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वेद क्या हैं? श्रृंखला के पिछले अंकों का संक्षिप्त सार:
- भाग १ (वेदों का स्वरूप एवं मर्यादा): वेदों का अनादि, अपौरुषेय और नारायण-स्वरूप वाङ्मय विग्रह। महर्षि वेदव्यास द्वारा चार भागों में विभाजन तथा वेद-अध्ययन हेतु यज्ञोपवीत, पात्रता, गुरु-मुख श्रवण और अनुशासन की अनिवार्यता।
- भाग २ (उपवेद, विद्याएँ और लक्ष्य): ३२ मुख्य विद्याओं, ६४ कलाओं एवं चार प्रमुख उपवेदों (आयुर्वेद, धनुर्वेद, गांधर्ववेद, स्थापत्य/अर्थशास्त्र) का व्यावहारिक महत्व तथा जीवन का चरम लक्ष्य—’पुरुषार्थ चतुष्टय’ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष)।
- भाग ३ (वैदिक वाङ्मय के चार स्तंभ): वैदिक वाङ्मय के चार प्रमुख चरण—(१) मन्त्र संहिता: मूल अपौरुषेय श्रुति, (२) ब्राह्मण ग्रन्थ: मन्त्रों का यज्ञीय विधान और व्यावहारिक प्रयोग (विनियोग), (३) आरण्यक: यज्ञों के अंतर्निहित आध्यात्मिक रहस्य, (४) उपनिषद्: जीव, जगत् और ब्रह्म के सत्य का साक्षात्कार कराने वाला ज्ञानकाण्ड (वेदान्त)।
- भाग ४ (वेदांग परिचय एवं महत्व): वेदों के शुद्ध उच्चारण, अर्थ-बोध और प्रयोग की रक्षा हेतु ऋषि-प्रणीत ६ वेदांग (वेद-पुरुष के अंग)—शिक्षा (नासिका/उच्चारण), छन्द (पाद), व्याकरण (मुख), निरुक्त (कर्ण/शब्दार्थ), ज्योतिष (नेत्र/काल-ज्ञान) और कल्प (हस्त/यज्ञ-विधि)।
- भाग ५ (आगम / तन्त्र शास्त्र और षड्दर्शन शास्त्र): वैदिक ज्ञान-परम्परा के दो महत्वपूर्ण आयाम—आगम / तन्त्र शास्त्र और षड्दर्शन शास्त्र (न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्वमीमांसा और वेदान्त) का मूल स्वरूप, विषय-वस्तु और वैदिक परंपरा में स्थान।
- भाग ६ (पुराण, इतिहास और धर्मशास्त्र): श्रुति के गूढ़ तत्वों को जन-सामान्य तक पहुँचाने वाले स्मृति-प्रस्थान के अंतर्गत १८ महापुराण, उपपुराण, इतिहास ग्रन्थ (रामायण व महाभारत) और सामाजिक-नैतिक आचरण का विधान करने वाले २० प्रमुख धर्मशास्त्र (स्मृतियाँ)। इसके साथ वैदिक शब्दावली का परिचय-क्रम पूर्ण हुआ।
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‘वेद क्या हैं?’ शृंखला के भाग ३ से ६ तक हमने वैदिक शब्दावली को क्रम से समझा – संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, वेदांग, षड्दर्शन, आगम-तन्त्र, इतिहास, पुराण और धर्मशास्त्र। भाग ६ में यह आधारभूत परिचय पूर्ण हुआ, और वहीं यह भी कहा गया था कि उपनिषद्, वेदांग और दर्शन-शास्त्र में से प्रत्येक विषय पर आगे पृथक् और विस्तृत चर्चा होगी। इस भाग ७A से उसी क्रम का आरम्भ होता है, और पहला विषय है – उपनिषद्।
भाग ३ में उपनिषद् का परिचय केवल कुछ पंक्तियों में दिया गया था। विषय इतना गम्भीर है कि वह कुछ अनुच्छेदों में समाता नहीं। इसलिए इस भाग ७A से आगे के कई अंक उपनिषदों को ही समर्पित रहेंगे – उनका अर्थ, संख्या, शाखाएँ, मुख्य उपनिषद्, सिद्धान्त और भाष्य-परम्परा।
