वेद क्या हैं? भाग-5, वैदिक शब्दावली – वैदिक दर्शन आगम और (तंत्र शास्त्र)

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वेद क्या हैं? श्रृंखला के पिछले अंकों का संक्षिप्त सार

  • भाग १ (वेदों का स्वरूप एवं मर्यादा): वेदों का अनादि, अपौरुषेय और नारायण-स्वरूप वाङ्मय विग्रह। महर्षि वेदव्यास द्वारा चार भागों में विभाजन तथा वेद-अध्ययन हेतु यज्ञोपवीत, पात्रता, गुरु-मुख श्रवण और अनुशासन की अनिवार्यता।
  • भाग २ (उपवेद, विद्याएँ और लक्ष्य): ३२ मुख्य विद्याओं, ६४ कलाओं एवं चार प्रमुख उपवेदों (आयुर्वेद, धनुर्वेद, गांधर्ववेद, स्थापत्य/अर्थशास्त्र) का व्यावहारिक महत्व तथा जीवन का चरम लक्ष्य—’पुरुषार्थ चतुष्टय’ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष)।
  • भाग ३ (वैदिक वाङ्मय के चार स्तंभ):
    • मन्त्र संहिता: मूल अपौरुषेय श्रुति।
    • ब्राह्मण ग्रन्थ: मन्त्रों का यज्ञीय विधान और व्यावहारिक प्रयोग (विनियोग)।
    • आरण्यक: यज्ञों के अंतर्निहित आध्यात्मिक रहस्य।
    • उपनिषद्: जीव, जगत् और ब्रह्म के सत्य का साक्षात्कार कराने वाला ज्ञानकाण्ड (वेदान्त)।
  • भाग ४ (वेदांग परिचय एवं महत्व): वेदों के शुद्ध उच्चारण, अर्थ-बोध और प्रयोग की रक्षा हेतु ऋषि-प्रणीत ६ वेदांग (वेद-पुरुष के अंग)—शिक्षा (उच्चारण/नासिका), छन्द (पाद), व्याकरण (मुख), निरुक्त (शब्दार्थ/कर्ण), ज्योतिष (काल-ज्ञान/नेत्र) और कल्प (यज्ञ-विधि/हस्त)।
  • वेद क्या हैं ? – भाग ५ में हम वैदिक ज्ञान-परम्परा के दो अत्यंत महत्वपूर्ण, गूढ़ और विशाल आयामों का संक्षिप्त परिचय प्राप्त करेंगे—आगम / तन्त्र शास्त्र और षड्दर्शन शास्त्र । षड्दर्शन के छह प्रमुख दर्शन हैं—न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्वमीमांसा और वेदान्त । दोनों विषयों की अपनी अत्यंत समृद्ध और विस्तृत शास्त्रीय परम्परा है; इस भाग में हम इनके मूल स्वरूप, प्रमुख विषय-वस्तु और वैदिक ज्ञान-परम्परा में इनके महत्व को संक्षेप में समझने का प्रयास करेंगे।

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वैदिक दर्शन शास्त्र: षड्दर्शन की मूल अवधारणा, परिचय एवं इनकी महत्ता

वेदों में प्रतिपादित तत्त्वों, जीव, जगत्, प्रकृति, चेतना, ईश्वर, ज्ञान, कर्म, बन्धन और मोक्ष आदि के गहन विवेचन को सूत्रबद्ध करने वाली शास्त्रीय परम्परा को दर्शन शास्त्र कहा जाता है। इसके छह प्रमुख दर्शन—न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्वमीमांसा और वेदान्त—षड्दर्शन के रूप में प्रसिद्ध हैं।

सनातन धर्म की ज्ञान-परम्परा में वेद साक्षात् ईश्वरीय ज्ञान हैं। वेदों के मन्त्रभाग में जो परम सत्य, सृष्टि-विज्ञान और आत्म-ज्ञान संक्षेप में (बीज रूप में) कहा गया, उसे मानव-बुद्धि के लिए स्पष्ट, तार्किक और व्यावहारिक बनाने का कार्य हमारे महर्षियों ने ‘दर्शन-शास्त्रों’ के माध्यम से किया।

जब सामान्य व्यक्ति ‘दर्शन’ शब्द सुनता है, तो प्रायः उसे यह बहुत गूढ़, क्लिष्ट या संन्यासियों का विषय प्रतीत होता है। किन्तु वास्तव में दर्शन मनुष्य के दैनिक जीवन, उसके तनावों के समाधान और परम शांति को प्राप्त करने का सबसे वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक मार्ग है।

फिलॉसफी (Philosophy) और दर्शनमें क्या अन्तर है?

