वेद क्या हैं? (भाग ७C): उपनिषद – वेदांत दर्शन (द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत)

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वेद क्या हैं? श्रृंखला के पिछले अंकों का संक्षिप्त सार

  • भाग १–६: वेदों का स्वरूप और मर्यादा; उपवेद और पुरुषार्थ; मन्त्र संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद्; वेदांग; आगम-तन्त्र और षड्दर्शन; इतिहास, पुराण और धर्मशास्त्र।
  • भाग ७A: उपनिषद् शब्द का अर्थ; वेदांग, वेदान्त और उत्तर मीमांसा का भेद; चार महावाक्य; प्रस्थानत्रयी; आत्मा, ब्रह्म और मोक्ष का मूल विषय।
  • भाग ७B: दस प्रमुख उपनिषद्—ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय,छान्दोग्य और बृहदारण्यक—उनकी कथाएँ, उपमाएँ, विद्याएँ और जीवन-मूल्य।    

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उपनिषदों पर लेख में वेदांत दर्शन अद्वैत, विशिष्टाद्वैत और द्वैत क्यों?

'वेदान्त दर्शन' की चर्चा उपनिषद् ज्ञान के मूल मन्त्र हैं, और वेदान्त दर्शन उस ज्ञान को सुव्यवस्थित रूप से समझने की दार्शनिक मीमांसा है।

‘वेद क्या हैं?’ शृंखला के पिछले दो अंकों (भाग ७A और ७B) में हमने उपनिषदों के मूल भाव, उनकी प्रमुख कथाओं और दस प्रधान उपनिषदों के संदेश को समझा।

यद्यपि संपूर्ण वैदिक वाङ्मय का मूल अधिष्ठान और अंतिम लक्ष्य एक ही सत्य – परब्रह्म है, फिर भी यह प्रश्न उठता है कि उसी एक सत्य को आधार बनाकर अद्वैत, विशिष्टाद्वैत और द्वैत आदि विभिन्न दार्शनिक परंपराएँ कैसे विकसित हुईं?

यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि षड्दर्शनों में से अन्य पाँच दर्शनों (न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग और पूर्व मीमांसा) को छोड़कर हम यहाँ केवल ‘वेदान्त दर्शन’ की चर्चा क्यों कर रहे हैं?

इसका कारण यह है कि जहाँ अन्य पाँच दर्शनों का अपना स्वतंत्र प्रतिपाद्य विषय है, वहीं उत्तर मीमांसा (वेदान्त दर्शन) का संपूर्ण आधार और लक्ष्य ही उपनिषदों के मन्त्रों का तात्विक अर्थ-निर्णय करना है। उपनिषद् ज्ञान के मूल मन्त्र हैं, और वेदान्त दर्शन उस ज्ञान को सुव्यवस्थित रूप से समझने की दार्शनिक मीमांसा है। शेष दर्शनों पर हम इस शृंखला के आगामी स्वतंत्र अंकों में विस्तार से विचार करेंगे।

वास्तविक रूप से ‘वेदान्त‘ शब्द केवल उपनिषदों के लिए ही प्रयुक्त होता है। चूँकि ब्रह्मसूत्र, गीता, स्मृतियाँ और आचार्यों के भाष्य उपनिषदों के ही अर्थ का निर्णय करते हैं, इसलिए उन्हें भी औपचारिक रूप से ‘वेदान्त‘ कह दिया जाता है।

‘वेदान्त दर्शन‘ कैसे बना: उपनिषदों के वाक्यों का सही और निश्चित अर्थ तय करने के लिए महर्षि बादरायण ने ‘ब्रह्मसूत्र’ की रचना की। आगे चलकर इसी को ‘वेदान्त दर्शन‘ (उत्तर मीमांसा) कहा गया। आचार्यों के मत: उपनिषदों को प्रमाण मानने वाले सभी आचार्यों (आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य जी, मध्वाचार्य आदि) ने इसी ब्रह्मसूत्र पर अपने-अपने भाष्य लिखकर अद्वैत, विशिष्टाद्वैत और द्वैत जैसे दर्शन स्थापित किए।

जीव का ब्रह्म से क्या संबंध है? यह संसार वास्तविक है या केवल प्रतीति? और “तत्त्वमसि” जैसे महावाक्यों का यथार्थ अभिप्राय क्या है? हमारे प्राचीन आचार्यों ने वेदों के मन्त्रों का किस प्रकार समन्वय किया, इस अंक में हम इसे बिना किसी आग्रह या पूर्वाग्रह के, विशुद्ध दार्शनिक दृष्टि से समझेंगे।

एक मन्त्र और दो भिन्न दृष्टियाँ

उपनिषदों की शैली अत्यंत सूक्ष्म और काव्यात्मक है। एक ही मन्त्र को जब अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा जाता है, तो उसके अर्थ के भिन्न-भिन्न धरातल प्रकट होते हैं।

इसे समझने के लिए मुण्डकोपनिषद् का एक सुप्रसिद्ध रूपक देखिए:

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥ (मुण्डक० ३.१.१)

अर्थात एक ही वृक्ष पर दो सखा पक्षी बैठे हैं। उनमें से एक पक्षी वृक्ष के फलों को स्वाद ले-लेकर खाता है, जबकि दूसरा पक्षी फल खाए बिना केवल शांत भाव से देखता रहता है।

यह रूपक है तो अत्यधिक साधारण पर द्वैत और अद्वैत सिद्धांत समझने की दॄष्टि से अत्यंत महत्पूर्ण है । 

द्वैत दृष्टि:

द्वैत सिद्धांत अनुसार यहाँ दोनों पक्षी स्पष्ट रूप से अलग-अलग सत्ताएँ हैं। फल खाने वाला पक्षी जीवात्मा है, जो अपने कर्मों के सुख-दुःख भोगता है। दूसरा शांत बैठा पक्षी परमात्मा (ईश्वर) है, जो कर्मों के लेप से सर्वथा परे रहकर केवल साक्षी बना रहता है। इस दृष्टि से जीव और ईश्वर अनादि काल से दो भिन्न सत्ताएँ हैं – जीव सेवक है और ईश्वर उसका स्वामी।

अद्वैत दृष्टि:

भगवान् आदि शंकराचार्य की अद्वैत परंपरा इसे एक भिन्न धरातल पर देखती है। उनके अनुसार यह मन्त्र जीव और ईश्वर को दो पृथक् सत्ताएँ सिद्ध करने के लिए नहीं, बल्कि देह के भीतर उपाधि और शुद्ध साक्षी के विवेक को स्पष्ट करने के लिए है। फल भोगने वाला पक्षी वस्तुतः हमारा मन (अंतःकरण) है, जो सुख-दुःख और वासनाओं में लिप्त रहता है। जबकि दूसरा पक्षी हमारी शुद्ध आत्मा (चेतना) है, जो मन के इन विकारों से सर्वथा अछूती और शांत साक्षी है। जब मनुष्य चंचल मन के तादात्म्य से ऊपर उठकर उस साक्षी-भाव में स्थित होता है, तो उसे अपने वास्तविक अद्वैत ब्रह्म-स्वरूप का बोध हो जाता है।

यह केवल एक मन्त्र का उदाहरण है। उपनिषदों में जहाँ एक ओर जीव और ब्रह्म की पूर्ण एकता (अभेद) बताने वाले वाक्य मिलते हैं, वहीं दूसरी ओर दोनों के स्वरूप का भेद बताने वाले वाक्य भी प्रचुर मात्रा में हैं।

जब ये दोनों प्रकार के वचन एक ही श्रुति में मिलते हैं, तो अध्येता के मन में स्वाभाविक संशय होता है कि दोनों में समन्वय कैसे हो? उपनिषदों के इसी दार्शनिक समन्वय और निर्णायक अर्थ-बोध के लिए भगवान् बादरायण ने ‘ब्रह्मसूत्र‘ का प्रणयन किया, और आगे चलकर उसी सूत्र-परंपरा को स्पष्ट करने के लिए आचार्यों द्वारा स्वतंत्र ‘भाष्यों‘ की रचना हुई।

मुण्डकोपनिषद् का एक सुप्रसिद्ध रूपक -द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥

उपनिषदों की समन्वय-परंपरा: विभिन्न वेदान्त दर्शन मतों की प्रतिष्ठा कैसे हुई?

