“गुरु पूर्णिमा” गुरुओं के परम गुरु “महर्षि वेदव्यास” की जन्म तिथि है!

महर्षि वेदव्यास गुरुओं के परम गुरु हैं! उनकी जन्म तिथि ही गुरु पूर्णिमा है !

सनातन संस्कृति में ‘गुरु’ को साक्षात् परब्रह्म मानकर पूजने का विधान है। प्रतिवर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा को संपूर्ण देश में गुरु पूर्णिमाका महापर्व अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह लेख ‘गुरु पूर्णिमा’ महा-पर्व के मूल रहस्यों को उजागर करने का एक प्रयास है।  भगवान् श्री हरी विष्णु के ही अवतार महर्षि कृष्ण द्वैपायन व्यास  जी के जन्म और कार्य से जुडी अनेकों अनसुनी अद्भुत कथाएं हैं जो बहुत कम हिन्दुओं को ज्ञात हैं।  इस लेख में हम उन सभी कथाओं को और वेदव्यास जी के विशाल कार्य के बारे में जानेंगे। 

संसार में जितने भी मत, पंथ, संप्रदाय, आचार्य, ऋषि या संत-महात्मा हैं—उन सभी के पास जो तत्व ज्ञान, सदाचार और मोक्ष का मार्ग है, उसका आदि स्रोत क्या है? शास्त्र उद्घोष करते हैं कि संसार के समस्त गुरुओं में गुरुत्व(अर्थात् ज्ञान की प्रामाणिकता और गुरु होने की पात्रता) साक्षात् भगवान श्री कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास जी की लेखनी से ही प्रवाहित हुआ है। व्यास जी के ज्ञान रूपी प्रसाद (व्यास उच्छिष्ट) को पढ़कर, समझकर और उसी का आश्रय लेकर ही कोई मनुष्य संसार में गुरु बनने की योग्यता पाता है। संसार के समस्त मतों, पंथों और संप्रदायों के गुरुओं में जो ‘गुरुत्व’ है, वह व्यास जी के वांग्मय से ही आता है।

सनातन परंपरा में एक अत्यंत प्रसिद्ध और प्रामाणिक वचन है—व्यास उच्छिष्टं जगत्सर्वम्”। इसका अर्थ है कि इस ब्रह्मांड में ज्ञान का जो भी क्षेत्र है, चाहे वे वेद हों, पुराण हों, इतिहास हो या दर्शन, वह सब महर्षि वेदव्यास का ही छोड़ा हुआ प्रसाद है। संसार का कोई भी आचार्य या संत जब व्यास पीठ पर बैठकर समाज का मार्गदर्शन करता है, तो वह उसी ज्ञान को बांट रहा होता है जो महर्षि व्यास ने कलयुग की आबादी के कल्याण के लिए प्रकट किया था। इसलिए वे संपूर्ण चराचर जगत के “गुरुओं के परम गुरु” हैं और उनकी पावन जन्म तिथि ही ‘गुरु पूर्णिमा’ के रूप में युगों-युगों से वंदनीय है।

महर्षि वेदव्यास जी के अलौकिक प्राकट्य की कथा

श्रीमद देवी भागवत महापुराण के द्वितीयस्कन्ध का मत्स्यगन्धोत्पत्तिवर्णन ( देवी भागवत पुराण के श्रोता ऋषियों के द्वारा सूत जी (वक्ता) से भगवान् व्यास जी की माता मत्स्यगंधा के विषय में शंका व्यक्त करना )

प्रथम स्कन्ध के अन्तिम अध्याय में सत्यवती को शन्तनु की पत्नी तथा व्यासजी की माता कहा गया है, जो एक- दूसरे से विरुद्ध प्रतीत होता है। यही यहाँ पर आश्चर्य की बात है। इसलिए आश्चर्यजनक इस बात को सुनकर ऋषियों ने सूतजी से प्रश्न किया-‘हे सूतजी! आपने नियोग द्वारा जो यह गर्भ की बात (धृतराष्ट्र तथा पाण्डु की कथा) कही है, उससे हम लोगों को बड़ा आश्चर्य हो रहा है, अतः हम सभी तपस्वियों को महान् सन्देह’ हो रहा है। हे प्रतिभावान ! व्यासजी की माता सत्यवती को पूर्व विवाहिता जानकर भी शन्तनु राजा ने उनके साथ विवाह कैसे कर लिया था ? और पितृगृह में रहते हुए भी उनके गर्भ से व्यास जी कैसे उत्पन्न हो गये? अथवा एक विवाहिता स्त्री को धर्मज्ञ शन्तनु ने कैसे स्वीकार कर लिया? (यह तो शास्त्र-विरुद्ध बात है?) आप कहते हैं कि उस सत्यवती के गर्भ से उनके दो’ पुत्र भी उत्पन्न हुए। अत: हे सुव्रत! आप इस परम पवित्र एवं विचित्र कथा को विस्तारपूर्वक कहिये।

तब  सूतजी कहने लगे-‘हे मुनिगण! मैं धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष—इन चारों पदार्थों को देनेवाली आदिशक्ति भगवती महामाया को प्रणाम करके पुराण की इस शुभ कथा को अब कहता हूँ।

चेदि देश के शासक राजा उपरिचर

उपरिचर नाम के एक सत्यवादी तथा धर्मात्मा राजा हुए-जो चेदि देश के शासक तथा ब्राह्मणों का सम्मान करनेवाले थे। उन्होंने इन्द्र की आराधना की, उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवराज इन्द्र ने राजा उपरिचर को एक स्फटिक मणि का बना हुआ सुन्दर वायुयान (विमान) दिया । उस दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर चेदिराज सर्वत्र विचरण करने लगे, वे कभी भूमि पर उतरते नहीं थे। सर्वदा स्वच्छ आकाश मार्ग से ही वे सर्वत्र यात्रा करते थे। वे कभी भूमि पर न उतरने तथा पृथ्वी से ऊपर ही चलने के कारण ‘उपरिचर’२ वसु के नाम से प्रसिद्ध थे । वे राजा तीनों लोकों में विख्यात थे। उनकी धर्मपत्नी का नाम ‘गिरिका’ था, जो परम सुन्दरी एवं पतिव्रता थी ।

