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वेद क्या हैं ? श्रृंखला के पिछले दो अंकों का संक्षिप्त सार
भाग १ में वेदों के स्वरूप को शास्त्रीय आधार पर स्थापित किया गया है—वेद साक्षात् नारायण का स्वरूप हैं; सर्वविद् ज्ञान-विज्ञान, सृष्टि और मोक्ष का अक्षय महासागर हैं। वेद अपौरुषेय और अनादि हैं; सृष्टि के प्रारम्भ में यही दिव्य ज्ञान ब्रह्मा के हृदय में संप्रेषित होता है और श्रुति परंपरा से ऋषियों के माध्यम से प्रवाहित रहता है। कालानुसार मानव की क्षीण होती स्मरण-शक्ति और सामर्थ्य को ध्यान में रखते हुए महर्षि वेदव्यास ने इसी एक वेद-ज्ञान को चार भागों में विभाजित किया तथा आगे चलकर महाभारत और पुराणों के माध्यम से उसी तत्त्व को अधिक सुगम रूप में उपलब्ध कराया, ताकि कलियुग में भी धर्म का आधार सुरक्षित रह सके।
वेद-अध्ययन को लेकर प्रचलित आधुनिक धारणाओं से भिन्न, शास्त्र वेद-बोध को एक अत्यंत अनुशासित और मर्यादित साधना मानते हैं—यज्ञोपवीत, शास्त्रीय पात्रता, गुरु-मुख से श्रवण और दीर्घकालीन ब्रह्मचर्य इसके अनिवार्य अंग हैं। वेदों के मंत्र ‘शब्द-ब्रह्म’ की सूक्ष्म और शक्तिशाली सत्ता हैं, जिनका अध्ययन केवल विधि और संरक्षण के साथ ही फलदायक माना गया है।
इस लेख-शृंखला का उद्देश्य सामान्य हिंदू जनमानस को अपने धर्म की उस शाश्वत आधारशिला से परिचित कराना है, जिस पर समस्त शास्त्र, पुराण और स्मृतियाँ प्रतिष्ठित हैं—ताकि वेदों के वास्तविक स्वरूप, उनकी मर्यादा और उनके महत्व को शास्त्रीय दृष्टि से समझा जा सके।
भाग 2 में हमने जाना वेद ‘अनादि’ और ‘अपौरुषेय’ हैं, जो किसी मनुष्य द्वारा रचित नहीं बल्कि सृष्टि के आरंभ में ईश्वर द्वारा ब्रह्मा जी को प्राप्त हुए और फिर ऋषियों के माध्यम से प्रसारित हुए,: वैदिक ज्ञान केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक भी है; इसमें 32 मुख्य विद्याओं और 64 कलाओं का विस्तृत वर्णन मिलता है, जो जीवन के हर रचनात्मक पक्ष को समाहित करती हैं । हमने चार प्रमुख उपवेदों—आयुर्वेद (स्वास्थ्य), धनुर्वेद (रक्षा), गान्धर्ववेद (कला) और अर्थशास्त्र (प्रबंधन) के व्यावहारिक महत्व को समझा । कालक्रम में मानव स्मृति की कमी को देखते हुए वेदव्यास जी ने एक वेद को चार भागों में विभाजित किया ताकि यह सुरक्षित और सुलभ रह सके ।
परम लक्ष्य: वेदों का मूल प्रयोजन मनुष्य को ‘पुरुषार्थ चतुष्टय’ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) की प्राप्ति की ओर ले जाना है ।
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भाग ३ में और आगामी भागों में सर्वप्रथम हम उन वेद सम्बंधित शब्दों का अर्थ और विषय वास्तु जानेंगे जिनका नाम तो हम सुनते हैं पर उनका अर्थ और विषय क्या है हमें नहीं मालूम, भाग ३ में वेद के अपौरुषेय “मन्त्र भाग” और ऋषियों द्वारा रचित ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद के बारे में जानेंगे ।