मुख्य रूप से ‘वेदान्त’ शब्द उपनिषदों के लिए ही प्रयुक्त होता है। उपनिषदों का अध्ययन करते समय पाठक के सामने एक स्वाभाविक जिज्ञासा खड़ी होती है:

  • कहीं तो मन्त्र जीव और ईश्वर को एक ही बताते हैं (जैसे ‘तत्त्वमसि‘),
  • और कहीं दोनों के बीच स्वामी और सेवक जैसा स्पष्ट अंतर दिखाते हैं (जैसे ‘ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशानीशौ‘ अर्थात् सर्वज्ञ ईश्वर स्वामी है और अल्पज्ञ जीव उसका अधीन)।

उपनिषदों के इन सभी वचनों में परस्पर कोई विरोध नहीं है, बल्कि एक ही सत्य के विभिन्न पहलू हैं। इस अंतर्निहित एकसूत्रता को स्पष्ट करने और उनका निश्चित दार्शनिक निर्णय देने के लिए महर्षि बादरायण (वेदव्यास) ने ‘ब्रह्मसूत्र‘ (उत्तर मीमांसा) की रचना की। चूँकि ब्रह्मसूत्र सीधे उपनिषदों के ही अर्थ का निर्णायक ग्रंथ है, इसलिए इसे औपचारिक रूप से ‘वेदान्त दर्शन‘ कहा गया।

दर्शन: श्रुति से भाष्य तक

सनातन परंपरा में कोई भी वेदान्त दर्शन इन तीन चरणों से होकर परिपक्व होता है:

  1. श्रुति (उपनिषद्): यह मूल ज्ञान की नींव है।
  2. सूत्र (ब्रह्मसूत्र): उपनिषदों के ज्ञान को व्यवस्थित करने वाला तार्किक ढाँचा।
  3. भाष्य (व्याख्या): ब्रह्मसूत्र के सूत्र बहुत छोटे और संकेतात्मक हैं, इसलिए आगे चलकर महान आचार्यों ने उन सूत्रों को विस्तार से समझाने के लिए अपने-अपने प्रामाणिक भाष्य लिखे।

जब आचार्यों ने ब्रह्मसूत्रों पर भाष्य लिखे, तो उनके सामने मुख्य चुनौती यह थी कि उपनिषदों में आने वाले विभिन्न प्रकार के मन्त्रों का आपस में तालमेल कैसे बिठाया जाए?

उपनिषदों के चार प्रकार के मन्त्र (श्रुतियाँ)

उपनिषदों को ध्यान से पढ़ने पर चार प्रकार के मन्त्र मुख्य रूप से दिखाई देते हैं:

  1. निर्गुण मन्त्र: जो ईश्वर को किसी भी रूप, सीमा या सांसारिक गुण से परे बताते हैं; जैसे—“निष्कलं निरञ्जनं निर्गुणम्” (वह निर्विकार और प्राकृत गुणों से रहित है)।
  2. सगुण मन्त्र: जो परमात्मा को दिव्य गुणों और शक्तियों का स्वामी बताते हैं; जैसे—“सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः“ (जिसके सभी संकल्प सत्य हैं)।
  3. अभेद मन्त्र: जो जीव और ईश्वर की मूल एकता की बात करते हैं; जैसे—“एकमेवाद्वितीयम्“ (सत्य केवल एक है) और “नेह नानास्ति किञ्चन” (यहाँ कोई अनेकता नहीं है)।
  4. भेद मन्त्र: जो जीव, संसार और ईश्वर के अलग-अलग अस्तित्व को स्पष्ट करते हैं; जैसे—“भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा“ (भोगने वाला जीव, भोगने की वस्तु संसार और चलाने वाला ईश्वर अलग-अलग हैं)।

विभिन्न वेदान्त दर्शन मतों की प्रतिष्ठा कैसे हुई - अद्वैत, विशिष्टाद्वैत और द्वैत

भाष्य और विभिन्न दर्शनों का जन्म

ऊपर से देखने पर इन चारों प्रकार के मन्त्रों में अंतर दिखता है। किसी आचार्य ने किसी भी मन्त्र को नकारा नहीं, बल्कि सबका समन्वय किया। अंतर केवल इस बात का था कि किस आचार्य ने किस प्रकार के मन्त्रों को आधार (केन्द्र) बनाकर बाकी मन्त्रों की व्याख्या की:

  • अद्वैत वेदान्त (आदि शंकराचार्य): इन्होंने ‘अभेद’ और ‘निर्गुण’ मन्त्रों को मुख्य आधार बनाया और यह सिद्ध किया कि अंततः जीव और ब्रह्म एक ही हैं। (इनका ग्रंथ: शाङ्कर-भाष्य)
  • विशिष्टाद्वैत वेदान्त (रामानुजाचार्य जी): इन्होंने भेद और अभेद दोनों को सत्य मानते हुए यह समझाया कि जैसे आत्मा के साथ शरीर जुड़ा रहता है, वैसे ही जीव और जगत परमात्मा के ‘शरीर’ हैं। (इनका ग्रंथ: श्रीभाष्य)
  • द्वैत वेदान्त (मध्वाचार्य): इन्होंने ‘भेद’ मन्त्रों को केंद्र में रखकर यह स्पष्ट किया कि जीव और परमात्मा अनादि काल से दो भिन्न सत्ताएँ हैं और जीव का कल्याण ईश्वर की भक्ति में ही है। (इनका ग्रंथ: पूर्णप्रज्ञ-भाष्य)
  • द्वैताद्वैत वेदान्त (निम्बार्काचार्य): इन्होंने भेद और अभेद दोनों को स्वाभाविक माना—जैसे सूर्य और उसकी किरण में एकत्व भी है और स्वरूप का अंतर भी। (ग्रंथ: वेदान्त पारिजात सौरभ)
  • शुद्धाद्वैत वेदान्त (वल्लभाचार्य): इन्होंने माना कि ब्रह्म बिना किसी माया के प्रभाव के, स्वयं ही अपनी इच्छा से जगत रूप में लीलापूर्वक प्रकट हुआ है; अतः संपूर्ण जगत ब्रह्म का ही सत्य स्वरूप है। (ग्रंथ: अणुभाष्य)

इस प्रकार, एक ही उपनिषद् और एक ही ब्रह्मसूत्र के आधार पर आचार्यों के भाष्यों से वेदान्त दर्शन की ये समृद्ध परंपराएँ स्थापित हुईं।

उपनिषदों पर भाष्य-परम्परा

उपनिषदों पर भाष्य-परम्परा।

अद्वैत वेदान्त (आदि शंकराचार्य)