एक बार वसु-पत्नी ‘गिरिका’ ने ऋतु काल के स्नान से पवित्र होकर राजा से गर्भाधान की प्रार्थना की। जिस समय वह प्रार्थना करने लगी, उसी समय उनके पितरों ने आकाशवाणी की  “हे राजन्! श्राद्ध के योग्य मृगों को अभी मार लाओ” यह आदेश सुनकर राजा को अपनी ऋतुमती रानी का स्मरण हो आया।  एक ही साथ दो आदेश पाकर राजा बड़ी चिन्ता में पड़े; परन्तु पितरों की आज्ञा श्रेष्ठ मानकर मन-ही-मन गिरिका का स्मरण करते हुए वे शिकार करने को चल पड़े।

वन में जाकर राजा वसु साक्षात् लक्ष्मी के समान रूपवती अपनी पत्नी का स्मरण करने लगे। इस प्रकार गिरिका के ध्यान से एकाएक उनका वीर्य स्खलित हो गया और राजा ने शीघ्र ही उसे बरगद के पत्ते के दोने में रख लिया। राजा ने विचार किया- ‘नि:सन्देह मेरा वीर्य अमोघ है, यह व्यर्थ कैसे होगा?’ इसी बीच उन्हें अपनी रज:स्वला स्त्री का स्मरण हो आया। अतः यह निश्चय कर लिया कि हो न हो, अवश्यमेव इस वीर्य को मैं रानी के पास भेज दूँ। राजा जब उस वीर्य को पत्ते के दोने में रखकर अपनी रानी के पास भेजने लगे, तब उन्होंने रानी का स्मरण करते हुए उस वीर्य को अभिमंत्रित कर लिया और पास ही बैठे हुए बाज’ पक्षी से कहा हे पक्षी! तुम इसे लेकर मेरे  घर चले जाओ और देखो, यह दोना हमारी रानी गिरिका को दे देना; क्योंकि वह आज ही ऋतु-स्नान से पवित्र हुई है’।

सूतजी कहते हैं-ऐसा कहकर महाराज ने बाज को वह दोना दे दिया और शीघ्रगामी बाज भी उसे चोंच से दबाकर गगन-मण्डल में उड़ने लगा । इस प्रकार चोंच में कोई वस्तु लिये उड़ते हुए बाज को किसी दूसरे बाज ने देखा। उसने बाज के चोंच में माँस का टुकड़ा समझकर तत्काल इस बाज पर आक्रमण कर दिया। दोनों बाजों में घोर युद्ध होने लगा। इसी बीच युद्ध के कारण दोनेवाला वह वीर्य यमुनाजी के जल में जा गिरा। यह देख दोनों पक्षी निराश होकर इधर-उधर उड़ गये। इसी समय यमुना नदी के तीर पर कोई ब्राह्मण स्नान करके संध्या-वन्दन कर रहे थे; वहीं एक किनारे ‘अद्रिका’ नाम की एक अप्सरा भी स्नान कर रही थी ।

जलक्रीड़ा करती हुई उस अप्सरा ने डुबकी लगाकर (जल के भीतर ही भीतर चलकर) उस ब्राह्मण का चरण पकड़ लिया । प्राणायाम में लीन क्रिया-निष्ठ ब्राह्मण  उस स्वेच्छाचारिणी स्त्री को उसकी उद्दण्डता पर क्रुद्ध होकर शाप दे दिया और कहा-‘तूने मेरे ध्यान में विघ्न डाला है। अतएव मछली हो जा’। इस प्रकार ब्राह्मण से अभिशापित होकर अद्रिका अप्सरा ‘शफरी’ नामक मछली बन यमुना के जल में विचरने लगी। संयोगवश बाज के पंजे से गिरे हुए दोने के वीर्य के गिरने का और उस अप्सरा के ‘शफरी’ होने का एक ही समय था।  बहता हुआ वह वीर्य मत्स्यरूपधारिणी अद्रिका ने अपने पेट में निगल लिया । कुछ दिन यों ही बीतने पर मछुए ने दसवें मास में उस सुन्दर मछली को जाल में फँसा लिया। जब वह मल्लाह अपने घर ले जाकर उसका पेट चीरने लगा, तब उसके उदर से मनुष्य के आकारवाले जोड़े बच्चे निकले। उन दोनों में एक सुन्दर बालक तथा एक सुन्दर बालिका थी। उन अद्भुत बच्चों को देखकर मछुए को भी बड़ा आश्चर्य हुआ | अतः उसने उन दोनों बच्चों को ले जाकर तत्कालीन राजा ‘उपरिचर’ को सौंप दिया। साथ ही राजा ने भी आश्चर्यचकित होकर उन्हें बड़े प्रेम से ले लिया।। ३६॥ आगे चलकर वही बालक ‘मत्स्य’ नामक एक महाप्रतापी राजा हुआ । उधर राजा उपरिचर वसु ने वह ‘कालिका’ नाम की कन्या उस मल्लाह को ही दे दी, जो आगे चलकर काली तथा ‘मत्स्योदरी’ नाम से प्रसिद्ध हुई । अपनी जाति-गुण-विशेषता के कारण लोग उसे ‘मत्स्यगन्धा’ कहने लगे। अब उस मल्लाह के घर वह वसु-कन्या धीरे-धीरे बढ़ने लगी ।

पराशरमुनि का यमुना नदी के किनारे आगमन

एक समय पराशरमुनि तीर्थाटन करते हुए यमुना नदी के किनारे आये। वहाँ उन धर्मात्मा मुनि ने भोजन करते हुए निषाद से कहा-‘महाशय! मुझे नौका द्वारा यमुना नदी के उस तट पर पहुँचा दो । उस समय वह केवट भोजन कर रहा था, अत: अपनी पुत्री मत्स्यगंधा से उसने कहा- ‘बेटी! तुम इन मुनि महाराज को नाव पर बैठा कर उस पार पहुँचा दो; क्योंकि हे पुत्रिके! ये धर्मात्मा तपस्वी मुनि यमुना के उस पार जाना चाहते हैं । पिता की आज्ञा से वह कुमारी वासवी-कन्या (मत्स्यगंधा) महामुनि को डोंगी में बैठाकर खेती हुई उस पार ले चलने लगी।

