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वेद क्या हैं? श्रृंखला के पिछले अंकों का संक्षिप्त सार
- भाग १–२: वेदों का अनादि, अपौरुषेय स्वरूप; वेद-अध्ययन की मर्यादा (गुरु-मुख श्रवण, पात्रता); उपवेद, ३२ विद्याएँ, ६४ कलाएँ और पुरुषार्थ चतुष्टय।
- भाग ३: वैदिक वाङ्मय के चार स्तम्भ—मन्त्र संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद्; साथ ही मुक्तिकोपनिषद् के अनुसार १०८ उपनिषदों की वेद-वार सारणी।
- भाग ४–६: छह वेदांग; आगम-तन्त्र और षड्दर्शन; इतिहास, पुराण और धर्मशास्त्र।
- भाग ७A: उपनिषद् शब्द का अर्थ; वेदांग, वेदान्त और उत्तर मीमांसा के नामों का भेद; चार महावाक्य; प्रस्थानत्रयी; तथा आत्मा, ब्रह्म और मोक्ष का मूल विषय।
भाग ७A में हमने जाना कि उपनिषद् क्या हैं और वे क्या सिखाते हैं। अब स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि जिन उपनिषदों की इतनी चर्चा होती है, वे कौन-से हैं, किस वेद से जुड़े हैं और उनमें क्या है? भाग ३ में हमने १०८ उपनिषदों की पूरी सारणी देखी थी। किन्तु उन १०८ में से कुछ उपनिषद् ऐसे हैं जिन्हें नींव माना गया है, जिन पर आचार्यों ने (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य, भगवद्पाद रामानुजाचार्य और श्रीमन्मध्वाचार्य) भाष्य लिखे और जिनके वाक्य हम बार-बार सुनते हैं। इस भाग में हम उन्हीं प्रमुख उपनिषदों से परिचय करेंगे: उनका क्रम, उनके विषय और उनकी कथाएँ।
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मुख्य उपनिषद् कौन-से हैं और क्यों?
उपनिषद् नाम के ग्रन्थों की संख्या बहुत बड़ी है। उपनिषत्सञ्चयनम् पुस्तक (सन्दर्भ सूचि देखें) की भूमिका के अनुसार ऐसे ग्रन्थ १०८ से बढ़कर २०० या २४० तक पहुँच गए हैं। इनका संकलन भी दो स्थानों पर हुआ था:
दक्षिण भारतीय संकलन: इसमें ५२ उपनिषदों का समुच्चय किया गया, जिस पर श्रीनारायण की ‘दीपिका’ टीकाएँ मिलती हैं।
उत्तर भारतीय संकलन: इसमें १०८ उपनिषदों को समाहित किया गया, जो आज सर्वाधिक प्रचलित और मान्य परंपरा है।
इनमें से बाद की उपनिषदों को छह वर्गों में बाँटा जाता है – वेदान्ती, शैव, शाक्त, वैष्णव, योग और संन्यास उपनिषद् (इस वर्गीकरण में भी सभी एकमत नहीं हैं )। इनमें से बाद की वेदान्त-उपनिषदें सामान्य सिद्धान्तों में पुरानी मुख्य उपनिषदों के ही मार्ग पर चलती हैं।
इन सब में मुख्य या प्राचीन उपनिषद् वे माने जाते हैं जिन पर आदि शंकराचार्य ने भाष्य लिखा या जिनका उन्होंने अपने भाष्यों में प्रमाण-रूप से उल्लेख किया। इनकी संख्या दस से पन्द्रह के बीच बताई जाती है। परम्परा में दस उपनिषदों का स्मरण इस श्लोक से किया जाता है, जो मुक्तिकोपनिषद् (१.३०) में आता है:
ईश-केन-कठ-प्रश्न-मुण्ड-माण्डूक्य-तित्तिरिः। ऐतरेयं च छान्दोग्यं बृहदारण्यकं तथा॥
इन दस को दशोपनिषद् कहा जाता है: ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य और बृहदारण्यक। शंकराचार्य के ग्रन्थों के आधार पर इनके साथ श्वेताश्वतर, कौषीतकि, जाबाल, महानारायण और पैङ्गल को जोड़ने पर चौदह, और माण्डूक्य के साथ पन्द्रह की गणना बनती है। इसीलिए “मुख्य उपनिषद्” की संख्या अलग-अलग ग्रन्थों में दस, ग्यारह, तेरह या पन्द्रह मिलती है। उसमें कोई विरोध नहीं है, केवल गणना की पद्धति का भेद है।
दस प्रमुख उपनिषद् एक दृष्टि में:

प्रमुख उपनिषदों का परिचय
१. ईशावास्य उपनिषद्: सब कुछ ईश्वर से व्याप्त है
यह उपनिषद् संपूर्ण वैदिक वाङ्मय में अत्यंत अद्वितीय और विशिष्ट स्थान रखता है, क्योंकि यह वेद के मन्त्र-भाग का ही अंश है। यह शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिनी संहिता का अन्तिम अध्याय है। इसमें केवल अठारह मन्त्र हैं, परन्तु इनमें ज्ञान और कर्म दोनों का समन्वय मिलता है। इसका पहला मन्त्र ही इसकी पहचान है:
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥
अर्थात्: इस गतिशील जगत् में जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है। इसलिए त्याग-भाव से उसका उपभोग करो और किसी के धन का लोभ मत करो।
यह मंत्र संसार को ‘मिथ्या’ कहकर छोड़ देने की बात नहीं करता, बल्कि संसार को ‘ईश्वर का स्वरूप’ मानकर जीने की कला सिखाता है।
आज की उपभोक्तावादी संस्कृति में जहाँ मनुष्य अंधाधुंध संचय और ईर्ष्या की आग में जल रहा है, वहीं ईशावास्य घोषणा करता है –‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः‘ उपभोग करो, किंतु कर्तापन के अहंकार और आसक्ति से मुक्त होकर।
इसके तुरंत बाद दूसरे मंत्र में यह स्पष्ट कहा गया:
“कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः“ (ईश० २)
कर्म करते हुए ही सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करो। कर्म का परित्याग धर्म नहीं है; कर्मफल की आसक्ति का परित्याग ही वास्तविक धर्म है। यही जीवन के प्रति वास्तविक आदर और अकर्मण्यता से मुक्ति का संदेश है।