मन्त्र संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् परिचय

वैदिक साहित्य का विस्तार इतना विशाल है कि इसमें हज़ारों वर्षों की हमारी आध्यात्मिक चिंतन-धारा को संजोया गया है। समय के साथ हमारी भाषा और व्यवहार बदल गए हैं, लेकिन स्वयं को और इस विश्व को समझने की ऋषियों की वह मौलिक शैली आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। हालाँकि, समय के लंबे अंतराल के कारण उनकी अभिव्यक्ति की शैली आज हमें कुछ कठिन या दुरूह जान पड़ सकती है।
पूरे वैदिक साहित्य को मुख्य रूप से चार भागों में समझा जा सकता है: मन्त्र संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् । इनमें ‘मन्त्र’ ही मूल आधार हैं, जबकि ‘ब्राह्मण’ ग्रंथ उनकी व्याख्या या अनुपूरक के रूप में कार्य करते हैं। मन्त्रों से शुरू हुई यह ज्ञान-यात्रा उपनिषदों पर जाकर पूर्ण होती है। हमारे लिए उपनिषदों को समझना अपेक्षाकृत सरल है क्योंकि उनमें भाव की प्रधानता है और उनकी भाषा भी बहुत जटिल नहीं है।
सबसे बड़ी चुनौती वेदों के ‘मन्त्र-भाग’ को समझने में आती है। इसका कारण मन्त्रों की अत्यंत प्राचीन भाषा और उनका कर्मकाण्ड (यज्ञ आदि) के साथ गहरा जुड़ाव है। ब्राह्मण ग्रंथों की रचना मन्त्रों की शब्द-दर-शब्द व्याख्या के लिए नहीं, बल्कि कर्मकाण्ड की पद्धति को सुव्यवस्थित करने के लिए हुई थी। इसी कर्मकाण्ड को स्पष्ट करने के क्रम में ब्राह्मणकारों ने मन्त्रों के अर्थों पर प्रकाश डाला है, जो आज हमें वेदों के प्राचीनतम रहस्य को समझने में सहायता करते हैं।
वेद भगवान् के वाङ्मय स्वरूप हैं!
वेद कोई पुस्तक नहीं हैं या मनुष्य रचित कोई काव्य या ग्रन्थ नहीं हैं, बल्कि वे साक्षात् अनन्त–कोटि, ब्रह्माण्ड नायक भगवान् के श्रीवाङ्मय-स्वरूप हैं
वाङ्मय का अर्थ: ‘वाक’ (वाणी) और ‘मय’ (व्याप्त/स्वरूप) से मिलकर बना है। इसका शाब्दिक अर्थ है— “वाणी के रूप में व्यक्त”।
जैसे भगवान श्रीकृष्ण या श्रीराम का एक विग्रह के रूप में हमारे सामने है, वैसे ही वेद भगवान का शब्द रूपी शरीर हैं। शास्त्रों के अनुसार, वेद कोई सामान्य रचना नहीं हैं जो किसी मनुष्य ने लिखी हो, बल्कि वे भगवान के ‘निःश्वास’ (सांस) हैं जो शब्द और ज्ञान के रूप में प्रकट हुए हैं।
महत्व: जब हम कहते हैं कि वेद “वाङ्मय स्वरूप” हैं, तो इसका अर्थ है कि मन्त्रों का उच्चारण करना साक्षात् भगवान का स्पर्श करने या उनके सान्निध्य में होने के समान है।
मन्त्र संहिता ही ‘वेद (श्रुति )’ हैं, और ये ही अपौरुषेय हैं: वेदांत, वेदांग, स्मृति, इतिहास आदि नहीं !