कुछ दूर जाने पर मध्य धार में संयोगवश पराशरमुनि उस सुनयनी कन्या पर मोहित हो गये। वह युवती हो चली थी मुनिराज ने उस दाश-कन्या को अपने दाहिने हाथ से उसकी दाहिनी भुजा पकड़नी चाही, इसी बीच मन्द मुसकान करती हुई उस कुमारी ने कहा- ‘महामुने! आप जो कुछ कर रहे हैं, यह क्या ब्राह्मणोचित अथवा किसी तपस्वी के अनुरूप है? क्योंकि हे धर्मात्मन! आप वसिष्ठ के वंश के हैं और कुल-शील वाले हैं, पूज्य ब्राह्मण कुल के हैं, फिर भी काम से पीड़ित होकर यह क्या कर रहे हैं?  हे विप्रवर! इस संसार में एक तो मनुष्य का जन्म पाना ही दुर्लभ है, उस पर भी उच्च ब्राह्मण जाति का होना तो और भी दुर्लभ है।  इसलिये हे बुद्धिशाली मुनिवर! आप तो यह जानते हैं कि ब्राह्मण कुल-शील एवं वेदाध्ययन के कारण संसार में कितने श्रेष्ठ होते हैं? उनमें भी आप तो धर्मज्ञ एवं तापस हैं, अतः हे द्विजराज! मुझ मछली की गंधवाली नीच जाति की बालिका को देखकर भी, मेरा हाथ पकड़ने को क्यों उद्यत हो गये? मुझमें क्या विशेषता आपने देखी है, जो इतने कामातुर हो उठे हैं? मुझे क्यों छूते हैं? क्या आप अपने धर्म को भूल गये ?

पराशर मुनि द्वारा मत्स्यगंधा को अनेक वरदान

मत्स्यगंधा भय से पुनः मुनि से कहने लगी- ‘मुनिवर ! मैं दुर्गन्धवाली हूँ, मछली की गंधवाली मुझसे आपको घृणा नहीं हो रही है? क्योंकि समान रूपवालों को ही काम जनित आनन्द मिलता है। अब जैसा उचित हो करिये, मैं तो अबला हूँ। मत्स्यगंधा के ऐसा कहते ही पराशरमुनि ने अपने तपोबल से कुछ ऐसा चमत्कार दिखाया, जिससे वह दुर्गन्धा उसी समय सुगन्धा हो गयी और अत्यन्त सुन्दरी युवती-सी दिखाई देने लगी। अब उसके शरीर से कस्तूरी की सुगंधि निकलकर चार कोस तक फैलने लगी।

मुनिराज  की बात न मानने से कहीं वे शाप न दे दें मत्सीगन्धा इस भय से आश्वासन देकर उन्हें नदी पार रेती पर ले गयीऔर कहने लगीं  ‘महामुने ! देखिये, यहाँ सब लोग देख रहे हैं और उस पार स्थित मेरे पिताजी भी देख लेंगे। ,रात्रि हो लेने दीजिये। तब तक धैर्य धारण कीजिय।  संसार में लोक-निन्दा से बढ़कर कोई पाप नहीं है। इससे लोक-निन्दा होगी, फिर आप-हम कहीं के न होंगे।

सत्यवती के युक्तियुक्त वचन सुनकर दयालु मुनि ने अपने पुण्यबल एवं योगक्रिया द्वारा ऐसा कुहरा डाल दिया कि यमुना के दोनों तटों पर अँधेरा छा गया – रात्रि-सी हो गयी। यह देखकर उस कामिनी ने पराशर मुनि से विनयपूर्वक मीठे शब्दों में कहा- द्विजशिरोमणे! आप तो अपनी कामना पूरी कर चले जायेंगे, परन्तु आप अमोघ वीर्यवाले हैं, यदि गर्भाधान हो गया तो मेरी क्या गति होगी? और मैं अपने पिता से क्या कहूँगी, कैसे मुँह दिखाऊँगी?

यह सुनकर पराशर मुनि ने कहा- ‘प्रिये! यह तुम क्या कह रही हो? यदि तुमने मेरे मनोनुकूल काम किया तो यह निश्चय ही समझो कि तुम सर्वदा पूर्ववत् कन्या ही बनी रहोगी। यह रहस्य कोई जानेगा भी नहीं’। ‘अयि भीरु भामिनि! तुम जो चाहो, सो मुँहमाँगा वर मुझसे माँग लो।’ सत्यवती ने कहा-‘हे मानद! आप ऐसा वरदान दीजिये, जिससे मेरे माता-पिता तथा अन्यान्य लोग भी इस गुप्त व्यवहार को न जान सकें। साथ ही हे विप्रवर्य! आप कोई ऐसा प्रबन्ध कर दें, जिससे मेरा कन्याव्रत नष्ट न हो और हमसे जो संतान उत्पन्न हो, वह आप ही के समान अपूर्व वीर्यशाली एवं पराक्रमी विद्वान् हो। दूसरी बात यह है कि मेरे शरीर से ऐसी ही सुगंधि सर्वदा आती रहे तथा मेरा यौवन भी उत्तरोत्तर नया बना रहे।’।

यह सुनकर पराशरजी ने कहा-‘हे सुन्दरी! सुनो, तुम्हारे गर्भ से उत्पन्न पुत्र अत्यन्त पवित्र होगा। यहाँ तक कि वह साक्षात् भगवान् विष्णु के अंश से अवतारी पुरुष होगा। यही नहीं, बल्कि हे कामिनी! तुम्हारा वह पुत्र तीनों लोक में प्रसिद्ध होगा, क्योंकि किसी अनिर्वचनीय अज्ञात कारण से (दैवात्) ही मैं तुम्हारे ऊपर इस प्रकार आसक्त हुआ हूँ।

