माँ दुर्गा कौन हैं? भाग 3: नवरात्र विधि, कुमारी-पूजन और महामाया का रहस्य

पिछले दो भागों में हमने श्रीदेवी भागवत महापुराण के आधार पर माँ दुर्गा के वास्तविक स्वरूप, आदिशक्ति के रूप में उनकी सर्वोच्च सत्ता और उनके विविध दिव्य स्वरूपों को समझा।

पहला भाग पढ़ें: माँ दुर्गा का वास्तविक स्वरूप और आदिशक्ति का रहस्य

दूसरा भाग पढ़ें: मूल प्रकृति और भगवती के विविध स्वरूपों का रहस्य

नवरात्र विधि और कुमारी पूजन और महामाया का रहस्य

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण के तृतीय स्कन्ध के छब्बीसवें अध्याय में राजा जनमेजय ने व्यासजी से नवरात्र-व्रत की विधि और उसके फल के विषय में पूछा। इसके बाद षष्ठ स्कन्ध के सत्ताईसवें से इकतीसवें अध्याय तक नारदजी के माध्यम से महामाया की अद्भुत शक्ति, जीव का मोह, तीनों गुणों का प्रभाव और उन सबकी अधिष्ठात्री भगवती मायेश्वरी का माहात्म्य वर्णित है।

इन प्रसंगों में एक ओर नवरात्र विधि और कुमारी पूजन का विधान मिलता है, तो दूसरी ओर नारदजी जैसे ज्ञानी ऋषि को भी महामाया के प्रभाव में पड़कर अपना पूर्वस्वरूप भूलते हुए दिखाया गया है। यही कथा आगे चलकर यह समझाती है कि संसार में देह, सम्बन्ध, सुख-दुःख और अहंकार का बन्धन किस प्रकार जीव को अपने वश में कर लेता है और भगवती की कृपा से उससे मुक्ति कैसे मिलती है।

नवरात्र में क्या करना चाहिए? — जनमेजय और व्यासजी का संवाद

कथा के प्रारम्भ में राजा जनमेजय महर्षि व्यास से प्रश्न करते हैं:

“हे द्विजश्रेष्ठ! नवरात्र आने पर मनुष्य को क्या-क्या कर्तव्य करने चाहिए? विशेषकर शरद् ऋतु में इसका विधान क्या है? इसका फल क्या है और इसकी पूजा किस प्रकार की जानी चाहिए? कृपा करके इसे विस्तार से समझाइए.”

महर्षि व्यास उत्तर देते हुए राजर्षि जनमेजय को समझाते हैं कि आश्विन मास (शरद् ऋतु) और चैत्र मास (वसन्त ऋतु) – ये दोनों ही समय ऋतुओं की संधियाँ हैं। पुराणों में इन दोनों ही ऋतुओं को ‘यमदंष्ट्रा‘ कहा गया है, अर्थात् यमराज के दाँतों के समान भयंकर और प्राणियों के लिए अत्यंत दुर्गम काल।

इन दोनों ही ऋतु-सन्धि के समयों में मानव शरीर पर मौसमी बीमारियाँ, वात-पित्त-कफ का असंतुलन और शारीरिक दुर्बलताएँ सबसे अधिक आक्रमण करती हैं। शरीर और मन के इसी संतुलन को बनाए रखने के लिए, तथा बाह्य और आन्तरिक शुद्धि के लिए हमारे ऋषियों ने इन दोनों कालों में चण्डिका-पूजन, उपवास और व्रत का यह सनातन विधान तय किया है।

व्रत की शुरुआत अमावस्या के दिन से ही हो जाती है। इस दौरान साधक को हविष्यान्न (सात्विक आहार, फलाहार या एक समय खीर आदि का भोजन) लेते हुए संयमित जीवन जीना होता है।

नवरात्र की तैयारी और मण्डप का निर्माण

नियम और संकल्प के पश्चात पूजन के लिए एक पवित्र, समतल और सुंदर स्थान का चयन किया जाता है।