एक बात पहले ही स्पष्ट कर देनी आवश्यक है। उपनिषद् की चर्चा प्रायः पाठक को कठिन लगती है, और इसका कारण केवल विषय की गहराई नहीं, शब्दों की उलझन भी है। ‘वेदांग’ और ‘वेदान्त’ सुनने में लगभग एक जैसे हैं, जबकि दोनों का अर्थ सर्वथा भिन्न है। ‘वेदान्त’ शब्द कभी उपनिषदों के लिए आता है, कभी उन पर आधारित दर्शन के लिए; और जिस दर्शन को वेदान्त कहते हैं, उसी को षड्दर्शन में ‘उत्तर मीमांसा’ भी कहा जाता है। इस प्रकार एक ही विषय के लिए तीन-चार नाम सुनकर पाठक उपनिषद् का वास्तविक विषय समझने से पहले ही भ्रमित हो जाता है। अतः इस भाग में हम सबसे पहले इन नामों की उलझन दूर करेंगे, तब उपनिषद् के अर्थ और विषय में प्रवेश करेंगे।
वैदिक शब्दावली – वेदांग, वेदान्त, उत्तर मीमांसा और उपनिषद्: नामों का भ्रम
पहले चारों शब्दों को अलग-अलग देखिए:
- वेदांग: वेद-पुरुष के छह अंग—शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष। भाग ४ में हमने देखा था कि ये वेद-मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण, अर्थ-बोध और यज्ञ-काल के निर्णय में सहायक हैं। ये ज्ञान के साधन हैं, स्वयं कोई अन्तिम सिद्धान्त नहीं।
- उपनिषद्: वेद का ज्ञानकाण्ड। वे ग्रन्थ, जिनमें जीव, जगत् और ब्रह्म के स्वरूप का विचार है।
- वेदान्त: शब्दार्थ है ‘वेद का अन्त’। उपनिषद् वेद के अन्तिम भाग हैं और वेद का निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं, इसलिए उन्हें ही वेदान्त कहा गया। आगे चलकर उपनिषदों का अर्थ निर्णय करने वाले ब्रह्मसूत्र को भी, और उस पर आधारित सम्पूर्ण दर्शन को भी, ‘वेदान्त’ कहा जाने लगा।
- उत्तर मीमांसा: षड्दर्शन में छठा दर्शन, जो वेदान्त दर्शन का ही दूसरा नाम है।

‘उत्तर मीमांसा’ नाम का अर्थ समझने के लिए ‘पूर्व मीमांसा’ को भी जानना होगा। ‘मीमांसा’ का अर्थ है किसी गम्भीर विषय का तर्कपूर्वक विचार । वेद के दो भाग माने गए हैं। पूर्व भाग (संहिता और ब्राह्मण, अर्थात् कर्मकाण्ड) पर महर्षि जैमिनि ने विचार किया, जिसे पूर्व मीमांसा कहते हैं; उसका प्रथम सूत्र है “अथातो धर्मजिज्ञासा”। उत्तर भाग (उपनिषद्, अर्थात् ज्ञानकाण्ड) पर महर्षि बादरायण व्यास ने विचार किया, जिसे उत्तर मीमांसा या ब्रह्ममीमांसा कहते हैं; उसका प्रथम सूत्र है “अथातो ब्रह्मजिज्ञासा”।
इस पूरे क्रम को एक वाक्य में कहें तो: उपनिषद् वेद के अन्तिम भाग हैं, इसीलिए वेदान्त कहलाते हैं; इन उपनिषदों के वचनों को क्रमबद्ध और तर्कसंगत रूप महर्षि व्यास ने ब्रह्मसूत्र में दिया, जिसे उत्तर मीमांसा या वेदान्त दर्शन कहते हैं। अतः जहाँ ‘वेदान्त’ शब्द आए, वहाँ प्रसंग से देखना चाहिए कि उपनिषदों की बात हो रही है या उन पर आधारित दर्शन की। वेदान्त संज्ञा मूलतः उपनिषदों की है, और ब्रह्मसूत्र को भी उसी नाम से कहा जाता है।