अद्वैत का सीधा अर्थ है—’द्वैत से रहित’ अर्थात् जहाँ दो नहीं, केवल एक ही परम सत्य है। जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित अद्वैत दर्शन का संपूर्ण सार इस प्रसिद्ध श्लोकार्ध में मिलता है:

ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः॥

अर्थात्: केवल ब्रह्म ही सत्य है, यह जगत मिथ्या है, और जीव वस्तुतः ब्रह्म ही है, उससे अलग नहीं।

इस सूत्र को सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए अद्वैत के मुख्य सिद्धांतों को समझना आवश्यक है।

क. ‘मिथ्या‘ का वास्तविक अर्थ

साधारण बोलचाल में ‘मिथ्या’ का अर्थ ‘झूठ’ या ‘असत्य’ मान लिया जाता है, किंतु अद्वैत वेदान्त में इसका अर्थ बहुत गहरा है।

शंकराचार्य के अनुसार:

  • सत्य: वह है जो तीनों कालों (भूत, वर्तमान, भविष्य) में कभी न बदले। ऐसा नित्य तत्व केवल ब्रह्म है।
  • असत्: वह जिसका कोई अस्तित्व ही न हो; जैसे आकाश का फूल या खरगोश के सींग।
  • मिथ्या (अनिर्वचनीय): यह संसार न तो ब्रह्म की तरह सदा रहने वाला सत्य है (क्योंकि यह निरंतर बदलता है), और न ही यह आकाश-कुसुम की तरह असत् है (क्योंकि हमें इसका प्रत्यक्ष अनुभव होता है)।

अतः जो न पूरी तरह सत् है और न सर्वथा असत्, उस अनुभव में आने वाले जगत को अद्वैत में ‘मिथ्या’ (अनिर्वचनीय) कहा गया है।

ख. विवर्तवाद: जगत की रचना का रहस्य

ब्रह्म से यह जगत कैसे बना? इसे समझाने के लिए दर्शन में दो विचार हैं:

  1. परिणामवाद: जब मूल वस्तु वास्तव में बदलकर कुछ और बन जाए; जैसे दूध का दही बनना। इसमें दूध हमेशा के लिए बदल जाता है।
  2. विवर्तवाद (अद्वैत मत): जब मूल वस्तु में कोई वास्तविक बदलाव न हो, केवल अज्ञान के कारण वह कुछ और दिखाई देने लगे।
    • प्रसिद्ध उदाहरण: कम रोशनी में पड़ी रस्सी को देखकर साँप का भ्रम हो जाना। यहाँ रस्सी वास्तव में साँप नहीं बनी, रस्सी रस्सी ही रही; केवल भ्रम से साँप दिखाई दिया। रोशनी आते ही जैसे ही रस्सी का ज्ञान होता है, साँप का भ्रम अपने-आप समाप्त हो जाता है।

शंकराचार्य के अनुसार यह संसार ब्रह्म का ‘विवर्त‘ है। ब्रह्म में कोई विकार या बदलाव नहीं आया; वह अपनी अखंड अवस्था में ही है, केवल अज्ञान के कारण यह संसार दिखाई दे रहा है।

ग. माया की दो शक्तियाँ: आवरण और विक्षेप

यदि ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है, तो हमें यह अनेकता से भरा संसार क्यों दिखाई देता है? इसका कारण है—माया। माया के दो मुख्य कार्य होते हैं:

  • आवरण शक्ति: यह मूल सत्य को छिपा देती है। जैसे छोटा-सा बादल आँख के आगे आकर विशाल सूर्य को ढँक लेता है, वैसे ही यह शक्ति हमारे भीतर ब्रह्म के सत्य स्वरूप को ढँक देती है।
  • विक्षेप शक्ति: जब सत्य छिप जाता है, तब यह शक्ति उस पर एक नई कल्पना खड़ी कर देती है। जैसे रस्सी छिपते ही उस पर ‘साँप’ का भय खड़ा हो जाता है, वैसे ही ब्रह्म के छिपते ही यह पूरा संसार दिखाई देने लगता है।
घ. सत्ता के तीन स्तर (सत्य के तीन धरातल)

अद्वैत वेदान्त हमारे दैनिक जीवन और संसार के नियमों को नकारता नहीं है। इसे स्पष्ट करने के लिए सत्ता को तीन स्तरों पर बाँटा गया है:

अद्वैत वेदान्त हमारे दैनिक जीवन और संसार के नियमों को नकारता नहीं है। इसे स्पष्ट करने के लिए सत्ता को तीन स्तरों पर बाँटा गया है:

अद्वैत स्पष्ट कहता है कि जब तक मनुष्य को आत्मज्ञान (पारमार्थिक सत्य) का बोध नहीं हो जाता, तब तक यह व्यावहारिक जगत पूरी तरह सत्य की तरह काम करता है। नियम, कर्तव्य, समाज, पूजा और सदाचार सब अपने स्थान पर आवश्यक हैं। इसलिए अद्वैत जगत् के व्यवहार का निषेध नहीं करता। आत्मज्ञान होने तक सभी लौकिक और वैदिक व्यवहार चलते रहते हैं।

ङ. जीव, ईश्वर और मोक्ष

माया के दो रूप (जीव और ईश्वर):

शुद्ध चैतन्य जब माया की उपाधि को अपने वश में रखता है, तो वह सर्वज्ञ और सर्वनियन्ता ईश्वर कहलाता है। वही चैतन्य जब अंतःकरण और अविद्या की उपाधि से बँधकर अपने को कर्ता-भोक्ता मानने लगता है, तो जीव कहलाता है।

इस संबंध में पंचदशीकार श्रीविद्यारण्य स्वामी का सुप्रसिद्ध श्लोक है:

मायाख्यायाः कामधेनोर्वत्सौ जीवेश्वरावुभौ। यथेच्छं पिबतां द्वैतं तत्त्वं त्वद्वैतमेव हि॥

अर्थात्: माया रूपी कामधेनु के दो बछड़े हैं—जीव और ईश्वर। वे व्यावहारिक जगत में अपनी इच्छा से द्वैत का कितना भी उपभोग करें, किन्तु परमार्थ सत्य तो विशुद्ध अद्वैत ही है।

व्यावहारिक द्वैत और उपासना का सम्मान:

अद्वैत वेदान्त पूजा, उपासना, गुरु-शिष्य परंपरा और शास्त्र-मर्यादा का निषेध नहीं करता। जब तक देह-भाव है, तब तक उपास्य-उपासक भाव पूर्णतः सत्य है। बृहदारण्यकोपनिषद् (२.४.१४) स्पष्ट कहता है: “यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति…” (जहाँ द्वैत-सा प्रतीत होता है, वहाँ एक दूसरे को देखता है; किन्तु जहाँ सब आत्मरूप हो जाता है, वहाँ कौन किसे देखे?)।

ज्ञान का अधिकारी (साधन-चतुष्टय):

कर्म और निष्काम सेवा से चित्त की शुद्धि होती है, किन्तु अविद्या का नाश केवल ज्ञान से होता है। आत्मज्ञान के लिए शास्त्र चार अनिवार्य योग्यताएँ (साधन-चतुष्टय) बताते हैं:

  1. विवेक: नित्य (सत्य) और अनित्य का भेद जानना।
  2. वैराग्य: इस लोक और परलोक के नश्वर भोगों से विरक्ति।
  3. षट्-सम्पत्ति: शम (मन का संयम), दम (इंद्रिय-निग्रह), उपरति (विषयों से निवृत्ति), तितिक्षा (सहनशीलता), समाधान (चित्त की एकाग्रता) और श्रद्धा।
  4. मुमुक्षुत्व: मोक्ष पाने की तीव्र अभीप्सा।
‘तत्त्वमसि‘ और जीवन्मुक्ति:

इन योग्यताओं से युक्त साधक जब गुरु के सान्निध्य में जाकर श्रवण, मनन और निदिध्यासन करता है, तब “तत्त्वमसि” (वह ब्रह्म तुम्हीं हो) महावाक्य से अविद्या का पर्दा हट जाता है और “अहं ब्रह्मास्मि” का अपरोक्ष अनुभव होता है। ऐसा पुरुष शरीर रहते हुए भी अहंकार और वासनाओं से मुक्त हो जाता है, जिसे ‘जीवन्मुक्ति’ कहते हैं।

इन पाँच सिद्धांतों का तात्पर्य क्या है?
  1. यदि ब्रह्म ही सत्य है, तो यह संसार क्या है? ‘मिथ्या‘ (अनिर्वचनीय)।
  2. यदि संसार मिथ्या है, तो बना कैसे? ‘विवर्त‘ (रस्सी में साँप का केवल भ्रम, कोई वास्तविक बदलाव नहीं)।
  3. यह भ्रम हुआ क्यों? ‘माया‘ (आवरण ने सत्य छिपाया, विक्षेप ने संसार दिखा दिया)।
  4. यदि यह सब भ्रम है, तो हम दिनभर जो खाते-पीते, जीते-मरते हैं वह क्या है? ‘व्यावहारिक सत्ता‘ (जब तक नींद नहीं टूटती, तब तक सपना सच लगता है)।
  5. तो फिर इस जीवन का अंतिम समाधान क्या है? ‘जीव वस्तुतः ब्रह्म ही है‘ (उपाधि हटी और जीवन्मुक्ति मिली) ।

जब हम इन पाँचों अंगों को एक साथ जोड़कर देखते हैं, तो अद्वैत वेदान्त का पूरा चित्र बिल्कुल साफ हो जाता है:

  • उपनिषदों के भेद और अभेद का समाधान: शंकराचार्य यह सिद्ध करते हैं कि उपनिषदों में जहाँ भी भेद (जीव और ईश्वर का अंतर, कर्म, पूजा, उपासना) की बात आई है, वह ‘व्यावहारिक सत्ता’ के लिए है। जब तक देह-भाव और अज्ञान है, तब तक भेद का पूरा आदर है।
  • परम सत्य केवल अभेद है: किन्तु जहाँ उपनिषद् “तत्त्वमसि” या “अहं ब्रह्मास्मि” कहते हैं, वह ‘पारमार्थिक सत्ता’ का अंतिम सत्य है। ज्ञान होते ही अविद्या (माया) का आवरण हट जाता है और साधक जान लेता है कि रस्सी कभी साँप बनी ही नहीं थी; वैसे ही ब्रह्म कभी जीव या संसार बना ही नहीं, वह सदा अपनी अखंड सत्ता में ही था।
  • साधना का मर्म: संसार को छोड़ना नहीं है, केवल संसार के प्रति अपनी दृष्टि बदलनी है। अद्वैत कहता है कि आप पहले से ही मुक्त स्वरूप ब्रह्म हैं, केवल भूलवश अपने को सीमित जीव मान बैठे हैं। उस भूल का मिट जाना ही ‘मोक्ष‘ है।

अद्वैत वेदान्त (आदि शंकराचार्य)

विशिष्टाद्वैत वेदान्त (रामानुजाचार्य जी)

अद्वैत वेदान्त को समझने के बाद पाठक के मन में स्वाभाविक प्रश्न उठता है:

“यदि शंकराचार्य के अनुसार केवल ब्रह्म ही सत्य है और यह संसार केवल एक प्रतीति (भ्रम) है, तो फिर हमारे सुख-दुःख, यह विशाल सृष्टि और ईश्वर की भक्ति का क्या स्थान है?”

इसी जिज्ञासा का अत्यंत समन्वयात्मक समाधान प्रस्तुत करते हुए भगवद्पाद रामानुजाचार्य जी ने ‘विशिष्ट-अद्वैत’ की स्थापना की। उनका प्रस्थान-बिन्दु यह है कि उपनिषद् ज्ञाननिधि हैं; उनका प्रत्येक वाक्य यथार्थ सत्य का ही प्रतिपादन करता है, किसी भ्रम का नहीं।

क. अद्वैत में ‘विशिष्ट‘ क्या है? (सीधा और सरल अंतर)

रामानुजाचार्य जी भी शंकराचार्य की तरह यही मानते हैं कि परम सत्य केवल एक ही है (अद्वैत)। फर्क केवल इस बात का है कि वह ‘एक’ कैसा है:

  • अद्वैत की दृष्टि: वह एक परब्रह्म अकेला और शांत है; उसमें कोई सांसारिक रंग, रूप या भेद नहीं है।
  • विशिष्ट-अद्वैत की दृष्टि: वह एक परब्रह्म शून्य जैसा खाली या अकेला नहीं है, बल्कि समस्त जीवों और इस पूरी प्रकृति के दिव्य ऐश्वर्य से सजा हुआ (विशिष्ट) है।

(जैसे शांत समुद्र भी समुद्र है, और अनगिनत तरंगों से युक्त समुद्र भी वही एक समुद्र है। तरंगें समुद्र से अलग कोई दूसरी वस्तु नहीं हैं।)

अद्वैत में 'विशिष्ट' क्या है?

ख. शरीर-शरीरी संबंध: जीव और जगत का वास्तविक स्वरूप

अद्वैत ने कहा था कि संसार रस्सी में साँप की तरह केवल अज्ञान के कारण भासता है। इसके समानांतर, भगवद्पाद रामानुजाचार्य जी उपनिषदों की एक दूसरी परंपरा को सामने लाते हैं: “संसार भी सत्य है और इसे रचने वाले परमात्मा भी सत्य हैं।”  

जीव, जगत और ईश्वर के इस संबंध को स्पष्ट करने के लिए वे उपनिषदों का प्रसिद्ध सिद्धांत प्रस्तुत करते हैं – शरीर और आत्मा का संबंध (शरीर-शरीरी भाव):

  • जैसे हमारा भौतिक शरीर हमारी अंतरात्मा के अधीन रहता है, वैसे ही यह संपूर्ण जड़ प्रकृति और समस्त चेतन जीव परमात्मा का पावन शरीर हैं।
  • और परमात्मा सबके अंतर में बैठकर सबको धारण और नियमित करने वाले ‘अन्तर्यामी‘ (शरीरी) हैं।

दृष्टिकोण का समन्वय:

  • अद्वैत साधना के उस शिखर की बात करता है जहाँ उपाधियाँ विलीन हो जाती हैं और साधक केवल शुद्ध चैतन्य का अनुभव करता है (“अहं ब्रह्मास्मि”)।
  • विशिष्ट-अद्वैत भक्ति और संबंध की उस मधुरता को प्रतिष्ठित करता है जहाँ जीव स्वयं को परमात्मा के विराट शरीर का एक नित्य, चेतन और समर्पित अंग (दास) अनुभव करता है।
ग. अर्थपञ्चक: जीवन के पाँच मूल प्रश्नों का वेदान्तिक समाधान

