सूर्य नारायण का महात्म्य – भाग-2

 
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भाग-1 हमने भगवान सूर्य-नारायण के उस अद्वितीय स्वरूप को समझा, जो उन्हें पंचदेवों में ‘प्रत्यक्ष देव’ के रूप में प्रतिष्ठित करता है। हमने चर्चा की थी कि किस प्रकार वे चराचर जगत की आत्मा और ‘हिरण्यगर्भ’ रूप में सृष्टि के सृजनकर्ता (ब्रह्मा) हैं।

लेख के प्रथम भाग के मुख्य बिंदु इस प्रकार थे:

  • प्रत्यक्षं ब्रह्म: सूर्य ही एकमात्र ऐसे देव हैं जिनका दर्शन और अनुभव प्रत्येक प्राणी साक्षात् कर सकता है। वे ‘लोकसाक्षी’ और ‘जगच्चक्षु’ हैं।
  • गायत्री और संध्या वंदन: त्रिकाल संध्या और गायत्री मंत्र वस्तुतः भगवान सूर्य की ही आराधना है
  • पञ्चभूत और सूर्य: पंचदेवों के अधिष्ठाता के रूप में सूर्य देव ‘वायु’ तत्व के स्वामी हैं।

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जो ब्रह्मा, महादेव, विष्णु, प्रजापति, वायु, आकाश, जल, पृथ्वी, पर्वत, समुद्र, ग्रह, नक्षत्र और चन्द्रमा आदि देवता हैं; वनस्पति, वृक्ष तथा ओषधियाँ जिनके स्वरूप हैं, ब्राह्मी, वैष्णवी और माहेश्वरी – ये त्रिधा शक्तियाँ जिनका वपु हैं; भानु (सूर्य) जिनका स्वरूप हैं; वे आप भुवन-भास्कर (हमपर) प्रसन्न हों।

मार्कण्डेयपुराण में भगवान् सूर्य की सर्वोपकारिता प्रदर्शित की गयी है। । मार्कण्डेयपुराण १०९ । ६९–७१

 सर्वदेवमय सूर्य

 एष ब्रह्मा च विष्णुश्च रुद्र एष हि भास्करः । त्रिमूर्त्यात्मा त्रिवेदात्मा सर्वदेवमयो रविः”  –             सूर्यतापिनी-उपनिषद्

सूर्य समस्त जगत के आत्मा हैं, काल के नियामक हैं, रोगों के हर्ता हैं और धन संपदा, ज्ञान -विज्ञान के दाता हैं ।

  • सृष्टि के प्रारंम्भ में भगवान् नारायण ही सूर्य रूप में प्रकट होते हैं, इसलिए वे सूर्य नारायण कहलाते है । सनातन धर्म में सृष्टि के प्रमुख पांच कार्य पांच देवों के द्वारा संभव होते हैं। भगवान् एक ही हैं जो स्वयं पांच स्वरूपों में विभिन्न कार्य करते हैं वे पांच देव हैं – श्री गणेश, माँ दुर्गा, शिव जी, श्री विष्णु और सूर्य दे।  इन पांच देवों का ही पूजन का विधान है या उनके अवतार (जैसे- श्री हरी विष्णु जी के अवतार राम जी, श्री कृष्ण, शिव जी के अवतार हनुमान जी)
  • सूर्यौदय के साथ ही जगत के सब कार्य प्रारम्भ होते हैं। सूर्य ही दिन रात, ऋतुओं , तिथियों, दक्षिणायन , उत्तरायण, दो पक्षों (कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष ) के ३० दिन, मॉस, संवत्सर (वर्ष), युग और कल्प। काल एवं कालान्तर के नियामक हैं। 
  • सूर्य से ही वनस्पतियां, अन्न उत्पन्न होते हैं , उनके आभाव में प्राणधारी प्राण को धारण नहीं कर सकते इसीलिए सूर्य देव को जगत की आत्मा कहते हैं।

“सूर्य आत्मा जगतस्तथुषश्च”, “दृशे विश्वाय सूर्यम” ।  

अर्थात समस्त जगत के आत्मा रूप में सूर्य हैं तथा सारे संसार के दृष्टी दाता सूर्य हैं ।     