२. केन उपनिषद्: मन और इन्द्रियों को कौन चलाता है?
यहाँ सामवेद की जैमिनीय (तलवकार) शाखा से संबंधित यह उपनिषद् चेतना के सबसे गूढ़ प्रश्न से आरंभ होता है:
“केनेषितं पतति प्रेषितं मनः? केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः?
केनेषितां वाचमिमां वदन्ति? चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति?” (केन० १.१)
अर्थात्: वह कौन है जिसकी अदृश्य इच्छा और प्रेरणा से यह मन विचारों की ओर दौड़ता है? सबसे पहला मुख्य प्राण किसके आदेश से गतिशील होता है? वह कौन-सी अंतर्शक्ति है जो वाणी से शब्द कहलवाती है, और आँखों व कानों को देखने-सुनने के काम में नियुक्त करती है?
ऋषि इसका जो उत्तर देते हैं, वह वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक दोनों है:
वह परमतत्त्व ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद् वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणश्चक्षुषश्चक्षुः‘ है – अर्थात् वह कान का भी कान, मन का भी मन, वाणी की भी वाणी, प्राण का भी प्राण और आँख की भी आँख है।
जो शक्ति हमारी ज्ञानेन्द्रियों को कार्यक्षम बनाती है, उसे हमारी आँखें या बुद्धि बाहर किसी वस्तु की तरह नहीं पकड़ सकतीं। जैसे एक कैमरा पूरी दुनिया की तस्वीर खींच सकता है, किंतु वह स्वयं अपनी तस्वीर नहीं खींच सकता; वैसे ही जिससे मन सोचता है, मन उस ब्रह्म को नहीं सोच सकता।
अहंकार-भंग का अमर आख्यान (उमा-हैमवती प्रसंग):
मनुष्य जब कोई बड़ी उपलब्धि हासिल करता है, तो वह मान बैठता है कि “यह सब मेरी बुद्धि, मेरी मेहनत और मेरी प्रतिभा का परिणाम है।” केनोपनिषद् की यह कथा मनुष्य के इसी सूक्ष्म अहंकार को तोड़ती है:
एक बार देवताओं ने असुरों पर विजय प्राप्त की और वे इस मिथ्या गर्व से भर गए कि यह विजय उनके अपने पराक्रम की है। देवताओं के इस अज्ञान को मिटाने के लिए परब्रह्म उनके सम्मुख एक विराट्, अज्ञात ‘यक्ष‘ के रूप में प्रकट हुए।

देवराज इंद्र ने पहले अग्निदेव को पता लगाने भेजा। यक्ष ने अग्नि से पूछा, “तुम्हारा सामर्थ्य क्या है?” अग्नि ने गर्व से कहा, “मैं इस पूरी पृथ्वी को क्षण भर में भस्म कर सकता हूँ!” यक्ष ने उनके आगे एक छोटा-सा सूखा तिनका रख दिया और कहा, “इसे जलाकर दिखाओ।” अग्निदेव ने अपना पूरा वेग लगा दिया, प्रचंड ज्वालाएँ छोड़ दीं, किंतु उस तिनके का एक कोना भी नहीं जला सके! वे लज्जित होकर लौट आए।
फिर पवनदेव पहुँचे और उन्होंने अपनी शक्ति का बखान किया कि “मैं पूरे ब्रह्मांड को उड़ा सकता हूँ!” यक्ष ने पुनः वही तिनका रख दिया। वायुदेव ने आंधी-तूफान का रूप धर लिया, पर उस तिनके को एक इंच भी हिला नहीं पाए!
अंत में स्वयं देवराज इंद्र आगे बढ़े, किंतु जैसे ही वे पास पहुँचे, यक्ष अंतर्धान हो गए और उसी आकाश में अत्यंत दिव्य, ज्ञानमयी भगवती उमा हैमवती प्रकट हुईं। इंद्र ने उनसे पूछा, “वह परम शक्ति कौन थी?” तब ज्ञान की देवी उमा ने देवताओं का भ्रम तोड़ते हुए कहा:
“वह साक्षात् ब्रह्म थे! तुम्हारी विजय तुम्हारी शक्ति से नहीं, उस परब्रह्म के तेज से हुई थी। अग्नि में जलाने की और वायु में उड़ाने की शक्ति भी उसी परमात्मा का अंश है। तुम्हारा अहंकार व्यर्थ है!”
जीवन-संदेश:
केनोपनिषद् हमें सिखाता है कि पद, प्रतिष्ठा, बुद्धि या शक्ति किसी की भी अपनी निजी बपौती नहीं है। जैसे ही मनुष्य यह समझ लेता है कि उसकी हर क्षमता के पीछे वही परम चेतना कार्य कर रही है, उसका अहंकार मिट जाता है और वह विनय तथा दिव्यता से भर जाता है।

