माँ दुर्गा कौन हैं? भाग 4: महामाया का प्रपंच, गुणों का रहस्य और भगवती मायेश्वरी की शरण

पिछले भाग में हमने श्रीमद्देवीभागवत महापुराण के आधार पर नवरात्र-विधि और कुमारी-पूजन का शास्त्रीय विधान जाना, और यह भी देखा कि महामाया के प्रभाव से देवर्षि नारद सरोवर में स्नान करते ही सौभाग्यसुन्दरी बन गए, राजा तालध्वज की भार्या हुए, बीस पुत्रों की माता बने और युद्ध में सबका विनाश देखकर विलाप करने लगे।

पहला भाग पढ़ें: माँ दुर्गा कौन हैं? आदिशक्ति का वास्तविक स्वरूप, शास्त्रों के अनुसार

दूसरा भाग पढ़ें: माँ दुर्गा कौन हैं? मूल प्रकृति और उनके विविध स्वरूपों का रहस्य (भाग २)

तीसरा भाग पढ़ें: माँ दुर्गा कौन हैं? भाग 3: नवरात्र विधि, कुमारी-पूजन और महामाया का रहस्य

महामाया का प्रपंच, गुणों का रहस्य और भगवती मायेश्वरी की शरण

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण के षष्ठ स्कन्ध के सत्ताईसवें से इकतीसवें अध्याय तक का यह उत्तरार्ध वह स्थल है, जहाँ भ्रम और सत्य के बीच की दीवार गिरती है और जीव अपने मूल स्वरूप को पहचानता है। इस चौथे और अन्तिम भाग में हम देखेंगे कि भगवान विष्णु ने जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीया अवस्थाओं के दृष्टान्त से नारदजी का संशय किस प्रकार दूर किया; राजा तालध्वज को क्या उपदेश मिला और उन्होंने क्या निर्णय लिया; सत्त्व, रज और तम – इन तीनों गुणों का रहस्य क्या है; संसार कठपुतली की भाँति माया के अधीन कैसे नाचता है; और अन्त में माया की अधिष्ठात्री भगवती मायेश्वरी की शरण ही जीव को इस भवसागर से कैसे मुक्त करती है।

राजा तालध्वज का शोक और नारदजी की जिज्ञासा

उधर राजा तालध्वज अपनी प्रिय भार्या के वियोग में विलाप कर रहे थे, और इधर स्त्री-रूप से मुक्त होकर अपने वास्तविक स्वरूप में लौटे हुए नारदजी के मन में एक ही आश्चर्य घर कर गया था—सरोवर में उतरते ही उनका पूर्वज्ञान कैसे नष्ट हो गया? उन्होंने भगवान विष्णु के सम्मुख हाथ जोड़कर कहा—

“हे देवदेवेश! मैं जब इस सरोवर में उतरा, उसी क्षण मेरा पूर्वज्ञान लुप्त हो गया। स्त्री-देह पाकर मैं राजा तालध्वज की भार्या बन गया। मेरा मन तो वही था, फिर भी मैं अपने वास्तविक स्वरूप को भूल गया। मैंने अनेक भोग भोगे, परन्तु उस समय मुझे यह स्पष्ट बोध नहीं था कि मैं नारद हूँ। अब स्त्री-रूप में किए गए सभी कार्य मुझे स्मरण हो रहे हैं। हे रमाकान्त! इस विचित्र घटना का कारण कृपा करके बताइए।”

जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीया — भगवान विष्णु ने नारदजी का संशय कैसे दूर किया

भगवान विष्णु बोले—

“हे नारद! महामाया का यह विलास देखो। देहधारी प्राणियों की अनेक अवस्थाएँ होती हैं। जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीया—ये चार अवस्थाएँ कही गई हैं। फिर एक देह से दूसरी देह प्राप्त होने पर तुम्हें आश्चर्य क्यों होता है?”