आधुनिक समय में विदेशी अनुवादों के कारण पाश्चात्य शब्द ‘Philosophy’ और भारतीयदर्शनको एक ही समझ लिया गया है, जो बहुत बड़ी भ्रांति है। दोनों के दृष्टिकोण और उद्देश्य में जमीन-आसमान का अन्तर है:

Philosophy (पाश्चात्य दर्शन):

यह शब्द दो ग्रीक शब्दों से मिलकर बना है—Philo (प्रेम/लगाव) और Sophia (बौद्धिक ज्ञान)। इसका अर्थ केवल ज्ञान के प्रति बौद्धिक आकर्षण है। पाश्चात्य दर्शन का जन्म केवल आश्चर्य‘ (Wonder) और कौतूहलसे हुआ—जैसे यह ब्रह्माण्ड क्या है, तारे कैसे बने? पश्चिमी दार्शनिक केवल मस्तिष्क के स्तर पर तर्क-वितर्क (Intellectual Speculation) करते हैं। वे नए प्रश्न तो खड़े करते हैं, किन्तु जीवन के दुःखों का स्थायी और व्यावहारिक समाधान नहीं दे पाते।

दर्शन (भारतीय वैदिक दृष्टि):

इसकी व्युत्पत्ति है—दृश्यते अनेन इति दर्शनम्” अर्थात् जिसके द्वारा वस्तु और जीवन के वास्तविक सत्य को साक्षात् देख लिया जाए, अनुभव कर लिया जाए। भारतीय दर्शन केवल पुस्तकों में पढ़ने या बहस करने का विषय नहीं है; यह अपरोक्ष साक्षात्कार‘ (Direct Experience) का मार्ग है। इसका जन्म किसी कौतूहल से नहीं, बल्कि मानव-मात्र के दुःखों को सदा के लिए समाप्त करने की तीव्र आवश्यकता से हुआ है।

वैदिक दर्शन का प्राण (मूल प्रतिपाद्य): दुःखनिवृत्ति एवं ‘चतुर्व्यूह’ विधान

संसार के प्रत्येक प्राणी के जीवन का सत्य क्या है?

एक छोटा-सा कीट-पतंग हो, साधारण गृहस्थ हो, कोई बड़ा उद्योगपति हो या चक्रवर्ती राजा—प्रत्येक जीव हर पल केवल एक ही काम में लगा है: वह दुःख, कष्ट और भय से बचना चाहता है और सुख पाना चाहता है।

मानव-जीवन में मुख्यतः तीन प्रकार के दुःख (त्रिविध ताप) होते हैं:
  1. आध्यात्मिक दुःख: अपने शरीर और मन से उत्पन्न कष्ट—जैसे रोग, बुढ़ापा, मानसिक तनाव, अवसाद, क्रोध, शोक और चिंता।
  2. आधिभौतिक दुःख: बाहरी संसार, समाज, शत्रुओं, हिंसक पशुओं या परिस्थितियों से मिलने वाले कष्ट।
  3. आधिदैविक दुःख: प्राकृतिक आपदाओं, ग्रह-नक्षत्रों, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूकंप या अदृष्ट कारणों से होने वाले संकट।

मनुष्य इन कष्टों से बचने के लिए सांसारिक भोगों और सुख-सुविधाओं के पीछे भागता है। किन्तु जैसे ही उसे कोई सांसारिक सुख मिलता है, कुछ समय बाद वही सुख भय, तृष्णा और नए दुःखों का कारण बन जाता है।

 आयुर्वेद और मोक्ष-शास्त्र का समानान्तर सिद्धान्त

जिस प्रकार आयुर्वेद (चिकित्सा-शास्त्र) किसी शारीरिक बीमारी को ठीक करने के लिए चार प्रमुख अंगों पर काम करता है:

  • रोग (बीमारी क्या है)
  • रोग का हेतु (बीमारी क्यों हुई)
  • आरोग्य (स्वस्थ अवस्था क्या है)
  • औषध / चिकित्सा (दवा और इलाज क्या है)
ठीक उसी प्रकार समग्र वैदिक दर्शन मानव-चेतना के मानसिक और आध्यात्मिक रोगों को सदा के लिए समाप्त करने हेतु चार आधारभूत सूत्रों (चतुर्व्यूह) पर खड़ा है:
  1. हेय (त्याज्य दुःख): दुःख का वास्तविक स्वरूप क्या है, जिससे हमें सर्वथा मुक्त होना है? संसार का नश्वर चक्र, जन्म-मरण का बन्धन और अज्ञानजनित कष्ट ‘हेय’ (छोड़ने योग्य) हैं।
  1. हेयहेतु (दुःख का मूल कारण): दुःख क्यों होता है? जड़ शरीर और नश्वर संसार को अपना वास्तविक स्वरूप मान लेना, तथा चेतन आत्मा को भूलकर अविद्या और अविवेक में जीना ही दुःख का मूल कारण है।
  1. हान (मुक्ति की अवस्था): दुःख का पूरी तरह समाप्त हो जाना क्या है? आत्मा का अज्ञान के बन्धनों से छूटकर अपने वास्तविक, शुद्ध, शांत और आनंदमय स्वरूप में स्थित हो जाना ही ‘हान’ (मोक्ष, कैवल्य या अपवर्ग) कहलाता है।
  1. हानोपाय (मुक्ति का सच्चा साधन):इस दुःखनिवृत्ति और आत्म-साक्षात्कार को पाने का व्यावहारिक मार्ग क्या है? यथार्थ तत्त्व-ज्ञान, विवेक, सत्कर्म और नियमित ध्यान-साधना ही ‘हानोपाय’ है।
इन चारों प्रश्नों के समाधान हेतु हमारे ऋषियों ने तीन नित्य तत्त्वों—जीवात्मा (चेतन), प्रकृति (जड़ जगत्) और परमात्मा (ईश्वर)का विश्लेषण छह दर्शनों में किया है।

