रामराज्य का महत्त्व: अनसुने सत्य
क्या आप जानते हैं कि भगवान श्रीराम के लगभग 11,000 वर्षों के शासनकाल में—
- किसी पिता को अपने पुत्र के वियोग का दुःख नहीं सहना पड़ा।
- किसी स्त्री को वैधव्य का दुःख नहीं हुआ।
- न किसी को चोरों-डाकुओं का भय था, न अग्निकाण्ड का और न ही अराजकता का।
इसीलिए लाखों वर्षों बाद भी जब आदर्श शासन, आदर्श समाज और आदर्श जीवन व्यवस्था की चर्चा होती है, तब सम्पूर्ण विश्व “रामराज्य” का स्मरण करता है।
भगवान श्रीराम सर्वसमर्थ हैं। उनके राज्य में किसी भी प्रकार के अमंगल की कल्पना भी नहीं की जा सकती। फिर भी उनके सम्पूर्ण शासनकाल में जिस व्यवस्था के पालन पर सर्वाधिक बल दिया गया, वह थी वर्णाश्रम धर्म।
अनेक आचार्यों और महात्माओं का मत है कि भगवान श्रीराम ने अपने सम्पूर्ण शासनकाल में वर्णाश्रम धर्म की स्थापना, संरक्षण और पालन को सर्वोच्च महत्त्व दिया। स्वामी राघवाचार्य जी महाराज भी अपने प्रवचनों में बताते हैं कि भगवान श्रीराम अपनी प्रजा को नियमित रूप से धर्मोपदेश देते थे और प्रत्येक व्यक्ति को उसके स्वधर्म में स्थित रहने की प्रेरणा देते थे।

ब्राह्मण ब्राह्मणधर्म का पालन करें। क्षत्रिय क्षत्रियधर्म का पालन करें। वैश्य वैश्यधर्म का पालन करें। शूद्र शूद्रधर्म का पालन करें। स्त्रियाँ अपने धर्म का पालन करें तथा पुरुष अपने धर्म का पालन करें। समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने वर्ण, अपने आश्रम और अपने शास्त्रविहित कर्तव्यों के अनुसार जीवन व्यतीत करे—यही भगवान श्रीराम का स्पष्ट संदेश था।
यही कारण था कि रामराज्य केवल एक आदर्श शासन व्यवस्था नहीं था, बल्कि धर्माधारित जीवन व्यवस्था का साकार स्वरूप था। वस्तुतः भगवान श्रीराम जिस व्यवस्था की स्थापना और रक्षा कर रहे थे, वही वर्णाश्रम धर्म था। इसलिए रामराज्य को समझना है तो वर्णाश्रम धर्म को समझना ही होगा।
वर्णाश्रम धर्म ही धर्म है
महर्षि कणाद ने वैशेषिक दर्शन में धर्म की परिभाषा देते हुए कहा है—
“यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः।”
अर्थात् जिससे मनुष्य का लौकिक अभ्युदय (सुख, समृद्धि और समाज का कल्याण) तथा पारलौकिक निःश्रेयस (मोक्ष) दोनों सिद्ध हों, वही धर्म है।
सनातन धर्म की यही सबसे विलक्षण विशेषता है। यहाँ धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ, मंदिर जाना अथवा किसी विशेष सम्प्रदाय का अनुसरण करना नहीं है। धर्म का अर्थ है—शास्त्रानुसार जीवन जीना।
इसी कारण सनातन धर्म पृथ्वी पर रहने वाले प्रत्येक मनुष्य के लिए एक ही नियम निर्धारित नहीं करता। प्रत्येक व्यक्ति का स्वभाव, उत्तरदायित्व, आयु, परिवार, जीवन की अवस्था और सामाजिक भूमिका भिन्न होती है। अतः उसका धर्म भी उसी के अनुसार शास्त्रों में निर्धारित किया गया है।
इसी व्यवस्था को वर्णाश्रम धर्म कहा जाता है।
वर्णाश्रम धर्म क्या है?