भगवान ने आगे समझाया कि जब मनुष्य गहरी निद्रा में होता है, तब वह न देखता है, न सुनता है और न बोलता है; उसे अपने आस-पास की घटनाओं का कोई ज्ञान नहीं रहता। परन्तु जागने पर वही मनुष्य फिर अपने परिचित संसार को पहचानने लगता है।

स्वप्न में भी ऐसा ही होता है। निद्रा के कारण चित्त विचलित हो जाता है और मन में अनेक प्रकार के दृश्य तथा भाव उत्पन्न होते हैं। कोई स्वप्न में देखता है कि एक हाथी उसे मारने के लिए दौड़ा चला आ रहा है; वह भागना चाहता है, परन्तु भाग नहीं पाता। उस समय उसे भय वास्तविक लगता है, और यह निश्चय नहीं रहता कि वह केवल स्वप्न देख रहा है।

कभी कोई मनुष्य स्वप्न में अपने मृत पितामह को घर लौटकर आया हुआ देखता है। वह उनके साथ बैठता है, बातें करता है और भोजन भी करता है। स्वप्न के भीतर यह सब उसे सत्य प्रतीत होता है, परन्तु जागने पर उसे ज्ञात होता है कि वे दृश्य स्वप्न में ही दिखाई दिए थे। तब वह दूसरों को भी उस स्वप्न की बात विस्तार से सुनाता है।

“हे नारद! स्वप्न देखते समय मनुष्य को प्रायः यह ज्ञान नहीं रहता कि वह भ्रम में है; जागने पर ही वह स्वप्न की स्थिति को समझता है। महामाया का प्रभाव भी इसी प्रकार अत्यन्त दुर्जेय है। उसके प्रभाव से जीव एक अवस्था को सत्य मानकर उसी में रम जाता है, और दूसरी अवस्था में पहुँचने पर ही पूर्व स्थिति का ज्ञान प्राप्त करता है।

माया के गुणों का सम्पूर्ण रहस्य न तुम पूरी तरह जानते हो, न शिव और न ब्रह्मा। फिर सामान्य बुद्धि वाला मनुष्य माया के इस दुर्गम प्रभाव को कैसे जान सकता है? यह सम्पूर्ण स्थावर-जंगम जगत तीनों गुणों से बना है; गुणों के बिना संसार में किसी देहधारी का अस्तित्व नहीं है। मैं स्वयं सत्त्वप्रधान कहा जाता हूँ, फिर भी रज और तम से सर्वथा रहित नहीं हूँ। ब्रह्माजी में रजोगुण की प्रधानता बताई गई है और शिवजी में तमोगुण की; फिर भी वे दोनों तीनों गुणों के प्रभाव से सर्वथा अलग नहीं हैं।

इसलिए हे मुने! इस संसार में मोह नहीं करना चाहिए। माया से निर्मित यह संसार अत्यन्त विस्तृत और दुर्गम है। तुम स्वयं माया को देख चुके हो और उसके भीतर अनेक भोग भी भोग चुके हो; अब उसके अद्भुत चरित्र के विषय में और क्या पूछते हो?”

अर्थात् भगवान ने नारदजी के अपने अनुभव को ही प्रमाण बना दिया। नारदजी जानते थे कि वे कौन हैं, फिर भी एक नई देह और नई परिस्थिति में पहुँचकर वे अपना पूर्वज्ञान भूल गए। जिस प्रकार स्वप्न के दृश्य उस समय वास्तविक लगते हैं, उसी प्रकार माया के प्रभाव में जीव अपने वर्तमान सम्बन्धों और अनुभवों को ही सम्पूर्ण सत्य मान बैठता है।

राजा तालध्वज को भगवान विष्णु का उपदेश – शोक छोड़कर आत्मसाधना करो

राजा तालध्वज उस समय भी पत्नी के वियोग में विलाप कर रहे थे। तब भगवान विष्णु ने उन्हें समझाते हुए कहा—