 

छह वैदिक दर्शन (षड्दर्शन — वेदों के उपांग)

वेदों के अर्थ को समझने और मोक्ष के मार्ग पर चलने के लिए छह आस्तिक दर्शनों को वेदों का ‘उपांग’ माना गया है। ये छहों दर्शन अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं और तीन युगलों (जोड़ों) में बंटे हुए हैं:

पहला युगल: न्याय एवं वैशेषिक दर्शन (तर्क, यथार्थ ज्ञान और भौतिक जगत का विज्ञान)
१. न्याय दर्शन (महर्षि गौतम)

न्याय दर्शन का अर्थ है—तर्क, प्रमाण और निष्पक्ष परीक्षण का शास्त्र। यह हमें सिखाता है कि किसी भी बात को आंख मूंदकर नहीं मानना चाहिए, बल्कि यथार्थ प्रमाणों की कसौटी पर कसकर सत्य का निर्णय करना चाहिए।

इसमें क्या है?

महर्षि गौतम ने १६ प्रमुख पदार्थों (विषयों) का निरूपण किया है। सत्य को जानने के लिए न्याय दर्शन ४ प्रमाण स्वीकार करता है:

  1. प्रत्यक्ष प्रमाण: जो इन्द्रियों से साक्षात् देखा या अनुभव किया जाए।
  2. अनुमान प्रमाण: प्रत्यक्ष लक्षणों (जैसे धुएं) को देखकर अप्रत्यक्ष (अग्नि) का सटीक ज्ञान करना।
  3. उपमान प्रमाण: समानता या सादृश्य के आधार पर ज्ञान प्राप्त करना।
  4. शब्द प्रमाण (आप्त-वाक्य): सत्यवक्ता और आत्मज्ञानी महापुरुषों व वेदों के प्रामाणिक वचन।

मुक्ति का मार्ग:

न्याय दर्शन का स्पष्ट सिद्धांत है कि जब मनुष्य को यथार्थ ज्ञान होता है, तो उसका मिथ्याज्ञान (भ्रम) नष्ट हो जाता है। भ्रम मिटने से मन के दोष (राग, द्वेष, मोह) मिटते हैं। दोष मिटने से गलत प्रवृत्ति (कर्म-बन्धन) समाप्त होती है और अंततः जन्म-मरण के समस्त दुःखों का अभाव होकर आत्मा को अपवर्ग (मोक्ष) प्राप्त होता है।

आज के समय में क्या प्रासंगिकता है?

आज के युग में जहाँ भ्रामक जानकारियाँ, अंधविश्वास, फेक-न्यूज और कुतर्क भरे पड़े हैं, वहाँ न्याय दर्शन की ५-चरणीय वैज्ञानिक तर्क-पद्धति (प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन) व्यक्ति को सही और गलत में स्पष्ट भेद करने की बौद्धिक शक्ति प्रदान करती है।

२. वैशेषिक दर्शन (महर्षि कणाद)

यह संसार के भौतिक पदार्थों और परमाणुओं की संरचना का विश्लेषण करने वाला दर्शन है। महर्षि कणाद ने बताया कि संसार की प्रत्येक वस्तु सूक्ष्मतम ‘परमाणुओं’ से बनी है। विशेष नामक तत्त्व का स्वतंत्र निरूपण करने के कारण इसे ‘वैशेषिक’ कहा जाता है।

इसमें क्या है?

वैशेषिक दर्शन सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को ७ पदार्थों में वर्गीकृत करता है:

  1. द्रव्य (९ मूल द्रव्य): पृथ्वी, जल, तेज (अग्नि), वायु, आकाश, काल (समय), दिक् (दिशा), आत्मा और मन।
  2. गुण (२४ गुण): रूप, रस, गंध, स्पर्श, संख्या, परिमाण, सुख, दुःख, बुद्धि, इच्छा, प्रयत्न आदि।
  3. कर्म (५ प्रकार की गतियां): ऊपर फेंकना, नीचे गिराना, सिकोड़ना, फैलाना और चलना।
  4. सामान्य (जाति): जो अनेक वस्तुओं में एक समान धर्म हो।
  5. विशेष: जो प्रत्येक परमाणु और नित्य द्रव्य को एक-दूसरे से बिल्कुल अलग करता है।
  6. समवाय: वह गहरा संबंध जिसे कभी अलग नहीं किया जा सकता (जैसे कपड़े में धागा या वस्तु में उसका गुण)।
  7. अभाव: किसी वस्तु का न होना।

मुक्ति का मार्ग:

संसार के इन भौतिक पदार्थों के यथार्थ स्वरूप, उनके नश्वर स्वभाव और आत्मा के शाश्वत स्वरूप को समझ लेने से अविद्या नष्ट हो जाती है और मनुष्य को ‘निःश्रेयस’ (परम कल्याण / मोक्ष) की प्राप्ति होती है।

आज के समय में क्या प्रासंगिकता है?