  • मण्डप की संरचना: शास्त्र के अनुसार सोलह हाथ का एक भव्य मण्डप बनवाया जाता है, जो सुदृढ़ खम्भों और पावन ध्वजाओं से सुसज्जित हो। इस मण्डप की भूमि को पवित्र गोमय (गोबर) और श्वेत मिट्टी से लीपकर संस्कारित किया जाता है।
  • वेदी और तोरण: मण्डप के ठीक मध्य में चार हाथ चौड़ी और एक हाथ ऊँची एक समतल, स्थिर और सुंदर वेदी का निर्माण किया जाता है। उसके चारों ओर कलात्मक तोरण और ऊपर वितान (छत्र) की सजावट की जाती है।
  • ब्राह्मणों का वरण: रात्रि के समय ऐसे विद्वान ब्राह्मणों को आमंत्रित किया जाता है जो देवी-तत्त्व के मर्मज्ञ हों, आचारवान् हों, इन्द्रियों पर नियंत्रण रखते हों और वेद-वेदांगों में पारंगत हों। प्रतिपदा तिथि से लेकर प्रतिदिन प्रातःकाल नदियों, तालाबों, कुओं या पवित्र जल स्रोतों पर स्नान का विधान है। नित्यकर्म से निवृत्त होकर ब्राह्मणों का वरण किया जाता है और मधुपर्क, अर्घ्य तथा पाद्य से उनका सत्कार होता है।
  • व्यासजी यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात कहते हैं कि अपनी शक्ति के अनुसार अश्वालंकार और दान-दक्षिणा देनी चाहिए; यदि वैभव और सामर्थ्य है, तो देवी के यज्ञ में कभी भी कृपणता (वित्तशाठ्य) नहीं करनी चाहिए. पाठ के लिए नौ, पाँच या तीन ब्राह्मणों का वरण कर वेदमन्त्रों से स्वस्तिवाचन कराया जाता है।

भगवती अम्बिका की स्थापना और पूजा

वेदी के ऊपर सुंदर सिंहासन स्थापित कर उस पर भगवती अम्बिका की प्रतिमा विराजमान की जाती है।

  • देवी का स्वरूप: माता की चार भुजाएँ हों, जिनमें वे शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करती हों। वे सिंह पर आसीन हों, रत्नों और मुक्ताहारों से विभूषित हों, तथा दिव्य वस्त्रों से सुशोभित सौम्य एवं समस्त शुभ लक्षणों से सम्पन्न हों। आवश्यकता पड़ने पर अठारह भुजाओं वाली सनातनी मूर्ति भी स्थापित की जा सकती है।
  • यन्त्र और कलश स्थापना: यदि प्रतिमा का अभाव हो, तो ‘नवार्ण मन्त्र’ से युक्त यन्त्र की स्थापना की जाती है। उसके पार्श्व में स्वर्ण, रत्नों, पवित्र तीर्थों के जल से परिपूर्ण, पञ्चपल्लव और वेदमन्त्रों से संस्कृत कलश स्थापित किया जाता है।
  • संकल्प और हवन: प्रथम दिन हस्त नक्षत्र या नन्दा तिथि में साधक संकल्प लेता है—”हे माता! मैं इस उत्तम नवरात्र-व्रत को कर रहा हूँ, आप मेरी समस्त सहायता करें.” इसके बाद चन्दन, अगर, कपूर, सुगन्धित पुष्पों (मन्दार, चम्पा, करवीर, मालती, ब्रह्मकमल) और बिल्वपत्रों से माता का अर्चन होता है। नारियल, मातुलुङ्ग (चकोतरा), अनार, केला, नारंगी और कटहल जैसे पूर्ण फल अर्पित किए जाते हैं। त्रिकोणीय कुण्ड में हवन और तीनों समय नित्य पूजन के साथ संगीत, वाद्य और नृत्य के जरिए महोत्सव मनाया जाता है।