“हे राजेन्द्र! तुम क्यों शोक कर रहे हो? तुम्हारी प्रिय पत्नी कहाँ चली गई—इस बात को लेकर इतना दुःख क्यों करते हो? क्या तुमने शास्त्रों का अध्ययन नहीं किया और विद्वानों का आश्रय नहीं लिया? वह कौन थी, तुम कौन हो, और तुम्हारा संयोग तथा वियोग किस प्रकार हुआ—इस पर विचार करो।

यह संसार प्रवाह के समान है। इसमें मनुष्यों का मिलना और बिछुड़ना दैव के अधीन है। जैसे नदी के प्रवाह में नौका पर बैठे हुए लोग कुछ समय साथ रहते हैं और फिर अलग हो जाते हैं, वैसे ही संसार में सम्बन्ध बनते और समाप्त होते रहते हैं।

हे नृपश्रेष्ठ! अपने घर जाओ। रोने से क्या लाभ होगा? तुमने उस सुन्दरी को सरोवर के समीप अनायास पाया था; तुम उसके माता-पिता को भी नहीं जानते थे। वह जिस प्रकार तुम्हारे जीवन में आई, उसी प्रकार चली गई। काल का विधान टाला नहीं जा सकता।

भोग समय के अनुसार प्राप्त होते हैं और समय आने पर चले भी जाते हैं। सुख और दुःख किसी एक स्थान पर सदा नहीं टिकते; घटीयन्त्र (रहट) के घूमने की भाँति मनुष्य के जीवन में भी सुख-दुःख आते-जाते रहते हैं।

इसलिए मन को स्थिर करो। अपने राज्य में लौटकर राजकाज करो, अथवा राज्य अपने पौत्र को सौंपकर वन में चले जाओ। मनुष्य-देह दुर्लभ भी है और क्षणभंगुर भी; इसे पाकर आत्मसाधना करनी चाहिए। जिह्वा और जननेन्द्रिय के सुख तो पशु-योनि में भी उपलब्ध हैं, परन्तु ज्ञान प्राप्त करने की विशेष सम्भावना मनुष्य-देह में ही है।

अतः पत्नी के वियोग से उत्पन्न शोक को त्याग दो। यह भगवती की माया है, जिसके प्रभाव से सम्पूर्ण जगत मोहित हो रहा है।”

भगवान विष्णु के वचन सुनकर राजा तालध्वज ने उन्हें प्रणाम किया और स्नान-विधि पूरी करके अपने नगर लौट गए। वहाँ उन्होंने अपने पौत्र को राज्य सौंप दिया, संसार से वैराग्य ग्रहण किया और वन की ओर चले गए, जहाँ उन्हें तत्त्वज्ञान की प्राप्ति हुई।

इस प्रकार राजा तालध्वज की कथा भी केवल पत्नी-वियोग का प्रसंग बनकर समाप्त नहीं हुई। भगवान के उपदेश से उनका मोह दूर हुआ और वे मनुष्य-जीवन के वास्तविक उद्देश्य की ओर अग्रसर हुए।

नारदजी की स्वीकारोक्ति – अब मुझे माया का बल ज्ञात हो गया

राजा तालध्वज के चले जाने पर नारदजी ने भगवान विष्णु से कहा—

“हे देव! आपने मुझे माया के प्रभाव से मोहित कर दिया था। अब मैं जान गया हूँ कि माया का बल कितना महान् है। स्त्री-देह में मैंने जो कुछ किया, वह सब मुझे स्मरण हो रहा है। उस समय मुझे अपने नारद होने का ज्ञान नहीं था, परन्तु अब मैं उन सभी घटनाओं को स्पष्ट रूप से याद कर रहा हूँ।”