इसे भी विधि की विडम्बना ही समझो। हे सुमुखि ! इसके पूर्व ऐसा मोह मुझे कभी न हुआ था। एक-से-एक रूपवती अप्सराएँ मेरे सामने आयी होंगी और मुझे योगावस्था में रिझाने की कोशिशें की होंगी, पर मैंने कभी किसी पर ध्यान तक नहीं दिया और न कभी इस प्रकार अपना धैर्य एवं धर्म ही खोया। सुतराम्’ दैवयोग से ही मैं तुझे देखकर कामातुर हो गया हूँ। इसमें भी कोई विशेष कारण होगा- ऐसा समझो; क्योंकि दैव का अतिक्रमण‍ करना अत्यन्त कठिन होता है । यदि ऐसा न होता तो भला, तुम-जैसी मैली-कुचैली दुर्गन्धित निषाद-कन्या को देखकर मैं क्योंकर इस प्रकार मोह-जाल में फँसता। जो हो, पर तुम चिन्ता न करो; क्योंकि तुम्हारा पुत्र पुराणों का रचयिता होगा और तीनों लोकों में विख्यात एवं वेदों का विभाजन करनेवाला होगा’।

कृष्ण द्वैपायन व्यास जी का जन्म और तपस्या हेतु प्रस्थान

सूतजी कहते हैं- ऐसा कहने पर अनुकूल हुई उस कन्या के साथ रमण करके मुनिवर पराशरजी यमुना जल में स्नान करके वहाँ से तत्काल चल दिये ? यथासमय सत्यवती ने यमुनाजी के रेतीले द्वीप में एक मेधावी एवं अद्भुत पुत्र उत्पन्न किया, जो कामदेव के समान सुन्दर था और जो पैदा होते ही चलने-फिरने योग्य हो गया था। उस तेजस्वी बालक ने माता सत्यवती से कहा- ‘हे माता! ‘हे माता! मैं तपोयोग का आश्रय लेकर यहाँ आया हूँ। हे महाभागे! हे जननि!! आपकी जहाँ इच्छा हो, जाइये। मैं भी अब तप करने के लिये वन में जा रहा हूँ।

हे माताजी! आपको जब कभी कोई आवश्यकता पड़े या कोई जटिल समस्या उपस्थित हो, तब मुझे आप स्मरण करें। मैं उस समय शीघ्र ही सेवा में उपस्थित रहूँगा। ऐसा कहकर वह नवजात शिशु (व्यासजी) वहाँ से चल पड़े और सत्यवती भी अपने पिता (निषादराज) के पास चली गयी।

द्वीप में पैदा होने के कारण ही उस बालक का नाम द्वैपायनपड़ा। श्रीकृष्ण या विष्णु भगवान् के अंशावतार होने के कारण वह बालक शीघ्र ही युवक हो गए तथा अनेक तीर्थों में स्नान करते हुए उत्तम तप करने लगे

कृष्ण द्वैपायन व्यास जी द्वारा कलियुग के मनुष्यों के कल्याण हेतु विलक्षण कार्य

इस प्रकार पराशर मुनि के वीर्य एवं सत्यवती के गर्भ से कृष्ण द्वैपायन का जन्म हुआ और उन्होंने ही कलियुग का प्रादुर्भाव जानकर द्वापर के अन्त में वेदों को अनेक शाखाओं में विभक्त कर दिया । तबसे वेदों के विस्तार करने के कारण ही उनका नाम “व्यास” पड़ गया। उन्होंने ही अष्टादश पुराण-संहिताओं तथा सर्वोत्तम ग्रंथ ‘महाभारत’ की  रचना की है । साथ ही वेदों का विभाग करके अपने शिष्यों को पढ़ाया। उनके शिष्य में उल्लेखनीय नाम ये हैं—सुमन्तु, जैमिनी, पैल, वैशम्पायन, असित, देवल और व्यास-पुत्र शुकदेवजी’

भगवान् वेदव्यास जी ने एक ही वेद को चार भागों में विभक्त क्यों किया ?

भगवान् वेदव्यासकी स्थिति वैदिक युग के अन्तमें भी थी, महाभारतकाल में भी थी और आज भी वे नारायणभूत वेदव्यास अनन्त के अनन्त रूपमें विश्व में विद्यमान हैं। (सप्त चिरंजीवियों में भगवान् व्यास भी हैं – अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः । कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः ॥)

व्यासजीने मनुष्यमात्रको अल्पबुद्धि, अल्पायु तथा कर्म-क्रियामें लिप्त देखकर उनके सार्वकालिक कल्याण के लिये वेदों का विभाजन चार शाखाओं में किया था, जिसका स्पष्ट निदर्शन श्रीमद्भागवतमें इस प्रकार प्राप्त होता है-

स कदाचित् सरस्वत्या उपस्पृश्य जलं शुचि । विविक्तदेश आसीन उदिते रविमण्डले ॥

परावरज्ञः स ऋषिः कालेनाव्यक्तरंहसा । युगधर्मव्यतिकरं प्राप्तं भुवि युगे युगे ॥

भौतिकानां च भावानां शक्तिह्रासं च तत्कृतम्। अश्रद्दधानान्निःसत्त्वान् दुर्मेधान् ह्रसितायुषः ॥

दुर्भगांश्च जनान् वीक्ष्य मुनिर्दिव्येन चक्षुषा । सर्ववर्णाश्रमाणां यद्दध्यौ हितममोघदृक् ॥

चातुर्होत्रं कर्मशुद्धं प्रजानां वीक्ष्य वैदिकम् । व्यदधाद् यज्ञसन्तत्यै वेदमेकं चतुर्विधम् ॥