३. कठोपनिषद्: जीवन का सबसे बड़ा चुनाव और मन पर विजय का विज्ञान
कृष्ण यजुर्वेद की कठ शाखा से संबद्ध यह उपनिषद् मृत्यु के रहस्य, जीवन की प्राथमिकता और आत्मज्ञान का अत्यंत तेजस्वी ग्रंथ है।
जैसा कि हमने पिछले अंक (भाग 7A) में देखा था, बालक नचिकेता ने साक्षात् मृत्यु के देवता यमराज के सामने सांसारिक सुखों और प्रलोभनों को ठुकराकर केवल आत्म-तत्त्व का ज्ञान माँगा था। यमराज और नचिकेता के उस अमर एवं विस्तृत संवाद को हम आगे आने वाले अंकों (जब हम एक-एक उपनिषद् का विशद मंथन करेंगे) में गहराई से समझेंगे। यहाँ हम संक्षेप में इस उपनिषद् के उन दो अमर सूत्रों को देखते हैं, जो हर मनुष्य के दैनिक जीवन की दिशा तय करते हैं:
(i) श्रेय बनाम प्रेय (क्षणिक सुख बनाम स्थायी कल्याण):
कठोपनिषद् मनुष्य के सामने आने वाले दो रास्तों को पूरी स्पष्टता से रखता है:
- प्रेय: जो इन्द्रियों को तुरंत लुभावना लगता है, जिसमें तात्कालिक स्वाद और सस्ता सुख है, किंतु जिसका अंत मानसिक अशांति और पतन में होता है।
- श्रेय: जो आत्म-कल्याण और परम शांति का मार्ग है; यह आरंभ में कठिन और संयम की माँग करने वाला हो सकता है, किंतु अंत में मनुष्य को निर्भय और अमर बनाता है।
ऋषि कहते हैं कि मूढ़ व्यक्ति सस्ते प्रलोभनों (प्रेय) में बह जाता है, जबकि धीर और बुद्धिमान व्यक्ति कल्याणकारी मार्ग (श्रेय) को चुनता है।
(II) रथ और सारथि का अमर रूपक :
मनुष्य अपने मन और इन्द्रियों के भटकाव पर नियंत्रण कैसे पाए, इसके लिए कठोपनिषद् से सुंदर मनोविज्ञान पूरी दुनिया में दूसरा नहीं है:
“आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥” (कठ० १.३.३)
- शरीर: एक रथ है।
- आत्मा: उस रथ का स्वामी (सवार) है।
- बुद्धि: सारथि (रथ चलाने वाला) है।
- मन: घोड़ों की लगाम है।
- इन्द्रियाँ: रथ के वेगवान घोड़े हैं।
- संसार के विषय (रूप, रस, गंध आदि): वे मार्ग हैं जिन पर ये घोड़े दौड़ते हैं।
यदि सारथि (बुद्धि) सो जाए या भ्रमित हो, और लगाम (मन) ढीली छोड़ दी जाए, तो बेलगाम घोड़े पूरे रथ को जीवन की खाई में गिरा देते हैं। किंतु जब बुद्धि सजग हो और मन की लगाम दृढ़ता से साधी जाए, तो वही रथ मनुष्य को उसके सर्वोच्च लक्ष्य तक सुरक्षित पहुँचाता है।
इसके अतिरिक्त, इसी उपनिषद् में संसार को ‘ऊर्ध्वमूलमवाक्शाखम्‘—एक ऐसे सनातन पीपल के वृक्ष के रूप में निरूपित किया गया है, जिसकी मूल चेतना ऊपर (परब्रह्म) में है और संसार की शाखाएँ नीचे फैली हुई हैं।

४. प्रश्नोपनिषद्: छह शिष्य, छह प्रश्न
अथर्ववेद की पिप्पलाद शाखा से संबद्ध यह उपनिषद् पूर्णतः प्रश्नोत्तरी और वैज्ञानिक शैली में है। इसका नाम ही इसके स्वरूप को दर्शाता है। छह उच्चकोटि के ब्रह्म-जिज्ञासु ऋषि – सुकेशा भारद्वाज, शैब्य सत्यकाम, सौर्यायणी गार्ग्य, कौसल्य आश्वलायन, भार्गव वैदर्भि और कबंधी कात्यायन – हाथों में समिधा लेकर परम ज्ञानी महर्षि पिप्पलाद की शरण में पहुँचे।
महर्षि पिप्पलाद ने उत्तर देने से पहले उनसे कहा कि एक वर्ष तक तपस्या, ब्रह्मचर्य और श्रद्धा के साथ रहो, उसके बाद जो पूछना हो पूछना। यह उपनिषद् गुरु-शिष्य परम्परा में योग्यता की कसौटी का उदाहरण है। उन्होंने पहले उनकी पात्रता जांची और कहा:
“भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ यथाकामं प्रश्नान् पृच्छत यदि विज्ञास्यामः सर्वं ह वो वक्ष्याम इति।” (प्रश्न० १.२)
(अर्थात्: तुम लोग एक वर्ष तक यहाँ आश्रम में रहकर तप, ब्रह्मचर्य और अटूट श्रद्धा के साथ साधना करो। उसके बाद अपनी इच्छा के अनुसार प्रश्न पूछना; यदि मैं जानूँगा, तो तुम्हारे सभी संशयों का समाधान अवश्य करूँगा।)
यह प्रसंग सिद्ध करता है कि आत्मज्ञान के लिए मन की शुद्धि, तपस्या और गुरु के प्रति निष्ठा अनिवार्य है।
इस उपनिषद् में छह गहरे प्रश्नों के समाधान दिए गए हैं:
- पहला प्रश्न: समस्त प्रजा और प्राणियों की उत्पत्ति किससे हुई (रयि और प्राण का सृष्टि-चक्र)?
- दूसरा प्रश्न: इस शरीर को कितने देवता धारण करते हैं और उनमें सर्वश्रेष्ठ कौन है (इंद्रियों में प्राण की सर्वोच्चता)?
- तीसरा प्रश्न: यह मुख्य प्राण कहाँ से उत्पन्न होता है और शरीर में कैसे प्रवेश करता है?
- चौथा प्रश्न: मनुष्य जब सोता है, तब कौन-से अंग सोते हैं, कौन जागता रहता है, और स्वप्न देखने वाला वह देव कौन है (निद्रा और स्वप्न का गहरा मनोविज्ञान)?
- पाँचवाँ प्रश्न: जो मनुष्य जीवन भर ॐकार का ध्यान करता है, वह किस लोक और गति को प्राप्त करता है (प्रणव-साधना का रहस्य)?
- छठा प्रश्न: वह षोडशकल पुरुष (सोलह कलाओं वाला परमात्मा) कहाँ स्थित है? महर्षि बताते हैं कि वह कहीं दूर आकाश में नहीं, बल्कि इसी शरीर के भीतर हृदयाकाश में विराजमान है।