सर्वप्रथम हमे ‘श्रुति’ और ‘स्मृति’ के सूक्ष्म अंतर को समझना महत्वपूर्ण है जो वैदिक शब्दावली समझने के लिए अनिवार्य हैं । वेद अपौरुषेय अर्थात किसी मनुष्य द्वारा रचित नहीं हैं। यह सिर्फ वेद के मन्त्र भाग (संहिता) के लिए ही कहा गया है जो की सत्य है। और सभी स्मृतियाँ और सभी शास्त्र इतिहास पुराण वेदांग, उपनिषद आदि महान ऋषियों द्वारा रचित हैं जिनके आधार वेद के मंत्र भाग ही हैं।
- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद की ‘मन्त्र संहिताएँ’ ही वास्तविक ‘श्रुति’ हैं और ‘अपौरुषेय’ हैं।
- संहिताओं के बाद आने वाले ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद, साथ ही अन्य स्मृति ग्रंथ, ऋषियों द्वारा रचित वे विस्तार हैं जो वैदिक मन्त्रों के रहस्यों को हमारे समझने योग्य बनाते हैं।
स्मृति ग्रंथ: पुराण, इतिहास (रामायण, महाभारत) और धर्मशास्त्र ‘स्मृति‘ की श्रेणी में आते हैं, जिनका आधार तो वेद (श्रुति) ही है परन्तु ये ऋषियों , मनीषियों द्वारा रचित हैं। और इसलिए ये अपौरुषेय नहीं हैं ।
मन्त्र संहिता
मन्त्र वे मूल वाक्य हैं जिनमें सत्य (तत्त्व), देवता, शक्ति और साधना के बीज रूप में संकेत (व्यञ्जना) निहित रहते हैं। ये अत्यन्त संक्षिप्त, प्रतीकात्मक और कई स्तरों पर अर्थ देने वाले होते हैं। एक ही मन्त्र का बाह्य अर्थ (यज्ञ, देवता) भी हो सकता है और आन्तरिक अर्थ (चेतना, साधना, आत्मबोध) भी।
सनातन धर्म की संपूर्ण ज्ञान-राशि का मूल आधार ‘मन्त्र संहिता’ ही है। सरल शब्दों में कहें तो मन्त्रों के संकलन या संग्रह को ही ‘संहिता’ कहा जाता है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि केवल ये मन्त्र संहिताएँ ही वास्तविक ‘श्रुति‘ और ‘अपौरुषेय‘ हैं, जिसका अर्थ है कि इनकी रचना किसी मनुष्य ने नहीं की है। संहिताओं के बाद आने वाले अन्य सभी ग्रंथ (ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्) ऋषियों द्वारा रचित वे व्याख्याएँ हैं, जो हमें इन दिव्य मन्त्रों के अर्थ समझने और उन्हें जीवन में उतारने में सहायता करती हैं।
मन्त्रों की प्रकृति के आधार पर इन्हें मुख्य रूप से तीन श्रेणियों (त्रयी) में बाँटा गया है: ऋक् (छन्दोबद्ध पद्य), यजु: (गद्य) और साम (मन्त्रों का संगीतमय गायन)। ऋग्वेद और अथर्ववेद में जहाँ ज्ञान और प्रार्थनाओं का भंडार है, वहीं यजुर्वेद यज्ञ की क्रियाओं का और सामवेद उपासना के मधुर गीतों का आधार है। मन्त्र संहिताएँ वे दिव्य बीज हैं, जिनमें ब्रह्मांड के गूढ़ रहस्य संकेतों के रूप में छिपे हैं।
शास्त्रीय दृष्टि से अथर्ववेद को ऋग्वेद का ‘परिपूरक’ माना गया है। इसे समझने के लिए निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान देना आवश्यक है:
- मन्त्रों की समानता: अथर्वसंहिता के अधिकांश मन्त्र भी ऋग्वेद की तरह ही ‘पादबद्ध’ और ‘छन्दोबद्ध’ हैं। मीमांसा शास्त्र के नियमों के अनुसार, जो मन्त्र छंद में बँधे होते हैं, उन्हें सामान्यतः ‘ऋक्’ ही कहा जाता है।