भगवान विष्णु ने स्पष्ट किया कि तीनों गुणों के प्रभाव से कोई भी देहधारी पूरी तरह अलग नहीं है, इसीलिए अपने ज्ञान का गर्व करके यह कहना उचित नहीं कि मैंने माया को पूरी तरह जीत लिया है। नारदजी ने अपनी भूल को समझा, और उनका अपना अनुभव ही इस बात का उदाहरण बन गया कि माया का प्रभाव कितना सूक्ष्म और व्यापक है।

नारदजी का अनुभव – माया केवल अज्ञानियों को ही नहीं बाँधती

नारदजी ने भगवान विष्णु के सम्मुख अपना अनुभव स्वीकार कर लिया। वे समझ गए कि केवल शास्त्रों का ज्ञान, तपस्या, योग और इन्द्रिय-संयम के बल पर कोई यह दावा नहीं कर सकता कि उसने महामाया को जीत लिया है।

जिन नारदजी के मन में पहले यह गर्व था कि उन्होंने इन्द्रियों, क्रोध और माया पर विजय पा ली है, वही थोड़े ही समय में अपनी पूर्व पहचान भूल गए। उन्हें अपने ब्रह्मविद्या के ज्ञान, तपस्वी जीवन और भगवान विष्णु से अपने सम्बन्ध का स्मरण तक नहीं रहा।

इस अनुभव से स्पष्ट है कि मोह में पड़ने पर मनुष्य अपने वर्तमान सम्बन्धों को ही सत्य और स्थायी मानने लगता है। वह अपने परिवार, प्रतिष्ठा, सुख और दुःख को ही अपनी सम्पूर्ण पहचान बना लेता है। माया का प्रभाव केवल किसी बाह्य वस्तु का आकर्षण नहीं है; वह जीव की स्मृति, विचार और ‘मैं’ तथा ‘मेरा’ की भावना को भी ढक लेती है।

स्त्री-रूप में बीते उन वर्षों में नारदजी के साथ यही हुआ। वे राजा की पत्नी बनीं, पुत्रों की माता बनीं, और अपने परिवार के सुख-दुःख में इस प्रकार डूब गईं कि उन्हें अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान नहीं रहा।

भगवान विष्णु ने पहले ही कहा था कि माया त्रिगुणात्मिका है, सर्वव्यापिनी है, और देहधारी जीव उसके अधीन रहते हैं। नारदजी की कथा उसी कथन का प्रत्यक्ष अनुभव बन गई।

नारदजी का व्यासजी को उपदेश – कर्मफल और शोक

नारदजी ने महर्षि व्यास को भी माया और कर्म के विषय में इसी प्रकार समझाया। उस समय व्यासजी कौरवों के विनाश से उत्पन्न शोक और मोह में डूबे हुए थे। नारदजी ने उनसे कहा कि शुभ और अशुभ कर्मों का फल प्रत्येक प्राणी को भोगना ही पड़ता है; यही कर्म का अटल विधान है। इसलिए संसार की घटनाओं से उत्पन्न शोक में डूबे रहने के स्थान पर मनुष्य को सत्य को समझकर अपने कर्तव्य में स्थित होना चाहिए।

नारदजी ने यह भी बताया कि सम्पूर्ण संसार माया के प्रभाव में है। जब जीव अपने सम्बन्धों और अनुभवों को स्थायी मान लेता है, तब उनके नष्ट होने पर वह शोक करता है; परन्तु इस संसार में संयोग और वियोग का क्रम निरन्तर चलता ही रहता है।

नारदजी के वचन सुनकर व्यासजी ने उनके उपदेश पर विचार किया। इसके पश्चात् नारदजी वहाँ से चले गए। व्यासजी सरस्वती नदी के तट पर ही रहे और सारस्वत कल्प में समय व्यतीत करने के लिए उन्होंने भागवत की रचना की। व्यासजी बताते हैं कि यह पुराण अनेक आख्यानों से युक्त है और वेद-प्रामाण्य पर आधारित है। इसके पश्चात् वे माया और तीनों गुणों के प्रभाव का रहस्य समझाते हैं।