५. मुण्डकोपनिषद् परा और अपरा विद्या
अथर्ववेद से जुड़ी यह उपनिषद् अध्यात्म, साधना और यथार्थ का अद्भुत संगम है। इसमें गृहस्थ शौनक ऋषि विधिवत महर्षि अंगिरा के पास पहुँचकर एक अत्यंत मौलिक प्रश्न पूछते हैं—”कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति” अर्थात् किसे जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है।
उत्तर में महर्षि अङ्गिरा दो प्रकार की विद्याएँ बताते हैं:
तस्मै स होवाच—द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च॥ (१.१.४)
तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति।
अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते॥ (१.१.५)
अर्थात्: उन शौनक से महर्षि अङ्गिरा ने कहा—ब्रह्मवेत्ताओं का ऐसा कथन है कि दो प्रकार की विद्याएँ जानने योग्य हैं—एक ‘परा’ और दूसरी ‘अपरा’। उनमें ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद तथा शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष—यह सब ‘अपरा विद्या’ है। तथा ‘परा विद्या’ वह है जिससे उस अविनाशी अक्षर-तत्त्व (परब्रह्म) का ज्ञान होता है। यहाँ ‘अपरा’ साधन का स्तर है और ‘परा विद्या’ साध्य का।
यज्ञ-कर्मों की सीमा और टूटी हुई नौका की उपमा:
मुण्डकोपनिषद् में केवल बाह्य यज्ञ-कर्मों के भरोसे रहने की सीमा स्पष्ट करते हुए ऋषि कहते हैं:
प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म। एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरां मृत्युं ते पुनरेवापि यन्ति॥ (मुण्डकोपनिषद् १.२.७)
अर्थात्: यज्ञ-स्वरूप वाले ये अठारह साधन अदृढ़ (कमजोर) नौकाओं के समान हैं, जिनमें केवल अवर (अपर) कर्म कहा गया है। जो अज्ञानी जन केवल इन्हीं कर्मों को परम कल्याणकारी मान लेते हैं, वे बार-बार जरा (बुढ़ापे) और मृत्यु के चक्र में पड़ते हैं। आशय यह है कि अकेले सकाम यज्ञ-कर्म भवसागर पार नहीं करा सकते; वे केवल चित्त-शुद्धि या स्वर्गादि लोक के साधन हैं, मोक्ष का साक्षात् साधन परा विद्या (ब्रह्मज्ञान) ही है।
मुण्डकोपनिषद् के प्रसिद्ध मन्त्र:
१. द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥ (मुण्डकोपनिषद् ३.१.१)
अर्थात्: साथ रहने वाले दो सखा पक्षी एक ही वृक्ष पर बैठे हैं। उनमें से एक पक्षी (जीवात्मा) वृक्ष के कर्मफल रूपी फलों का उपभोग करता है, और दूसरा पक्षी (परमात्मा/शुद्ध साक्षी) फल न खाता हुआ केवल देखता रहता है।
२. सत्यमेव जयते नानृतम्… (मुण्डकोपनिषद् ३.१.६)
अर्थात्: सत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहीं। सत्य से ही देवयान मार्ग प्रशस्त होता है।

६. माण्डूक्योपनिषद्: ॐ और चार अवस्थाएँ
यह दसों प्रमुख उपनिषदों में सबसे छोटा है, जिसमें केवल बारह मंत्र हैं। इसका आरंभ ही इस सत्य से होता है:
“ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वम्...” अर्थात्: यह संपूर्ण जगत ॐ अक्षर ही है। जो बीत चुका है, जो वर्तमान में है और जो भविष्य में होगा, वह सब ॐकार का ही विस्तार है।
इस उपनिषद् में आत्मा की चार अवस्थाओं का निरूपण किया गया है:

परम पूज्य आचार्य गौड़पाद ने इस उपनिषद् के गूढ़ रहस्यों को स्पष्ट करने के लिए प्रसिद्ध ‘माण्डूक्य-कारिकाएँ’ लिखीं, जिन पर आगे चलकर आद्य शंकराचार्य ने अपना भाष्य रचा। इसी उपनिषद् में चार वेदान्त महावाक्यों में से एक—“अयमात्मा ब्रह्म“ आता है।