उपनिषद् क्या है? पूज्य आचार्यों के अनुसार विभिन्न अभिव्यक्तियाँ
उपनिषद्’ शब्द का अर्थ
‘उपनिषद्’ शब्द तीन अंशों से बना है—उप (समीप), नि (निष्ठापूर्वक, निश्चयपूर्वक) और षद् (बैठना)। सामान्य अर्थ है—गुरु के समीप निष्ठापूर्वक बैठकर प्राप्त किया जाने वाला ज्ञान। भाग १ में हमने देखा था कि वेद-अध्ययन गुरु-मुख से श्रवण और पात्रता पर आधारित है; ‘उपनिषद्’ शब्द में वही परम्परा निहित है। यह ज्ञान पुस्तक पढ़कर नहीं, गुरु के समीप बैठकर प्राप्त किया जाता था।

आचार्यों की परिभाषाएँ
उपनिषद् विषय अत्यंत सूक्ष्म और अतींद्रिय होने के कारण सनातन परंपरा के महान आचार्यों और पीठाधीश्वरों ने इसे भिन्न-भिन्न भावों, दृष्टियों और अनुभूतियों से परिभाषित किया है। :
मुण्डकोपनिषद् (२.२.३) में उपनिषद् को ही साधक का ‘महान् अस्त्र’ कहा गया है:
धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं शरं ह्युपासानिशितं सन्धयीत।
आयम्य तद्भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि॥
अर्थात्: उपनिषद्-रूप महान् अस्त्र धनुष को लेकर उस पर उपासना से तीक्ष्ण किया हुआ बाण चढ़ाए; फिर चित्त को ब्रह्म के भाव में लगाकर उसे खींचे, और हे सोम्य! उसी अविनाशी ब्रह्म को लक्ष्य जान।
उपनिषद् अध्यात्मविद्या अथवा ब्रह्मविद्या को कहते हैं। वेद का अन्तिम भाग होने से इसे वेदान्त भी कहा जाता है और वेदान्तसम्बन्धी श्रुति-संग्रह-ग्रन्थों के लिये भी उपनिषच्छब्द का प्रयोग होता है।
उपनिषद् वेद का ज्ञानकाण्ड है। यह चिरप्रदीप्त वह ज्ञानदीपक है जो सृष्टि के आदि से प्रकाश देता चला आ रहा है और लयपर्यन्त पूर्ववत् प्रकाशित रहेगा। इसके प्रकाश में वह अमरत्व है, जिसने सनातनधर्म के मूल का सिञ्चन किया है। यह जगत्कल्याणकारी भारत की अपनी निधि है; जिसके सम्मुख विश्व का प्रत्येक स्वाभिमानी सभ्य राष्ट्र श्रद्धा से नतमस्तक रहा है और सदा रहेगा। अपौरुषेय वेद का अन्तिम अध्यायरूप यह उपनिषद् ज्ञान का आदिस्रोत और विद्या का अक्षय भण्डार है। –
-पूज्य श्रीमज्जगद्गुरु श्रीशङ्कराचार्य अनन्तश्रीविभूषित श्रीमज्ज्योतिर्पीठाधीश्वर स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज
प्राणियोंके बाह्य अर्थोंका प्रकाश करनेवाली तथा नाना प्रकारसे उपकार करनेवाली अनेक विद्याएँ हैं; परंतु परम पुरुषार्थको प्रकाशित करनेवाली, परमार्थको दिखलानेवाली तथा परम उपकारिणी विद्या उपनिषद् है। जिससे तत्त्व-जिज्ञासु पुरुषों को परम शान्ति प्राप्त होती है, वह परमार्थ कहलाता है। क्लेशग्रस्त जीवों के समस्त क्लेशों का निवारण जिससे हो, वह परम उपकार कहलाता है।
– श्री काञ्ची कामकोटि पीठाधीश्वर अनंतश्री विभूषित श्रीमद श्रीमज्जगद्गुरु श्री शंकराचार्य जी महाराज