तीनों गुणों का रहस्य सत्त्व, रज और तम

व्यासजी कहते हैं कि इस विषय में किसी प्रकार का सन्देह नहीं करना चाहिए कि देहधारी जीव माया के अधीन हैं। इसी माया से तीनों गुण उत्पन्न होते हैं, और इनके स्वभाव अलग-अलग हैं—शान्त, घोर और मूढ़। संसार के प्राणियों के व्यवहार और अनुभवों पर इन्हीं सत्त्व, रज और तम का प्रभाव रहता है।

जैसे धागों के बिना वस्त्र नहीं बन सकता और मिट्टी के बिना घड़ा नहीं बन सकता, वैसे ही इन गुणों के बिना देहधारी संसार की कल्पना नहीं की जा सकती। देवता, मनुष्य और अन्य सभी प्राणी इन गुणों से पूरी तरह अलग नहीं हैं।

सत्त्वगुण

सत्त्व की प्रधानता होने पर मन शान्त और स्थिर रहता है; ज्ञान, प्रसन्नता, प्रीति और समभाव का विकास होता है। व्यासजी बताते हैं कि जब ब्रह्माजी में सत्त्वगुण की प्रधानता होती है, तब वे शान्त, समाधिस्थ, ज्ञानयुक्त और सभी प्राणियों के प्रति प्रीतिसम्पन्न होते हैं।

रजोगुण

रजोगुण की प्रधानता होने पर चंचलता, क्रिया, आकांक्षा और असन्तोष बढ़ते हैं। इस अवस्था में देवताओं के स्वरूप में भी घोरता और अप्रसन्नता का वर्णन मिलता है।

तमोगुण

तमोगुण की प्रधानता होने पर मोह, विषाद और मूढ़ता का प्रभाव दिखाई देता है। जीव वास्तविक स्थिति को ठीक प्रकार से नहीं समझ पाता और भ्रम में पड़ जाता है।

भगवान विष्णु और रुद्र के विषय में भी इसी प्रकार तीनों गुणों के प्रभाव से भिन्न-भिन्न अवस्थाओं का वर्णन किया गया है। जब ब्रह्मा, विष्णु और शिव के प्रसंग में भी गुणों की अवस्थाओं का उल्लेख है, तब सूर्यवंश, चन्द्रवंश, मनुओं, देवताओं, असुरों और मनुष्यों की तो बात ही क्या है? यह सम्पूर्ण संसार माया और उसके गुणों के अधीन है।

नारदजी के अपने जीवन में गुणों के इसी प्रभाव का उदाहरण सामने आ चुका है। वे अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर पत्नी, माता और गृहस्थ के भाव में डूब गए थे। जिस प्रकार माया जीव को उसके स्वरूप से विमुख कर देती है, उसी प्रकार गुणों के प्रभाव से मन में भिन्न-भिन्न वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। अर्थात् जीव को अपने मन, बुद्धि और व्यवहार की अवस्थाओं को समझना चाहिए; गुणों के प्रभाव से उत्पन्न भावों को ही अपना स्थायी स्वरूप मान लेना मोह का कारण है।

संसार कठपुतली की भाँति माया के अधीन है

व्यासजी कठपुतली का दृष्टान्त देकर माया की इस शक्ति को समझाते हैं। जिस प्रकार कोई बाजीगर हाथ में काठ की पुतली लेकर उसे अपनी इच्छा के अनुसार नचाता है, उसी प्रकार माया सम्पूर्ण स्थावर-जंगम जगत को नचाती है। ब्रह्मा से लेकर तिनके तक, देवता, असुर और मनुष्य—सभी इन्द्रियों तथा मन के प्रभाव में रहते हैं, और संसार के प्रत्येक कार्य के पीछे तीनों गुणों का प्रभाव रहता है।