ऋग्यजुःसामाथर्वाख्या वेदाश्चत्वार उद्धृताः । इतिहासपुराणं च पञ्चमो वेद उच्यते॥

तत्रर्वेदधरः पैलः सामगो जैमिनिः कविः । वैशम्पायन एवैको निष्णातो यजुषामुत ॥

अथर्वाङ्गिरसामासीत् सुमन्तुर्दारुणो मुनिः । इतिहासपुराणानां पिता मे रोमहर्षणः ॥

त एत ऋषयो वेदं स्वं स्वं व्यस्यन्ननेकधा । शिष्यैः प्रशिष्यैस्तच्छिष्यैर्वेदास्ते शाखिनोऽभवन्॥

त एव वेदा दुर्मेधैर्धार्यन्ते पुरुषैर्यथा । एवं चकार भगवान् व्यासः कृपणवत्सलः ॥

स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा । कर्मश्रेयसि मूढानां श्रेय एवं भवेदिह ।

इति भारतमाख्यानं कृपया मुनिना कृतम् ॥ (श्रीमद्भा० १ । ४ । १५-२५)

अर्थात् एक दिन वे पुराणमुनि व्यास सूर्योदय के समय सरस्वती के पावन जल में स्नानादि करके एकान्त पवित्र स्थान पर बैठे हुए थे। वे महर्षि भूत और भविष्य के ज्ञाता तथा दिव्य-दृष्टि-सम्पन्न थे। उन्होंने उस समय देखा कि जिसका परिज्ञान लोगों को नहीं होता, ऐसे समय के फेर से प्रत्येक युग में धर्मसंकट रहा और उसके प्रभाव से भौतिक पदार्थों की शक्ति का ह्रास होता रहता है। सांसारिक जन श्रद्धाविहीन और शक्तिहीन हो जाते हैं। उनकी बुद्धि कर्तव्य-निर्णय में असमर्थ एवं आयु अल्प हो जाती है। लोगों की इस भाग्य हीनता को देखकर उन्होंने अपनी दिव्यदृष्टि से समस्त वर्णों और आश्रमों का हित कैसे हो? इसपर विचार किया। उन्होंने सोचा कि वेदोक्त चातुर्होत्र (होता, अध्वर्यु, उद्गाता, ब्रह्मादिद्वारा सम्पादित होने वाले अग्निष्टोमादि यज्ञ) -कर्म लोगों का हृदय शुद्ध करनेवाले हैं, अतः यज्ञों का विस्तार करने के लिये उन्होंने एक ही वेद के चार विभाग ऋक्, यजुः, साम तथा अथर्व के रूपमें किये। इतिहास और पुराण को पाँचवाँ वेद कहा जाता है। उनमें से प्रथम स्नातक ऋग्वेद के पैल, सामवेद के जैमिनि, यजुर्वेद के वैशम्पायन तथा अथर्ववेद के सुमन्तु हुए और सूतजी के पिता रोमहर्षण इतिहास-पुराणों के स्नातक हुए। इन सब महर्षियों ने अपनी-अपनी वैदिक शाखा को अनेक भागों में विभक्त कर दिया। इस प्रकार शिष्य, प्रशिष्य तथा उनके शिष्योंद्वा रा वेदों की अनेक शाखाएँ बन गयीं।

अल्प बौद्धिक शक्तिवाले पुरुषों पर कृपा करके भगवान् वेदव्यास ने वेदों का यह विभाग इसलिये किया, जिससे दुर्बल स्मरणशक्ति वाले तथा धारणाशक्तिहीन (व्यक्ति) भी वेदों को धारण कर सकें। स्त्री, शूद्र तथा पतित वेद-श्रवण के अनधिकारी हैं; वे शास्त्रोक्त कर्मों के आचरण में भूल न कर बैठें, अतः उनके हितसाधनार्थ महाभारत की इस दृष्टि से रचना की, जिससे वे भी वेदांश हृदयंगम कर सकें ।

महर्षि कृष्णा द्वैपायन व्यास जी के विशाल कार्य – संक्षिप्त परिचय

भगवान् वेदव्यास जी के बारे में अधिकतर लोग जानते हैं की उन्होंने वेदों का विभाजन किया , महाभारत और १८ महापुराणों की रचना की लेकिन केवल यही नहीं उनके और भी बहुत ग्रन्थ हैं जो प्रतिदिन मनुष्य जीवन यापन के लिए  अत्यंत उपयोगी हैं।  

भगवान् व्यासदेव का शुद्ध सत्संगरूपी धर्म-सत्र विविधरूप से निरन्तर चलता रहता था। उनकी धर्मगोष्टी में ब्रह्मतत्त्व का निरूपण, परमात्मा के निर्गुण-सगुण स्वरूपों का विचार, धर्म-कर्मों की व्यापकता तथा उनके फलाफल की मीमांसा, धर्माचरण की महिमा आदि विषयों पर गहन चर्चा होती रहती थी। वे स्वयं भी धर्म के आचरण तथा सदाचार के पालन में निरन्तर निरत रहते थे। वस्तुतः धर्म-तत्त्व के विषय में आज संसार जो कुछ भी जानता है, वह वेदव्यास जी की ही देन है। वेद तो धर्म-संहिताएँ ही हैं। पुराणों में धर्म, दर्शन एवं आचार-मीमांसा पद-पदपर भरी पड़ी है। महाभारत तो धर्म-विषयक कोश ही है। वह व्यास जी की ही रचना है। स्मृतियाँ तो ‘व्यास’, ‘लघुव्यास इस प्रकार से उनके नाम से ही प्रसिद्ध हैं। अतः धर्मशास्त्र की मर्मज्ञता के सम्बन्ध में व्यासजी से अधिक और कौन हो सकता है ? वस्तुतः सच्चा धर्म और सम्यक् आचार दर्शन व्यासदेव की वाणी में ही संनिहित है। इसके लिये सारा – विश्व अनन्तकाल तक उनका ऋणी रहेगा। उनकी महिमा अपार है। शास्त्रों में उनका दिव्य चरित्र अनेक प्रकार से गुम्फित है, यहाँ संक्षेप में उनके धर्मशास्त्रों की कुछ चर्चा की जा रही है-

