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वेद क्या हैं ? श्रृंखला के पिछले दो अंकों का संक्षिप्त सार
भाग १ में वेदों के स्वरूप को शास्त्रीय आधार पर स्थापित किया गया है—वेद साक्षात् नारायण का स्वरूप हैं; सर्वविद् ज्ञान-विज्ञान, सृष्टि और मोक्ष का अक्षय महासागर हैं। वेद अपौरुषेय और अनादि हैं; सृष्टि के प्रारम्भ में यही दिव्य ज्ञान ब्रह्मा के हृदय में संप्रेषित होता है और श्रुति परंपरा से ऋषियों के माध्यम से प्रवाहित रहता है। कालानुसार मानव की क्षीण होती स्मरण-शक्ति और सामर्थ्य को ध्यान में रखते हुए महर्षि वेदव्यास ने इसी एक वेद-ज्ञान को चार भागों में विभाजित किया तथा आगे चलकर महाभारत और पुराणों के माध्यम से उसी तत्त्व को अधिक सुगम रूप में उपलब्ध कराया, ताकि कलियुग में भी धर्म का आधार सुरक्षित रह सके।
वेद-अध्ययन को लेकर प्रचलित आधुनिक धारणाओं से भिन्न, शास्त्र वेद-बोध को एक अत्यंत अनुशासित और मर्यादित साधना मानते हैं—यज्ञोपवीत, शास्त्रीय पात्रता, गुरु-मुख से श्रवण और दीर्घकालीन ब्रह्मचर्य इसके अनिवार्य अंग हैं। वेदों के मंत्र ‘शब्द-ब्रह्म’ की सूक्ष्म और शक्तिशाली सत्ता हैं, जिनका अध्ययन केवल विधि और संरक्षण के साथ ही फलदायक माना गया है।
इस लेख-शृंखला का उद्देश्य सामान्य हिंदू जनमानस को अपने धर्म की उस शाश्वत आधारशिला से परिचित कराना है, जिस पर समस्त शास्त्र, पुराण और स्मृतियाँ प्रतिष्ठित हैं—ताकि वेदों के वास्तविक स्वरूप, उनकी मर्यादा और उनके महत्व को शास्त्रीय दृष्टि से समझा जा सके।
भाग 2 में हमने जाना वेद ‘अनादि’ और ‘अपौरुषेय’ हैं, जो किसी मनुष्य द्वारा रचित नहीं बल्कि सृष्टि के आरंभ में ईश्वर द्वारा ब्रह्मा जी को प्राप्त हुए और फिर ऋषियों के माध्यम से प्रसारित हुए,: वैदिक ज्ञान केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक भी है; इसमें 32 मुख्य विद्याओं और 64 कलाओं का विस्तृत वर्णन मिलता है, जो जीवन के हर रचनात्मक पक्ष को समाहित करती हैं । हमने चार प्रमुख उपवेदों—आयुर्वेद (स्वास्थ्य), धनुर्वेद (रक्षा), गान्धर्ववेद (कला) और अर्थशास्त्र (प्रबंधन) के व्यावहारिक महत्व को समझा । कालक्रम में मानव स्मृति की कमी को देखते हुए वेदव्यास जी ने एक वेद को चार भागों में विभाजित किया ताकि यह सुरक्षित और सुलभ रह सके ।
परम लक्ष्य: वेदों का मूल प्रयोजन मनुष्य को ‘पुरुषार्थ चतुष्टय’ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) की प्राप्ति की ओर ले जाना है ।
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भाग ३ में और आगामी भागों में सर्वप्रथम हम उन वेद सम्बंधित शब्दों का अर्थ और विषय वास्तु जानेंगे जिनका नाम तो हम सुनते हैं पर उनका अर्थ और विषय क्या है हमें नहीं मालूम, भाग ३ में वेद के अपौरुषेय “मन्त्र भाग” और ऋषियों द्वारा रचित ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद के बारे में जानेंगे ।
मन्त्र संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् परिचय

वैदिक साहित्य का विस्तार इतना विशाल है कि इसमें हज़ारों वर्षों की हमारी आध्यात्मिक चिंतन-धारा को संजोया गया है। समय के साथ हमारी भाषा और व्यवहार बदल गए हैं, लेकिन स्वयं को और इस विश्व को समझने की ऋषियों की वह मौलिक शैली आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। हालाँकि, समय के लंबे अंतराल के कारण उनकी अभिव्यक्ति की शैली आज हमें कुछ कठिन या दुरूह जान पड़ सकती है।
पूरे वैदिक साहित्य को मुख्य रूप से चार भागों में समझा जा सकता है: मन्त्र संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् । इनमें ‘मन्त्र’ ही मूल आधार हैं, जबकि ‘ब्राह्मण’ ग्रंथ उनकी व्याख्या या अनुपूरक के रूप में कार्य करते हैं। मन्त्रों से शुरू हुई यह ज्ञान-यात्रा उपनिषदों पर जाकर पूर्ण होती है। हमारे लिए उपनिषदों को समझना अपेक्षाकृत सरल है क्योंकि उनमें भाव की प्रधानता है और उनकी भाषा भी बहुत जटिल नहीं है।
सबसे बड़ी चुनौती वेदों के ‘मन्त्र-भाग’ को समझने में आती है। इसका कारण मन्त्रों की अत्यंत प्राचीन भाषा और उनका कर्मकाण्ड (यज्ञ आदि) के साथ गहरा जुड़ाव है। ब्राह्मण ग्रंथों की रचना मन्त्रों की शब्द-दर-शब्द व्याख्या के लिए नहीं, बल्कि कर्मकाण्ड की पद्धति को सुव्यवस्थित करने के लिए हुई थी। इसी कर्मकाण्ड को स्पष्ट करने के क्रम में ब्राह्मणकारों ने मन्त्रों के अर्थों पर प्रकाश डाला है, जो आज हमें वेदों के प्राचीनतम रहस्य को समझने में सहायता करते हैं।
वेद भगवान् के वाङ्मय स्वरूप हैं!