आधुनिक भौतिक विज्ञान (Physics) और रसायन विज्ञान (Chemistry) आज जिस परमाणुवाद और द्रव्य-गुणों की खोज कर रहे हैं, महर्षि कणाद ने सहस्रों वर्ष पूर्व उसका सूक्ष्म आध्यात्मिक व भौतिक ढाँचा प्रस्तुत कर दिया था। यह हमें सिखाता है कि भौतिक विज्ञान और अध्यात्म एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।

दूसरा युगल: सांख्य एवं योग दर्शन (आन्तरिक तत्त्व-ज्ञान और मन का नियंत्रण)

३. सांख्य दर्शन (महर्षि कपिल)

सांख्य दर्शन वैदिक दर्शनों में सबसे प्राचीन ज्ञान-मार्ग है। ‘सांख्य’ का अर्थ है—सम्यक् विवेकपूर्ण ज्ञान और तत्त्वों की निश्चित गणना। यह सृष्टि के विकास का क्रमबद्ध वैज्ञानिक मानचित्र प्रस्तुत करता है।

इसमें क्या है?

सांख्य दर्शन सम्पूर्ण अस्तित्व को २५ तत्त्वों में विभाजित करता है:

  • प्रकृति (जड़ शक्ति): जो त्रिगुणात्मक (सत्त्व, रजस्, तमस्) है और सम्पूर्ण दृश्य जगत् का उपादान कारण है।
  • महत्तत्त्व (बुद्धि): प्रकृति से उत्पन्न पहला प्रकाशमय तत्त्व।
  • अहंकार: व्यक्तित्व और ‘मैं’-पन की चेतना।
  • ५ तन्मात्राएँ: सूक्ष्म शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध।
  • ५ ज्ञानेन्द्रियाँ: कान, त्वचा, आँख, जीभ, नाक।
  • ५ कर्मेन्द्रियाँ: वाणी, हाथ, पैर, गुदा, जननेन्द्रिय।
  • मन: संकल्प-विकल्प करने वाला आन्तरिक साधन।
  • ५ स्थूल महाभूत: आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी।
  • पुरुष (२५वाँ तत्त्व – आत्मा): वह शुद्ध, नित्य, चेतन और साक्षी तत्त्व, जो प्रकृति के इन २४ तत्त्वों से सर्वथा परे है।

 मुक्ति का मार्ग:

अज्ञानतावश पुरुष (आत्मा) स्वयं को जड़ प्रकृति और शरीर से जोड़ लेता है और दुःखी होता है। जैसे ही आत्मा को यह स्पष्ट विवेक हो जाता है कि “मैं शरीर या प्रकृति नहीं, बल्कि उसका दृष्टा मात्र हूँ”, वैसे ही समस्त सांसारिक बंधनों का नाश होकर ‘कैवल्य’ (मोक्ष) प्राप्त हो जाता है।

आज के समय में क्या प्रासंगिकता है?

सांख्य का त्रिगुण सिद्धान्त (सत्त्व = शांति व संतुलन, रजस् = चंचलता व तृष्णा, तमस् = आलस्य व अज्ञान) आज के मानसिक तनाव और मनोविज्ञान को समझने का सबसे सटीक साधन है। यह हमें जीवन की घटनाओं से अलिप्त रहकर साक्षी-भाव से जीना सिखाता है।

 ४. योग दर्शन (महर्षि पतंजलि)

यदि सांख्य दर्शन सिद्धान्त (Theory) है, तो योग दर्शन उसका व्यावहारिक प्रयोग (Practical) है। सांख्य के तत्त्व-ज्ञान को अपने भीतर साक्षात् उतारने की क्रियात्मक पद्धति ही योग है। इसका मूल सूत्र है—‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः’ अर्थात् चित्त की चंचल वृत्तियों को शांत करके स्थिर करना ही योग है।

इसमें क्या है?

