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वेद क्या हैं ? श्रृंखला के पिछले तीन अंकों का संक्षिप्त सार
भाग १ (वेदों का स्वरूप एवं मर्यादा): इसमें हमने वेदों के शास्त्रीय स्वरूप को स्थापित किया—वेद साक्षात् नारायण का वाङ्मय स्वरूप, सर्वविद् ज्ञान-विज्ञान और मोक्ष का अक्षय महासागर हैं। वेद अनादि और अपौरुषेय हैं। मानव की क्षीण होती स्मरण-शक्ति को देखते हुए महर्षि वेदव्यास ने एक ही वेद को चार भागों में विभक्त किया। साथ ही, हमने समझा कि वेद-अध्ययन कोई साधारण पुस्तक-पठन नहीं, बल्कि यज्ञोपवीत, शास्त्रीय पात्रता, गुरु-मुख से श्रवण और अनुशासन से बंधी एक साधना है।
भाग २ (उपवेद, विद्याएँ और परम लक्ष्य): इसमें हमने जाना कि वैदिक ज्ञान में ३२ मुख्य विद्याओं और ६४ कलाओं का विस्तृत वर्णन मिलता है। हमने चार प्रमुख उपवेदों—आयुर्वेद (स्वास्थ्य), धनुर्वेद (रक्षा-विज्ञान), गांधर्ववेद (कला व संगीत) और स्थापत्य/अर्थशास्त्र (प्रबंधन) के व्यावहारिक महत्व को समझा। वेदों का अंतिम लक्ष्य मनुष्य को ‘पुरुषार्थ चतुष्टय‘ (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) की प्राप्ति कराना है।
भाग ३ (वैदिक शब्दावली: मन्त्र संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद्): इसमें हमने वैदिक वाङ्मय के चार मुख्य स्तंभों के अर्थ और संबंध को समझा:
- मन्त्र संहिता: केवल यही भाग वास्तविक ‘श्रुति’ और ‘अपौरुषेय’ (ईश्वर का निःश्वास) है।
- ब्राह्मण ग्रन्थ: ऋषियों द्वारा रचित वे ग्रंथ जो अपौरुषेय मन्त्रों का यज्ञीय विधि-विधान और व्यावहारिक प्रयोग (विनियोग) स्पष्ट करते हैं।
- आरण्यक: अरण्य (एकांत) में पढ़े जाने वाले ग्रंथ जो बाहरी यज्ञों के पीछे छिपे आध्यात्मिक रहस्यों को प्रकट करते हैं।
- उपनिषद्: वेदों का अंतिम भाग (वेदान्त / ज्ञानकाण्ड), जो जीव, जगत् और ब्रह्म के परम सत्य (मोक्ष) का साक्षात्कार कराता है।
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भाग ४ में हम संक्षेप में वेदांग से सम्बंधित महत्वपूर्ण शब्दों के बारे में जानेंगे। सनातन धर्म में वेद साक्षात् परमेश्वर का शब्द-रूप विग्रह (वाङ्मय स्वरूप) हैं। वे ‘श्रुति’ हैं, जो अनादि, अनंत और अपौरुषेय हैं। उस ईश्वरीय ज्ञान-राशि के शुद्ध स्वरूप को अक्षुण्ण रखने और उसके गूढ़ मर्म को उजागर करने के लिए हमारे मन्त्रद्रष्टा ऋषियों ने अपने गहन चिंतन, तप और मनन से जिन सर्वोपरि शास्त्रों की रचना की, वे ‘स्मृति-साहित्य‘ के मूल स्तंभ– ‘वेदांग‘ कहलाए

श्रुति (वेदों) पर अधिकार प्राप्त करने और उन्हें समझने का साधन ‘वेदांग‘ हैं।
वेद पर अधिकार प्राप्त करने का साधन वेदाङ्ग है । शिक्षा, व्याकरण, छन्द, निरुक्त, ज्योतिष एवं कल्प ये छह वेदाङ्ग हैं।