वेद कोई पुस्तक नहीं हैं या मनुष्य रचित कोई काव्य या ग्रन्थ नहीं हैं, बल्कि वे साक्षात् अनन्त–कोटि, ब्रह्माण्ड नायक भगवान् के श्रीवाङ्मय-स्वरूप हैं
वाङ्मय का अर्थ: ‘वाक’ (वाणी) और ‘मय’ (व्याप्त/स्वरूप) से मिलकर बना है। इसका शाब्दिक अर्थ है— “वाणी के रूप में व्यक्त”।
जैसे भगवान श्रीकृष्ण या श्रीराम का एक विग्रह के रूप में हमारे सामने है, वैसे ही वेद भगवान का शब्द रूपी शरीर हैं। शास्त्रों के अनुसार, वेद कोई सामान्य रचना नहीं हैं जो किसी मनुष्य ने लिखी हो, बल्कि वे भगवान के ‘निःश्वास’ (सांस) हैं जो शब्द और ज्ञान के रूप में प्रकट हुए हैं।
महत्व: जब हम कहते हैं कि वेद “वाङ्मय स्वरूप” हैं, तो इसका अर्थ है कि मन्त्रों का उच्चारण करना साक्षात् भगवान का स्पर्श करने या उनके सान्निध्य में होने के समान है।
मन्त्र संहिता ही ‘वेद (श्रुति )’ हैं, और ये ही अपौरुषेय हैं: वेदांत, वेदांग, स्मृति, इतिहास आदि नहीं !
सर्वप्रथम हमे ‘श्रुति’ और ‘स्मृति’ के सूक्ष्म अंतर को समझना महत्वपूर्ण है जो वैदिक शब्दावली समझने के लिए अनिवार्य हैं । वेद अपौरुषेय अर्थात किसी मनुष्य द्वारा रचित नहीं हैं। यह सिर्फ वेद के मन्त्र भाग (संहिता) के लिए ही कहा गया है जो की सत्य है। और सभी स्मृतियाँ और सभी शास्त्र इतिहास पुराण वेदांग, उपनिषद आदि महान ऋषियों द्वारा रचित हैं जिनके आधार वेद के मंत्र भाग ही हैं।
- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद की ‘मन्त्र संहिताएँ’ ही वास्तविक ‘श्रुति’ हैं और ‘अपौरुषेय’ हैं।
- संहिताओं के बाद आने वाले ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद, साथ ही अन्य स्मृति ग्रंथ, ऋषियों द्वारा रचित वे विस्तार हैं जो वैदिक मन्त्रों के रहस्यों को हमारे समझने योग्य बनाते हैं।
स्मृति ग्रंथ: पुराण, इतिहास (रामायण, महाभारत) और धर्मशास्त्र ‘स्मृति‘ की श्रेणी में आते हैं, जिनका आधार तो वेद (श्रुति) ही है परन्तु ये ऋषियों , मनीषियों द्वारा रचित हैं। और इसलिए ये अपौरुषेय नहीं हैं ।
मन्त्र संहिता
मन्त्र वे मूल वाक्य हैं जिनमें सत्य (तत्त्व), देवता, शक्ति और साधना के बीज रूप में संकेत (व्यञ्जना) निहित रहते हैं। ये अत्यन्त संक्षिप्त, प्रतीकात्मक और कई स्तरों पर अर्थ देने वाले होते हैं। एक ही मन्त्र का बाह्य अर्थ (यज्ञ, देवता) भी हो सकता है और आन्तरिक अर्थ (चेतना, साधना, आत्मबोध) भी।