महर्षि पतंजलि ने चित्त को पूर्ण शांत करने के लिएअष्टांग योग‘ (८ अंग) का विधान किया है:

  1. यम (सामाजिक आचार): अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (आवश्यकता से अधिक संचय न करना)।
  2. नियम (व्यक्तिगत अनुशासन): शौच (पवित्रता), संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान (ईश्वर पर पूर्ण विश्वास)।
  3. आसन: शरीर की स्थिरता और सुखमय स्थिति।
  4. प्राणायाम: श्वास-प्रश्वास की गति का नियमन और प्राण-ऊर्जा का विस्तार।
  5. प्रत्याहार: इन्द्रियों को बाहरी विषयों से खींचकर अंतर्मुखी करना।
  6. धारणा: मन को किसी एक पवित्र लक्ष्य या चक्र पर ठहराना।
  7. ध्यान: उस लक्ष्य का निरंतर, अटूट चिंतन।
  8. समाधि: ध्यान करते-करते स्वयं के अस्तित्व को भूलकर केवल सत्य में लीन हो जाना।

मुक्ति का मार्ग:

अष्टांग योग के अभ्यास और ‘ॐकार’ की साधना से चित्त के समस्त क्लेश और संस्कार भस्म हो जाते हैं, और साधक अपने विशुद्ध चैतन्य स्वरूप में स्थित हो जाता है (स्वरूपावस्थिति / कैवल्य)।

आज के समय में क्या प्रासंगिकता है?

आज के युग में जहाँ हर दूसरा व्यक्ति तनाव, अनिद्रा, अवसाद और एकाग्रता की कमी से जूझ रहा है, वहाँ योग दर्शन केवल व्यायाम नहीं, बल्कि मानसिक शांति, कार्य-कुशलता और आंतरिक आनंद का अचूक उपाय है।

तीसरा युगल: मीमांसा एवं वेदान्त दर्शन (कर्तव्य-कर्म और परब्रह्म-साक्षात्कार)
५. पूर्व मीमांसा दर्शन (महर्षि जैमिनि)

यह दर्शन वेदों के कर्मकाण्ड और ‘धर्म’ की तार्किक व्याख्या करता है। इसका प्रथम सूत्र है—‘अथातो धर्मजिज्ञासा’ (अब धर्म के मर्म को जानने का विचार करते हैं)।

इसमें क्या है?

महर्षि जैमिनि ने स्पष्ट किया कि ‘धर्म’ कोई अंधविश्वास नहीं है, बल्कि वेदों द्वारा निर्देशित वे कर्तव्य-कर्म हैं जो मनुष्य का कल्याण करते हैं।

  • पञ्चमहायज्ञ: ब्रह्मयज्ञ (स्वाध्याय), देवयज्ञ (हवन/पर्यावरण शुद्धि), पितृयज्ञ (माता-पिता व गुरुजनों की सेवा), बलिवैश्वदेव (पशु-पक्षियों का पोषण) और अतिथियज्ञ (मानव-सेवा)।
  • कर्म के प्रकार: नित्य कर्म (दैनिक कर्तव्य), नैमित्तिक कर्म (विशेष अवसरों के कर्म), प्रायश्चित्त कर्म (त्रुटियों का सुधार), काम्य कर्म (कामना-युक्त) और निषिद्ध कर्म (पाप कर्म)।

मुक्ति का मार्ग:

काम्य (स्वार्थी) और निषिद्ध कर्मों को छोड़कर, निष्काम भाव से अपने नित्य-नैमित्तिक कर्तव्यों का पालन करने से अंतःकरण पूर्ण पवित्र हो जाता है और सांसारिक बन्धनों का नाश होकर मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

आज के समय में क्या प्रासंगिकता है?

पूर्व मीमांसा हमें पारिवारिक, सामाजिक और पर्यावरणीय दायित्वों को निष्ठापूर्वक निभाने की प्रेरणा देती है। यह सिखाती है कि समाज और प्रकृति से केवल लेना ही नहीं है, बल्कि ‘यज्ञीय भावना’ से समाज को लौटाना भी हमारा परम कर्तव्य है।

६. उत्तर मीमांसा / वेदान्त दर्शन (महर्षि बादरायण व्यास) 

यह वेदों के ज्ञानकाण्ड (उपनिषदों) का सर्वोपरि निष्कर्ष है, जिसे ‘ब्रह्मसूत्र’ भी कहते हैं। इसका प्रथम सूत्र है—‘अथातो ब्रह्मजिज्ञासा’ (अब परब्रह्म परमात्मा के स्वरूप को जानने का विचार करते हैं)।

इसमें क्या है?

वेदान्त दर्शन सृष्टि के मूल कारण ‘परब्रह्म’ और ‘जीवात्मा’ के वास्तविक संबंध का उद्घाटन करता है:

  • ब्रह्म का लक्षण: जिससे इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का जन्म, स्थिति और प्रलय होता है, वह सच्चिदानन्द सत्ता ही ब्रह्म है (जन्माद्यस्य यतः)।
  • अध्यास और अविद्या: जिस प्रकार अंधेरे में रस्सी को सांप समझकर मनुष्य भयभीत हो जाता है, उसी प्रकार अविद्या के कारण मनुष्य सच्चिदानन्द परमात्मा को भूलकर इस नश्वर संसार को ही सब कुछ मान बैठता है।
  • महावाक्य: उपनिषदों के महावाक्य जैसे—’तत्त्वमसि’ (वह ब्रह्म तुम ही हो) और ‘अहं ब्रह्मास्मि’ मनुष्य को उसकी असीम ईश्वरीय क्षमता का बोध कराते हैं।

मुक्ति का मार्ग:

साधन-चतुष्टय (विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत्ति और मोक्ष की तीव्र इच्छा) से युक्त होकर, गुरु-मुख से श्रवण, मनन और निदिध्यासन (गहन ध्यान) करने से जब ‘ब्रह्म-साक्षात्कार’ होता है, तो जीवात्मा समस्त संकीर्णताओं से मुक्त होकर परमानन्द में लीन हो जाती है।

आज के समय में क्या प्रासंगिकता है?