वेदांग सूत्र शैली (संक्षिप्त नियमों) में लिखे गए थे, हालाँकि आज सभी सूत्र उपलब्ध नहीं हैं। ‘सूत्र’ का लक्षण यह है कि बहुत कम अक्षरों में एक ऐसा सार-सत्य व्यक्त किया जाए जिसमें संशय की कोई गुंजाइश न हो और अर्थ बहुत व्यापक हो। सूत्र-साहित्य में प्राचीन ऋषियों की वैज्ञानिक बुद्धि का अद्भुत परिचय मिलता है।
सभी वेदांग ‘स्मृति‘ के अंतर्गत आते हैं, इसलिए ये अपौरुषेय (ईश्वर-कृत) नहीं हैं बल्कि ऋषियों द्वारा रचित हैं। पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा सूत्रों को भी वेदांग के अंतर्गत मान लेना उचित होगा। इसके अतिरिक्त कुछ वैदिक-परिशिष्ट और अनुक्रमणिकाएँ भी हैं। परिशिष्ट में अनुष्ठानों का अतिरिक्त विवरण है और अनुक्रमणिका में मंत्रों के ऋषि, देवता, छंद आदि का विवरण है। वेद अध्ययन में सहायक होने के कारण इन्हें भी वेदांग के अंतर्गत माना जा सकता है।
जिस प्रकार मंत्र और ब्राह्मण को मिलाकर ‘वेद’ बनता है, उसी प्रकार वेद और वेदांग को मिलाकर पूरा ‘वैदिक-साहित्य’ बनता है। वेद ईश्वरीय अंतर्दृष्टि (बोधि) का परिणाम हैं और वेदांग ऋषियों के मनन का। इसलिए वेद ‘श्रुति’ हैं और वेदांग ‘स्मृति’। वेद को समझने और उसकी विद्या को पाने के लिए वेदांग एक साधन-शास्त्र है। ये छह वेदांग मंत्र-विद्या की छह साधनाओं का संकेत करते हैं।
वेदांग परिचय
सनातन धर्म में वेद साक्षात् परमेश्वर का शब्द-रूप विग्रह (वाङ्मय स्वरूप) हैं। वे ‘श्रुति’ हैं, जो अनादि, अनंत और अपौरुषेय हैं।
‘बोधि‘ और ‘स्मृति‘: शास्त्रों केअनुसार बताया गया है कि ऋषियों को जो ईश्वरीय वाणी (वेद मन्त्र) प्राप्त हुई, वह ‘बोधि‘ (दिव्य अंतर्दृष्टि) के माध्यम से मिली। ‘बोधि’ की अनुभूति आकाश में चमकने वाली बिजली की कौंध की तरह अलौकिक और क्षणिक होती है। उस क्षणिक अनुभूति के पश्चात् ऋषियों के चित्त में जो ज्ञान स्थायी रूप से सुरक्षित रहा, वह ‘स्मृति‘ कहलाया। चूँकि ईश्वरीय वाणी अत्यंत सूक्ष्म है, उसे लोक-व्यवहार में सुरक्षित रखने और उसके अर्थ की रक्षा करने के लिए ऋषियों ने जिन शास्त्रों की रचना की, वे ‘स्मृति-साहित्य‘ के मूल स्तंभ — ‘वेदांग‘ कहलाए।
शास्त्रों का स्पष्ट विधान है कि इन ६ वेदांगों के अनुशासन में ढले बिना वेदों के वास्तविक अर्थ तक पहुँचना संभव नहीं है। यदि वेद ईश्वरीय ज्ञान का असीम महासागर हैं, तो वेदांग उस महासागर में प्रवेश कराने वाले छः पावन द्वार हैं।
6 वेदांगों का त्रिधा (3 fold) वर्गीकरण
प्राचीन ऋषियों ने व्यावहारिक आवश्यकता के आधार पर इन ६ अंगों को तीन मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया था:
- स्वाध्याय प्रयोजन (शुद्ध पाठ और कंठस्थ करने हेतु): शिक्षा और छंद।
- अर्थविज्ञान प्रयोजन (गहरे अर्थ और मर्म को समझने हेतु): व्याकरण और निरुक्त।
- कर्मानुष्ठान प्रयोजन (जीवन और यज्ञ में प्रयोग करने हेतु): ज्योतिष और कल्प।
वेद-पुरुष
प्राचीन मनीषियों ने पूरे वैदिक वाङ्मय को एक ‘सजीव पुरुष’ (वेद-पुरुष) के रूप में देखा और समझाया कि जैसे किसी मनुष्य का शरीर बिना अंगों के कोई कार्य नहीं कर सकता, वैसे ही इन छः वेदांगों के बिना वेद-ज्ञान भी व्यवहार में नहीं लाया जा सकता।
वेदांग वे गंभीर और प्रामाणिक शास्त्र हैं, जो वेदों की पवित्रता, उनके शुद्ध उच्चारण, उनके अर्थ और उनके प्रयोग की रक्षा का विधान करते हैं। शास्त्रों का स्पष्ट मत है कि इन ६ वेदांगों के अनुशासन में ढले बिना वेदों के वास्तविक अर्थ तक पहुँचना संभव नहीं है।

1. शिक्षा (नासिका/नाक) — स्वर, मात्रा और नाद-विज्ञान का आधार
पाणिनीय शिक्षा में कहा गया है— “शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य”। जिस प्रकार नासिका (नाक) मुखमंडल का प्रमुख अंग है और श्वास-उच्छ्वास को नियंत्रित करती है, उसी प्रकार ‘शिक्षा’ वेदांग मंत्रों के श्वास, स्वर और नाद का नियमन करता है।
- ‘शिक्षा’ क्या है? – ‘शिक्षा’ वेदों का शुद्ध उच्चारण-विज्ञान (Phonetics) है। यह शास्त्र बताता है कि प्रत्येक वर्ण या अक्षर का उच्चारण कंठ, तालु, मूर्धा या नासिका में से किस स्थान से होगा।
- स्वर-भेद से अर्थ-भेद: वेदों में सही उच्चारण का अत्यंत महत्त्व है, स्वर के ऊँचे-नीचे होने से भी अर्थ बदल जाता है। मंत्र का एक ही शब्द उदात्त (उच्च स्वर), अनुदात्त (निम्न स्वर) या स्वरित (मध्यम स्वर) के सूक्ष्म अंतर से अपना संपूर्ण अर्थ परिवर्तित कर देता है। इसीलिए गुरु-मुख से सस्वर सुनकर सीखने की ‘अनुश्रव’ परंपरा इसी उच्चारण-शुद्धि को बनाए रखने का विधान है।
- व्युत्पत्ति और दीक्षा: ‘शिक्षा’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘शक्’ (सामर्थ्य या शक्ति) से है। प्राचीन काल में जब आचार्य उत्तर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके शिष्य को वेद-मंत्र का अभ्यास कराते थे, तो वे शिष्य के भीतर मंत्र की आंतरिक शक्ति और सामर्थ्य का संचार (दीक्षा) करते थे।
(व्युत्पत्ति – किसी शब्द का जन्म, उसका मूल (Origin) और उसकी रचना का विज्ञान (Etymology)।
2. कल्प (हस्त/हाथ) — यज्ञानुष्ठान और जीवन-मर्यादा का क्रियात्मक विधान
वेद-पुरुष के ‘हाथ’ कल्प कहलाते हैं— “हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते”। जिस प्रकार हाथ से सभी कर्म संपन्न किए जाते हैं, उसी प्रकार वेदों में वर्णित कर्मकांड, यज्ञीय क्रियाओं और संस्कारों को व्यवहार में लाने का कार्य ‘कल्प’ करता है।