७. तैत्तिरीय उपनिषद्: गुरु की विदाई-शिक्षा और पंचकोश
कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा से संबद्ध यह उपनिषद् तीन वल्लियों (भागों) में विभक्त है—शिक्षावल्ली, ब्रह्मानन्दवल्ली और भृगुवल्ली।
(I). शिक्षावल्ली (समावर्तन-उपदेश):
शिक्षा पूर्ण होने पर गुरुकुल से विदा लेते समय गुरु अपने शिष्य को गृहस्थ और समाज में जीने की मर्यादा का पावन उपदेश देते हैं:
“सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः। मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव॥“ (१.११)
अर्थात्: सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो, स्वाध्याय में कभी प्रमाद मत करो; माता, पिता, आचार्य और अतिथि को देवता के समान मानो।
(II) ब्रह्मानन्दवल्ली (पंचकोश-विवेक):
यहाँ “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म“ का उद्घोष करते हुए यह समझाया गया है कि आत्मा इस शरीर के भीतर पाँच कोशों (आवरणों) से परे है:
- अन्नमय कोश: यह हाड़-मांस का स्थूल शरीर।
- प्राणमय कोश: श्वास-प्रश्वास और प्राणों की शक्ति।
- मनोमय कोश: संकल्प और विकल्प करने वाला मन।
- विज्ञानमय कोश: निर्णय लेने वाली बुद्धि।
- आनन्दमय कोश: सुख और विश्राम की अनुभूति।
आत्मा इन पाँचों कोशों का साक्षी है, इनसे सर्वथा परे है।
(III). भृगुवल्ली (तपस्या द्वारा ब्रह्म-साक्षात्कार):
भृगु अपने पिता वरुण से ब्रह्म का उपदेश पाकर तपस्या करते हैं और क्रम से अन्न, प्राण, मन और बुद्धि को पार करते हुए इस अंतिम सत्य पर पहुँचते हैं:
“आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्...” (३.६)
अर्थात्: आनंद ही ब्रह्म है; आनंद से ही समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं, आनंद से ही जीवित रहते हैं और अंत में आनंद में ही विलीन हो जाते हैं।

८. ऐतरेय उपनिषद्: आरम्भ में केवल आत्मा था
यह उपनिषद् ऋग्वेद के ऐतरेय आरण्यक से जुड़ा हुआ है। इसका आरंभ ही इस गंभीर सत्य से होता है:
“आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्...” (ऐतरेय० १.१.१)
अर्थात्: सृष्टि के आरंभ में यह सब केवल एक आत्मा ही था, अन्य कुछ भी चेष्टावान नहीं था। उस आत्मा ने संकल्प किया कि मैं लोकों की रचना करूँ।
उस परमात्मा के संकल्प से ही लोकों और लोकपालों की उत्पत्ति का पूरा क्रम इसमें विस्तार से बताया गया है। इस उपनिषद् का अंतिम और सबसे प्रमुख निष्कर्ष ऋग्वेद का अमर महावाक्य है –
“प्रज्ञानं ब्रह्म” (३.१.३)
अर्थात्: यह शुद्ध ज्ञानस्वरूप चेतना ही परब्रह्म है। परंपरा में इसका संबंध ऋषि महीदास ऐतरेय से जोड़ा जाता है।

९. छान्दोग्य उपनिषद्: उपासनाएँ, कथाएँ और तत्त्वमसि
सामवेद से जुड़ा यह उपनिषद् आठ अध्यायों में फैला हुआ है और अत्यंत विशाल है। इसका आरंभ ही ॐकार की उपासना से होता है:
“ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत...” (१.१.१)
अर्थात्: ॐ इस अविनाशी अक्षर की उद्गीथ के रूप में उपासना करो।
इस उपनिषद् की सबसे बड़ी विशेषता इसकी प्रेरक और जीवनोपयोगी कथाएँ हैं:
- गाड़ीवान रैक्व और राजा जानश्रुति का संवाद (४.१–३)
- सत्यकाम जाबाल का सत्य-आचरण (४.४–९)
- सत्यकाम और उनके शिष्य उपकोसल की कथा (४.१०–१५)
- श्वेतकेतु और राजा प्रवाहण जैवलि का संवाद (५.३–१०)
- महर्षि सनत्कुमार द्वारा देवर्षि नारद को भूमा-विद्या का उपदेश (७.१–२६)
छठे अध्याय में महर्षि उद्दालक आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु को अनेक व्यावहारिक दृष्टांतों से समझाते हुए बार-बार कहते हैं—
“तत्त्वमसि श्वेतकेतो…“ (६.८.७)
अर्थात्: वह जो अत्यंत सूक्ष्म आत्म-तत्त्व है, वही सत्य है, वही आत्मा है, और हे श्वेतकेतु! वह तुम ही हो।
यहाँ पानी में घुले हुए नमक का प्रसिद्ध दृष्टांत दिया गया है: जैसे पानी में घुल जाने के बाद नमक आँखों से नहीं दिखता, पर चखने पर उसकी हर बूँद में उसका अस्तित्व मिलता है, वैसे ही यह ब्रह्म संसार और शरीर में व्याप्त है।
इसी उपनिषद् में शाण्डिल्य विद्या का वह अमर सूत्र आता है:
“सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत…“ (३.१४.१)
अर्थात्: यह संपूर्ण जगत निश्चय ही ब्रह्म है, क्योंकि उसी से यह उत्पन्न होता है, उसी में विलीन होता है और उसी में चेष्टा करता है; इसलिए शांत चित्त होकर उसकी उपासना करनी चाहिए।