वेदान्त दर्शन मनुष्य को जाति, वर्ण, सम्प्रदाय और संकीर्ण सीमाओं से ऊपर उठाकर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ (सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है) और ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ (सब में एक ही ईश्वरीय चेतना है) का वैश्विक संदेश देता है। यह आधुनिक समाज में प्रेम, समानता और अभय (निर्भयता) की आधारशिला है।

 षड्दर्शनों का अद्भुत समन्वय

वैदिक षड्दर्शन आपस में विरोधी नहीं, बल्कि एक ही मंज़िल तक पहुँचने की छह क्रमिक सीढ़ियाँ हैं:

  1. न्याय और वैशेषिक मनुष्य की बुद्धि को तार्किक बनाकर भौतिक संसार के नियमों और द्रव्यों का स्पष्ट ज्ञान कराते हैं।
  2. सांख्य और योग मनुष्य को अंतर्मुखी बनाकर जड़ प्रकृति और चेतन आत्मा का भेद समझाते हैं तथा ध्यान द्वारा चित्त को शांत करते हैं।
  3. मीमांसा और वेदान्त मनुष्य को कर्तव्य-परायण बनाकर अंतःकरण को शुद्ध करते हैं और अंत में साक्षात् परब्रह्म की अनुभूति कराकर मोक्ष प्रदान करते हैं।

सनातन वैदिक दर्शन मानव-जीवन के त्रिविध तापों का समूल उच्छेद कर आत्मा को उसके वास्तविक, शांत और आनंदमय स्वरूप में प्रतिष्ठित करने वाला प्रत्यक्ष, शाश्वत और व्यावहारिक महामार्ग है। वैदिक षड्दर्शन वेदों में निहित सत्य का वह सुव्यवस्थित और व्यावहारिक अनुशीलन है, जो साधक को आत्म-साक्षात्कार और परम मोक्ष की प्रत्यक्ष अनुभूति कराता है।

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आगम (तन्त्र शास्त्र)

सनातन धर्म की ज्ञान-राशि मुख्यतः दो प्रमुख धाराओं में प्रवाहित होती है – निगम (वेद) और आगम (तन्त्र)। जहाँ निगम (श्रुति / वेद) कर्मकांड, उपासना और ज्ञान-काण्ड का प्रतिपादन करता है, वहीं आगम उस ईश्वरीय ज्ञान को जीवन में अनुभूत करने वाला व्यावहारिक एवं क्रियात्मक साधना-शास्त्र है। आगम शास्त्र (तंत्र शास्त्र ) भी वेदों के ही समान विशाल साहित्य है, अपौरुषेय है, और उतना ही रहस्य्मय भी। 

तन्त्र को लेकर अनेक भ्रांतियाँ हैं, किन्तु शास्त्रीय दृष्टि से तन्त्र कोई चमत्कार या विकृति नहीं, बल्कि चेतना के विस्तार और मन्त्रों को सजीव करने का विशुद्ध आध्यात्मिक एवं प्रायोगिक विज्ञान है।

आगम और तन्त्र का अर्थ एवं सूक्ष्म भेद

  • आगम: जो ज्ञान भगवान् शिव के मुख से प्रकट होकर गुरु-परम्परा के माध्यम से साधकों तक पहुँचा है, वह आगम कहलाता है। वाचस्पति मिश्र के अनुसार—जिस शास्त्र के द्वारा मनुष्य को लौकिक उन्नति (अभ्युदय) और आत्म-कल्याण (निःश्रेयस/मोक्ष) प्राप्त करने का मार्ग ज्ञात हो, उसे ‘आगम’ कहते हैं।

आगतं शिववक्त्रेभ्यो गतं च गिरिजाश्रुतौ । मतं च वासुदेवेन तेनागम इति स्मृतः ॥

अर्थात् जो शास्त्रीय विधान परमशिव के मुख से निःसृत हुआ, भगवती पार्वती के कर्णगोचर हुआ और भगवान् वासुदेव (विष्णु) द्वारा अनुमोदित हुआ, उसे ‘आगम’ कहा जाता है।

  • तन्त्र:

“तनोति विपुलांस्तत्त्वमन्त्रसमाश्रितान् । त्राणं च कुरुते पुंसां तेन तन्त्रमिति स्मृतम् ॥”

जो शास्त्र मन्त्रों और गूढ़ आध्यात्मिक तत्त्वों का विस्तार (तन्) करता है तथा साधक के समस्त भय और बन्धनों से उसकी रक्षा (त्रै) करता है, उसे ‘तन्त्र’ कहा जाता है।