कुमारी-पूजन का विधान

नवरात्र के अनुष्ठान का सबसे पवित्र और अनिवार्य अंग है—कुमारी-पूजन। व्यासजी राजा जनमेजय से कहते हैं कि साधक को अपनी सामर्थ्य के अनुसार प्रतिदिन एक कन्या से शुरुआत करते हुए अथवा संख्या बढ़ाते हुए (द्विगुण, त्रिगुण या सीधे नवकन्याओं तक) पूजन करना चाहिए।

शास्त्रों में कन्याओं की आयु के आधार पर उनके नाम और उनके पूजन के विशिष्ट फल इस प्रकार बताए गए हैं:

  1. दो वर्ष की कन्या (‘कुमारी‘): इसके पूजन से दुःख और दरिद्रता का नाश होता है, शत्रुओं का क्षय होता है तथा धन, आयु और बल की वृद्धि होती है।
  2. तीन वर्ष की कन्या (‘त्रिमूर्ति‘): इसके पूजन से आयु बढ़ती है, त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) का फल मिलता है, और धन-धान्य तथा पुत्र-पौत्रादि की वृद्धि होती है।
  3. चार वर्ष की कन्या (‘कल्याणी‘): विद्यार्थी, विजयार्थी, राज्य चाहने वाले और सुखार्थियों के लिए यह सर्वकामप्रद है।
  4. पाँच वर्ष की कन्या (‘रोहिणी‘): इसके पूजन से समस्त रोगों का नाश होता है।
  5. छह वर्ष की कन्या (‘कालिका‘): इसे शत्रुनाश के लिए भक्तिपूर्वक पूजा जाता है।
  6. सात वर्ष की कन्या (‘चण्डिका‘): यह ऐश्वर्य और धन की कामना को पूर्ण करती है।
  7. आठ वर्ष की कन्या (‘शाम्भवी‘): इसके पूजन से राजा/प्रभावशाली जन वश में होते हैं, संग्राम में विजय मिलती है और दुःख-दरिद्रता दूर होती है।
  8. नौ वर्ष की कन्या (‘दुर्गा‘): यह क्रूर शत्रुओं का नाश करने वाली, रणकर्म में सफलता देने वाली और परलोक में सुख देने वाली है।
  9. दस वर्ष की कन्या (‘सुभद्रा‘): यह साधक के प्रत्येक वाञ्छित अर्थ और मनोकामना को सिद्ध करती है।

(नोट: एक वर्ष की बालिका को अभी भोगों का ज्ञान नहीं होता अतः वह इस विधि में वर्जित है, और 10 वर्ष से ऊपर की कन्याओं का इस रूप में पूजन नहीं किया जाता.) इन कन्याओं को वस्त्र, आभूषण, माला और सुधामय भोजन से संतुष्ट कर बीजमन्त्रों के साथ नमन करना चाहिए।

जब देवर्षि नारद को हुआ भ्रम: महामाया की लीला का प्रवेश

कुमारी-पूजन और नवरात्र के इस अनुष्ठानिक विधान के पश्चात, श्रीमद्देवीभागवत महापुराण का षष्ठ स्कन्ध हमें एक अत्यंत गहरे दार्शनिक और आख्यानिक प्रसंग की ओर ले जाता है। यह प्रसंग हमें यह सिखाता है कि बाह्य अनुष्ठानों के साथ-साथ अहंकार का विसर्जन कितना आवश्यक है।

एक समय महर्षि व्यास और देवर्षि नारद के संवाद में महामाया की अचिन्त्य शक्ति का प्रसंग छिड़ता है। देवर्षि नारद, जो स्वयं ब्रह्मवेत्ता और महान तपस्वी हैं, एक समय अपनी महती वीणा बजाते हुए और सात स्वरों में सामगान गाते हुए सत्यलोक से भगवान विष्णु के दर्शन के लिए वैकुण्ठ पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि भगवान विष्णु लक्ष्मीजी के साथ आनंदित हो रहे हैं। नारदजी को आते देख लक्ष्मीजी वहाँ से अन्तर्धान हो गईं।

अपने तप, संयम और ब्रह्मचर्य के अहंकार में डूबे नारदजी ने भगवान विष्णु से कह दिया:

“हे जगद्गुरो! मैं कोई नीच या धूर्त नहीं हूँ, अपितु माया को जीतने वाला एक तपस्वी हूँ। मैंने अपनी इंद्रियों को वश में कर रखा है और क्रोध पर विजय पा ली है। मुझ पर तो माया का कोई वश नहीं चलता। फिर भी हे जनार्दन! मुझे देखकर लक्ष्मीजी अन्तर्धान क्यों हुईं?”