- कल्प’ शब्द का मूल ‘क्लृप‘ (आकार देना या रूप गढ़ना) है। कल्प का मुख्य ध्येय संस्कारों के माध्यम से मनुष्य के व्यक्तित्व को गढ़कर उसे ‘दिव्य रूप’ प्रदान करना है। ऋषियों ने कल्पसूत्रों को चार विभागों में संरचित किया
- कल्पसूत्रों में वैदिक अनुष्ठानों का क्रमबद्ध विवरण है, जिन्हें ऋषियों ने मुख्य रूप से चार विभागों में संरचित किया:
- श्रौतसूत्र: वेदों में वर्णित १४ मुख्य श्रौत-यज्ञों की प्रयोग विधि।
- श्रौत‘ का अर्थ: जो सीधे ‘श्रुति‘ (वेदों) से निकले हों
- उदाहरण: इसमें राजाओं और ऋषियों द्वारा किए जाने वाले बड़े सार्वजनिक यज्ञों की प्रयोग-विधि आती है; जैसे अग्निहोत्र, सोमयाग, दर्शपूर्णमास आदि।
- गृह्यसूत्र: (गृहस्थ जीवन के नियम व संस्कार):
- उदाहरण (१६ संस्कार): गर्भाधान, पुंसवन, नामकरण, अन्नप्राशन, उपनयन (जनेऊ), विवाह से लेकर अंत्येष्टि तक के जीवन-व्यापी संस्कार।

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- उदाहरण (पंचमहायज्ञ): गृहस्थों के लिए प्रतिदिन किए जाने वाले ५ नित्य कर्तव्य:
- देवयज्ञ: हवन/पूजा करना।
- पितृयज्ञ: पूर्वजों/पितरों के प्रति तर्पण व श्रद्धा।
- मनुष्ययज्ञ: अतिथि व अभ्यागत का सत्कार।
- भूतयज्ञ: गाय, पक्षी व अन्य जीव-जंतुओं को अन्न/आहार देना।
- ब्रह्मयज्ञ: प्रतिदिन स्वाध्याय व वेदों का अध्ययन करना।
- उदाहरण (पंचमहायज्ञ): गृहस्थों के लिए प्रतिदिन किए जाने वाले ५ नित्य कर्तव्य:

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धर्मसूत्र (सामाजिक मर्यादा, कानून व आचार):
- उदाहरण (स्वधर्म व आश्रम): विद्यार्थी, गृहस्थ और संन्यासी के कर्तव्य।
- उदाहरण (राजधर्म व न्याय): राजा की कर्तव्य-परायणता, कर-प्रणाली और सामाजिक न्याय।
- उदाहरण (सदाचार): भोजन, स्वच्छता, अतिथि-सत्कार और नैतिक आचरण के नियम (गौतम, आपस्तम्ब व बौधायन धर्मसूत्र)।
- शुल्बसूत्र (प्राचीन भारतीय ज्यामिति व गणित):
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- शुल्ब‘ का अर्थ: प्राचीन काल में नापने के लिए उपयोग की जाने वाली ‘डोरी या रस्सी’।
- यज्ञवेदी और कुंडों को सही आकार (त्रिभुज, वृत्त, वर्ग) में नापने के लिए इस रस्सी का प्रयोग होता था। इसी से भारतीय रेखागणित (Geometry) और गणित के सूक्ष्म सिद्धांत उदित हुए
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3. व्याकरण (मुख/मुँह) — शब्दों की शुद्धि और भाषा का कठोर अनुशासन
व्याकरण को वेद-पुरुष का ‘मुख’ माना गया है— “मुखं व्याकरणं स्मृतम्”। जिस प्रकार मुख से वाणी प्रकट होती है, उसी प्रकार व्याकरण शास्त्र पदों की संरचना, प्रकृति और प्रत्यय को अलग-अलग करके शब्द के यथार्थ स्वरूप को सामने लाता है।