‘वर्णाश्रम’ दो शब्दों से मिलकर बना है—
वर्ण + आश्रम = वर्णाश्रम धर्म
‘वर्ण’ मनुष्य की सामाजिक एवं दायित्वगत स्थिति का द्योतक है और ‘आश्रम’ जीवन की अवस्था का।
अर्थात् प्रत्येक मनुष्य किसी न किसी वर्ण में है और जीवन के किसी न किसी आश्रम में भी है। इन दोनों के अनुसार उसके कर्तव्य निर्धारित होते हैं।
समाज को चार वर्णों में विभाजित किया गया है –

इसी प्रकार सम्पूर्ण मानव जीवन को चार आश्रमों में विभाजित किया गया है –

वर्ण और आश्रम—इन दोनों का समन्वित पालन ही वर्णाश्रम धर्म कहलाता है।
वर्णाश्रम धर्म का वास्तविक अर्थ
आज अधिकांश लोग वर्णाश्रम धर्म का वास्तविक अर्थ नहीं जानते। कुछ लोग केवल चार वर्णों को ही वर्णाश्रम समझते हैं, जबकि कुछ लोग इसे केवल जाति-व्यवस्था मान लेते हैं। यह दोनों ही धारणाएँ अपूर्ण हैं।
वर्णाश्रम धर्म का अर्थ है—मनुष्य अपने जीवन के जिस चरण में है और जिस वर्ण में जन्मा है, उस स्थिति के अनुसार शास्त्रों में बताए गए कर्तव्यों का पालन करे।
एक ही परिवार में रहने वाले दो व्यक्तियों का धर्म भी समान नहीं हो सकता।
उदाहरण के लिए, यदि एक ब्राह्मण परिवार में एक ही आयु का पुत्र और पुत्री हैं, तो दोनों का वर्ण समान है, किन्तु उनके कुछ कर्तव्य भिन्न होंगे। इसी प्रकार एक ब्राह्मण बालक और वही व्यक्ति गृहस्थ बनने के बाद समान धर्म का पालन नहीं करेगा। वानप्रस्थ में प्रवेश करने पर उसके कर्तव्य पुनः बदल जाएँगे और संन्यास में वे पुनः भिन्न हो जाएँगे।
इसी प्रकार क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों में भी आश्रमानुसार कर्तव्य बदलते रहते हैं।
अर्थात् सनातन धर्म प्रत्येक मनुष्य को एक ही साँचे में ढालने का प्रयास नहीं करता, बल्कि उसके स्वभाव, उत्तरदायित्व और जीवन की अवस्था के अनुरूप धर्म का मार्ग प्रदान करता है।
यही वर्णाश्रम धर्म की सबसे अद्भुत विशेषता है।
इसी सिद्धांत के कारण भगवान श्रीराम अपनी सम्पूर्ण प्रजा को केवल धर्म का उपदेश नहीं देते थे, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को उसके स्वधर्म में स्थित रहने का उपदेश देते थे। रामराज्य की वास्तविक शक्ति इसी में निहित थी।

सबका धर्म समान क्यों नहीं हो सकता?
वर्णाश्रम धर्म का सबसे महत्वपूर्ण और सबसे अधिक गलत समझा जाने वाला सिद्धांत यही है कि पृथ्वी पर प्रत्येक मनुष्य का धर्म समान नहीं हो सकता। आधुनिक दृष्टि से यह बात आश्चर्यजनक प्रतीत हो सकती है, किन्तु सनातन धर्म की सम्पूर्ण व्यवस्था इसी सिद्धांत पर आधारित है।
एक ब्राह्मण का धर्म क्षत्रिय से भिन्न है। एक क्षत्रिय का धर्म वैश्य से भिन्न है। एक वैश्य का धर्म शूद्र से भिन्न है। इतना ही नहीं, एक ही वर्ण के दो व्यक्तियों का धर्म भी समान नहीं हो सकता। एक ब्रह्मचारी का धर्म गृहस्थ से भिन्न होगा, गृहस्थ का धर्म वानप्रस्थ से और वानप्रस्थ का धर्म संन्यासी से भिन्न होगा। इसी प्रकार स्त्री और पुरुष के अनेक कर्तव्य भी शास्त्रों में पृथक-पृथक बताए गए हैं।
अर्थात् सनातन धर्म सभी मनुष्यों को एक ही नियम में बाँधने का प्रयास नहीं करता। वह प्रत्येक व्यक्ति को उसकी प्रकृति, उत्तरदायित्व, आयु और जीवन की अवस्था के अनुसार धर्म का मार्ग प्रदान करता है।
इस सिद्धांत को निम्न उदाहरण से सरलता से समझा जा सकता है-

इसी व्यवस्था को भगवान श्रीराम ने अपने शासनकाल में पूर्ण निष्ठा के साथ स्थापित रखा। यही कारण था कि समाज का प्रत्येक वर्ग अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक था और सम्पूर्ण समाज एक सुगठित शरीर की भाँति कार्य करता था।
यदि आत्मा एक है तो वर्णाश्रम की आवश्यकता क्यों?
यह प्रश्न प्राचीन काल से पूछा जाता रहा है। जब सभी मनुष्यों की आत्मा एक ही परमात्मा का अंश है, तब ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री और पुरुष जैसे भेदों की आवश्यकता क्यों?