(१) व्यासस्मृति

महर्षि वेदव्यास प्रणीत ‘व्यासस्मृति’ का स्मृति-वाङ्मय में विशिष्ट स्थान है। उन्होंने अपने दिव्य प्रतिभा – ज्ञान एवं तपस्या के बल पर धर्मके सूक्ष्मतम तत्त्वों का दर्शन कर सर्वसामान्यके कल्याण के लिये वाराणसी में* जिज्ञासु महर्षियों को जो वर्णाश्रमधर्म-सम्बन्धी उपदेश प्रदान किये, वे ही “व्यासस्मृति’ के नाम से प्रसिद्ध हो गये। निबन्ध-ग्रन्थों में इस स्मृति के अनेक वचनों को उद्धृत किया गया है। वर्तमान उपलब्ध व्यासस्मृतिमें चार अध्याय तथा लगभग २५० श्लोक हैं। मुख्य रूप से इसमें धर्माचरण के योग्य उत्तम देश, वेदप्रामाण्य की प्रधानता, षोडश संस्कारों का नाम-परिगणन तथा उनकी संक्षिप्त  विधि, ब्रह्मचारी के नियम, गुरु-महिमा, विवाह विधि, | उनमे विवाह-योग्य कन्या के लक्षण, गृहस्थ धर्म, स्त्री धर्म, स्त्री के नित्य-नैमित्तिक कर्म, पातिव्रत्य-धर्म की महिमा, रजोधर्म की इतिकर्तव्यता, गृहस्थ के नित्य-नैमित्तिक तथा संस्काम्य – इन तीन प्रकार के कर्मों का वर्णन, तर्पण-विधि,  वैश्वदेव तथा पञ्चबलि-विधान, अतिथि-पूजन, गृहस्थाश्रम की महिमा, सदाचार की महिमा तथा ब्राह्मण-महिमा आदि का वर्णन है। इसके चौथे अध्यायके ५० श्लोकोंमें दान-धर्म का विशेष माहात्म्य प्रतिपादित है। इसमें दान की महिमा, दान के योग्य पात्र तथा दान का स्वरूप आदि विषय विवेचित हैं। दान-सम्बन्धी व्यास जी का यह विवेचन अत्यन्त महत्त्वका है, इसीलिये व्यासजी दानव्यासभी कहलाते हैं।

इस स्मृति के कुछ विषयों पर बहुत संक्षेप में जानकारी इस प्रकार है –

 षोडश (१६ ) संस्कार

वेदशास्त्रों – मुख्यतः गृह्यसूत्रों एवं धर्मशास्त्रों (स्मृतियों)-का ‘संस्कार’ एक मुख्य प्रतिपाद्य विषय है। संस्कार के करने से अन्तःकरण शुद्ध होता है और संस्कार मनुष्य को पाप तथा अज्ञान से दूर रखकर आचार-विचार एवं ज्ञान-विज्ञान से संयुक्त करते हैं। संस्कारों से मानव पूर्ण सुसंस्कृत बनता है। जिसके संस्कारादि कर्म नहीं किये जाते, वह धर्म-कर्मादि किसी भी कर्म को करने का अधिकारी नहीं होता ।

अपने-अपने वर्णाश्रम के अनुसार शास्त्रों में संस्कार कराने के | विधान वर्णित हैं और इसकी अनिवार्य आवश्यकता | बतलायी गयी है। जैसे खान से लोहा, सोना और हीरा आदि निकलने पर उसका संस्कार करके उसे शुद्ध किया जाता है, उसी प्रकार व्यक्ति का भी संस्कार कर उसे सुसंस्कृत किया जाता है।

संस्कारों की संख्या में विद्वानों में प्रारम्भ से ही कुछ मतभेद रहा है। गौतमस्मृति में ४८ संस्कार बताये गये हैं। महर्षि अङ्गिरा ने २५ संस्कार निर्दिष्ट किये हैं, परंतु उनमें मुख्य तथा आवश्यक षोडश (१६) संस्कार हैं।

महर्षि वेदव्यास जी ने अपनी व्यासस्मृति में षोडश संस्कारों का परिगणन कर उनकी संक्षिप्त विधि भी दी है। वे षोडश संस्कार इस प्रकार हैं – (१) गर्भाधान, (२) पुंसवन, (३) सीमन्तोन्नयन, (४) जातकर्म, (५) नामकरण, (६) निष्क्रमण, (७) अन्नप्राशन, (८) वपन-क्रिया (चूडाकरण – मुण्डन), (९) कर्णवेध, (१०) व्रतादेश (उपनयन – यज्ञोपवीत), (११) वेदारम्भ, (१२) केशान्त (गोदान), (१३) वेदस्नान (समावर्तन), (१४) विवाह, (१५) विवाहाग्निपरिग्रह तथा (१६) त्रेताग्निसंग्रह * । इनमें से प्रारम्भ के तीन संस्कार गर्भाधान, पुंसवन तथा सीमन्तोन्नयन जन्म से पूर्व सम्पादित होते हैं और शेष संस्कार यथासमय किये जाते हैं। कुछ आचार्यों ने मृत-शरीर की अन्त्येष्टिक्रिया को भी एक संस्कार माना है। इस संस्कार में मुख्यतः दाहक्रिया से लेकर द्वादशाह तक अपने-अपने वर्ण-आश्रमके अनुसार दशगात्रविधान, षोडश श्राद्ध, सपिण्डीकरणके साथ ही जलाञ्जलि- विधान तथा श्राद्धादि कर्म भी सम्मिलित हैं।

गर्भाधानसे लेकर कर्ण वेधतक जो ९ संस्कार कहे गये हैं, वे स्त्रियों के अमन्त्रक किये जाते हैं, परंतु विवाह-संस्कार समन्त्रक होता है। शूद्र के ये दसों संस्कार बिना मन्त्रके ही सम्पादित होते हैं