  • सूर्य की किरणों में मनुष्य के लिए उपयोगी सभी तत्व विद्यमान हैं , सब रोगों और दूरितों को दूर करने की शक्ति है। इसलिए सूर्य देव का पूजन करने वालों को कोई औषधि आदि की आवश्यकता नहीं पढ़ती। उदय होते सूर्य देव के नियमित दर्शन और उनको विधिवत अर्ध्य देने से सभी रोग नष्ट होते हैं।  
  • शरीर में नाड़ियां, योगिक क्रियाओं में प्राणायाम और कुण्डलिनी जागरण में भगवान् सूर्य का अभिन्न संबंध है
  • सभी प्राणियों के नेत्रों में मूल शक्ति सूर्य देव की ही है ।

सूर्य नारायण ही सृष्टि के सृजन करता ब्रह्मा  हैं ।

भगवान् सूर्य संसार के सृष्टिकर्ता हैं।  सूर्य से ही सृष्टि-चक्र प्रवर्तित और प्रचलित है।  सूर्य से ही प्राणियों की उत्पात्ति होती है।  सूर्य से ही कृषि होतीहै।  सूर्य से ही वृक्ष, फल, वनस्पति,औषधि, अन्न और सभी सांसारिक खाद्य पदार्थ उत्पन्न होते हैं।  सूर्य से ही वृष्टि होती है।   

सूर्यदेव प्रतिदिन अपनी अमृतमयी किरणोंकी ज्योतिद्वारा समस्त संसारमें प्रकाश और उष्णता आदि प्रदान करते हैं, जिससे मनुष्य, पशु-पक्षी और पेड़-पौधे-वनस्पति आदि सभी जीवन-शक्ति प्राप्तकर बलिष्ठ और सुरक्षित रहते हैं। इसलिये सूर्यकी किरणोंकी ज्योति प्राणिमात्रके लिये आवश्यक और उपयोगी है। अतः स्पष्ट है कि सूर्य ही संसारके समस्त जड़ और चेतन प्राणियोंके जीवन ज्योतिके मूल स्रोत हैं। इसलिये सूर्यको समस्त प्राणियोंका जीवन कहा गया है-  जीवनं सर्वभूतानाम् (–ब्रह्मपुराण ३३ । ९)

सूर्य समस्त संसारके प्रसविता (जन्मदाता) हैं। | इसीलिये इनका नाम ‘सविता’ है-

 ‘सविता वै प्रसवानामीशे सवितारमेव।‘ (–कृष्णयजुर्वेद २ । १ । ६ । ३)

‘सूर्य ही संसारके प्रसविता हैं और वे ही अपने ऐश्वर्यसे जगत्के प्रकाशक हैं।’ तथा सविता सर्वस्य प्रसविता‘ (-निरुक्त, दैवतकाण्ड ४। ३१) ‘सविता सबके उत्पादक हैं।’

आरोग्य के लिए भगवान सूर्य की आराधना अत्यंत प्रभावी है

भारतीय वाङ्मय का यह परम सिद्धांत है कि वह परब्रह्म परमात्मा एक ही है, किंतु सृष्टि के सुचारु संचालन और भक्तों के कल्याण हेतु वह स्वयं को पाँच दिव्य रूपों में विभक्त करता है—इन्हें ही हम ‘पंचदेव’ (श्री गणेश, सूर्य, विष्णु, शिव और शक्ति) कहते हैं। परमात्मा का यह रूप-भेद उनकी किसी भिन्नता के कारण नहीं, अपितु उनके प्रयोजन और कार्य-विभाजन के कारण है। जिस प्रकार एक ही सुवर्ण (सोना) प्रयोजन के अनुसार कभी ‘मुकुट’ बनता है तो कभी ‘कंगन’, अथवा एक ही जल कभी ‘प्यास’ बुझाता है तो कभी ‘शुद्धि’ का आधार बनता है, ठीक उसी प्रकार वह एक ही ईश्वर सृष्टि के विभिन्न कार्यों के संपादन हेतु विशिष्ट स्वरूप धारण करता है।