इस प्रश्न का अत्यंत सुंदर उत्तर पूज्यनीय गुरुदेव जगद्गुरु, गोवर्धन मठ पुरी पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती जी महाराज देते हैं।
वे बताते हैं कि शरीर की दृष्टि से हम सभी पंचमहाभूतों से बने हैं। आत्मा की दृष्टि से भी सभी एक ही चेतन तत्व हैं। किन्तु प्रकृति ने किसी भी दो मनुष्यों को पूर्णतः समान नहीं बनाया। सबकी प्रवृत्तियाँ, योग्यताएँ, क्षमताएँ और उत्तरदायित्व भिन्न-भिन्न हैं।
इसी सत्य को स्पष्ट करते हुए गुरुदेव कहते हैं
“प्रकृति प्रदत्त भेद बाधक नहीं, साधक हैं।”
अर्थात् प्रकृति द्वारा दिए गए भेद मनुष्य की उन्नति में बाधा नहीं, बल्कि उसके विकास और समाज के कल्याण के साधन हैं।
जिस प्रकार शरीर के सभी अंग समान नहीं होते, किन्तु सभी आवश्यक होते हैं; उसी प्रकार समाज के सभी वर्ग समान उत्तरदायित्व नहीं निभाते, किन्तु सभी समान रूप से आवश्यक हैं। नेत्र का कार्य हृदय नहीं कर सकता और हृदय का कार्य चरण नहीं कर सकते। भिन्नता ही समन्वय का आधार है।
वर्णाश्रम धर्म इसी प्राकृतिक विविधता को स्वीकार करता है और उसे धर्म के माध्यम से समाज के कल्याण में रूपांतरित करता है।
धर्मसिद्धि के तीन आधार: श्रौत, स्मार्त और शिष्टाचार
वर्णाश्रम धर्म किसी व्यक्ति या समाज द्वारा बनाई गई व्यवस्था नहीं है। इसकी जड़ें वेद, स्मृति और शिष्टाचार में स्थित हैं। मत्स्यपुराण में धर्म के इन तीन आधारों का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है।
“विज्ञेयः श्रवणाच्छ्रौतः स्मरणात् स्मार्त उच्यते। इज्यावेदात्मकः श्रौतः स्मार्तो वर्णाश्रमात्मकः।।“
इस श्लोक का अर्थ है कि श्रुति (वेद) द्वारा प्रतिपादित धर्म श्रौत धर्म कहलाता है तथा स्मृतियों द्वारा प्रतिपादित धर्म स्मार्त धर्म कहलाता है। श्रौत धर्म का मुख्य स्वरूप यज्ञ, अग्निहोत्र तथा वैदिक अनुष्ठान हैं, जबकि स्मार्त धर्म का मुख्य स्वरूप वर्णाश्रम धर्म है।
इसे निम्न तालिका से और स्पष्ट समझा जा सकता है –

शिष्टाचार क्या है?
श्रौत और स्मार्त धर्म का व्यवहारिक रूप ही शिष्टाचार कहलाता है।
शास्त्रों में ‘शिष्ट’ शब्द का अर्थ केवल शिक्षित या सभ्य व्यक्ति नहीं है। मनु, सप्तर्षि तथा वे महान धर्मनिष्ठ महापुरुष, जिन्होंने युग-युग में श्रौत और स्मार्त धर्म का पालन, संरक्षण और पुनः स्थापना की, वे शिष्ट कहलाते हैं। उनके द्वारा आचरित धर्म ही शिष्टाचार है।
मत्स्यपुराण शिष्टाचार के आठ लक्षण बताता है—
“दानं सत्यं तपोऽलोभो विद्येज्या पूजनं दमः।”
अर्थात् “दान, सत्य, तप, अलोभ, विद्या, यज्ञ, पूजन तथा इन्द्रियनिग्रह” ये शिष्टाचार के प्रमुख लक्षण हैं।
इस प्रकार श्रुति धर्म का आधार है, स्मृति धर्म का व्यवहारिक स्वरूप है और शिष्टाचार उस धर्म का जीवंत आचरण है। यही सनातन परम्परा की निरन्तरता का वास्तविक आधार है।
वर्णाश्रम व्यवस्था की अद्भुत वैज्ञानिकता
वर्णाश्रम धर्म का उद्देश्य किसी को ऊँचा या नीचा सिद्ध करना नहीं था, बल्कि सम्पूर्ण समाज को धर्म, मर्यादा और उत्तरदायित्व के आधार पर संगठित करना था। इस व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वाभाविक गुणों और शास्त्रविहित कर्तव्यों के अनुसार जीवन व्यतीत करता था। परिणामस्वरूप न अनावश्यक प्रतिस्पर्धा थी, न अधिकारों का संघर्ष और न ही कर्तव्यों का भ्रम।