जैसा कि हमने इस शृंखला के भाग २ में समझा था, हमारे वेदों और शास्त्रों का मुख्य लक्ष्य जीवन के पाँच आधारभूत प्रश्नों (अर्थपञ्चक) का उत्तर देना ही है।

रामानुजाचार्य जी जी ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘श्रीभाष्य’ (ब्रह्मसूत्र की व्याख्या) में इन्हीं पाँच प्रश्नों का अंतिम दार्शनिक निर्णय दिया है:

हमारे वेदों और शास्त्रों का मुख्य लक्ष्य जीवन के पाँच आधारभूत प्रश्नों (अर्थपञ्चक) का उत्तर देना ही है।

अर्थपञ्चक के पाँच तत्त्व

घ. उपनिषदों की पहेली: जब ब्रह्म ‘सगुण‘ है, तो श्रुति उसे ‘निर्गुण‘ क्यों कहती है? (उभयलिङ्ग समाधान)

रामानुजाचार्य जी जब यह स्थापित करते हैं कि परब्रह्म अनंत कल्याणकारी गुणों से युक्त (सगुण) हैं, तब उपनिषदों के वे मन्त्र सामने आते हैं जो स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि ब्रह्म ‘निर्गुण’ है।

अद्वैत और विशिष्टाद्वैत के बीच यह एक बड़ा विचारणीय प्रश्न था: क्या सगुण रूप केवल कल्पना है, या निर्गुण और सगुण दोनों एक साथ सत्य हो सकते हैं?

भगवद्पाद रामानुजाचार्य जी ‘श्रीभाष्य’ में ब्रह्मसूत्र के ‘उभयलिङ्ग अधिकरण’ (३.२.११–२५) के आधार पर इस पहेली का अत्यंत सुंदर समाधान देते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि परमात्मा के स्वरूप की पहचान के दो नित्य लक्षण (उभयलिङ्ग) हैं, और दोनों एक साथ सत्य हैं:

  1. पहला लक्षण—दोषों से परे (निर्गुण / अखिल-हेय-प्रत्यनीकत्व):

उपनिषदों में जहाँ भी ब्रह्म को ‘निर्गुण’ कहा गया है, उसका अर्थ गुणों का अभाव नहीं है। उसका वास्तविक अर्थ है कि परमात्मा संसार के समस्त प्राकृत, क्षुद्र, नाशवान और निंदित दोषों—जैसे काम, क्रोध, अज्ञान, वासना और जन्म-मरण—से सर्वथा रहित हैं। यानी वे दोष-रहित होने के कारण ‘निर्गुण’ हैं।

  1. दूसरा लक्षण—दिव्य गुणों के भंडार (सगुण / कल्याणैकतानता):

परमात्मा ज्ञान, बल, ऐश्वर्य, शक्ति, वात्सल्य और अपार करुणा जैसे अनंत दिव्य कल्याणकारी गुणों के नित्य आश्रय हैं। उपनिषदों में जहाँ भी उन्हें ‘सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः’ कहा गया है, वह उनका वास्तविक स्वरूप है। यानी वे दिव्य गुणों से संपन्न होने के कारण ‘सगुण’ हैं।

  • सगुण का सबसे अनूठा गुण: ‘सौशील्य‘ (सुशीलता):

विशिष्टाद्वैत में भगवान् के ऐश्वर्य से भी बढ़कर उनके ‘सौशील्य’ को महत्व दिया गया है। इसका अर्थ है—इतना परम महान्, सर्वशक्तिमान और त्रिलोकीनाथ होकर भी, जब कोई अत्यंत साधारण, दीन-हीन जीव उनकी शरण में आता है, तो वे अपने बड़प्पन का तनिक भी अभिमान किए बिना उसे अपने हृदय से लगा लेते हैं।

संक्षेप में: विशिष्टाद्वैत उपनिषदों के दोनों वचनों को पूर्ण सत्य मानता है—दोषों और सीमाओं की दृष्टि से भगवान् ‘निर्गुण’ हैं, और अपने अनंत दिव्य प्रेम व वात्सल्य की दृष्टि से ‘सगुण’ हैं।

उपनिषदों की पहेली: जब ब्रह्म 'सगुण' है, तो श्रुति उसे 'निर्गुण' क्यों कहती है? (उभयलिङ्ग समाधान)

ङ. अद्वैत और विशिष्टाद्वैत में साधना और मोक्ष का अंतर

अंत में पाठक के लिए यह समझना आवश्यक है कि दोनों मार्गों में चलने वाले साधक की साधना दृष्टि में क्या भेद है:

अद्वैत का पथ (ज्ञान मार्ग):

यहाँ साधक का भाव है—“अहं ब्रह्मास्मि” (मैं ही ब्रह्म हूँ)। इसका लक्ष्य स्वयं को शरीर और प्रकृति के भ्रम से मुक्त करके अपने शुद्ध आत्म-स्वरूप में लीन हो जाना है।

विशिष्ट-अद्वैत का पथ (भक्ति और शरणागति मार्ग):

यहाँ भक्त का भाव है—“हे नाथ! मैं आपका हूँ” (सेवक-स्वामी भाव)। अहंकारी व्यक्ति कभी सच्चा प्रेमी या सेवक नहीं हो सकता। इसलिए साधक अपने अहंकार को प्रभु के चरणों में समर्पित करके ‘प्रपन्न’ (शरणागत) हो जाता है।

यहाँ मोक्ष का अर्थ समाप्त हो जाना नहीं, बल्कि भगवान् के नित्य धाम में उनके सान्निध्य में रहकर सदा उनके दिव्य प्रेम और सेवा के अखंड रस में निमग्न रहना है।

अद्वैत और विशिष्टाद्वैत में साधना और मोक्ष का अंतर

द्वैत वेदान्त: श्रीमन्मध्वाचार्य का दृष्टिकोण

अद्वैत (शंकराचार्य) और विशिष्टाद्वैत (रामानुजाचार्य) को समझने के बाद वेदान्त की यात्रा का तीसरा मुख्य सोपान आता है—द्वैत वेदान्त। इसके प्रणेता जगद्गुरु श्रीमन्मध्वाचार्य (आनन्दतीर्थ) हैं।

द्वैत दर्शन को समझने के लिए सबसे पहले यह देखना होगा कि मध्वाचार्य जी का प्रस्थान-बिन्दु क्या था और उन्होंने पूर्ववर्ती दोनों मतों से अलग क्या दृष्टि रखी।

क. अद्वैत और विशिष्टाद्वैत से द्वैत का मौलिक अंतर

साधारण पाठक के मन में यह सवाल उठता है कि जब अद्वैत ने ‘अभेद’ (एकत्व) और विशिष्टाद्वैत ने ‘शरीर-शरीरी भाव’ से समन्वय कर ही दिया था, तो मध्वाचार्य जी को ‘द्वैत’ की स्थापना क्यों करनी पड़ी?