यद्यपि पंचदेवों में प्रत्येक देव सर्वशक्तिमान और सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने में सक्षम हैं, पर विभिन्न प्रकार की कामनाओं की पूर्ति के लिए पंचदेवों में किन देवता की उपासना, कम श्रम में, शीघ्र फलदायक होगी यह अनेक शास्त्रों में विस्तृत रूप से वर्णित है।  कर्मकांड में इस विषय पर विद्वान् ब्राह्मण भली भाँती विचार करके उपयुक्त देवता का उपयुक्त अनुष्ठान चयन करते हैं।  मत्स्य पुराण अनुसार रोगों के निवृति के लिए भगवान् सूर्य का आराधन करना चाहिए।   

आरोग्यं भास्करादिच्छेद्धनमिच्छेद्धुताशनात्। ऐश्वर्यमीश्वरादिच्छेज्ज्ञानमिच्छेज्जनार्दनात् ॥ ४१॥ –(मत्स्य पुराण 68, 41)

आरोग्य (अच्छा स्वास्थ्य) की इच्छा सूर्य से करनी चाहिए, धन की इच्छा अग्नि से करनी चाहिए, ऐश्वर्य (शक्ति और प्रभुत्व) की इच्छा शिव से करनी चाहिए और ज्ञान की इच्छा भगवान विष्णु से करनी चाहिए।

अनुष्ठान प्रकाश के अनुसार:

प्रायेण सूर्यः सर्वेषां रोगाणामधिदैवतम्। आरोग्यं भास्करादिच्छेदिति प्रख्या श्रुतिः स्मृतिः॥”

अर्थात, सूर्य ही समस्त रोगों के अधिदेवता हैं। इसलिए श्रुति और स्मृति का यह निर्देश है कि पूर्ण आरोग्य की कामना सूर्य देव से ही करनी चाहिए।

सनातन धर्म के शास्त्रों में रोगों के मूल कारणों का गहन विश्लेषण किया गया है। मनुष्य के शरीर में व्याधि (रोग) उत्पन्न होने के मुख्य तीन कारण माने गए हैं:

  1. दोषज रोग: गलत खान-पान (आहार-विहार) या प्रदूषित वातावरण से होने वाले रोग। ये उचित औषधि के सेवन से ठीक हो जाते हैं।
  2. कर्मज रोग: पूर्वजन्म के संचित पापों के फलस्वरूप होने वाले असाध्य रोग, जो केवल औषधि से शांत नहीं होते।
  3. कर्मदोषज रोग: वे व्याधियाँ जो औषधि और आध्यात्मिक अनुष्ठान (जप-तप) दोनों के समन्वय से ही ठीक होती हैं।

सूर्यदेव की उपासना से आरोग्यता प्राप्ति, असाध्य रोगों का शमन होने  के ऐतिहासिक एवं शास्त्रीय प्रमाण

सूर्य देव की आराधना से असाध्य रोगों के निवारण के कई जीवंत उदाहरण हमारे शास्त्रों और इतिहास में मिलते हैं:

  • भगवान श्री कृष्ण के पुत्र साम्ब: भविष्योत्तर पुराण के अनुसार, जब साम्ब कुष्ठ रोग से पीड़ित हुए, तब उन्होंने भगवान सूर्य के सूर्यस्तवराज स्तोत्र का अनुष्ठान किया और पूर्णतः रोगमुक्त हुए।
  • कवि मयूरभट्ट: संस्कृत के प्रख्यात कवि बाणभट्ट के साले मयूरभट्ट ने अपने कुष्ठ रोग की शांति के लिए सूर्य शतक की रचना की। इसके प्रभाव से उन्हें दिव्य काया प्राप्त हुई।
  • वैदिक अनुष्ठान: सूर्य अथर्वशीर्ष उपनिषद् में वर्णित अष्टाक्षर मंत्र ॐ घृणिः सूर्य आदित्य का विधिपूर्वक अनुष्ठान करने से बड़ी से बड़ी महाव्याधियों से मुक्ति मिलती है।
सूर्य उपासना की वैज्ञानिकता एवं प्रभाव

सूर्य समस्त जगत की आत्मा और दृष्टि के दाता हैं । उनकी अमृतमयी किरणों में रोगों को जड़ से मिटाने की अदभुत शक्ति है । उदय होते सूर्य के नियमित दर्शन और विधिवत अर्घ्य देने से शरीर की नाड़ियाँ पुष्ट होती हैं और योगी जनो को कुण्डलिनी जागरण में सहायता मिलती है । जो व्याधियाँ औषधि से वश में नहीं आतीं, वे सूर्य देव के समक्ष किए गए जप, हवन और देवार्चन से शांत हो जाती हैं।