वर्णाश्रम व्यवस्था का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण पक्ष यह भी था कि प्रत्येक व्यक्ति को जन्म से ही जीवन की दिशा प्राप्त हो जाती थी। ज्ञान की रक्षा का उत्तरदायित्व ब्राह्मणों पर था, धर्मसम्मत शासन और प्रजारक्षण का उत्तरदायित्व क्षत्रियों पर, कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य का उत्तरदायित्व वैश्यों पर तथा समाज के लिए आवश्यक असंख्य कला-कौशल, शिल्प और उत्पादन का उत्तरदायित्व शूद्रों पर था। इस प्रकार सम्पूर्ण समाज एक विशाल परिवार की भाँति परस्पर सहयोग से संचालित होता था।
मानव जीवन को भी केवल अर्थोपार्जन तक सीमित नहीं रखा गया। ब्रह्मचर्य से प्रारम्भ होकर गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास तक सम्पूर्ण जीवन को इस प्रकार व्यवस्थित किया गया कि मनुष्य धीरे-धीरे भोग से योग और योग से मोक्ष की ओर अग्रसर हो सके। यही सनातन धर्म की अद्भुत दूरदर्शिता है।
भगवान श्रीकृष्ण भी श्रीमद्भगवद्गीता (१८.४५) में इसी सिद्धांत की पुष्टि करते हुए कहते हैं—
“स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।”
अर्थात् प्रत्येक मनुष्य अपने-अपने स्वाभाविक कर्म में स्थित रहकर ही सिद्धि को प्राप्त करता है।
रामराज्य – वर्णाश्रम धर्म ही रामराज्य है,वर्णाश्रम धर्म ही सनातन धर्म है!
अब हम पुनः रामराज्य की ओर लौटते हैं।
जब हम रामराज्य की चर्चा करते हैं, तब सामान्यतः उसके परिणामों की चर्चा करते हैं—सुखी प्रजा, भयमुक्त समाज, समृद्ध राष्ट्र, धर्मनिष्ठ जीवन और आदर्श शासन। किन्तु इन सभी का मूल कारण क्या था?
स्वामी राघवाचार्य जी महाराज बताते हैं कि भगवान श्रीराम अपनी प्रजा को धर्म का उपदेश भी देते थे। वे प्रजा को उनके-अपने स्वधर्म में स्थित रहने की प्रेरणा देते थे। समाज का प्रत्येक वर्ग अपने शास्त्रविहित धर्म का पालन करे—इसी पर सम्पूर्ण व्यवस्था आधारित थी।
जब ब्राह्मण अपने धर्म में स्थित रहा, क्षत्रिय अपने धर्म में स्थित रहा, वैश्य अपने धर्म में स्थित रहा, शूद्र अपने धर्म में स्थित रहा तथा प्रत्येक आश्रम ने अपने-अपने कर्तव्यों का पालन किया, तब सम्पूर्ण समाज में संतुलन, अनुशासन और समन्वय स्थापित हुआ। रामराज्य का अर्थ है शास्त्रसम्मत धर्मव्यवस्था का समाज में पूर्ण रूप से प्रतिष्ठित होना।
आज वर्णाश्रम धर्म को समझना क्यों आवश्यक है?
आज संसार में परिवार टूट रहे हैं, कर्तव्य पीछे छूटते जा रहे हैं और अधिकारों की चर्चा सबसे अधिक हो रही है। जीवन का उद्देश्य भी धीरे-धीरे केवल अर्थ और भोग तक सीमित होता जा रहा है।
ऐसे समय में वर्णाश्रम धर्म केवल इतिहास का विषय नहीं है। यह मनुष्य को पुनः यह स्मरण कराता है कि जीवन अधिकारों से नहीं, कर्तव्यों से महान बनता है। समाज प्रतियोगिता से नहीं, उत्तरदायित्व से चलता है। धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि प्रातःकाल से रात्रि तक शास्त्रानुसार जीवन जीने की कला है।
==============================================
Reference:
- https://www.youtube.com/watch?v=Op0grD3i4_8&t=5s. (Ram Rajya
- https://www.youtube.com/watch?v=kQTD1Abvz9A (ram Setu)
- https://www.youtube.com/watch?v=JSQeyMOtSsg (Pujyaniya Shri Raghavacharya Ji sanatan dharm)
- https://www.youtube.com/watch?v=wPPIP2eaZeU
- https://www.youtube.com/watch?v=Op0grD3i4_8 (pujyaniya shri Raghavacharya Ji on Ram Rajya)