  • सूक्ष्म भेद: सैद्धान्तिक रूप से दोनों अभिन्न हैं। सूक्ष्म रूप से आगम उस मूल उपदिष्ट ज्ञान-राशि को कहते हैं, जबकि तन्त्र उस ज्ञान के अनुष्ठान, मन्त्र-साधना और प्रयोग की व्यावहारिक विधि को कहा जाता है।

आगम-वाङ्मय का पाँच प्रमुख सम्प्रदायों में वर्गीकरण

उपास्य देवता के आधार पर आगम-ग्रन्थों को पाँच प्रमुख शाखाओं में विभक्त किया गया है:

  1. वैष्णवागम (पाञ्चरात्र एवं वैखानस): भगवान् विष्णु की उपासना और मन्दिर-प्रतिष्ठा से सम्बद्ध शास्त्र। पाञ्चरात्र की १३ प्रमुख संहिताओं में अहिर्बुध्न्यसंहिता, ईश्वरसंहिता, जयाख्यसंहिता, लक्ष्मीतन्त्र और सात्वतसंहिता प्रमुख हैं।
  2. शैवागम (२८ प्रधान आगम):
  • १० शिवभेद (द्वैतपरक): कामिक, योगज, दिव्य, मुकुट आदि।
  • १८ रुद्रभेद (द्वैताद्वैतपरक): किरण, रौरव, स्वायम्भुव आदि।
  • कश्मीर शैवदर्शन: मालिनीविजयोत्तर, स्वच्छन्द, विज्ञानभैरव तन्त्र तथा आचार्य अभिनवगुप्त-रचित तन्त्रालोक (आगम-साहित्य का विश्वकोश) एवं तन्त्रसार
  1. शाक्तागम (६४ प्रधान तन्त्र): भगवती शक्ति और महाविद्याओं की साधना के ग्रन्थ। दश महाविद्याओं, कुल-अकुल साधनाओं से सम्बद्ध ग्रन्थ, जैसे कुलार्णव तन्त्र, महानिर्वाण तन्त्र, रुद्रयामल, तन्त्रराज तन्त्र, शारदातिलक तथा आद्य शङ्कराचार्य-प्रणीत प्रपञ्चसार तन्त्र एवं सौन्दर्यलहरी
  2. सौर आगम: प्रत्यक्ष भगवान् सूर्य की शक्ति, आरोग्य और प्रकाश-साधना से जुड़े आगमिक मन्त्र-विधान।
  3. गाणपत्य आगम: विघ्नहर्ता भगवान् श्रीगणेश की तान्त्रिक उपासना और मूलाधार-शक्ति के जागरण से सम्बद्ध संहिताएँ।

आगम के गूढ़ रहस्य

पं० गोपीनाथ कविराज और आगम-मनीषियों के अनुसार तन्त्र के कुछ ऐसे रहस्य हैं जो लोक-मानस में प्रायः अज्ञात हैं:

  • मातृका (वर्णमाला) का ब्रह्माण्डीय रहस्य: तन्त्र में संस्कृत वर्णमाला के ५० अक्षर केवल भाषा के वर्ण नहीं हैं, बल्कि वे ‘मातृका-शक्ति’ (ब्रह्माण्ड की आद्य स्पन्दन-ऊर्जा) हैं। प्रथम वर्ण ‘अ’ परमशिव (निराकार प्रकाश) का प्रतीक है और अन्तिम वर्ण ‘ह’ विमर्श-शक्ति का। इन दोनों के योग और अनुस्वार के संयोग से ‘अहम्’ (पूर्ण चैतन्य) निष्पन्न होता है।
  • षडध्वा (छह मार्ग) का विज्ञान: तन्त्र का प्रतिपादन है कि सम्पूर्ण व्यक्त सृष्टि ६ मार्गों (षडध्वा) में बँटी है—तीन शब्द रूप (वर्ण, पद, मन्त्र) और तीन अर्थ रूप (कला, तत्त्व, भुवन)। मन्त्र-साधना द्वारा शब्द-अध्वा का शोधन होते ही अर्थ-अध्वा (सृष्टि के तत्त्व) स्वतः साधक के वश में आ जाते हैं।
  • यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे (नाड़ी-चक्र विज्ञान): तन्त्र ने सिद्ध किया कि जो कुछ इस विशाल ब्रह्माण्ड में है, वही मानव शरीर में सूक्ष्म रूप से विद्यमान है। ७२,००० नाड़ियों में मुख्य तीन—इड़ा (चन्द्र/ज्ञान), पिंगला (सूर्य/क्रिया) और मध्य में सुषुम्ना (अग्नि/शिव-शक्ति सामरस्य) तथा मूलाधार से सहस्रार तक षट्चक्रों का विशद मानचित्र आगमों की ही देन है।
  • स्पन्द-तत्त्व और स्वातंत्र्य-वाद: वेदान्त जहाँ जगत् को केवल ‘माया’ (अविद्या) कहकर निवृत्ति की ओर ले जाता है, वहीं आगम-तन्त्र जगत् को परमेश्वर का ‘स्पन्द’ (चैतन्य का सजीव विलास) मानता है। तन्त्र के अनुसार संसार त्याज्य नहीं, बल्कि शिव का ही रूपान्तरण है; अतः इन्द्रिय-ऊर्जा का दमन करने के बजाय साधना द्वारा उसका ऊर्ध्वारोहण करके ‘भोग और मोक्ष’ दोनों को एक साथ प्राप्त किया जा सकता है।
हमारे नित्य पूजा-अनुष्ठानों में आगम/तन्त्र का व्यावहारिक विनियोग