जीव अपने मन और शरीर की गतिविधियों को ही अपना सम्पूर्ण स्वरूप मान बैठता है। वह अपनी इच्छाओं, कर्मों और सम्बन्धों में उलझ जाता है। उसे लगता है कि वह सब कुछ अपने नियन्त्रण से कर रहा है, परन्तु प्रकृति के गुण, कर्म और काल उसके जीवन को निरन्तर प्रभावित करते रहते हैं। यही माया का खेल है।

महामाया की अधिष्ठात्री कौन हैं? — भगवती मायेश्वरी

यदि सम्पूर्ण संसार माया से मोहित है, यदि तीनों गुण जीव को बाँधते हैं और यदि देहधारी अपने बल से माया को जीत नहीं सकता, तो उससे मुक्ति का मार्ग क्या है?

व्यासजी इसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि सभी जीव माया के अधीन हैं। माया परम तत्त्व में स्थित रहती है और उसी की प्रेरणा से जीवों को प्रवृत्त करती है। परन्तु उस माया को अपने अधीन रखने वाली परमेश्वरी उससे परे हैं। वे ही सच्चिदानन्दरूपिणी भगवती मायेश्वरी हैं।

उनका ध्यान करना चाहिए, उनकी आराधना करनी चाहिए, उन्हें प्रणाम करना चाहिए और उनके मन्त्र का जप करना चाहिए। भगवती दयालु होकर साधक को मुक्त करती हैं; वे अपनी अनुभूति प्रदान करके जीव की माया का निवारण कर देती हैं।

पुराण में कहा गया है कि यह समस्त भुवन माया के समान है, और उसकी स्वामिनी होने के कारण देवी ‘भुवनेशी’ कहलाती हैं। वे त्रैलोक्यसुन्दरी हैं। जिस साधक का चित्त सदा उनके स्वरूप में लगा रहता है, वह सांसारिक माया के बन्धन से मुक्त होने का मार्ग प्राप्त करता है।

यहाँ भगवती का स्वरूप केवल संसार की इच्छाओं को पूर्ण करने वाली देवी तक सीमित नहीं रहता। वे उस महामाया की अधिष्ठात्री हैं, जिसके प्रभाव में समस्त जगत है; और वे ही जीव को उसके मोह से मुक्त करने वाली शक्ति हैं.

अन्धकार को अन्धकार से नहीं मिटाया जा सकता

भगवती मायेश्वरी के माहात्म्य को समझाने के लिए पुराण एक सरल दृष्टान्त देता है। अन्धकार को अन्धकार से दूर नहीं किया जा सकता; उसे हटाने के लिए प्रकाश चाहिए। सूर्य, चन्द्रमा, बिजली और अग्नि अपने प्रकाश से ही अन्धकार को दूर करते हैं।

इसी प्रकार माया से उत्पन्न अज्ञान को दूर करने के लिए भगवती मायेश्वरी की उपासना करनी चाहिए। वे सच्चिदानन्दरूपिणी हैं और अपने प्रकाश से जीव के मोह का निवारण करती हैं। पुराण के अनुसार मायिक गुणों से छुटकारा पाने के लिए भगवती की उपासना प्रेमपूर्वक करनी चाहिए। उनके ध्यान, पूजन, प्रणाम और जप के द्वारा साधक उनकी कृपा प्राप्त करता है, और भगवती अपनी अनुभूति प्रदान करके उसे माया के बन्धन से मुक्त कर देती हैं।

इस उपदेश में देवी की महिमा का सार निहित है। महामाया जगत को मोहित करती हैं, परन्तु मायेश्वरी भगवती उस माया की अधिष्ठात्री हैं। जिस माया को जीव अपने बल से जीतने का दावा करता है, उससे मुक्ति भगवती की कृपा और उपासना से ही सम्भव बताई गई है।