सूर्य नेत्रों के अधिष्ठात्र देवता हैं

सूर्येण हि विभज्यन्ते दिशः खं द्यौर्महीभिदा । स्वर्गापवर्गौ नरका रसौकांसि च सर्वशः ॥देवतिर्यङ्मनुष्याणां सरीसृपसवीरुधाम्। सर्वजीवनिकायानां सूर्य आत्मा दृगीश्वरः ॥ (श्रीमद्भागवत ५ । २० । ४५-४६)

श्रीमद्भागवतमें सुस्पष्ट वर्णन है कि सूर्यके द्वारा ही दिशा, आकाश, द्युलोक, भूर्लोक, स्वर्ग-मोक्षके प्रदेश, नरक और रसातल तथा अन्य समस्त स्थानोंका विभाग होता है। सूर्यभगवान् ही देवता, तिर्यक्, मनुष्य, सरीसृप और लता-वृक्षादि समस्त जीवसमूहोंके आत्मा एवं नेत्रेन्द्रियके अधिष्ठाता हैं।

 महाभारतमें भगवान् सूर्यका स्तवन करते हुए महाराज युधिष्ठिर कहते हैं

 ‘त्वं भानो जगतश्चक्षुः त्वमाचारः क्रियावताम् ॥ (–महा० वन० ३ । ३६)

‘सूर्यदेव ! आप सम्पूर्ण जगत के नेत्र तथा समस्त प्राणियों के आत्मा हैं। आप ही सब जीवों के उत्पत्ति-स्थान और कर्मानुष्ठान में लगे पुरुषों के सदाचार हैँ।  

 भगवान् सूर्य से सम्बंधित – चाक्षुषोपनिषद में नेत्र सम्बन्धी रोगों के अद्भुत चमत्कारी निवारण

भगवान् सूर्य से सम्बंधित ‘चाक्षुषोपनिषद्’ में विधिवत पाठ मात्र से सिद्ध होने वाला अद्भुत मन्त्र  है। इसमें भगवान् सूर्य से नेत्र रोग दूर करने की प्रार्थना है ।  चाक्षुषोपनिषद्’ कृष्ण यजुर्वेदीय परंपरा के अंतर्गत है और अपने नाम के अनुरूप चक्षु रोग (नेत्र रोग ) दूर करने का चमत्कारी सामर्थ्य रखती है।  विनियोग सहित मंत्र और हिंदी अनुवाद इस प्रकार है : 

विनियोगः-‘अस्याश्चाक्षुषीविद्याया अहिर्बुध्न्य ऋषिः, गायत्री छन्दः, सूर्यो देवता, चक्षूरोगनिवृत्तये जपे विनियोगः ।’

ॐ चक्षुः चक्षुः चक्षुः तेजः स्थिरो भव । मां पाहि पाहि। त्वरितं चक्षूरोगान् शमय शमय। मम जातरूपं तेजो दर्शय दर्शय । यथाहं अन्धो न स्यां तथा कल्पय कल्पय । कल्याणं कुरु कुरु । यानि मम पूर्वजन्मोपार्जितानि चक्षुःप्रतिरोधकदुष्कृतानि तानि सर्वाणि निर्मूलय निर्मूलय । ॐ नमः चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय । ॐ नमः करुणाकरायामृताय। ॐ नमः सूर्याय। ॐ नमो भगवते

सूर्यायाक्षितेजसे नमः। खेचराय नमः। महते नमः । रजसे नमः। तमसे नमः । असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय। उष्णो भगवाञ्छुचिरूपः । हंसो भगवान् शुचिरप्रतिरूपः । य इमां चाक्षुष्मतीविद्यां ब्राह्मणो नित्यमधीते न तस्याक्षिरोगो भवति। न तस्य कुले अन्धो भवति । अष्टौ ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिर्भवति * ।

हिंदी अर्थ: –

विनियोग: ॐ इस चाक्षुषी विद्याके ऋषि अहिर्बुध्न्य हैं, गायत्री छन्द है, सूर्यनारायण देवता हैं तथा नेत्ररोगकी निवृत्तिके लिये इसका जप होता है—यह विनियोग है।