१०. बृहदारण्यक उपनिषद्: सबसे विशाल और गम्भीर
यह शुक्लयजुर्वेद की काण्व शाखा से संबद्ध उपनिषद् है। भाग ३ में हमने देखा था कि यह शतपथ ब्राह्मण के चौदहवें (अंतिम) काण्ड का अंश है। विस्तार और दार्शनिक गहराई—दोनों ही दृष्टियों से यह उपनिषदों में सबसे विशाल है।
समग्र ग्रंथ मुख्य रूप से तीन काण्डों में विभक्त है – मधुकाण्ड, मुनिकाण्ड (याज्ञवल्क्यकाण्ड) और खिलकाण्ड। इसके केंद्र में महर्षि याज्ञवल्क्य का दिव्य तत्त्वज्ञान है।
इस उपनिषद् के प्रमुख संवाद और प्रसंग:
- याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी संवाद (२.४ तथा ४.५): जब महर्षि याज्ञवल्क्य संन्यास लेने लगे, तब उन्होंने अपनी संपत्ति दोनों पत्नियों (मैत्रेयी और कात्यायनी) में बाँटनी चाही। ब्रह्मवादिनी मैत्रेयी ने पूछा—“यदि मुझे धन से भरी पूरी पृथ्वी भी मिल जाए, तो क्या उससे मैं अमर हो जाऊँगी?” याज्ञवल्क्य ने कहा, “नहीं, धन से केवल साधन संपन्न जीवन जीया जा सकता है, अमृतत्व नहीं।” तब मैत्रेयी ने कहा—“येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्याम्” (जिससे मैं अमर न हो सकूँ, उसका मैं क्या करूँ)! इसी प्रसंग में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अमर सत्य उद्घाटित किया:
“न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति...“
अर्थात्: पति पति के लिए प्रिय नहीं होता (कोई भी स्त्री अपने पति से केवल इसलिए प्रेम नहीं करती कि वह ‘पति की अपनी सत्ता’ या ‘पति की इच्छा’ है।), अपनी आत्मा के लिए प्रिय होता है (स्त्री को पति इसलिए प्रिय लगता है क्योंकि उसमें वह अपनी ही आत्मा (सुख, शांति और आत्म-चेतना) को पाती है) । संसार में जो कुछ भी हमें प्रिय लगता है, वह सब वस्तुतः हमारी अपनी आत्मा के कारण ही प्रिय है। आत्मा ही समस्त प्रेम और आनंद का अंतिम केंद्र है।
- राजा जनक की सभा और शास्त्रार्थ (अध्याय ३ और ४): विदेहराज जनक की सभा में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अश्वल, आर्तभाग, भुज्यु, उषस्त, कहोल, गार्गी, उद्दालक और विदग्ध शाकल्य जैसे उद्भट विद्वानों के प्रश्नों का समाधान कर ब्रह्मविद्या की सर्वोच्चता स्थापित की।
- विदग्ध शाकल्य का प्रश्न: जब शाकल्य ने पूछा कि वास्तव में देवता कितने हैं, तो याज्ञवल्क्य ने पहले उत्तर में तीन हज़ार तीन सौ छह (३३०६) देवता बताए, फिर क्रम से उन्हें तैंतीस, छह, तीन, दो, डेढ़ और अन्त में केवल एक प्राण (परब्रह्म) में समेट दिया।
- गार्ग्य बालाकि और काशिराज अजातशत्रु संवाद (२.१): अभिमानी विद्वान बालाकि को शांत और आत्मनिष्ठ राजा अजातशत्रु से ब्रह्मविद्या का गूढ़ रहस्य सीखना पड़ा।
(यहाँ हमने इन प्रमुख प्रसंगों का केवल संक्षिप्त परिचय दिया है; जनक की सभा का वह ऐतिहासिक शास्त्रार्थ, गार्गी के तीखे प्रश्न और शाकल्य-संवाद जैसी इन सभी अमर कथाओं का पूर्ण एवं विस्तृत मंथन हम आगे प्रत्येक उपनिषद् पर आने वाले स्वतंत्र अंकों में करेंगे।)
इसी उपनिषद् में परब्रह्म के स्वरूप-निर्देश के लिए प्रसिद्ध “नेति नेति” (२.३.६) सूत्र आता है—अर्थात् बुद्धि और वाणी से जो कुछ भी सांसारिक रूप में कल्पित किया जा सकता है, ब्रह्म वह सीमित तत्त्व नहीं है।
संपूर्ण विश्व में प्रसिद्ध सनातन की यह पावन प्रार्थना इसी उपनिषद् की देन है:
असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्माऽमृतं गमय॥ (१.३.२८)
(अर्थात्: मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो, और मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो।)
दशोपनिषद् के अतिरिक्त दो प्रमुख उपनिषद्:
- श्वेताश्वतर उपनिषद् (कृष्णयजुर्वेद): इसमें ईश्वर, जीव और प्रकृति (त्रिपुटी) के दार्शनिक संबंध का अत्यंत स्पष्ट निरूपण है, इसलिए आचार्य-परंपराओं में इसे बार-बार प्रमाण-रूप से उद्धृत किया जाता है।
- कौषीतकि उपनिषद् (ऋग्वेद): इसमें प्रतर्दन-विद्या और पर्यङ्क-विद्या जैसे अत्यंत गूढ़ आध्यात्मिक प्रसंग आते हैं।