नारदजी के इन वचनों में उनके तप और ज्ञान का वह सूक्ष्म अहंकार छिपा था, जिसे महामाया ने तुरंत पकड़ लिया। भगवान विष्णु का मुखमण्डल मंद-मुस्कान से भर गया और वे वीणा के समान मधुर स्वर में बोले:

“हे नारद! यह काम शिष्टाचार के विरुद्ध है कि स्त्रियाँ परपुरुष के सामने अपने पति के साथ विनोद की बातें करें। स्त्री को चाहिए कि पति के सिवाय किसी दूसरे के सामने बिना बुलाए न जाय, क्योंकि लज्जा ही नारीजाति का आभूषण है। देखो, हे मुने! जो प्राणायाम द्वारा अपनी इंद्रियों को सर्वदा वश में किए हैं, जो निराहार रहकर व्रतोपवास में निरन्तर लगे रहते हैं, जिन्होंने सांख्य एवं वेदान्त शास्त्र का अध्ययन और मनन कर रखा है—ऐसे जितेन्द्रिय योगियों के लिए भी माया अति दुराजेय है। हे संगीतकला-कुशल महामुने! तुमने जो अभी यह कहा है कि ‘मैं माया पर विजय प्राप्त कर चुका हूँ’, ऐसी अभिमान भरी बातें कभी नहीं बोलनी चाहिए। जब मैं, शिव, ब्रह्मा तथा सनक आदि मुनि भी उस अजन्मा माया पर विजय नहीं पा सके, तब किसी दूसरे देवता-मुनि की क्या गणना की जाय?”

भगवान की बात सुनकर नारदजी ने पूछा

“हे रमापते! वह महामाया किस स्वरूप की है? वह कैसी दिखाई देती है? उसका निवास कहाँ है और वह किसके आधार पर स्थित है? मैं उसे देखना और ठीक प्रकार से जानना चाहता हूँ। कृपा करके मुझे उसके दर्शन कराइए।”

भगवान विष्णु बोले—

“वह महामाया त्रिगुणात्मिका है। वह सम्पूर्ण जगत की आधार है, सर्वज्ञा है, अजेय है और अनेक रूपों में प्रकट होती है। वह सम्पूर्ण जगत में व्याप्त है। यदि तुम उसे देखना चाहते हो, तो मेरे साथ गरुड़ पर बैठकर चलो। मैं तुम्हें उस माया के दर्शन कराऊँगा जिसे अपने मन और इन्द्रियों को वश में न रखने वाले पुरुष जीत नहीं सकते। परन्तु हे ब्रह्मपुत्र! उसे देखकर तुम अपने मन में विषाद मत करना।”

भगवान विष्णु ने नारदजी को माया का रहस्य बताया

नारदजी के इस संशय को दूर करने और माया का वास्तविक स्वरूप दिखाने के लिए भगवान विष्णु ने एक लीला रची। वे नारदजी को गरुड़ पर बिठाकर कान्यकुब्ज (कन्नौज) के निकट एक अत्यंत रमणीय और दिव्य सरोवर पर ले आए।

वहाँ उन्हें एक अत्यन्त सुन्दर सरोवर दिखाई दिया। वह हंसों, कारण्डव पक्षियों और चक्रवाकों से भरा हुआ था। उसमें अनेक रंगों के कमल खिले थे। उसका जल स्वच्छ, निर्मल और अत्यन्त मधुर था।

भगवान विष्णु ने नारदजी से कहा

“हे नारद! इस सुन्दर सरोवर को देखो। इसका जल निर्मल है और चारों ओर कमल खिले हुए हैं। यहाँ स्नान करके हम आगे कान्यकुब्ज नगर चलेंगे।”