- ऋग्वेद और अथर्ववेद—ये दोनों ही ‘वेद-विद्या’ के मूल स्रोत हैं। जहाँ ऋग्वेद देवताओं की स्तुति और ज्ञान का आधार है, वहीं अथर्ववेद जीवन की रक्षा, शांति और व्यावहारिक प्रयोगों का ज्ञान देता है। इसीलिए विद्वान इन दोनों को एक ही श्रेणी में रखना तर्कसंगत मानते हैं
त्रयी‘ और ‘चतुर्वेद’ का रहस्य:
- संहिता (संग्रह) की दृष्टि से वेद चार हैं: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।
- मन्त्रों के प्रकार की दृष्टि से वेद तीन हैं (त्रयी): ऋक् (पद्य), यजु: (गद्य) और साम (गीत)।
- चूँकि अथर्ववेद के मन्त्र भी अधिकतर ‘ऋक्’ (पद्य) की श्रेणी में ही आते हैं, इसलिए मन्त्रों की शैली के आधार पर उन्हें अलग विभाग न मानकर ‘वेदत्रयी’ में ही सम्मिलित मान लिया जाता है।
मन्त्रों के प्रयोग के प्रकार
मन्त्र वेदों का वह भाग है जो यज्ञ में साक्षात् प्रयोग किया जाता है। ‘मन्त्र’ शब्द ‘मन्’ धातु से बना है। जिसके मनन, जप और आलम्बन से अभीष्ट फल मिलता है और जो परब्रह्म का ज्ञान कराता है, वह मन्त्र है।
- योगशिखोपनिषत् (२.७): “मननात् त्राणनात् / प्राणनाच्चैव मद्रूपस्यावबोधनात्।। मन्त्र इत्युच्यते ब्रह्मन् मदधिष्ठानतोऽपि वा।”
- पाञ्चरात्र (ई.स. ३.७.९): “मननान्मनुशार्दूल त्राणन कुर्वन्ति वै नरः। ददते पदमात्मीयं तस्मान्मन्त्राः प्रकीर्तिताः।।” — जो मनन करने पर रक्षा करते हैं, वे मन्त्र हैं।
मन्त्र तीन प्रकार से प्रयोग होते हैं:
- करण मन्त्र: जिनके उच्चारण के बाद कर्म किया जाता है (जैसे ‘याज्या’)।
- ये वे मन्त्र हैं जिन्हें बोलने के बाद वास्तविक कर्म शुरू होता है।
- उदाहरण (‘याज्या‘): यज्ञ में आहुति देने से ठीक पहले जो मन्त्र पढ़ा जाता है, उसे ‘याज्या’ कहते हैं। मन्त्र पूरा होने के बाद ही ‘स्वाहा’ बोलकर आहुति अग्नि में डाली जाती है। यहाँ मन्त्र क्रिया (आहुति) का ‘करण’ या कारण बनता है ।
- क्रियमाणानुवादि मन्त्र:
- ये मन्त्र कर्म के साथ-साथ पढ़े जाते हैं।
- उदाहरण: जब यज्ञ में वेदी पर कुश (घास) बिछाई जा रही हो या सामग्री तैयार की जा रही हो, तब जो मन्त्र साथ-साथ चलते रहते हैं, उन्हें ‘क्रियमाणानुवादि’ कहते हैं। यहाँ क्रिया और मन्त्र का पाठ एक साथ संपन्न होता है।
- अनुमन्त्रण मन्त्र: जो यजमान द्वारा कर्म के ठीक बाद पढ़े जाते हैं। इसके अतिरिक्त ‘जप मन्त्र’ होते हैं जो अदृष्ट फल देने वाले होते हैं।
- ये मन्त्र कर्म पूरा होने के ठीक बाद पढ़े जाते हैं।
- उदाहरण: जब यजमान अग्नि में द्रव्य (घी या सामग्री) का त्याग कर देता है, उसके तुरंत बाद वह जो मन्त्र पढ़ता है उसे ‘अनुमन्त्रण’ कहते हैं। यह कर्म की पूर्णता और उसके समर्पण का प्रतीक है।
- जप मन्त्र: (अदृष्ट फल देने वाले होते हैं।) ये मन्त्र किसी बाहरी क्रिया के लिए नहीं, अदृष्ट फल (पुण्य, कामना आदि) के लिए एकांत में जपे जाते हैं।
वेदमन्त्रों की संख्या
सृष्टि के आरम्भ में वेद एक ही था जिसमें एक लक्ष (एक लाख) मन्त्र थे। महर्षि वेदव्यास ने इसे चार भागों में बाँटा और अपने शिष्यों (पैल, जैमिनि, वैशम्पायन, सुमन्तु) को इसका प्रसार सौंपा।
वर्तमान मुख्य शाखाओं के अनुसार मन्त्रों का योग इस प्रकार है:
- ऋग्वेद (शाकल): १०,५५२ मन्त्र।
- यजुर्वेद (माध्यन्दिनी): १,९७५ मन्त्र।
- सामवेद (कौथुमी): १,८७३ मन्त्र।