वेद शब्द का अर्थ ज्ञान है। वेद-पुरुष के शिरोभाग को उपनिषद् कहते हैं। ‘उप’ (व्यवधानरहित सामीप्य), ‘नि’ (सम्पूर्ण/निश्चयपूर्वक) और ‘षद्’ (विशरण, गति और अवसादन अर्थात् अज्ञान का नाश, ब्रह्म की प्राप्ति और दुःखों की आत्यंतिक शांति) ही इसके अवयवार्थ हैं। अर्थात् वह सर्वोत्तम ज्ञान जो ज्ञेय से अभिन्न एवं देश, काल, वस्तु के परिच्छेद से रहित परिपूर्ण ब्रह्म है, ‘उपनिषद्’ पद का अभिप्रेत अर्थ है। इसलिये जब तक ज्ञान के स्वरूप का ठीक-ठीक विचार न कर लिया जायगा, तब तक उपनिषद् क्या हैं, यह बात स्पष्ट नहीं हो सकेगी। सम्पूर्ण वेद तीन भागों में विभक्त हैं—उपनिषद्भाग, मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग। उपनिषद्भाग वेद के ज्ञानकाण्ड का प्रकाशक है।
– प्रातःस्मरणीय स्वामी श्री अखण्डानन्द सरस्वती जी महाराज
प्रत्यक्-चैतन्याभिन्न परब्रह्म को प्राप्त अथवा व्यक्त कराने वाली, निःसन्धिबन्धनात्मिका चिज्जड़ग्रन्थिस्वरूपा अविद्या को शिथिल करने वाली, अविचारितरमणीय नामरूप-क्रियात्मक मायामय विश्वप्रपञ्च का समूलोन्मूलन करके जीव की ब्रह्मात्मता को बोधित करने वाली ब्रह्मविद्या ही उपनिषद् है। उसके उत्पादक एवं व्यञ्जक होने से ईशावास्य, केन, कठ आदि मन्त्र-ब्राह्मण वेदशीर्ष ग्रन्थ भी उपनिषत्पदवाच्य होते हैं। अतएव मन्त्र एवं ब्राह्मण उभयस्वरूप वेदशीर्ष उपनिषद् हैं और वे सब-के-सब ही अनादि अविच्छिन्न सम्प्रदाय-परम्परा प्राप्त तथा अस्मर्यमाणकर्तृक होने से अपौरुषेय वेदस्वरूप ही हैं। (‘तुल्यं साम्प्रदायिकम्’ जै०सू०)
गद्यांश का सरल, संक्षिप्त और स्पष्ट हिंदी में अर्थ:
ब्रह्मविद्या ही वास्तविक उपनिषद् है। जो विद्या जीव और परब्रह्म की एकता का बोध कराती है, चेतन और जड़ को एक मान लेने की अविद्या-रूपी गाँठ को शिथिल करती है, और नाम-रूप-क्रिया वाले माया-रचित संसार के भ्रम को जड़ से मिटाकर जीव को उसके ब्रह्म-स्वरूप का बोध कराती है, वही वास्तव में ‘उपनिषद्’ है।
ग्रन्थों को भी उपनिषद् क्यों कहते हैं। ईशावास्य, केन, कठ आदि ग्रन्थ इस ब्रह्मविद्या को उत्पन्न और प्रकट करने के साधन हैं, इसलिए इन्हें भी ‘उपनिषद्’ कहा जाता है। ये वेद के शिरोभाग हैं और मन्त्र तथा ब्राह्मण दोनों रूपों में मिलते हैं।
वेद के समान अपौरुषेय। ये ग्रन्थ अनादि और अटूट गुरु-शिष्य परम्परा से चले आ रहे हैं, और इनके किसी मानव-रचयिता का स्मरण नहीं किया जाता। इसीलिए जैमिनि-सूत्र ‘तुल्यं साम्प्रदायिकम्’ के अनुसार ये भी वेद के समान ही अपौरुषेय प्रमाण हैं।
— धर्मसम्राट पूज्यपाद स्वामी श्री करपात्री जी महाराज
इन परिभाषाओं का सार: ‘उपनिषद्’ शब्द दो अर्थों में प्रयुक्त होता है। मुख्य अर्थ में उपनिषद् वह ब्रह्मविद्या है, जो जीव और परब्रह्म की एकता का बोध कराकर अविद्या की गाँठ को शिथिल करती है। गौण अर्थ में ईश, केन, कठ आदि ग्रन्थ भी उपनिषद् कहलाते हैं, क्योंकि वे उसी विद्या को प्रकट करने का साधन हैं।
उपनिषद् क्या कहते हैं?