- प्रकृति और प्रत्यय: किसी शब्द का मूल रूप ‘प्रकृति’ (धातु या मूल शब्द) कहलाता है, और उसके अंत में जुड़ने वाला शब्दांश ‘प्रत्यय’ कहलाता है। व्याकरण इन दोनों को अलग-अलग करके शब्द की सटीक रचना स्पष्ट करता है।
- शब्द-शुद्धि और सुरक्षा: व्याकरण का मुख्य प्रयोजन वेदों की मूल संहिता को विकार-रहित (अपरिवर्तित) रखना है। यह शब्दों के लोप, आगम और वर्ण-परिवर्तन के नियमों का विश्लेषण करता है।
- अर्थ-रक्षा का उदाहरण: सही शब्द-रूप का ज्ञान न होने पर अर्थ का अनर्थ हो सकता है; जैसे उच्चारण और व्याकरण के अभाव में ‘स्वजन’ (अपने आत्मीय जन) और ‘श्वजन’ (कुत्ते) के बीच का भेद समाप्त हो सकता है।
- प्रतिनिधि ग्रंथ: महर्षि पाणिनि की ‘अष्टाध्यायी’ इस वेदांग का सर्वमान्य और प्रामाणिक ग्रंथ है।
4. निरुक्त (श्रोत्र/कान) — शब्दों की आंतरिक व्युत्पत्ति और अर्थ-निर्वचन
निरुक्त को वेद-पुरुष के ‘कान‘ कहा गया है— “निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते”।
- निरुक्त का सीधा अर्थ क्या है?: निरुक्त वेदों का ‘ शब्दकोष + अर्थ-विज्ञान‘ (Etymology & Word Science) है। जहाँ व्याकरण केवल यह बताता है कि कोई शब्द ‘रचनात्मक दृष्टि से शुद्ध है या नहीं’, वहीं निरुक्त यह प्रकट करता है कि “इस शब्द का यह अर्थ क्यों पड़ा और इसके मूल में कौन-सी क्रिया (Action) छिपी है?”
- कान (श्रोत्र) से तुलना क्यों?: जिस प्रकार कान केवल बाहरी ध्वनि नहीं सुनते, बल्कि आवाज़ के पीछे छिपे भाव और बात के मर्म को पकड़ते हैं, उसी प्रकार निरुक्त मंत्रों के बाहरी शब्दों को खोलकर उनके अंदर छिपे वास्तविक अर्थ को हमारे कानों तक पहुँचाता है।
सरल उदाहरण से समझें:
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- व्याकरण की दृष्टि: व्याकरण बताएगा कि ‘गौ‘ एक संज्ञा पद (शब्द) है और इसके रूप कैसे चलेंगे।
- निरुक्त की दृष्टि: महर्षि यास्क का निरुक्त गहराई में जाकर बताएगा कि इसे ‘गौ’ क्यों कहते हैं? क्योंकि यह ‘गम्‘ (चलना/गमन करना) धातु से बना है—अर्थात् ‘जो निरंतर चलती रहती है और जिसके माध्यम से दूध व कृपा का प्रवाह होता है, वह गौ है‘।
निरुक्त से जुड़े २ मुख्य शास्त्रीय पहलू:
- वैदिक शब्दकोश (निघण्टु) का भाष्य: प्राचीन काल में वेदों के कठिन और अप्रचलित शब्दों के संग्रह को ‘निघण्टु‘ (वैदिक कोष) कहा जाता था। महर्षि यास्क द्वारा रचित ‘निरुक्त‘ इसी निघण्टु के कठिन शब्दों का प्रामाणिक भाष्य (व्याख्या) है।