दानव्यास

धर्मशास्त्रोंमें दान-धर्म की विशेष महिमा बतलायी ८ गयी है । गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज ने तो कलियुग में दान को ही मुख्य धर्म माना है और उसे महान् कल्याणकारी बतलाया है

प्रगट चारि पद धर्म के कलि महुँ एक प्रधान । जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान ॥

दानमेकं कलौ युगे इसमें भी कलियुगमें दान को विशेष महत्त्वका बतलाया गया है। दानधर्म पर शतशः ग्रन्थ हैं। स्मृतियों तथा पुराणोंमें इसपर प्रचुर सामग्री उपलब्ध है। इसी प्रकार महाभारत तथा वाल्मीकीय रामायण आदि में दान पर महत्त्वपूर्ण विवरण मिलता है।

महाभारतका तो एक पूरा पर्व ही ‘दानधर्मपर्व’ कहलाता है। इसके अतिरिक्त हेमाद्रि, वीरमित्रोदय, कृत्यकल्पतरु तथा अपरार्क आदिके दानखण्ड बहुत प्रसिद्ध हैं, इसी प्रकार ‘दानसागर’ आदि भी अनेक स्वतन्त्र ग्रन्थ दान पर हैं। पर इनमें महर्षि वेदव्यासजी द्वारा ‘दान’ पर लिखा। गया विवरण विशेष महत्त्व का है। पुराण, महाभारत |आदि ग्रन्थ महर्षि वेदव्यासरचित ही हैं, अतः उनमें। निर्दिष्ट दान-विवरण महर्षि वेदव्यास जी का ही ठहरता। है। कलेवर में अत्यधिक बृहत् होने के साथ ही महत्त्व की दृष्टि से भी महर्षि वेदव्यास जी की सामग्री विशेष उपयोगी है। उनके नाम से जो ‘व्यासस्मृति’ उपलब्ध है, वह यद्यपि पूर्ण नहीं है तथापि इसमें उन्होंने दान के विषयमें जो लिखा है, वह अत्यन्त दिव्य और विशेष प्रेरणाप्रद है । व्यासस्मृति की यह सामग्री इतनी उपयोगी है कि दानव्यासके नामसे प्रसिद्ध है। कूर्मपुराण में वर्णित दान महिमा से यह सामग्री बहुत अंशों में मिल जाती है, वह भी वेदव्यासरचित ही है । व्यासस्मृति के  चौथे अध्यायके लगभग ५० श्लोक दानधर्म से सम्बद्ध हैं। विशेष महत्त्वके होनेसे यहाँ उस प्रकरणके कुछ श्लोकोंका भावानुवाद दिया जा रहा है-

महर्षि व्यासजी कहते हैं— जो विशिष्ट सत्पात्रों को जो कुछ दान देता है और जो कुछ अपने भोजन-आच्छादन में प्रतिदिन व्यवहृत करता है, उसी को मैं उस व्यक्ति का वास्तविक धन या सम्पत्ति मानता हूँ, अन्यथा शेष सम्पत्ति तो किसी अन्य की है, जिसकी वह केवल रखवाली मात्र करता है। दान में जो कुछ देता है और जितने मात्र का वह स्वयं उपभोग करता है, उतना ही उस धनी व्यक्ति का अपना धन है। अन्यथा मर जाने पर उस व्यक्ति के धन आदि वस्तुओं से दूसरे लोग आनन्द मनाते हैं अर्थात् मौज उड़ाते हैं। तात्पर्य यह है कि सावधानीपूर्वक अपनी धन-सम्पत्ति को दान आदि सत्कर्मों में व्यय करना चाहिये। जब आयु का एक दिन अन्त निश्चित है तो फिर धनको बढ़ाकर उसे रखने की इच्छा करना मूर्खता ही है, वह धन व्यर्थ ही है, क्योंकि जिस शरीर की रक्षा के लिये धन बढ़ाने का उपक्रम किया जाता है वह शरीर ही अस्थिर है, नश्वर है, इसलिये धर्म की ही वृद्धि करनी चाहिये, धनकी नहीं । धनके द्वारा दान आदि करके धर्म की वृद्धिका उपक्रम करना चाहिये, निरन्तर धन बढ़ाने से कोई लाभ नहीं। धर्म बढ़ेगा तो धन अपने-आप आने लगेगा। (धर्मादर्थो भवेद्ध्रुवम् )।

शरीरधारियों के सभी शरीर नश्वर हैं और धन भी सदा साथ रहनेवाला नहीं है, साथ ही मृत्यु भी निकट ही सिर पर बैठी है’ ऐसा समझकर प्रतिक्षण धर्म का संग्रह-धर्माचरण ही करना चाहिये। क्योंकि काल का क्या ठीक कब आ जाय, अतः अपने धन एवं समय का सदा सदुपयोग ही करना चाहिये। जो धन धर्म, सुखभोग या यश-किसी काम में नहीं आता और जिसे छोड़कर एक दिन यहाँ से अवश्य ही चले जाना है, उस धनका दान आदि धर्मों में उपयोग क्यों नहीं किया जाता? जिस व्यक्ति के जीने से ब्राह्मण, साधु-संत, मित्र, बन्धु-बान्धव आदि सभी जीते हैं – जीवन धारण करते हैं, उसी व्यक्ति का जीवन सार्थक है – सफल है; क्योंकि अपने लिये कौन नहीं जीता? पशु-पक्षी आदि क्षुद्र प्राणी भी जीवित रहते ही हैं, अतः स्वार्थी न बनकर परोपकारी बनना चाहिये।