भगवान गरुड़ से उतरे और हँसते हुए नारदजी की तर्जनी पकड़कर उन्हें सरोवर के तट पर ले गए। वहाँ वृक्षों की शीतल छाया में कुछ देर विश्राम करने के बाद भगवान ने कहा—

“हे मुने! तुम पहले इस पवित्र और निर्मल जल में स्नान कर लो। इसका जल सज्जनों के चित्त के समान स्वच्छ है और कमलों के पराग से सुगन्धित है।”

नारदजी ने अपनी वीणा और मृगचर्म तट पर रख दिया। उन्होंने स्नान की तैयारी की, हाथ-पैर धोए, आचमन किया और सरोवर के जल में प्रवेश किया।

वे भगवान विष्णु के सामने ही स्नान कर रहे थे कि उसी क्षण उनका पुरुष-स्वरूप समाप्त हो गया और वे एक अत्यन्त सुन्दर स्त्री बन गए।

भगवान विष्णु नारदजी की वीणा और मृगचर्म लेकर गरुड़ पर सवार हुए और अपने धाम चले गए।

उधर स्त्री-स्वरूप प्राप्त करते ही नारदजी के मन से अपने पूर्व शरीर की स्मृति मिट गई। उन्हें न अपने नारद होने का स्मरण रहा, न भगवान विष्णु का, न ही अपने पूर्व जीवन और ज्ञान का। वे अपने नए रूप में सरोवर से बाहर आए और उस निर्मल जल को देखकर आश्चर्य करने लगे।

उसी समय हाथियों, घोड़ों और रथों से घिरी सेना के साथ राजा तालध्वज वहाँ आ पहुँचे। वे युवा थे, सुन्दर थे और राजसी आभूषणों से सुसज्जित थे। उन्होंने सरोवर के पास पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान मुख वाली, दिव्य आभूषणों से विभूषित एक सुन्दर स्त्री को देखा।

राजा आश्चर्यचकित होकर उसके पास आए और पूछने लगे—

“हे कल्याणि! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? क्या तुम किसी देवता, मनुष्य, गन्धर्व अथवा नाग की कन्या हो? तुम इस वन में अकेली कैसे हो? तुम्हारा विवाह हुआ है या तुम अभी कुमारी हो? हे सुन्दर नेत्रों वाली! तुम अपना परिचय दो। मेरे साथ रहकर इच्छित भोगों का उपभोग करो।”

नारदजी अब अपने पूर्वस्वरूप को भूल चुके थे। उन्हें यह भी ज्ञात नहीं था कि वे कौन थे और किस प्रकार यहाँ पहुँचे थे।

उधर स्त्री-स्वरूप प्राप्त करते ही नारदजी के मन से अपने पूर्व शरीर की स्मृति मिट गई। उन्हें न अपने नारद होने का स्मरण रहा, न भगवान विष्णु का, न ही अपने पूर्व जीवन और ज्ञान का। वे अपने नए रूप में सरोवर से बाहर आए और उस निर्मल जल को देखकर आश्चर्य करने लगे।

उसी समय हाथियों, घोड़ों और रथों से घिरी सेना के साथ राजा तालध्वज वहाँ आ पहुँचे। वे युवा थे, सुन्दर थे और राजसी आभूषणों से सुसज्जित थे। उन्होंने सरोवर के पास पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान मुख वाली, दिव्य आभूषणों से विभूषित एक सुन्दर स्त्री को देखा।

राजा आश्चर्यचकित होकर उसके पास आए और पूछने लगे—

“हे कल्याणि! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? क्या तुम किसी देवता, मनुष्य, गन्धर्व अथवा नाग की कन्या हो? तुम इस वन में अकेली कैसे हो? तुम्हारा विवाह हुआ है या तुम अभी कुमारी हो? हे सुन्दर नेत्रों वाली! तुम अपना परिचय दो। मेरे साथ रहकर इच्छित भोगों का उपभोग करो।”