- मंत्रों के अर्थ-ज्ञान की अनिवार्यता: आचार्य कौत्स का मानना था कि “मंत्रों का अर्थ समझे बिना केवल उनका उच्चारण कर लेना ही काफ़ी है।” महर्षि यास्क ने निरुक्त की रचना करके इस सोच का पूर्ण खण्डन किया। उन्होंने अति-सुंदर उदाहरण दिया:

5. छंद (पाद/पैर) — मंत्रों का माप, मात्रा-सुरक्षा और संगीतमय संतुलन
छंद (पाद/पैर) — मंत्रों का माप, मात्रा-सुरक्षा और संगीतमय संतुलन
छंद को वेद-पुरुष के ‘पैर’ कहा गया है— “छन्दः पादौ तु वेदस्य”– जिस प्रकार पैर पूरे शरीर को प्रतिष्ठा, गति और संतुलन प्रदान करते हैं, उसी प्रकार छंद वेद-मंत्रों को अलौकिक लय, दिशा और अपरिवर्तनीय अमरता (अक्षयता) प्रदान करते हैं, जिसके कारण हज़ारों वर्षों बाद भी मंत्र अपने मूल रूप में सुरक्षित रहे।
छंद का वास्तविक महा-सामर्थ्य (दिव्य तरंग-विज्ञान):
- विनियोग में अनिवार्यता: वैदिक परंपरा में जब भी किसी मंत्र का जप या उच्चारण किया जाता है, तो उसके ‘विनियोग’ में ऋषि, देवता के साथ छंद का नाम लेना अनिवार्य होता है। बिना छंद के ज्ञान के मंत्र-जप निष्फल माना गया है, क्योंकि छंद ही मंत्र की ऊर्जा को सही दिशा में प्रवाहित करता है।
- गायत्री मंत्र की महिमा: जगत्-प्रसिद्ध ‘गायत्री मंत्र’ का नामकरण ही ‘गायत्री छंद’ (२४ अक्षरों के दिव्य संयोजन) के कारण हुआ है। इसका शास्त्रीय वचन है— “गायन्तं त्रायते इति गायत्री” अर्थात् जो इसका सस्वर गायन और ध्यान करता है, यह छंद उसकी रक्षा करता है।
- वेदों का अचूक ‘सुरक्षा-कवच‘ (दिव्य गणित): छंद वेदों का ऐसा अचूक गणितीय माप है जिसने हज़ारों वर्षों से वेद-मंत्रों को अमर बनाए रखा। प्रत्येक छंद में वर्णों (अक्षरों) की संख्या इतनी कठोरता से निबद्ध है कि युगों-युगों के बाद भी वेद-मंत्रों में एक भी अक्षर की मिलावट या परिवर्तन संभव ही नहीं हो सका। यदि कोई एक अक्षर भी बदलने का प्रयास करे, तो छंद का अलौकिक संतुलन और प्रवाह तुरंत खंडित हो जाता है।
गद्य और पद्य से छंद का संबंध:
- पद्य में (ऋग्वेद व सामवेद): पद्य मंत्रों में छंद अक्षरों की निश्चित गिनती और संगीतमय लय तय करता है, जिससे वे गाने योग्य (गेय) और कर्णप्रिय बनते हैं।
- गद्य में (यजुर्वेद): यजुर्वेद के गद्यात्मक मंत्रों में भी छंद अत्यंत सूक्ष्म रूप से विद्यमान रहता है। इसमें अक्षरों की निश्चित संख्या और उच्चारण का समय तय होता है, जिसे शास्त्रीय भाषा में ‘यजुश्छंद’ कहते हैं। अतः वेदों का कोई भी भाग छंद-रहित नहीं है।
प्रमुख ग्रंथ एवं ४ मुख्य वैदिक छंद:
आचार्य पिङ्गल द्वारा विरचित ‘छंदः सूत्रम्‘ इस वेदांग का मूलाधार ग्रंथ है। इसमें २६ वैदिक छंदों का विधान है, जिनमें से ४ प्रमुख छंद ये हैं:
- गायत्री छंद: कुल २४ अक्षर (८-८ अक्षरों के ३ पाद) — मंत्रों का मुकुटमणि छंद।