उपनिषदों की उपमाएँ
उपनिषदों की शैली का सबसे आकर्षक पक्ष उनके उदाहरण और उपमाएँ हैं। कठिन तत्त्व को ऋषि सीधे दृश्य से समझाते हैं:

ऋषियों की इन उपमाओं का स्पष्ट संकेत है कि ब्रह्म इसी जीवन और प्रकृति में ओत-प्रोत यथार्थ है। उपनिषदों की भाषा वैदिक संस्कृत के निकट होने से मन्त्रों के अर्थ अत्यंत गहरे हैं, जिसे आचार्यों ने अपनी-अपनी दृष्टि से व्याख्यायित किया।
उपनिषदों की विद्याएँ (उपासनाएँ)
उपनिषदों में कुछ ऐसी साधनाएँ बताई गई हैं जिन्हें विद्या या उपासना कहा जाता है। इनके दो रूप हैं। पहले में साधक यज्ञ के किसी अंग में एक विशेष भावना का आरोप करता है; उदाहरण के लिए बृहदारण्यक में यज्ञीय अश्व में प्रजापति की भावना करने को कहा गया है। दूसरे में नाम, वाणी, बल या मन जैसे विषयों में ब्रह्म की भावना करते हुए ध्यान किया जाता है। ऐसी उपासनाएँ मन को क्रम से ऊँचे स्तर पर ले जाती हैं। उपनिषदों में इनकी कुल संख्या लगभग बत्तीस बताई जाती है।
- छान्दोग्य की बारह विद्याएँ: अधिपुरुष, प्राण, दहर, गायत्री, मधु, पञ्चाग्नि, पुरुष, सद्विद्या, संवर्ग, शाण्डिल्य, उपकोसल और वैश्वानर विद्या।
- बृहदारण्यक की चार विद्याएँ: अन्तरादित्य, पञ्चाग्नि, प्राणाग्निहोत्र और उद्गीथ विद्या।
- कौषीतकि की दो विद्याएँ: पर्यङ्क और प्रतर्दन विद्या।
शाण्डिल्य विद्या का एक अंश यह है कि पुरुष क्रतुमय है, अर्थात् संकल्प से बना हुआ है। इस लोक में पुरुष जैसा संकल्प करता है, मरने के बाद वैसा ही बन जाता है, इसलिए शुभ संकल्प करना चाहिए (छान्दोग्य ३.१४)। इन विद्याओं के विधि-विधान उपनिषदों में या उनके भाष्यों में नहीं मिलते। प्राचीन काल में वे गुरु से पात्र शिष्य को ही सिखाई जाती थीं और योग्यता की पहले परीक्षा ली जाती थी।
उपनिषदों के ऋषि और उनकी चिन्तन-धाराएँ
उपनिषदों में अनेक ऋषियों के नाम आते हैं: शाण्डिल्य, उद्दालक आरुणि, प्रवाहण जैवलि, पिप्पलाद, सत्यकाम जाबाल, गार्गी, सनत्कुमार और याज्ञवल्क्य। उपनिषत्सञ्चयनम् की भूमिका इनके चिन्तन को तीन धाराओं में देखती है:
- आधिभौतिक चिन्तन: यहाँ विचार बाहरी जगत् को देखकर आरम्भ होता है। शाण्डिल्य और उद्दालक आरुणि को इस धारा में रखा गया है। वे जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लय के कारण को ब्रह्म के रूप में देखते हैं।
- आधिदैविक चिन्तन: यहाँ विचार प्राण और देवताओं से आरम्भ होता है। प्रश्नोपनिषद् में पिप्पलाद के उत्तर और याज्ञवल्क्य-शाकल्य का संवाद इसके उदाहरण हैं। उपनिषदों का उपासना-काण्ड इसी धारा से जुड़ा बताया गया है।
- आध्यात्मिक चिन्तन: यहाँ विचार सीधे आत्मा पर केन्द्रित होता है, और इसे उपनिषदों के चिन्तन की पराकाष्ठा माना गया है। इस धारा में याज्ञवल्क्य शीर्ष स्थान पर हैं।
याज्ञवल्क्य जी के विचारों का सार तीन बातों में है: जगत् का कारण और नियन्ता ब्रह्म अपनी ही आत्मा है; वह आत्मा स्वभाव से आनन्दरूप है; और वह विज्ञानघन तथा स्वप्रकाश है। याज्ञवल्क्य जी के अनुसार कामना वाला पुरुष संसारी जीव है। जिसकी कामना आत्मा के सिवा कहीं नहीं, वह आप्तकाम इसी लोक में ब्रह्मरूप हो जाता है। इन्हीं तीनों धाराओं में आगे के दर्शनों की नींव मानी गई है।
उपनिषदों से जीवन के मूल्य
उपनिषद् मत है कि जो सत्य भीतर अनुभव हो, उसकी छाया आचरण में दिखनी चाहिए। उपनिषदों में जीवन-मूल्य प्रायः कथा या संवाद के रूप में आते हैं:
- आत्मसंयम, दान और दया: बृहदारण्यक (५.२.१–३) में प्रजापति देवताओं, मनुष्यों और असुरों को क्रम से तीन उपदेश देते हैं—दाम्यत (संयम करो), दत्त (दान दो), दयध्वम् (दया करो)।
- विदाई का उपदेश: तैत्तिरीय (१.११) में सत्य, धर्म, स्वाध्याय और माता, पिता, आचार्य, अतिथि के प्रति सम्मान का उपदेश।
- सत्य ही पात्रता: सत्यकाम जाबाल को अपने पिता का नाम नहीं मालूम था। उसने गौतम को यही सत्य बता दिया। गौतम ने उसके वंश के स्थान पर उसकी सत्यवादिता देखी और उसे शिष्य बना लिया। गुरु ने उसे गायें देकर वन में भेजा और उसने प्रकृति से ही ज्ञान पाया।
- जीवन का आदर और त्याग: ईशावास्य के पहले दो मन्त्र, जिनमें त्यागपूर्वक भोग और सौ वर्ष जीने की इच्छा दोनों कही गई हैं।