- अथर्ववेद (शौनक): ६,००० मन्त्र।
- कुल योग: २०,४०० (बीस सहस्र चार सौ) मन्त्र।
वेदमन्त्रों की संख्या का रहस्य: उपलब्ध और वास्तविक ज्ञान
अक्सर यह जिज्ञासा उठती है कि यदि वेदों में मन्त्रों की संख्या एक लाख है, तो वर्तमान में केवल २०,४०० मन्त्र ही विवरणों में क्यों मिलते हैं? शास्त्रों और मनीषियों ने इस रहस्य का समाधान अत्यंत सूक्ष्मता से किया है:
- शाखाओं का लोप: महर्षि पतंजलि के अनुसार, प्राचीन काल में ऋग्वेद की २१, यजुर्वेद की १०१, सामवेद की १,००० और अथर्ववेद की ९ शाखाएँ थीं। वर्तमान में इनमें से केवल १०-१२ शाखाएँ ही पूर्णतः सुरक्षित हैं। समय के साथ अनेक शाखाओं के लुप्त होने से उनके मन्त्र भी सामान्य जनमानस के लिए अप्रकट हो गए हैं।
- देवलोक में उपस्थिति: शास्त्रों का मत है कि वेद और पुराण देवलोक में आज भी ‘शतकोटि’ (सौ करोड़) मन्त्रों के विस्तार में विद्यमान हैं। पृथ्वी पर मनुष्यों की सीमित स्मरणशक्ति और आयु को देखते हुए महर्षि व्यास जी ने इसका सार चार भागों में प्रस्तुत किया।
- शाखान्तर मन्त्र: अनेक मन्त्र अन्य शाखाओं (जैसे मैत्रायणी, काण्व, कठ आदि) में बिखरे हुए हैं, जिन्हें सम्मिलित करने पर यह संख्या बढ़ती है।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि २०,४०० मन्त्र वर्तमान में ‘उपलब्ध’ संपदा है, जबकि १,००,००० मन्त्र वेदों की ‘वास्तविक’ संख्या है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि जो मन्त्र आज लिखित रूप में उपलब्ध नहीं हैं, उनका ज्ञान इस पृथ्वी से समाप्त हो गया है। आज के समय में भी ऐसे महान महात्मा और अवतारी पुरुष विद्यमान हैं, जिनके पास ‘योग-बल’ और ‘ईश्वरीय अनुग्रह’ से संपूर्ण वेद मन्त्रों का ज्ञान सुरक्षित है। वेदों का मन्त्र-भाग केवल अक्षरों का समूह नहीं, बल्कि एक जीवंत सत्ता है, जो योग्य पात्रों के समक्ष आज भी पूर्णतः प्रकाशित होती है।
ब्राह्मण ग्रन्थ: अपौरुषेय मन्त्रों का ऋषियों द्वारा विस्तार
कालक्रम में जब मानव की मेधा क्षीण होने लगी और मन्त्रों के गूढ़ संकेत दुर्बोध होने लगे, तब मन्त्रद्रष्टा ऋषियों ने मन्त्रों के विनियोग, यज्ञ की पद्धतियों और उनके रहस्यों को सुव्यवस्थित करने के लिए ‘ब्राह्मण ग्रन्थों‘ का सूत्रपात किया। ऋषियों द्वारा रचित ये ग्रंथ बताते हैं कि संहिताओं के मन्त्रों का प्रयोग किस यज्ञ में, किस विधि से और किस प्रयोजन के लिए किया जाना चाहिए । यह वेदों का वह क्रियात्मक विस्तार है जो कर्मकाण्ड के माध्यम से देव-अनुग्रह सुनिश्चित करता है ।
ब्राह्मण ग्रन्थ केवल यज्ञ-विधि की सामान्य पुस्तिकाएँ नहीं हैं, बल्कि वे अपौरुषेय वेदमन्त्रों के गूढ़ तत्त्वों को कर्म, तत्त्वचिन्तन और रहस्य के माध्यम से उद्घाटित करने वाले ऋषि-प्रणीत महान ग्रन्थ हैं। वेदों के मन्त्रभाग में अनेक स्थलों पर अत्यन्त संक्षिप्त, प्रतीकात्मक और संकेतात्मक भाषा का प्रयोग हुआ है। मन्त्रों में यज्ञ, देवता, साधना और ब्रह्मविद्या के बीज रूप में संकेत निहित रहते हैं, किन्तु उन संकेतों का व्यवहारिक प्रयोग, विधि, उद्देश्य और तात्त्विक रहस्य ब्राह्मण ग्रन्थों में विस्तार से समझाया गया है। इसीलिए वैदिक परम्परा में कहा गया— “मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्” अर्थात् मन्त्र और ब्राह्मण—दोनों मिलकर ही ‘वेद’ कहलाते हैं।