 (भगवानका नाम लेकर कहे) हे चक्षुके अभिमानी सूर्यदेव! आप मेरे चक्षुमें चक्षुके तेजरूपसे स्थिर हो जायँ। मेरी रक्षा करें, रक्षा करें, मेरी आँखके रोगोंका शीघ्र शमन करें, शमन करें। मुझे अपना सुवर्ण-जैसा तेज दिखला दें, दिखला दें। जिससे मैं अन्धा न होऊँ (कृपया) वैसा ही उपाय करें, उपाय करें। मेरा कल्याण करें, कल्याण करें। दर्शनशक्तिका अवरोध करनेवाले मेरे पूर्वजन्मार्जित जितने भी पाप हैं, उन सबको जड़से उखाड़ दें, जड़से उखाड़ दें। ॐ (सच्चिदानन्दस्वरूप) नेत्रोंको तेज प्रदान करनेवाले दिव्यस्वरूप भगवान् भास्करको नमस्कार है। ॐ करुणाकर अमृतस्वरूपको नमस्कार है। ॐ सूर्यभगवान्‌को नमस्कार है। ॐ नेत्रोंके प्रकाशक भगवान् सूर्यदेवको नमस्कार है। ॐ आकाशविहारीको नमस्कार है। परमश्रेष्ठ स्वरूपको नमस्कार है। ॐ (सबमें क्रियाशक्ति उत्पन्न करनेवाले) रजोगुणरूप सूर्यभगवान्‌को नमस्कार है। (अन्धकारको सर्वथा अपने अंदर समा लेनेवाले) तमोगुण के आश्रयभूत भगवान् सूर्य को नमस्कार है। हे भगवन्! आप मुझको असत्से सत्की ओर ले चलिये। अन्धकारसे प्रकाशकी ओर ले चलिये। मृत्यु से अमृत की ओर ले चलिये। उष्णस्वरूप भगवान् सूर्य शुचिरूप हैं। हंसस्वरूप भगवान् सूर्य शुचि तथा अप्रतिरूप हैं—उनके तेजोमय स्वरूपकी समता करनेवाला कोई नहीं है। जो ब्राह्मण इस चाक्षुष्मती विद्याका नित्य पाठ करता है, उसको नेत्रसम्बन्धी कोई रोग नहीं होता। उसके कुल में कोई अन्धा नहीं होता। आठ ब्राह्मणों को इस विद्याका दान करनेपर—इसका ग्रहण करा देने पर इस विद्या की सिद्धि होती है। ‘

इस प्रकार उपरिनिर्दिष्ट सम्पूर्ण विवेचनके आकलनसे यह कहना समीचीन प्रतीत होता है कि भगवान् सूर्यकी उपासना मानवमात्रके लिये नितान्त वाञ्छनीय है। सूर्योपासनासे दिव्य आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, धन, पशु, मित्र, पुत्र, स्त्री, अनेक इच्छित भोग तथा स्वर्ग ही नहीं, मोक्षतक भी अनायास सुलभ हो जाता है। अतः प्रत्येक नैतिक, सामाजिक तथा धार्मिक अभ्युत्थानके इच्छुक व्यक्ति को विशेषतः आरोग्यके इच्छुक व्यक्तिको -सद्यः फलप्रदाता भगवान् भास्करकी उपासना करके अपना जीवन सफल बनाना चाहिये।

आगामी अंक (भाग-3) में

“लेख के अगले भाग में हम भगवान सूर्य नारायण के उन अद्भुत और अनोखे प्रसंगों पर चर्चा करेंगे, जहाँ उन्होंने महाराज युधिष्ठिर को अक्षय पात्र प्रदान किया, हनुमान जी के गुरु बनकर उन्हें ज्ञान दिया और किस प्रकार आदित्य हृदय स्तोत्र के पाठ से रावण वध का मार्ग प्रशस्त हुआ; साथ ही जानेंगे ज्योतिष के आधार स्तंभ सूर्य सिद्धांत के कुछ अनसुने रहस्य।

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संदर्भ (References):

  1. कल्याण – सूर्यांक, गीताप्रेस गोरखपुर।
  2. सूर्य विमर्श, संपादक – डॉ. सुरेंद्र कुमार पाण्डेय, प्रकाशक – हिंदुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद।

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