देवी-ज्ञान का रहस्य और पुराण का समापन

अन्त में व्यासजी कहते हैं कि श्रीमद्देवीभागवत महापुराण में देवी की महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है। यह पुराण अनेक कथाओं से युक्त है और शास्त्रीय प्रमाणों पर आधारित है।

वे कहते हैं कि महामाया का यह रहस्य प्रत्येक व्यक्ति को नहीं देना चाहिए। इसे उसी को बताना चाहिए जो शान्त हो, देवी-भक्ति में रत हो, योग्य शिष्य हो, ज्येष्ठ पुत्र हो अथवा गुरु के प्रति भक्ति रखने वाला हो। जो मनुष्य इस पुराण को परम भाव से पढ़ता है या भक्ति के साथ सुनता है, वह ज्ञानवान होता है और इस संसार में धन-सम्पन्नता भी प्राप्त करता है।

वर्तमान नवरात्र-उत्सव पर एक विचार

यह अंश पुराण का अनुवाद नहीं, बल्कि उसके पश्चात् की समकालीन टिप्पणी है।

नवरात्र का विधान पढ़ने के बाद आज के नवरात्र-उत्सवों पर भी विचार करना चाहिए। देवी-पूजा के नाम पर होने वाला हर आयोजन अपने-आप में शास्त्रसम्मत नहीं हो जाता। मण्डप कितना विशाल है, प्रतिमा कितनी ऊँची है, सजावट पर कितना धन खर्च हुआ है या कितने लोगों की भीड़ जुटी है—इनमें से कोई भी बात अपने-आप में पूजा की शुद्धता का प्रमाण नहीं है।

आज कई स्थानों पर देवी के नाम पर सड़कों और चौराहों को घेरकर विशाल पण्डाल बनाए जाते हैं। तेज ध्वनि-विस्तारक रात-दिन बजते हैं, यातायात बाधित होता है और सामान्य लोगों को आने-जाने में परेशानी होती है। गरबा और डांडिया के नाम पर कुछ आयोजनों में अनुशासन के स्थान पर अव्यवस्था, झगड़े और अनुचित आचरण दिखाई देता है। विसर्जन के समय मूर्तियों, पूजा-सामग्री और जलाशयों के प्रति असम्मानजनक व्यवहार भी देखने को मिलता है। यह प्रश्न पूछना अनुचित नहीं कि क्या यही देवी-उपासना का उद्देश्य है?

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण के नवरात्र-विधान में पूजा के लिए स्थान तैयार करने, वेदी बनाने, देवी की स्थापना, मन्त्रपूर्वक पूजन, व्रत, हवन और कुमारी-पूजन का विस्तार से वर्णन है। वहाँ साधक के नियम, पूजा की व्यवस्था और देवी के प्रति श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले अनुष्ठानों पर बल है। इस विधान को पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि नवरात्र केवल बाहरी प्रदर्शन का नाम नहीं है।

देवी की पूजा घर में हो या मन्दिर में, उसका आधार श्रद्धा, विधि और अनुशासन होना चाहिए। जब किसी आयोजन में सार्वजनिक व्यवस्था बनाई जाती है, तो उसके आयोजकों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। धार्मिक आयोजन के नाम पर दूसरों को कष्ट देना, रास्ते रोकना, ध्वनि-प्रदूषण फैलाना या उत्सव को झगड़े और अनुचित आचरण का अवसर बना देना देवी-भक्ति की गरिमा के अनुकूल नहीं है।

यहाँ एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए: प्रस्तुत अध्याय में सार्वजनिक पण्डालों पर सीधा निषेध नहीं दिया गया है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि इसी अध्याय ने सड़क या सार्वजनिक मैदान में पूजा को स्पष्ट रूप से निषिद्ध किया है। परन्तु अध्याय में दिए गए वास्तविक पूजा-विधान और आज के कुछ आयोजनों के आचरण की तुलना अवश्य की जा सकती है।