ब्राह्मण’ शब्द यहाँ ‘ब्राह्मण जाति’ के अर्थ में नहीं, बल्कि ‘ब्रह्म’ अर्थात् यज्ञ और वेदतत्त्व की व्याख्या करने वाले विभाग के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। ब्राह्मण ग्रन्थों का मुख्य विषय यज्ञानुष्ठान की पद्धति, मन्त्रों का विनियोग, उनके फल, देवताओं का स्वरूप, तथा यज्ञ के पीछे निहित सूक्ष्म आध्यात्मिक रहस्य हैं।
शुद्ध ब्राह्मण की मुख्य विषय-वस्तु यज्ञविधि है। सोमयाग में चार श्रेणी के ऋत्विकों की आवश्यकता होती है। उनके विनियोज्य मन्त्रों का सङ्ग्रह चारों संहिताओं में है। प्रत्येक संहिता के साथ उसका ब्राह्मण जुड़ा है।, ब्राह्मण-ग्रन्थ उन मन्त्रों की व्याख्या, विस्तार और प्रयोग को स्पष्ट करते हैं। वे बताते हैं कि—
- मन्त्र का प्रयोग किस यज्ञ में, किस विधि से होगा
- उसके पीछे का तात्त्विक अर्थ क्या है
- उस क्रिया का आध्यात्मिक उद्देश्य क्या है
इसलिए कहा गया कि मन्त्र में जो तत्त्व और साधना ‘संकेत’ रूप में छिपे हैं, ब्राह्मण ग्रन्थ उन्हें ‘प्रस्फुटित’ (स्पष्ट, विकसित) करते हैं।
ब्राह्मण साहित्य के तीन विभाग
विवेचन की सुविधा के लिए ब्राह्मण साहित्य को तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है, जो आपस में पूरी तरह ओत-प्रोत हैं:
- ब्राह्मण (शुद्ध ब्राह्मण): जिसका मुख्य विषय यज्ञ की विधियाँ हैं।
- आरण्यक: जो बाह्य यज्ञों के आध्यात्मिक रहस्य को समझाते हैं।
- उपनिषद्: जो ब्रह्मविद्या और मोक्ष का चरम लक्ष्य प्रदान करते हैं।
प्रत्येक वेद के साथ उसके विशिष्ट ब्राह्मण ग्रन्थ सम्बद्ध हैं। ऋग्वेद के साथ ऐतरेय और कौषीतकि ब्राह्मण, यजुर्वेद के साथ शतपथ और तैत्तिरीय ब्राह्मण, सामवेद के साथ ताण्ड्य आदि ब्राह्मण, तथा अथर्ववेद के साथ गोपथ ब्राह्मण प्रमुख माने जाते हैं। यज्ञ में कार्य करने वाले विभिन्न ऋत्विजों—होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा—के कर्तव्यों, मन्त्रों और विधानों का विस्तार भी इन्हीं ग्रन्थों में मिलता है। इस प्रकार ब्राह्मण ग्रन्थ वेदमन्त्रों और उनके वास्तविक प्रयोग के मध्य सेतु के समान हैं। मन्त्रों में जो ज्ञान बीज रूप में निहित है, ब्राह्मण ग्रन्थ उसी को क्रम, विधि, तत्त्व और रहस्य के माध्यम से प्रस्फुटित करते हैं।
आरण्यक ग्रन्थ
वैदिक साहित्य की शृंखला में ‘ब्राह्मण’ ग्रन्थों का अन्तिम भाग ही आरण्यक कहलाता है। जहाँ ब्राह्मण ग्रन्थों में ‘यज्ञ-विधि’ और बाहरी कर्मकाण्ड की प्रधानता है, वहीं आरण्यक वह वेदभाग है जिसमें यज्ञानुष्ठान की पद्धति, मन्त्रों और उनके फलों के पीछे छिपे ‘आध्यात्मिक संकेतों‘ का वर्णन मिलता है।
अरण्यवासी तपस्वियोंको अध्यात्मविद्या सुलभ कराने की विधासे समन्वित होने के कारण इसका अन्वर्थ (अर्थ के अनुरूप ) नाम आरण्यक है। सायण के अनुसार, एकांत में पढ़े जाने और व्रतधारी होकर सुने जाने के कारण ही इसकी ‘आरण्यक’ संज्ञा सार्थक है।