साधारणतः समझा जाता है कि वैदिक पूजा और तन्त्र बिल्कुल भिन्न हैं, किन्तु वस्तुतः हमारे दैनिक पूजा-पाठ और मन्दिर-विधान का अधिकांश क्रियात्मक स्वरूप आगम-तन्त्र से ही अनुप्राणित है:

  1. न्यास और भूतशुद्धि: पूजा के आरम्भ में किया जाने वाला करन्यास, अंगन्यास और मातृकान्यास विशुद्ध आगमिक प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य पंचभूतों से निर्मित नश्वर शरीर का मन्त्र-ऊर्जा द्वारा शोधन कर ‘देवो भूत्वा देवं यजेत्’ (देवता होकर ही देवता की आराधना करें) के शास्त्रीय सिद्धान्त को घटित करना है।
  2. मुद्रा एवं यन्त्र-विज्ञान: आह्वान, प्रतिष्ठा, नैवेद्य-समर्पण के समय प्रयुक्त होने वाली मुद्राएँ (धेनु, अंकुश, योनि मुद्रा आदि) तथा पूजा-पीठ पर निर्मित होने वाले त्रिकोण, अष्टदल या षट्कोण यन्त्र आगमों के क्रिया-पाद का अभिन्न अंग हैं। मुद्रा स्थूल चित्त को एकाग्र करती है और यन्त्र चेतना के लिए ऊर्जा-केन्द्र का कार्य करता है।
  3. मूर्ति-प्रतिष्ठा एवं मन्दिर-वास्तु: मन्दिरों के गर्भगृह का निर्माण, प्रतिमा का मान-प्रमाण, उनमें ‘प्राण-प्रतिष्ठा’ (प्राण-संचार) और षोडशोपचार पूजा का सम्पूर्ण नियमन वैष्णव पाञ्चरात्र, वैखानस अथवा शैव आगम संहिताओं द्वारा ही होता है।
  4. घट-स्थापना एवं कलश-पूजन: कलश में तीर्थों, वरुण, नवग्रह और मण्डल-देवताओं का आवाह्न तथा पल्लव-नारियल द्वारा ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का संचय आगमिक मण्डल-विधान पर आधारित है।
  5. दुर्गासप्तशती का मन्त्र-विधान: मार्कण्डेय पुराण के श्लोक केवल स्तुति ही नहीं, आगम-परम्परा के अनुसार कवच, अर्गला, कीलक, नर्वाण-मन्त्र और शापोद्धार की शास्त्रीय कुञ्जी के बिना इनका पूर्ण जागरण सम्भव नहीं होता।

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सन्दर्भ सूची (References):

  1. तन्त्राचार्य गोपीनाथ कविराज और योग-तन्त्र-साधना लेखक; रमेशचन्द्र अवस्थी, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी।
  2. तन्त्र-विमर्श (प्रथम खण्ड); सम्पादक: डॉ. सूर्यप्रकाश व्यास, आर्यभाषा संस्थान, वाराणसी।
  3. मन्त्रमहोदधि (महीधर-विरचित, ‘नौका’ एवं ‘अरित्र’ हिन्दी व्याख्या सहित); व्याख्याकार: डॉ. सुधाकर मालवीय, चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली।
  4. आगमरहस्यम् (प्रथम भाग); रचयिता: परमहंस श्रीसरयूप्रसाद द्विवेदी, सम्पादक एवं अनुवादक: डॉ. सुधाकर मालवीय, चौखम्बा संस्कृत सीरीज़ ऑफिस, वाराणसी।
  5. कल्याण (धर्मशास्त्र अंक) गीताप्रेस, गोरखपुर (पृष्ठ २००-२०१: ‘आगम या तन्त्रग्रन्थ’ संदर्भ)।
  6. पातञ्जलयोगप्रदीप (षड्दर्शनसमन्वय सहित); ग्रन्थकार: श्रीस्वामी ओमानन्द तीर्थ, गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रकरण १, २, ३ एवं ४)।
  7. श्रीमद्भगवद्रामानुजाचार्य-कृत श्रीभाष्यम् (भावप्रकाशिका भाषा-भाष्य सहित, प्रथम भाग); भाष्यकार: आचार्य श्रीशिवप्रसाद द्विवेदी, चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी (‘दार्शनिक परिचय’ संदर्भ)।

 

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