परिभाषाओं के बाद यह देखना उपयोगी होगा कि उपनिषद् की शैली और विषय वास्तव में कैसे हैं। उपनिषदों का बड़ा भाग संवाद के रूप में है—गुरु और शिष्य के प्रश्न-उत्तर।
(क) कठोपनिषद्: नचिकेता और यमराज का संवाद
कठोपनिषद् में बालक नचिकेता यमराज के द्वार पर तीन दिन प्रतीक्षा करता है। प्रसन्न होकर यमराज उसे तीन वर माँगने को कहते हैं। तीसरे वर में नचिकेता वह प्रश्न पूछता है जो प्रत्येक मनुष्य के मन में कभी न कभी उठता है: मृत्यु के पश्चात् मनुष्य का क्या होता है? यमराज उसे इस प्रश्न से हटाने के लिए लम्बी आयु, अपार धन और भोग के साधन देने का प्रस्ताव रखते हैं, किन्तु नचिकेता अपने प्रश्न पर अडिग रहता है। तब यमराज उसे आत्मविद्या का उपदेश देते हैं, और उसी प्रसंग में यह मूल भेद बताते हैं:
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः। (कठोपनिषद् १.२.२)
अर्थात्: कल्याणकारी (श्रेय) और प्रिय लगने वाला (प्रेय)—ये दोनों मनुष्य के सामने आते हैं; धीर पुरुष दोनों को भली प्रकार विचार कर अलग-अलग पहचानता है।
इसी उपनिषद् का वह आह्वान भी प्रसिद्ध है: “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत” (१.३.१४)—उठो, जागो और श्रेष्ठ आचार्यों के समीप जाकर तत्त्व को जानो।

(ख) चार महावाक्य
चारों वेदों के उपनिषदों से चार वाक्य चुने गए हैं, जिन्हें महावाक्य कहा जाता है। इनमें उपनिषदों का सार निहित माना गया है:
- प्रज्ञानं ब्रह्म — ऋग्वेद, ऐतरेय उपनिषद् (३.३)
- अहं ब्रह्मास्मि — यजुर्वेद, बृहदारण्यक उपनिषद् (१.४.१०)
- तत्त्वमसि — सामवेद, छान्दोग्य उपनिषद् (६.८.७)
- अयमात्मा ब्रह्म — अथर्ववेद, माण्डूक्य उपनिषद् (१.२)
इन वाक्यों का अर्थ आगे के भागों में हम आचार्यों की व्याख्या के साथ देखेंगे; यहाँ इतना समझ लेना पर्याप्त है कि उपनिषदों का केन्द्रीय विषय आत्मा और ब्रह्म का सम्बन्ध है।

प्रस्थानत्रयी: वेदान्त के तीन आधार-ग्रन्थ और उनका माहात्म्य
वेदान्त के अध्ययन में तीन ग्रन्थों का नाम बार-बार आता है – उपनिषद्, श्रीमद्भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्र। इन्हें सामूहिक रूप से ‘प्रस्थानत्रयी’ कहा जाता है। यह नाम क्यों पड़ा, और ये तीनों इतने महत्त्वपूर्ण क्यों हैं?
‘प्रस्थान’ और ‘त्रयी’ का अर्थ। ‘प्रस्थान’ शब्द ‘प्र’ उपसर्ग और ‘स्था’ धातु से बना है। इसका अर्थ है प्रयाण, गमन, अर्थात् वह मार्ग जिस पर चलकर साधक परम लक्ष्य – ब्रह्मज्ञान और मोक्ष – की ओर बढ़ता है। वेदान्त में ऐसे तीन प्रामाणिक मार्ग माने गए हैं, इसीलिए इन्हें ‘प्रस्थान-त्रय’ कहा गया। ये तीनों ज्ञान के तीन आधारों के अनुरूप हैं: श्रुति (वेद का स्वयं-प्रमाण वचन), स्मृति (उस वचन का आचरण-योग्य उपदेश) और न्याय (तर्क)।
- श्रुति प्रस्थान – उपनिषद्: वेद का ज्ञानकाण्ड होने से उपनिषद् सर्वोच्च प्रमाण हैं। यह मूल ज्ञान है, जिसका उपदेश ऋषियों ने गुरु-शिष्य परम्परा से दिया।
- स्मृति प्रस्थान – श्रीमद्भगवद्गीता: महाभारत के भीष्मपर्व (अध्याय २५ से ४२) में आने वाली, अठारह अध्यायों और सात सौ श्लोकों की गीता वेदान्त का स्मृति-प्रस्थान है।
- न्याय प्रस्थान — ब्रह्मसूत्र: महर्षि बादरायण व्यास का ग्रन्थ, जिसके चार अध्यायों के नाम हैं – समन्वय, अविरोध, साधन और फल। पहले अध्याय में उपनिषद्-वाक्यों का ब्रह्म में समन्वय किया गया है, दूसरे में अन्य मतों से उठने वाले विरोध का निराकरण, तीसरे में साधना का मार्ग और चौथे में फल (मोक्ष) का विवेचन।

गीता: वेदों और उपनिषदों का सार। गीता को ‘स्मृति’ कहा गया है, फिर भी वह स्वयं को उपनिषद् कहती है। गीता के प्रत्येक अध्याय के अन्त में यह पुष्पिका आती है:
“ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे…”
अर्थात् यह गीता-रूप उपनिषद् है, ब्रह्मविद्या है और योगशास्त्र है। इसी कारण इसे ‘गीतोपनिषद्’ भी कहा जाता है। श्रेणी की दृष्टि से गीता स्मृति-प्रस्थान में है, परन्तु विषय और भाव की दृष्टि से वह उपनिषद्-स्वरूप है।