यदि ब्राह्मण ग्रन्थों में ‘यज्ञ-विद्या’ (कर्मकाण्ड) की प्रधानता है, तो आरण्यक उस यज्ञ के पीछे छिपी ‘रहस्य-विद्या’ का उद्घाटन करते हैं।
प्रमुख आरण्यक ग्रन्थ
प्रत्येक वेद की अपनी विशिष्ट आरण्यक परंपरा है, जो उस वेद के चिंतन को आगे बढ़ाती है:
- ऋग्वेद: इसके दो मुख्य आरण्यक हैं— ऐतरेय और शाङ्खायन। ऐतरेय आरण्यक में ‘महाव्रत’ जैसे महत्वपूर्ण यज्ञों की रहस्य-भावना और ‘प्राण-विद्या’ का वर्णन मिलता है।
- यजुर्वेद:
- शुक्ल यजुर्वेद: इसके प्रसिद्ध ‘शतपथ ब्राह्मण’ के अंतिम काण्ड का नाम ही ‘बृहदारण्यक‘ है, जिसके अंत में सुप्रसिद्ध बृहदारण्यकोपनिषद् समाहित है।
- कृष्ण यजुर्वेद: इसमें ‘तैत्तिरीय आरण्यक‘ प्रमुख है, जिसमें पितृमेध और स्वाध्याय-विधि जैसे विषयों का गंभीर विवेचन है।
- सामवेद: इसके दो आरण्यक ग्रंथ माने जाते हैं— ‘उपनिषद् ब्राह्मण’ (जैमिनीय) और छान्दोग्योपनिषद् का प्रथम अंश, जिसमें साम-गायन पर आधारित उपासनाओं का वर्णन है।
उपनिषद्: ब्रह्मविद्या और वेदों का तत्त्वार्थ
उपनिषद् वैदिक वाङ्मय के विकास का अन्तिम सोपान हैं, इसीलिए इन्हें ‘वेदान्त‘ (वेदों का अंत या निष्कर्ष) के नाम से पुकारा जाता है। भारतीय संस्कृति के प्राण कहे जाने वाले इन ग्रन्थों में वेदों की सर्वोत्कृष्ट ज्ञाननिधि सुरक्षित है। जहाँ मन्त्रों में सत्य के बीज हैं और ब्राह्मणों में उनका क्रियात्मक विस्तार, उपनिषद् उसी मीमांसा का वह चरम परिणाम हैं जहाँ जीव, जगत् और ब्रह्म के रहस्यों का उद्घाटन होता है।
चूँकि यह विषय अत्यंत गम्भीर और अनन्त है, अतः यहाँ हम केवल इसका संक्षिप्त परिचय प्राप्त करेंगे; उपनिषदों के गूढ़ रहस्यों पर हम इस शृंखला के आगामी विशेष लेखों में विस्तार से चर्चा करेंगे।
उपनिषद्‘ शब्द का तात्विक अर्थ और व्युत्पत्ति
वेद शब्द का अर्थ ‘ज्ञान’ है और वेद-पुरुष के ‘शिरोभाग‘ (मस्तक) को उपनिषद् कहते हैं। उपनिषद् शब्द के अवयव इसके प्रयोजन को स्पष्ट करते हैं:
- उप: इसका अर्थ है ‘व्यवधानरहित’ यानी परमात्मा और जीवात्मा के बीच की दूरी को समाप्त करने वाला।
- नि: इसका अर्थ है ‘सम्पूर्ण’ या पूर्ण रूप से।
- षद्: इसका अर्थ है ‘ज्ञान’।
अतः वह सर्वोत्तम ज्ञान जो ज्ञेय (ब्रह्म) से अभिन्न है और जो देश, काल एवं वस्तु की सीमाओं से रहित परिपूर्ण ब्रह्म का साक्षात्कार कराता है, वही ‘उपनिषद्’ पद का वास्तविक अभिप्राय है।
मन्त्र, ब्राह्मण और उपनिषद् का सम्बन्ध
सम्पूर्ण वेद मुख्य रूप से तीन भागों में विभक्त है—मन्त्रभाग, ब्राह्मणभाग और उपनिषद्भाग। उपनिषद्भाग वेदों के ‘ज्ञानकाण्ड‘ का प्रकाशक है। शास्त्रीय परंपरा के अनुसार, जिस प्रकार ब्राह्मण का अन्तिम अंश आरण्यक है, उसी प्रकार आरण्यक का अन्तिम अंश उपनिषद् है। आरण्यक एवं उपनिषद् दोनों ही ब्राह्मण के अन्तर्गत समाहित हैं।
इनकी रचना शैली में एक क्रमिक विकास दिखाई देता है:
- गद्य और मीमांसा: प्राचीन उपनिषदों की रचना ब्राह्मणों की भाँति गद्य में हुई है, क्योंकि विचार और वितर्क के आधार पर मीमांसा करने के लिए गद्य का प्रयोग प्रभावी होता है।