(२) लघुव्याससंहिता

महर्षि वेदव्यासजीके नामसे एक ‘लघुव्याससंहिता या ‘लघुव्यासस्मृति’ भी उपलब्ध है, जो दो अध्यायों में उपनिबद्ध है तथा इसमें लगभग १२५ श्लोक हैं । मुख्यरूप से इसमें नित्य कर्मों में परिगणित स्नान, संध्या, जप, देवपूजन, बलिवैश्वदेव और अतिथि सत्कार इन ६ कर्मों के सम्पादन की नित्य आवश्यकता बतलायी है और दैनिक कृत्यों – प्रातः – जागरण, शौच, स्नान, तर्पण, त्रिकाल-संध्या, सूर्यार्घ्यदान, गायत्रीजप, अग्निहोत्र, मध्याह्नस्नान, पञ्चयज्ञ, नित्यश्राद्ध, अतिथिसेवा, देवपूजन, भोजन तथा शयन आदि की विधियों का निर्देश है। संक्षिप्त होने पर भी इस स्मृति का विशेष महत्व है। इसमें महर्षि मनु तथा कपिल आदि धर्मशास्त्रों के वचनों को भी लिया गया है।

इस स्मृति के कुछ विषय इस प्रकार हैं –

ब्राह्ममुहूर्तमें जागरण

सूर्योदय से चार घड़ी लगभग डेढ़ घंटे पूर्व का समय ब्राह्ममुहूर्त कहलाता है। इस समय सोना शास्त्र में निषिद्ध तो है ही, बल्कि इस समय की निद्रा अनेक शारीरिक और मानसिक व्याधियों को जन्म देती है

 प्रातः स्नान का महत्त्व :

रात में सोते हुए मुख से अपवित्र लार आदि पदार्थ निकलते रहते हैं, मनुष्य शरीर के ९ छिद्रों से दिन रात मॉल निकलता रहता है।  इसलिए प्रातः उठने के पश्चात बिना स्नान किये कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए। 

अशक्तावस्था में स्नान विधि

स्नान करने में असमर्थ अवस्था में सिर के नीचे से स्नान  करना चाहिये अथवा गीले वस्त्र से सारे शरीर को भलीभाँति पोंछ लेना चाहिये या मार्जन (अपने ऊपर जल छिड़कना) -से भी स्नान की विधि पूरी हो जाती है-ऐसा महर्षि कपिल जी का अभिमत है। अशक्तावस्था में बाहय्य आदि मन्त्र-स्नान भी प्रशस्त हैं-

अशक्तोऽवशिरस्कं वा स्नानमात्रं विधीयते ॥ आर्द्रेण वाससा चाङ्गमार्जनं कापिलं स्मृतम् ।

ब्राम्यादीन्यथवाशक्तौ स्नानान्याहुर्मनीषिणः । (लघुव्यास० १।८–१०)

सात प्रकारके स्नान

यद्यपि शुद्ध जलसे स्नान करना सामान्य स्नान है, तथापि धर्मशास्त्रों में स्नान के अनेक भेद बतलाये गये हैं। लघुव्यासस्मृति में बतलाया गया है कि (१) ब्राह्म, २) आग्नेय, (३) वायव्य, (४) दिव्य, (५) वारुण, (६) मानस तथा (७) यौगिक-ये सात प्रकारके स्नान होते हैं।

कुशाओंके द्वारा ‘आपो हि ष्ठा०’ इत्यादि मन्त्रोंका  उच्चारण करते हुए अपने ऊपर जल से मार्जन करना ‘ब्राह्म-स्नान’ कहलाता है । समस्त शरीर में भस्म लगाना ‘आग्नेय-स्नान’ है। चूँकि भस्म अग्निजन्य है, अत्यन्त पवित्र है, इसलिये यह अग्नि-सम्बन्धी स्नान ‘आग्नेय- स्नान’ कहलाता है। अधिक विस्तार न हो इस कारण कुछ स्नान के बारे में ही यहाँ बताया गया है ।

संध्याकी महिमा एवं अनिवार्यता

संध्योपासनासे विहीन द्विजाति-वर्ग नित्य अपवित्र ही रहता है और वह सभी प्रकारके विहित-कर्मों के अयोग्य है। संध्या से रहित होकर वह अन्य जो भी कर्म करता है, उसका फल उसे नहीं प्राप्त होता । तात्पर्य यह है कि संध्या अवश्य करनी चाहिये । प्राचीन काल में वेदशास्त्र में पारंगत ब्राह्मणों ने अनन्यमनस्क होकर शान्त एवं स्थिरभाव से विधिपूर्वक संध्योपासना के द्वारा ही भगवत्साक्षात्कार किया था, किंवा परमगति प्राप्त की थी। जो द्विजोत्तम संध्या-वन्दन छोड़कर अन्य दूसरे धर्मकार्योंको करनेका प्रयत्न करता है, वह अयुत वर्षों तक नरक में निवास करता है। इसलिये बड़े ही प्रयत्नपूर्वक श्रद्धा-भक्तिसे यथोचित विधिसे संध्योपासना करनी चाहिये। उससे मनुष्य का शरीर भगवत्प्राप्ति के परम योग्य बन जाता है

जप के समय निषिद्ध कार्य

गायत्री मन्त्र के जप अथवा अन्य किसी मन्त्र के जपमें न तो किसी से बोलना चाहिये और न अपने शरीर के अङ्गों को हिलाना चाहिये। न सिर और गर्दन हिलाये, न दाँत दिखाये। पवित्र देशमें – एकान्त-स्थान में स्थिर-आसन से बैठकर केवल मन्त्र के अधिष्ठाता देव का चिन्तन करते हुए एकतानतापूर्वक जप करना चाहिये। यदि इसके विपरीत जप होता है तो उस जप का फल गुह्यक, राक्षस तथा सिद्ध बलात् हरण कर लेते हैं ।

लघुव्याससंहिता में अन्य विषयों में तर्पण के नियम और सदाचार के नियम और सदाचार पालन से परम गति भी विस्तार से मिलता है ।

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References:

  1. https://www.youtube.com/watch?v=FKiO6GEQoV4, Pujyaniya Raghavacharya Ji’s pravachan.
  2. https://www.youtube.com/watch?v=41yreneWZEk, Pujyaniya Raghavacharya Ji’s pravachan.
  3. श्रीमद देवी भागवत महापुराण
  4. कल्याण, वेद कथा अंक, गीता प्रेस गोरखपुर
  5. कल्याण, धर्मशास्त्र अंक, गीता प्रेस गोरखपुर

 

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