- अनुष्टुप् छंद: कुल ३२ अक्षर (८-८ अक्षरों के ४ पाद) — इसी छंद में रामायण, महाभारत और भगवद्गीता के अमर श्लोक गुंफित हैं।
- त्रिष्टुप् छंद: कुल ४४ अक्षर (११-११ अक्षरों के ४ पाद) — ऋग्वेद और यजुर्वेद की ऋचाओं में इस छंद का विशाल विस्तार है।
- जगती छंद: कुल ४८ अक्षर (१२-१२ अक्षरों के ४ पाद) — वैदिक मंत्रों में अत्यंत ओजस्वी और गंभीर संगीतमय छंद।
6. ज्योतिष (चक्षु/आँखें) — काल-विधान, खगोल और यज्ञादि का समय-विज्ञान
ज्योतिष को वेद-पुरुष के ‘नेत्र’ (आँखें) कहा गया है— “ज्योतिषामयनं चक्षुः”। जिस प्रकार आँखों के बिना मनुष्य किसी स्थान का प्रत्यक्ष दर्शन या सही दिशा का निर्धारण नहीं कर सकता, उसी प्रकार काल (समय) और नक्षत्रों के ज्ञान के बिना वैदिक यज्ञों एवं अनुष्ठानों का सम्पादन असंभव है।
जनसामान्य की सबसे बड़ी भ्रांति और ज्योतिष का वास्तविक स्वरूप:
- अधिकांश लोग ज्योतिष का अर्थ केवल ‘जन्मपत्री देखना’ या ‘भविष्यवाणी करना’ (फलित ज्योतिष) मान लेते हैं। शास्त्रीय दृष्टि से फलित तो ज्योतिष का अत्यंत सूक्ष्म भाग है। ‘ज्योतिष’ शब्द का मूल है ‘ज्योतिषाम् अयनम्‘ अर्थात् ‘आकाशीय पिंडों (सूर्य, चंद्र, नक्षत्रों) की गति और उनके प्रकाश का अध्ययन‘। यह विशुद्ध रूप से काल-विज्ञान (Science of Time) और वैदिक खगोल-शास्त्र (Vedic Astronomy) है।
- ऋतु और नक्षत्र विधान: श्रौत और गृह्य यज्ञों का अनुष्ठान विशिष्ट अयन (उत्तरायण/दक्षिणायन), ऋतु, पक्ष, तिथि और नक्षत्र के शुद्ध योग में ही फलदायी होता है।
- सूर्य-चंद्र गति एवं संवत्सर: यह शास्त्र सूर्य, चंद्रमा और नक्षत्र चक्र की सूक्ष्म गतियों से संवत्सर (वर्ष), मास, तिथि और मुहूर्त का सटीक गणित निकालता है।
- यज्ञीय सफलता: अनुष्ठान की सफलता उसके निर्दिष्ट काल पर निर्भर करती है। अतः ज्योतिष वेद-पुरुष को ‘काल-दृष्टि’ प्रदान करके अनुष्ठान को सिद्ध करता है। ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद का अपना-अपना वेदांग-ज्योतिष ग्रंथ (जैसे आर्च एवं याजुष ज्योतिष) उपलब्ध है।
- वेदों का मुख्य ध्येय यज्ञों और सत्कर्मों का विधान करना है और सभी यज्ञ ‘काल‘ (सही समय) के आश्रित हैं।
शास्त्रों में स्पष्ट उद्घोष है:
“वेदा हि कालाभिपूर्वा विहिताश्च यज्ञाः, तस्मादिदं कालविधानशास्त्रम्।” (वेदाङ्ग ज्योतिष, याजुष ज्योतिष – श्लोक ३ / ऋक् ज्योतिष – श्लोक ३६)
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- अर्थात् वेदों का मुख्य ध्येय यज्ञों और सत्कर्मों का विधान करना है, और सभी यज्ञ ‘काल‘ यानी सही समय के आश्रित हैं। इसलिए काल का ज्ञान कराने वाला ज्योतिष शास्त्र ही सर्वोपरि है।