- सिद्धान्त और श्लोक: जब कोई दार्शनिक विचार एक स्थिर सिद्धान्त के रूप में स्थापित हो गया, तब उसे मन्त्र या श्लोक के रूप में ग्रथित किया गया। संहिता के अनेक मन्त्र इसी कारण उपनिषदों में ‘तत्त्वार्थ की भाषा’ के रूप में उद्धृत हुए हैं।
उपनिषदों की संख्या और उनका ऐतिहासिक लोप
पुराणों और उपनिषदों के अनुसार इस मन्वन्तर में वेदों की ११८० शाखाएँ आविर्भूत हुईं। इतनी ही संख्या में मन्त्रभाग, ब्राह्मण और उपनिषद् भी प्रकट हुए थे। किंतु कलिकाल के प्रभाव से आज इस विशाल ज्ञान-राशि का ‘सहस्रांश’ भी उपलब्ध नहीं है। वर्तमान में मुख्य रूप से १०८ उपनिषद् ही चर्चा में रहते हैं, जिनमें ईशावास्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक आदि प्रमुख हैं।
मुक्तिकोपनिषत् में दिये गए विवरण के अनुसार 108 उपनिषदों की सारणी इस प्रकार है—इसमें ऋग्वेद की 10, शुक्लयजुर्वेद की 19, कृष्णयजुर्वेद की 32, सामवेद की 16 और अथर्ववेद की 31 = कुल मिलाकर 108 उपनिषदें होती हैं, जिसका विवरण यहाँ दिया जा रहा है—

प्रस्थानत्रयी और श्रीमद्भगवद्गीता
भारतीय संस्कृति के जितने भी आस्तिक सम्प्रदाय हैं (अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत आदि), उन सबके मूल आधार यही उपनिषद् हैं। उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र और श्रीमद्भगवद्गीता को सम्मिलित रूप से ‘प्रस्थानत्रयी‘ कहा जाता है। उपनिषदों के इसी गूढ़ ज्ञान का मधुर सार हमें महाभारत के श्रीमद्भगवद्गीता खण्ड में प्राप्त होता है, जिसे उपनिषदों की ‘ज्ञान-गरिमा’ का अमृत कहा जाता है।
उपनिषद् भारतीय संस्कृति के प्राण हैं और ‘प्रस्थानत्रयी’ (उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र और गीता) के आधारभूत स्तम्भ हैं। इन्हीं उपनिषदों का मधुर सार हमें श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में प्राप्त होता है, जो ज्ञान-गरिमा का जीवंत प्रमाण है। ईशावास्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य और बृहदारण्यक जैसे उपनिषदों के माध्यम से यह ब्रह्मविद्या आज भी जीवों के ताप का शमन कर उन्हें मोक्ष की ओर अग्रसर करती है।
इस लेख में हमने वेदों के मुख्य चार भागों—मन्त्र संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद्—का संक्षिप्त परिचय प्राप्त किया है। वेदांग, उपांग और अन्य महत्वपूर्ण वैदिक शब्दावली पर हम इस शृंखला के आगामी भाग-4 में विस्तार से चर्चा करेंगे।
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References:
कल्याण: उपनिषद्-अङ्क (तेईसवें वर्ष का विशेषाङ्क), गीताप्रेस, गोरखपुर।
उपनिषत्सञ्चयनम् (हिन्दीभाषानुवादसहितम् – द्वितीयः खण्डः), अनुवादक: आचार्य केशवलाल वि० शास्त्री, चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली।
सनातनधर्म-प्रश्नोत्तर-मालिका, रचयिता: श्रीगोवर्द्धनमठ – पुरीपीठाधीश्वर श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानन्दसरस्वतीजी।
वेद-मीमांसा (प्रथम खण्ड), मूल लेखक: श्री अनिर्वाण, हिन्दी अनुवादक: छविनाथ मिश्र, नाग पब्लिशर्स, दिल्ली (महर्षि सान्दीपनि राष्ट्रीय वेदविद्या प्रतिष्ठान, उज्जैन द्वारा प्रायोजित)।