उपनिषदों के साथ उसके सम्बन्ध को ध्यान-श्लोक इस प्रकार कहता है:
सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः। पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्॥
अर्थात्: समस्त उपनिषदें गायों के समान हैं, गोपालनन्दन श्रीकृष्ण दुहने वाले हैं, अर्जुन बछड़ा है, और गीता रूपी महान् अमृत-दुग्ध का पान करने वाले विद्वान् जन हैं।
वेदों के साथ उसके सम्बन्ध को भगवान श्रीकृष्ण स्वयं गीता (१५.१५) में कहते हैं: “वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्” – समस्त वेदों द्वारा जानने योग्य मैं ही हूँ, वेदान्त का कर्ता भी मैं हूँ और वेदों का जानने वाला भी मैं ही हूँ। आदि शंकराचार्य ने अपने गीता-भाष्य की भूमिका में गीता को “समस्तवेदार्थसारसंग्रहभूतम्” कहा है, अर्थात् सम्पूर्ण वेदों के अर्थ का सार-संग्रह।
तीनों का परस्पर सम्बन्ध। ये तीनों ग्रन्थ एक-दूसरे का उल्लेख भी करते हैं। गीता के तेरहवें अध्याय में भगवान कहते हैं:
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्। ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥
अर्थात्: यह तत्त्व ऋषियों ने अनेक प्रकार से, अलग-अलग वैदिक छन्दों में गाया है, और तर्कयुक्त तथा निश्चित अर्थ वाले ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा भी इसका निरूपण किया गया है। यहाँ ‘ऋषिभिर्बहुधा गीतं’ उपनिषदों की ओर संकेत है, और ‘ब्रह्मसूत्रपदैः’ ब्रह्मसूत्र की ओर। इस प्रकार प्रस्थानत्रयी एक ही सत्य को तीन रूपों में प्रस्तुत करती है: उपनिषद् उसका मूल कथन हैं, गीता उसे आचरण योग्य सरल रूप में कहती है, और ब्रह्मसूत्र तर्क से उसकी पुष्टि करता है।
प्रस्थानत्रयी का माहात्म्य।
वेदान्त की किसी भी परम्परा को प्रामाणिक सिद्ध करने के लिए इन्हीं तीनों पर भाष्य लिखना आवश्यक माना गया। वेदान्तसार की भूमिका (पृ. ९) में उल्लेख है कि प्रस्थानत्रयी के आद्य भाष्यकार आचार्य शंकर भगवत्पाद हैं। उनके पश्चात् रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, निम्बार्काचार्य, वल्लभाचार्य आदि ने भी इन्हीं तीनों पर अपने-अपने भाष्य लिखे। परम्परा में जिस आचार्य ने प्रस्थानत्रयी पर भाष्य लिखा, उसे वेदान्त-सम्प्रदाय का प्रवर्तक माना गया। इसका अर्थ यह है कि एक ही उपनिषद्-साहित्य से अनेक दार्शनिक परम्पराओं का उदय प्रस्थानत्रयी के माध्यम से ही हुआ।
गीता के माहात्म्य में यह श्लोक प्रसिद्ध है:
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रसंग्रहैः। या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता॥
अर्थात्: गीता का भली-भाँति गान (अध्ययन) करना चाहिए, जो स्वयं भगवान पद्मनाभ के मुखकमल से निकली है; फिर अन्य शास्त्रों के संग्रह से क्या प्रयोजन?
आत्मा और ब्रह्म: उपनिषदों का मूल विषय
उपनिषदों के सम्पूर्ण उपदेश के केन्द्र में दो शब्द हैं—आत्मा और ब्रह्म। उपनिषद् बार-बार यही प्रश्न उठाते हैं: मैं वास्तव में कौन हूँ, और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ है, वह क्या है? इन दोनों की पहचान ही उपनिषदों का मूल विषय है।
आत्मा स्वयंसिद्ध है। संसार की प्रत्येक वस्तु को सिद्ध करने के लिए प्रमाण चाहिए – आँख, कान, तर्क या कोई उपकरण। परन्तु अपनी आत्मा को सिद्ध करने के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं। ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं मिलेगा जो कहे “मैं नहीं हूँ।” जैसे उष्णता अग्नि का स्वभाव है और अग्नि उसका निराकरण नहीं कर सकती, वैसे ही अपने होने का निराकरण कोई नहीं कर सकता। बृहदारण्यक उपनिषद् में याज्ञवल्क्य जी का प्रश्न है: “विज्ञातारमरे केन विजानीयात्” – जो स्वयं सबका जानने वाला है, उसे किस साधन से जाना जाए?