नवरात्र का अर्थ केवल नौ दिन तक शोर करना, विशाल प्रतिमा स्थापित करना और उत्सव की भव्यता दिखाना नहीं है। व्रत, पूजन, मन्त्र, हवन और कुमारी-पूजन जैसे अनुष्ठानों को समझना तथा मर्यादा के साथ करना भी आवश्यक है। यदि देवी के नाम पर आयोजित कार्यक्रम में ही अनुशासन, संयम और दूसरों के प्रति सम्मान न रहे, तो आयोजन की भव्यता उसके मूल उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर सकती। देवी-उपासना का मूल्य पण्डाल के आकार से नहीं, बल्कि पूजा की विधि, साधक के आचरण और श्रद्धा की सच्चाई से आँका जाना चाहिए।

(सार्वजनिक दुर्गापूजा और विशाल पण्डालों की परम्परा का ऐतिहासिक विकास भी समझना आवश्यक है। यह स्वरूप कब और कैसे विकसित हुआ, इसे जानने के लिए हमारा अलग लेख पढ़ें: “घर से सार्वजनिक पण्डालों तक: दुर्गापूजा का यह रूप कब शुरू हुआ?” [लिंक यहाँ जोड़ें])

निष्कर्ष

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण के इन अध्यायों में नवरात्र-व्रत और कुमारी-पूजन की विधि से लेकर महामाया की अद्भुत शक्ति तक का वर्णन मिलता है। नारदजी का अनुभव इस कथा का केन्द्रीय प्रसंग है। वे महान ज्ञानी होने पर भी माया के प्रभाव से अपना पूर्वस्वरूप भूल गए। जिन नारदजी को अपने ज्ञान और इन्द्रिय-संयम पर गर्व था, वे एक क्षण में अपना स्वरूप भूलकर पति, पुत्र, पौत्र और गृहस्थ जीवन को ही अपना सर्वस्व मान बैठे और उनके नाश पर असहनीय शोक करने लगे। फिर भगवान विष्णु की कृपा से उनका वास्तविक स्वरूप प्रकट हुआ और उन्हें माया की शक्ति का प्रत्यक्ष अनुभव हुआ।

राजा तालध्वज का पत्नी-वियोग और पुत्रों के नाश पर विलाप संसार के संयोग-वियोग को सामने लाता है। भगवान विष्णु ने उन्हें समझाया कि मनुष्य-देह दुर्लभ और क्षणभंगुर है; उसे केवल भोगों में गँवाने के बजाय आत्मसाधना में लगाना चाहिए।

इसके पश्चात् तीनों गुणों का विवेचन और कठपुतली का दृष्टान्त यह समझाता है कि संसार किस प्रकार माया के प्रभाव में चलता है। अन्ततः पुराण भगवती मायेश्वरी की शरण की ओर ले जाता है। वही सच्चिदानन्दरूपिणी देवी माया की अधिष्ठात्री हैं, और उनकी कृपा से ही जीव मोह के बन्धन से मुक्त हो सकता है। संसार के गुणों और माया के प्रभाव को समझना आवश्यक है, परन्तु केवल समझ लेना ही पर्याप्त नहीं; माया की अधिष्ठात्री भगवती मायेश्वरी की शरण, ध्यान, पूजन और जप ही जीव को उस बन्धन से मुक्त करने वाला मार्ग बताया गया है।

इस प्रकार नवरात्र की पूजा-विधि और महामाया की कथा एक ही व्यापक विषय के दो पक्ष सामने रखती हैं – देवी की आराधना और उस माया का बोध, जिसके प्रभाव में संसार मोहित है।

महामाया जगत को मोहित करती हैं; मायेश्वरी भगवती उस माया की अधिष्ठात्री हैं। उनकी उपासना और कृपा ही जीव को मोह से मुक्ति की ओर ले जाती है।

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स्रोत: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण, तृतीय स्कन्ध, अध्याय 26; षष्ठ स्कन्ध, अध्याय 27–31।

 

 

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