तीनों दर्शनों का मूल अंतर इस सरल तुलना से स्पष्ट हो जाता है:

अद्वैत और विशिष्टाद्वैत से द्वैत का मौलिक अंतर

ख. दो मूल तत्त्व: स्वतंत्र और परतंत्र

मध्वाचार्य जी ने संपूर्ण ब्रह्मांड के सभी पदार्थों को केवल दो श्रेणियों में बाँटा:

  1. स्वतंत्र तत्त्व:

वह जो अपनी सत्ता, ज्ञान और क्रिया के लिए किसी अन्य पर निर्भर न हो। ऐसा स्वतंत्र तत्त्व केवल और केवल परब्रह्म (भगवान् श्रीहरि / नारायण) हैं। वे सर्वशक्तिमान, निर्दोष और समस्त सद्गुणों के सागर हैं।

  1. परतंत्र तत्त्व:

जो अपने अस्तित्व, चेतना और गति के लिए पूरी तरह भगवान् के अधीन हों। इसमें दो आते हैं:

  • चेतन जीव: हम सभी जीवात्माएँ।
  • अचेतन प्रकृति: यह जड़ संसार, पंचमहाभूत और समय।

मध्वाचार्य जी का स्पष्ट सूत्र है: “हरिः परतरः”—भगवान् श्रीहरि ही सर्वोच्च और स्वतंत्र हैं, और बाकी सब कुछ उनके पूर्ण नियंत्रण में है।

द्वैत (मध्वाचार्य)-मध्वाचार्य जी का स्पष्ट सूत्र है: "हरिः परतरः"- भगवान् श्रीहरि ही सर्वोच्च और स्वतंत्र हैं, और बाकी सब कुछ उनके पूर्ण नियंत्रण में है।

ग. पञ्चभेद: द्वैत दर्शन की आधारशिला

द्वैत वेदान्त का सबसे प्रसिद्ध और केंद्रीय सिद्धांत है-पञ्चभेद (पाँच वास्तविक अंतर)।

मध्वाचार्य जी का कहना है कि यह भेद केवल देखने का भ्रम नहीं है, बल्कि सृष्टि का सनातन और कभी न मिटने वाला सत्य है:

इस भेद का व्यावहारिक अर्थ:

मोक्ष मिलने के बाद भी जीव कभी भगवान् नहीं बन जाता। जैसे एक सेवक अपने स्वामी से कितना भी प्रेम करे, वह स्वामी नहीं बनता; वैसे ही मुक्त होकर भी जीव भगवान् का नित्य उपासक ही रहता है।

द्वैत वेदान्त के पञ्चभेद - श्रीमन्मध्वाचार्य दर्शन -द्वैत वेदान्त का सबसे प्रसिद्ध और केंद्रीय सिद्धांत है - पञ्चभेद (पाँच वास्तविक अंतर)।

घ. उपनिषदों के महावाक्यों की व्याख्या: ‘तत्त्वमसि‘ का मर्म

जब उपनिषदों में कहा गया है कि “तत्त्वमसि” (वह तुम हो), तो द्वैत दर्शन इसकी व्याख्या कैसे करता है?

मध्वाचार्य जी कहते हैं कि यदि इसका अर्थ “जीव ही ईश्वर है” मान लिया जाए, तो वेद का उपहास होगा; क्योंकि जीव अल्पज्ञ (कम जानने वाला) और दुःखी है, जबकि ईश्वर सर्वज्ञ और आनंदमय हैं। दोनों एक कैसे हो सकते हैं?

द्वैत वेदान्त इसके दो समाधान देता है:

  1. सादृश्य (समानता) का बोध: जैसे हम किसी वीर पुरुष को देखकर कहते हैं कि “यह तो साक्षात् सिंह है”, इसका अर्थ यह नहीं होता कि वह सचमुच चार पैरों वाला जानवर बन गया; इसका अर्थ है कि उसमें सिंह जैसे गुण हैं। वैसे ही जीव अपने शुद्ध रूप में ज्ञान और आनंद के गुणों में भगवान् के सदृश (प्रतिबिम्ब) है।
  2. पद-च्छेद का भेद: छांदोग्य उपनिषद् के उस प्रसंग में नौ बार उदाहरण देकर समझाया गया है कि कैसे जीव परमात्मा के अधीन है। मध्वाचार्य जी वहाँ पद-विच्छेद करते हैं—“अतत्वमसि” (अ-तत् त्वम् असि) अर्थात् “तुम वह (स्वतंत्र ईश्वर) नहीं हो, तुम तो उसके आश्रित हो।”
ङ. जीव-तारतम्य और मोक्ष का स्वरूप

द्वैत दर्शन की एक और अनूठी विशेषता है—तारतम्य (श्रेणीबद्ध भिन्नता):

  • सभी जीव एक जैसे नहीं हैं। प्रत्येक जीवात्मा की अपनी आंतरिक योग्यता, स्वभाव और पात्रता अलग है।
  • साधना के द्वारा जब जीव अज्ञान के आवरण से मुक्त होता है, तो उसे भगवान् के दर्शन (अपरोक्ष ज्ञान) होते हैं।

मोक्ष का साधन:

मध्वाचार्य जी के अनुसार मोक्ष केवल ज्ञान की शुष्क चर्चा से नहीं, बल्कि “माहात्म्यज्ञानपूर्वस्तु सुदृढ़ः सर्वतोऽधिकः स्नेहो भक्तिरिति प्रोक्ता” – भगवान् के परम ऐश्वर्य और बड़प्पन को जानकर उनके प्रति किया गया अटूट, सर्वोच्च और निष्काम प्रेम ही भक्ति है। केवल इसी भक्ति और भगवान् श्रीहरि के अनुग्रह (प्रसाद) से मुक्ति संभव है।

मोक्ष की अवस्था:

मुक्ति के बाद जीव वैकुण्ठ में अपनी-अपनी पात्रता के अनुसार भगवान् के अलौकिक आनंद का आस्वादन करता है। वहाँ भी भगवान् के प्रति उसकी सेवा और प्रीति सदा बनी रहती है।

इस प्रकार द्वैत वेदान्त ईश्वर की परम स्वतंत्रता और जीव की अनन्य भक्ति को सर्वोपरि स्थान देता है।

द्वैत वेदान्त ईश्वर की परम स्वतंत्रता और जीव की अनन्य भक्ति को सर्वोपरि स्थान देता है।

द्वैताद्वैत वेदान्त: भगवन्निम्बार्काचार्य का दृष्टिकोण

अद्वैत (केवल अभेद), विशिष्टाद्वैत (शरीर-शरीरी भाव से समन्वय) और द्वैत (केवल नित्य भेद) को समझने के बाद वेदान्त का चौथा प्रमुख दर्शन आता है—द्वैताद्वैत वेदान्त। इसे ‘भेदाभेद वाद‘ या ‘सनकादि सम्प्रदाय‘ भी कहा जाता है।

इसके प्रणेता जगद्गुरु भगवन्निम्बार्काचार्य हैं। उनका दृष्टिकोण यह है कि उपनिषदों में भेद और अभेद दोनों का वर्णन है, इसलिए दोनों ही समान रूप से सत्य और नित्य हैं।

क. नाम का अर्थ: द्वैत + अद्वैत = द्वैताद्वैत
  • द्वैत: भेद (जीव और जगत ईश्वर से भिन्न हैं)।
  • अद्वैत: अभेद (जीव और जगत ईश्वर से अभिन्न हैं)।
  • द्वैताद्वैत: भेद और अभेद दोनों एक साथ, बिना किसी विरोध के, स्वाभाविक रूप से सत्य हैं।
ख. भेद और अभेद का स्वाभाविक संबंध (स्वाभाविक भेदाभेद)

निम्बार्काचार्य जी कहते हैं कि भेद और अभेद को सिद्ध करने के लिए किसी ‘माया’ या ‘उपाधि’ की कल्पना करने की आवश्यकता नहीं है; यह संबंध सर्वथा स्वाभाविक है।

इसे समझने के लिए वे दो अत्यंत सहज दृष्टान्त देते हैं:

  1. सूर्य और उसकी किरणें:
    • किरणें सूर्य से भिन्न (अलग) दिखाई देती हैं, क्योंकि वे पृथ्वी तक आती हैं जबकि सूर्य आकाश में रहता है। यह भेद (द्वैत) है।
    • किन्तु किरणें सूर्य से कभी अलग नहीं हो सकतीं; उनका अस्तित्व ही सूर्य के प्रकाश से है। यह अभेद (अद्वैत) है।
  2. समुद्र और उसकी तरंगें:
    • तरंग समुद्र नहीं है (तरंग छोटी है, समुद्र अगाध है)—यह भेद है।
    • किन्तु तरंग का सारा जल समुद्र का ही है, वह समुद्र से पृथक् कोई स्वतंत्र वस्तु नहीं—यह अभेद है।
ग. तीन मूल तत्त्व (तत्त्व-त्रय)

निम्बार्क दर्शन में तीन नित्य तत्त्व स्वीकार किए गए हैं:

१. ब्रह्म (परमात्मा): समस्त कल्याणकारी गुणों से युक्त, स्वतंत्र नियामक भगवान् श्रीराधा-कृष्ण।

२. चित् (जीवात्मा): ज्ञानस्वरूप, अणु-परिमाण (अत्यंत सूक्ष्म), किन्तु संख्या में अनंत और परमात्मा के आश्रित।

३. अचित् (जड़ प्रकृति): भौतिक संसार, जो विकारों से युक्त और जीवों के भोग का साधन है।

जीव और प्रकृति परमात्मा पर पूरी तरह आश्रित होने के कारण उनसे अभिन्न (अद्वैत) हैं, किन्तु अपनी पृथक् सत्ता रखने के कारण उनसे भिन्न (द्वैत) भी हैं।

घ. साधना और मोक्ष का स्वरूप: युगल उपासना

साधना का मार्ग:

कर्म और ज्ञान चित्त की शुद्धि और भगवत्-तत्त्व को समझने में सहायक हैं, किन्तु मोक्ष का साक्षात् साधन ‘प्रेम-लक्षणा भक्ति‘ और ‘शरणागति‘ (प्रपत्ति) है।

उपास्य स्वरूप:

निम्बार्क सम्प्रदाय की सबसे बड़ी विशेषता है—परब्रह्म के रूप में भगवान् श्रीकृष्ण और भगवती श्रीराधा रानी की नित्य युगल उपासना।

मोक्ष का स्वरूप:

मुक्ति के बाद जीव का व्यक्तित्व नष्ट नहीं होता। वह भगवान् के नित्य दिव्य धाम (गोलोक/निकुंज) में पहुँचकर युगल सरकार की नित्य सेवा और अप्रतिम आनन्द का अनुभव करता है।

द्वैताद्वैत वेदान्त। इसे 'भेदाभेद वाद' या 'सनकादि सम्प्रदाय' भी कहा जाता है।

शुद्धाद्वैत वेदान्त: जगद्गुरु वल्लभाचार्य का दृष्टिकोण

वेदान्त की पाँचवीं प्रमुख धारा है—शुद्धाद्वैत वेदान्त (जिसे ‘पुष्टिमार्ग‘ या ‘रुद्र सम्प्रदाय‘ की परंपरा भी कहा जाता है)। इसके प्रणेता श्रीमद्वल्लभाचार्य महाप्रभु हैं।

क. ‘शुद्धाद्वैत‘ का वास्तविक अर्थ
  • शुद्धयोः अद्वैतं शुद्धाद्वैतम्:

यहाँ ‘शुद्ध’ का अर्थ है—माया के संबंध से रहित।

  • शंकराचार्य के अद्वैत में संसार की प्रतीति के लिए ‘माया’ (अविद्या) को कारण माना गया था।
  • वल्लभाचार्य जी का कहना है कि ब्रह्म और यह जगत माया के बिना ही, अपनी विशुद्ध अवस्था में एक (अभिन्न) हैं। ब्रह्म विशुद्ध सत्य है और यह जगत भी ब्रह्म का ही विशुद्ध, वास्तविक रूप है; इसमें रत्ती भर भी अविद्या या भ्रम का मिश्रण नहीं है।
ख. अविकृत परिणामवाद (अग्नि और स्फुलिंग का दृष्टान्त)

ब्रह्म से संसार कैसे बना? वल्लभाचार्य जी का सिद्धांत है—‘अविकृत परिणामवाद‘:

  • इसका अर्थ है: ब्रह्म स्वयं जगत के रूप में प्रकट हुआ, किन्तु ऐसा होते हुए भी उसके मूल स्वरूप में कोई विकार, कमी या विकृति नहीं आई।
  • दृष्टान्त (अग्नि और चिनगारी):

जैसे विशाल प्रज्वलित अग्नि से करोड़ों चिनगारियाँ (स्फुलिंग) निकलती हैं। चिनगारी अग्नि का ही अंश है, उसमें अग्नि का ही तत्त्व है।

उसी प्रकार समस्त जीव और यह संसार परब्रह्म के ही साक्षात् अंश हैं। जब भगवान् अपनी इच्छा से अपने ‘आनन्द’ अंश को छिपा (तिरोहित कर) लेते हैं, तो जीव प्रकट होता है; और जब ‘चित्’ (चेतना) और ‘आनन्द’ दोनों को छिपा लेते हैं, तो जड़ जगत प्रकट होता है।

ग. संसार और जगत का भेद

वल्लभाचार्य जी ने भ्रम को दूर करने के लिए बहुत सुंदर विभाजन किया:

  • जगत (सत्य): यह भौतिक सृष्टि भगवान् का अपना स्वरूप है, इसलिए यह पूर्णतः सत्य और नित्य है।
  • संसार (मिथ्या): मनुष्य अपने मन में ‘मैं’ और ‘मेरा’ (अहंता और ममता) का जो काल्पनिक ताना-बाना बुनता है, वह संसार है। ज्ञान और भक्ति से इस ‘संसार’ (अहंकार) का नाश होता है, भगवान् के बनाए ‘जगत’ का नहीं।
घ. पुष्टिमार्ग: भगवद्-अनुग्रह ही सब कुछ है

‘पुष्टि‘ का अर्थ: भागवत के अनुसार “पोषणं तदनुग्रहः”—भगवान् का विशेष अनुग्रह (कृपा) ही ‘पुष्टि’ है।

साधना और भाव:

पुष्टिमार्ग में साधक किसी फल की इच्छा या मोक्ष के लोभ से साधन नहीं करता। वह केवल भगवान् श्रीकृष्ण के सुख के लिए, वात्सल्य या माधुर्य भाव से उनकी निष्काम ‘सेवा‘ करता है।

मोक्ष: मुक्ति कोई अलग अवस्था नहीं है, भगवान् की नित्य रास-लीला और सेवा के अलौकिक आनन्द में लीन हो जाना ही पुष्टि भक्त का परम फल है।

शुद्धाद्वैत वेदान्त (जिसे 'पुष्टिमार्ग' या 'रुद्र सम्प्रदाय' की परंपरा भी कहा जाता है)। इसके प्रणेता श्रीमद्वल्लभाचार्य महाप्रभु हैं।

पाँचों वेदान्त दर्शन: एक विहंगावलोकन (तुलनात्मक तालिका)

पाठक की सुविधा के लिए वेदान्त के इन पाँचों प्रमुख सम्प्रदायों के मूल दृष्टिकोण को एक साथ इस प्रकार देखा जा सकता है:

पाँचों वेदान्त दर्शन: एक विहंगावलोकन (तुलनात्मक तालिका)-. अद्वैत, द्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत,द्वैताद्वैत

वेदान्त का मूल स्वर: सभी परंपराओं में अंतर्निहित समन्वय

पाँचों आचार्यों के दृष्टिकोण में ऊपर से भेद दिखाई देने पर भी, अंतःसलिला सरस्वती की भाँति कुछ ऐसे मूलभूत शाश्वत सत्य हैं जो सभी वेदान्त परंपराओं में समान रूप से प्रतिष्ठित हैं:

श्रुति (उपनिषद्) का निरपेक्ष प्रामाण्य:

सभी आचार्यों ने वेदों और विशेष रूप से उपनिषदों को अपौरुषेय और ज्ञान का सर्वोच्च प्रमाण स्वीकार किया है। किसी भी संप्रदाय ने श्रुति की प्रामाणिकता पर प्रश्न नहीं उठाया; सभी का लक्ष्य उपनिषदों के ऋषियों के वचनों को अपने-अपने दार्शनिक धरातल पर पूर्ण सत्य सिद्ध करना ही रहा।

प्रस्थानत्रयी की सार्वभौमिक नींव:

प्रत्येक वेदान्त दर्शन का अधिष्ठान सनातन प्रस्थानत्रयी पर ही टिका है – उपनिषद् (श्रुति प्रस्थान), भगवद्गीता (स्मृति प्रस्थान) और ब्रह्मसूत्र (न्याय प्रस्थान)। इनमें से किसी एक की भी उपेक्षा करके कोई वेदान्त सम्प्रदाय खड़ा नहीं हो सकता।

परम पुरुषार्थ के रूप में मोक्ष:

संसार को अनादि और त्रिविध तापों (आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक) का क्षेत्र मानते हुए सभी मत एकमत हैं कि मानव जीवन का चरम लक्ष्य केवल लौकिक अभ्युदय नहीं, अपितु अविद्या और कर्म-बंधनों से परे शाश्वत आनंद (मोक्ष) की प्राप्ति है।

अन्तःकरण की शुद्धि और निष्काम साधना:

चाहे अद्वैत का विवेक-वैराग्य युक्त ज्ञान-मार्ग हो या वैष्णव आचार्यों का भक्ति और शरणागति-मार्ग – सभी आचार्यों ने षड्विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मद आदि) के शमन, गुरु-निष्ठा, शास्त्र-मर्यादा और निष्काम भाव को साधना की प्रथम अनिवार्य शर्त माना है।

व्यावहारिक धर्म और सदाचार का सम्मान:

अद्वैत जिसे ‘व्यावहारिक सत्ता’ कहकर धर्म, उपासना और कर्तव्य-कर्म का आदर करता है, वहीं अन्य आचार्य जगत को भगवान् का पावन शरीर, लीला या अविकृत स्वरूप मानकर पूज्य दृष्टि रखते हैं। किसी भी दर्शन में सामाजिक मर्यादा, नीति और सदाचार की उपेक्षा नहीं है।

उपसंहार

उपनिषदों का अनुशीलन करते हुए यह स्पष्ट होता है कि उनके मन्त्र उस परम दार्शनिक प्रज्ञा का अधिष्ठान हैं जिसे महर्षि बादरायण ने ‘ब्रह्मसूत्र’ में पिरोया। आगे चलकर आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, निम्बार्काचार्य और वल्लभाचार्य जैसे समर्थ आचार्यों ने इन्हीं मन्त्रों के आधार पर अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत, द्वैताद्वैत और शुद्धाद्वैत जैसे समृद्ध दर्शनों की प्रतिष्ठा की।

सनातन परंपरा का यह दार्शनिक वैविध्य किसी अंतर्विरोध का सूचक नहीं, बल्कि सत्य के साक्षात्कार के विभिन्न धरातल हैं। उपनिषदों की ज्ञान-गंगा में ज्ञान का तीक्ष्ण विवेक भी समाहित है और भक्ति व शरणागति का परम रस भी। साधक अपनी प्रकृति, पात्रता और रुचि के अनुसार उस एक ही सच्चिदानन्द परब्रह्म की ओर अग्रसर होता है – एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति (परम तत्व वास्तव में एक ही है, किंतु साधक की रुचि, दृष्टि और साधना के अनुसार ऋषि-मुनि उसे शिव, नारायण, निर्गुण या सगुण – अनेक नामों और भावों से पुकारते हैं। यह सनातन वेदान्त के समन्वय का मूल आधार है)।

दशोपनिषदों और उनके दार्शनिक भाष्यों के इस विहंगावलोकन के उपरांत, उपनिषद्-परंपरा के अंतर्गत श्वेताश्वतर, कौषीतकि, महानारायण तथा मैत्रायणी जैसे अन्य वैदिक उपनिषदों का तात्विक चिंतन भी वेदान्त के अनेक अनछुए पक्षों को आलोकित करता है, जिनकी मीमांसा इस शृंखला के आगामी क्रम में विचारणीय रहेगी।

‘वेद क्या हैं?’ शृंखला के अगले अंकों में प्रमुख उपनिषदों पर विस्तार से चर्चा करेंगे

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सन्दर्भ ग्रन्थ:
  1. वेदान्तसार (श्रीसदानन्दप्रणीत), ‘सारबोधिनी’ ‘विमला’ संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेत; व्याख्याकार: डॉ. गजाननशास्त्री मुसलगाँवकर; कृष्णदास संस्कृत ग्रन्थमाला १५; चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वाराणसी — भूमिका, पृ. ९–२१।
  2. श्रीमद्भगवद्रामानुजाचार्यकृत श्रीभाष्यम् (शारीरकमीमांसाभाष्यम्), हिन्दी ‘भावप्रकाशिका’ भाषाभाष्योपेत; भाष्यकार: आचार्य श्री शिवप्रसाद द्विवेदी; चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी — भूमिका (वेदान्त दर्शन, अद्वैतसिद्धान्त, विशिष्टाद्वैत)।
  3. उपनिषत्सञ्चयनम् (हिन्दीभाषानुवादसहितम्—द्वितीयः खण्डः), अनुवादक: आचार्य केशवलाल वि. शास्त्री, चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली — भूमिका (उपनिषदों पर टीकाएँ, पृ. ११–१२; भूमिका-पृष्ठ ३५ के बाद प्रस्तुत सामग्री)।
  4. कल्याण: उपनिषद्-अङ्क, गीताप्रेस, गोरखपुर — “उपनिषद् और रामानुज-वेदान्तदर्शन” तथा “उपनिषद् और अद्वैतवाद” (पं. श्रीरामगोविन्दजी त्रिवेदी, वेदान्तशास्त्री)।
  5. जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी श्रीराघवाचार्य जी महाराज — “निर्गुण और सगुण (Nirgun Aur Sagun)” (ब्रह्मसूत्र के उभयलिङ्ग अधिकरण और वाल्मीकि रामायण की रामायणभूषण टीका के अनुसार सौशील्य गुण का विवेचन):https://www.youtube.com/watch?v=cUI9iWAZG0I
  6. पूज्य रत्नेश प्रपन्नाचार्य जी महाराज — “इस प्रसंग के माध्यम से समझें भगवान निर्गुण है या सगुण” (श्रीभाष्य और वेदान्त के अनुसार सगुण-निर्गुण श्रुतियों का समन्वय):https://www.youtube.com/watch?v=mVRaiPpzMC8

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