ब्रह्म का स्वरूप। आत्मा के बाद प्रश्न आता है कि ब्रह्म क्या है। उपनिषद् और आचार्य ब्रह्म को दो प्रकार के लक्षणों से समझाते हैं:
- स्वरूप लक्षण (ब्रह्म का अपना स्वभाव): “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” (तैत्तिरीय उपनिषद् २.१.१) तथा “विज्ञानमानन्दं ब्रह्म” (बृहदारण्यक उपनिषद् ३.९.२८)। इसी से ब्रह्म को सच्चिदानन्द (सत्, चित्, आनन्द) कहा जाता है।
- तटस्थ लक्षण (जगत् के सम्बन्ध में ब्रह्म का कार्य): ब्रह्मसूत्र (१.१.२) में यह “जन्माद्यस्य यतः” कहा गया है, अर्थात् जिससे इस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लय होती है, वही ब्रह्म है।
मिट्टी और घड़े का दृष्टान्त। छान्दोग्य उपनिषद् के छठे अध्याय में उद्दालक आरुणि का पुत्र श्वेतकेतु बारह वर्ष गुरुकुल में अध्ययन करके लौटता है और स्वयं को बड़ा विद्वान् समझने लगता है। पिता उससे पूछते हैं—”क्या तूने गुरु से उस आदेश (उपदेश) के विषय में पूछा था, जिससे अश्रुत भी श्रुत हो जाता है, अमत भी मत और अविज्ञात भी विज्ञात हो जाता है?” (६.१.३) अर्थात् क्या तूने वह ज्ञान प्राप्त किया, जिसे जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है?
श्वेतकेतु पूछता है कि वह उपदेश कैसा होता है। तब पिता मिट्टी का उदाहरण देते हैं:
यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृण्मयं विज्ञातं स्याद् वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्॥ (छान्दोग्य उपनिषद् ६.१.४)
अर्थात्: हे सोम्य! जैसे एक मिट्टी के पिण्ड को जान लेने से मिट्टी से बनी सभी वस्तुएँ जान ली जाती हैं – क्योंकि विकार (घड़ा, सुराही आदि रूप) केवल वाणी से व्यवहार में आने वाला नाम मात्र है; सत्य तो केवल मिट्टी है।
कुम्हार मिट्टी से अनेक पात्र बनाता है और हम उन्हें अलग-अलग नाम देते हैं, परन्तु घड़ा बनने से पहले भी मिट्टी थी, टूटने के बाद भी मिट्टी रहेगी। इसी प्रकार इस नाम-रूप वाले सम्पूर्ण जगत् के मूल कारण को जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है। उपनिषद् आगे (६.२.१) उस मूल कारण को ‘सत्’ कहता है, जिसे आचार्य ब्रह्म कहते हैं।
यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है कि ब्रह्म का जगत् से कारण-कार्य सम्बन्ध वास्तव में किस प्रकार का है, इस पर आचार्यों के मत भिन्न-भिन्न हैं। अद्वैत परम्परा के ग्रन्थ उसी दृष्टि से इसकी व्याख्या करते है। अन्य परम्पराएँ इसी दृष्टान्त का अर्थ अपनी प्रणाली से करती हैं। इन मतभेदों को हम आगे के भागों में, उनके मूल ग्रन्थों के साथ, विस्तार से देखेंगे।

ज्ञान से मुक्ति: गले में पहने हार का दृष्टान्त
उपनिषद् केवल जानकारी देने वाले ग्रन्थ नहीं हैं; उनका लक्ष्य मोक्ष है। यहाँ एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है: यदि आत्मा स्वभाव से ही नित्य और शुद्ध है, तो जीव बन्धन में क्यों प्रतीत होता है, और मुक्ति का वास्तविक अर्थ क्या है? वेदान्तसार (अद्वैत परम्परा) इसे एक सीधे दृष्टान्त से समझाता है:
एक व्यक्ति के गले में रत्नों का हार था, किन्तु वह इस बात को एकदम भूल गया और समझने लगा कि हार कहीं खो गया है। उसे पाने के लिए वह अहर्निश सब जगह खोजता फिरा। उसे व्याकुल देखकर एक दयालु व्यक्ति ने उसके पास आकर कहा—“अरे, रत्नहार तो तेरे गले में ही है।” यह सुनकर उसने गले पर हाथ रखा, हार मिल गया, और वह अत्यन्त प्रसन्न हो गया।