- ‘ऋत्विक्‘ का गूढ़ अर्थ: यज्ञ संपन्न कराने वाले आचार्य को ‘ऋत्विक्‘ कहा जाता है। इसका शाब्दिक अर्थ है— ‘ऋतु-याजी‘ (जो सही ऋतु, सटीक तिथि और शुद्ध नक्षत्र-योग में ही यज्ञ का अनुष्ठान करे) । यदि काल का गणित ज़रा भी चूका, तो अनुष्ठान का वास्तविक फल प्राप्त नहीं होता।
परिशिष्ट और अनुक्रमणिका: वेदों की प्रामाणिकता और सुरक्षा व्यवस्था
६ वेदांगों के अतिरिक्त, वैदिक वाङ्मय में ‘परिशिष्ट’ और ‘अनुक्रमणिका’ का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। शास्त्रीय दृष्टि से ये मुख्य वेदांगों (विशेषतः कल्प, छंद और व्याकरण) के अनुपूरक के रूप में कार्य करते हैं।
प्राचीन ऋषियों ने वेदों को काल के प्रभाव और किसी भी भावी मिलावट से बचाने के लिए इन दो साधनों की रचना की:
परिशिष्ट – कल्प का व्यावहारिक पूरक
‘परिशिष्ट’ का शाब्दिक अर्थ है विषय को पूर्ण करने वाला अतिरिक्त विवरण’।
- शास्त्रीय मर्म: जब मुख्य कल्पसूत्रों (श्रौत और गृह्य सूत्र) में यज्ञानुष्ठान, संस्कारों या दैनिक कर्मकांड की कोई सूक्ष्म विधि या विशेष परिस्थिति का नियम छूट जाता है, तो उसे ‘परिशिष्ट’ के माध्यम से पूर्ण किया जाता है।
- महत्व: यह यज्ञ कराने वाले आचार्यों और साधकों के लिए एक मार्गदर्शक का काम करता है, जिससे पूजा या यज्ञ में कोई त्रुटि न रहे।
अनुक्रमणिका– वेदों की प्रामाणिक कार्य-सूची
अनुक्रमणिका ऋषियों द्वारा निर्मित वह अद्भुत ‘इंडेक्सिंग/सूचीबद्धता’ प्रणाली है, जिसने वेदों को विश्व का सबसे सुरक्षित और अपरिवर्तनीय ग्रंथ बना दिया।
- शास्त्रीय मर्म: महर्षि शौनक और कात्यायन जैसे आचार्यों ने प्रत्येक वेद की अलग-अलग अनुक्रमणिकाएँ तैयार कीं। इसमें प्रत्येक वेद-मंत्र का पूरा डेटा रिकॉर्ड रहता है:
- ऋषि-अनुक्रमणिका: मंत्र को प्रकट करने वाले मन्त्रद्रष्टा ऋषि कौन हैं।
- देवता-अनुक्रमणिका: मंत्र किस देवता को समर्पित है।
- छंद-अनुक्रमणिका: मंत्र में कौन-सा छंद है और उसमें अक्षरों की कुल संख्या कितनी है।
- सूक्त व शब्द-संख्या: यहाँ तक कि संहिता के कुल सूक्तों, पदों और अक्षरों तक की सटीक गिनती अनुक्रमणिका में दर्ज की गई।
- महत्व: इसी कठोर व्यवस्था (अनुक्रमणिका) के कारण हज़ारों वर्षों में कोई भी व्यक्ति वेदों में एक नया शब्द या अक्षर न तो जोड़ सका और न ही हटा सका।
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Ref:
- Kalyan, Ved- katha Ank, GeetaPress Gorakhpur
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वेद-मीमांसा (प्रथम खण्ड), मूल लेखक: श्री अनिर्वाण, हिन्दी अनुवादक: छविनाथ मिश्र, नाग पब्लिशर्स, दिल्ली (महर्षि सान्दीपनि राष्ट्रीय वेदविद्या प्रतिष्ठान, उज्जैन द्वारा प्रायोजित)।