- अभय: बृहदारण्यक के शब्दों में “अभयं वै जनक प्राप्तोऽसि” (४.२.४)। स्वामी विवेकानन्द को उपनिषदों का सर्वश्रेष्ठ मूल्य अभय ही लगा।
- कर्म की स्वतन्त्रता: बृहदारण्यक (४.४.५) के अनुसार पुरुष कामनामय है; जैसी कामना, वैसा संकल्प; जैसा संकल्प, वैसा कर्म; और जैसा कर्म, वैसा वह स्वयं बनता है। मुक्तिकोपनिषद् का श्लोक इसी भाव को कहता है:
शुभाशुभाभ्यां मार्गाभ्यां वहन्ती वासनासरित्। पौरुषेण प्रयत्नेन योजनीया शुभे पथि॥ (मुक्तिकोपनिषद् २.५)
अर्थात्: वासना की नदी शुभ और अशुभ, दोनों मार्गों में बहती है। मनुष्य को अपने पुरुषार्थ से उसे शुभ मार्ग की ओर मोड़ना चाहिए।
उपनिषदों की व्यापकता
उपनिषदों का प्रभाव भारत से बाहर भी पहुँचा। सत्रहवीं शताब्दी में शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दाराशिकोह को उपनिषदों का सर्वात्मभाव इतना आकर्षक लगा कि उसने काशी के पण्डितों को बुलाकर उनका फारसी में अनुवाद करवाया। आगे चलकर वह अनुवाद लैटिन और यूरोप की भाषाओं तक पहुँचा। जर्मन दार्शनिक शोपेनहावर ने उपनिषदों की गहरी प्रशंसा की, जिसके बाद यूरोप में उनका अध्ययन फैला। भारत में राजा राममोहन राय ने उपनिषदों के अनुवाद करवाए।
उपसंहार एवं आगामी भाग
इस भाग ७B में हमने देखा कि १०८ उपनिषदों में से कौन-से मुख्य माने जाते हैं और क्यों। हमने ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य और बृहदारण्यक के विषय और कथाएँ देखीं संक्षेप में, उनकी उपमाएँ और विद्याएँ समझीं, उनके ऋषियों की तीन चिन्तन-धाराओं को जाना और उनसे मिलने वाले जीवन-मूल्यों को देखा।
इस परिचय में एक बात बार-बार सामने आई कि एक ही उपनिषद्, यहाँ तक कि एक ही मन्त्र, से आचार्यों ने अलग-अलग अर्थ पाए। एक उदाहरण देखिए, जो मुण्डक (३.२.३) और कठ (१.२.२३) दोनों में आता है:
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥
अर्थात्: यह आत्मा जिसका वरण करता है, उसी के द्वारा प्राप्त होता है; उसके सामने यह अपने स्वरूप को प्रकट कर देता है। इस मन्त्र का अर्थ भी भाष्यकारों ने अपनी-अपनी दृष्टि से किया है। एक ही उपनिषद्-साहित्य से कई दार्शनिक परम्पराएँ कैसे निकलीं, यही हम अगले अंक में देखेंगे।
अगले भाग में — वेद क्या हैं? भाग ७C
- भाष्य-परम्परा और आचार्य-मत: अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैताद्वैत, द्वैत आदि परम्पराओं ने एक ही उपनिषद्-साहित्य का अर्थ किस प्रकार किया, और उनके मूल सिद्धान्त क्या हैं।
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सन्दर्भ ग्रन्थ:
- उपनिषत्सञ्चयनम् (हिन्दीभाषानुवादसहितम्—द्वितीयः खण्डः), अनुवादक: आचार्य केशवलाल वि. शास्त्री, चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली — भूमिका: वर्गीकरण, संख्या और टीकाएँ (पृ. ९–१२); उपासनाएँ (पृ. २३–२४); उपमाएँ और कथाएँ (पृ. २५–२६); चिन्तक और याज्ञवल्क्य (पृ. २७–३१); जीवन-मूल्य (पृ. ३१–३३); व्यापकता (पृ. ३८)।
ईशादि नौ उपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित) — गीताप्रेस, गोरखपुर (ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय एवं श्वेताश्वतर उपनिषद्)।
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित) — गीताप्रेस, गोरखपुर (उद्गीथ, आख्यायिकाएँ, शाण्डिल्य विद्या एवं तत्त्वमसि प्रसंग)।
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित) — गीताप्रेस, गोरखपुर (याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी संवाद, जनक सभा शास्त्रार्थ एवं नेति-नेति प्रसंग)।
कल्याण: उपनिषद्-अङ्क (विशेषाङ्क) — गीताप्रेस, गोरखपुर।
मुक्तिकोपनिषद् — चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी (१०८ उपनिषदों की नामावली एवं वर्गीकरण)।

Anupam Trivedi has spent over three decades studying and reflecting upon Sanatan scriptures, including the Vedas, Upanisads, Itihāsa, and Purāṇas. He writes on cultural philosophy and ancient literature to present traditional insights with accuracy and clarity. Read full bio →