विचार कीजिए, क्या वह हार कभी खोया था? क्या किसी ने उसे नया हार दिया? नहीं। हार पहले भी उसी के पास था। वेदान्तसार के शब्दों का आशय है कि मुक्ति की स्थिति भी ऐसी ही है: जीव तो स्वभाव से ही मुक्त है, मुक्ति न उत्पन्न होती है, न कहीं से प्राप्त होती है। केवल इस तथ्य को भूलकर जीव उसे सब जगह खोजता फिरता है।
तब यह बोध होता कैसे है? उपनिषद् का उत्तर है—गुरु के उपदेश से। गुरु शिष्य को “तत्त्वमसि” जैसे वाक्यों का उपदेश देते हैं, और शिष्य श्रवण, मनन और निदिध्यासन (बृहदारण्यक उपनिषद् २.४.५) के द्वारा उस ज्ञान को अपना अनुभव बनाता है। यहाँ ‘उपनिषद्’ शब्द का वही अर्थ चरितार्थ होता है जिससे हमने आरम्भ किया था—गुरु के समीप निष्ठापूर्वक बैठकर प्राप्त होने वाला ज्ञान।

आज के समय में उपनिषद् की प्रासंगिकता
आज का मनुष्य भौतिक साधनों की दृष्टि से पहले से कहीं अधिक सम्पन्न है, फिर भी मानसिक अशान्ति, असन्तोष और अर्थहीनता की अनुभूति बढ़ती जा रही है। नचिकेता का प्रश्न – सब कुछ मिल जाने पर भी जो शेष रह जाता है, उसका उत्तर क्या है? – आज भी उतना ही जीवन्त है। उपनिषद् इन्हीं मूल प्रश्नों पर विचार करते हैं: मैं कौन हूँ, सुख स्थायी क्यों नहीं होता, और जो नहीं बदलता वह क्या है। इसलिए ये ग्रन्थ किसी एक सम्प्रदाय या काल के लिए नहीं, प्रत्येक जिज्ञासु मनुष्य के लिए हैं।
सारांश एवं आगामी भाग
इस भाग ७A में हमने सबसे पहले वेदांग, वेदान्त, उत्तर मीमांसा और उपनिषद् के नामों का भ्रम दूर किया। फिर ‘उपनिषद्’ शब्द का अर्थ और आचार्यों की परिभाषाएँ देखीं, कठोपनिषद् और महावाक्यों से उपनिषदों की शैली को समझा, प्रस्थानत्रयी का परिचय लिया, तथा आत्मा, ब्रह्म और मोक्ष के मूल विषय पर विचार किया।
उपनिषदों की यह यात्रा अभी आरम्भ हुई है। आगामी अंकों में हम इसे अधिक विस्तार से देखेंगे।
अगले अंक में — वेद क्या हैं? भाग ७B एवं उसके आगे
- उपनिषदों की संख्या और वर्गीकरण: वेदों की शाखाएँ तथा मुक्तिकोपनिषद् के अनुसार १०८ उपनिषदों का वर्गीकरण।
- प्रमुख उपनिषद्: ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य आदि का संक्षिप्त परिचय।
- भाष्य-परम्परा और आचार्य-मत: अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैताद्वैत, द्वैत आदि परम्पराओं ने एक ही उपनिषद्-साहित्य का अर्थ किस प्रकार किया, और उनके मूल सिद्धान्त क्या हैं।
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सन्दर्भ ग्रन्थ:
- वेदान्तसार (श्रीसदानन्दप्रणीत), ‘सारबोधिनी’ ‘विमला’ संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेत; व्याख्याकार: डॉ. गजाननशास्त्री मुसलगाँवकर; कृष्णदास संस्कृत ग्रन्थमाला १५; प्रकाशक: चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वाराणसी; भूमिका, पृ. ९–२१ (आत्मा की स्वयंसिद्धि: पृ. ९–१०; ब्रह्म के लक्षण: पृ. १०–११; मृत्तिका-घट दृष्टान्त: पृ. ११–१२; रत्नहार दृष्टान्त: पृ. २०–२१)।
- कल्याण: उपनिषद्-अङ्क, गीताप्रेस, गोरखपुर — [संस्करण एवं पृष्ठ-संख्या जोड़ें]।

Anupam Trivedi has spent over three decades studying and reflecting upon Sanatan scriptures, including the Vedas, Upanisads, Itihāsa, and Purāṇas. He writes on cultural philosophy and ancient literature to present traditional insights with accuracy and clarity. Read full bio →