नारदजी अब अपने पूर्वस्वरूप को भूल चुके थे। उन्हें यह भी ज्ञात नहीं था कि वे कौन थे और किस प्रकार यहाँ पहुँचे थे।

सौभाग्यसुन्दरी का राजा तालध्वज से विवाह

राजा तालध्वज के प्रश्नों के उत्तर में उस स्त्री ने कहा—

“हे राजन्! मैं नहीं जानती कि मैं किसकी पुत्री हूँ। मुझे अपने माता-पिता का ज्ञान नहीं है। मैं यह भी नहीं जानती कि मुझे इस सरोवर के पास किसने छोड़ा। मेरा कोई रक्षक नहीं है, न पिता, न माता और न ही कोई बन्धु-बान्धव। अब मेरा जो भी भाग्य होगा, वही होगा।”

उसकी बात सुनकर राजा तालध्वज उस पर मोहित हो गए। उन्होंने उसके लिए सुन्दर पालकी मँगवाई। पालकी रेशमी वस्त्रों से सुसज्जित थी। उसमें कोमल बिछौने बिछाए गए थे, मोतियों के जाल लगाए गए थे और स्वर्ण की सजावट की गई थी।

राजा ने उस स्त्री को पालकी में बैठाया और अपने नगर ले आए। शुभ दिन देखकर वैदिक विधि से अग्नि के सामने उनका विवाह सम्पन्न कराया गया। वह स्त्री राजा की प्रिय पत्नी बनी और उसका नाम सौभाग्यसुन्दरी रखा गया।

विवाह के बाद राजा तालध्वज उसके प्रेम में इतने आसक्त हो गए कि राज्य के कार्यों की ओर उनका ध्यान कम होने लगा। वे दिन-रात अपनी पत्नी के साथ विहार करने लगे। कभी उद्यानों में, कभी जलाशयों के पास, कभी महलों में और कभी पर्वतों तथा सरोवरों के रमणीय स्थानों पर वे उसके साथ समय बिताते।

धीरे-धीरे राजा अपनी पत्नी के प्रेम में इतने डूब गए कि राजकाज और दूसरे कर्तव्य पीछे छूटने लगे।

इधर सौभाग्यसुन्दरी के रूप में स्थित नारदजी भी अपने पूर्व जीवन को पूरी तरह भूल चुके थे। उन्हें न यह स्मरण था कि वे ब्रह्मा के मानसपुत्र हैं, न अपनी तपस्या का, न वेद-वेदान्त के ज्ञान का और न ही भगवान विष्णु के साथ हुई उस यात्रा का। स्त्री-भाव और गृहस्थ जीवन के मोह ने उनकी स्मृति को ढक लिया था।

समय बीतता गया। बारह वर्ष इस प्रकार निकल गए मानो कुछ क्षण ही बीते हों। सौभाग्यसुन्दरी गर्भवती हुई और शुभ समय पर उसके पहले पुत्र का जन्म हुआ। राजा ने बड़े उत्साह से पुत्र-जन्म का उत्सव मनाया। बाद में दूसरा पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम सुधन्वा रखा गया; बड़े पुत्र का नाम वीरवर्मा था।

इस प्रकार सौभाग्यसुन्दरी के बारह पुत्र हुए। समय के साथ आठ और पुत्र हुए और कुल मिलाकर बीस पुत्र हो गए। पुत्र बड़े हुए, उनके विवाह हुए, घर में बहुएँ आईं और आगे चलकर पौत्र भी हुए। परिवार बढ़ता गया और उसके साथ ही मोह तथा ममता की गाँठ भी मजबूत होती गई।

सौभाग्यसुन्दरी अपने पुत्रों, बहुओं, पौत्रों और परिवार में रमी रहती थी। उसे अपने बड़े परिवार पर गर्व था। वह सोचती थी कि उसके समान भाग्यशाली स्त्री संसार में दूसरी कोई नहीं है। वह अपने पति, पुत्रों और गृहस्थ जीवन को ही अपना सर्वस्व समझने लगी।

कभी परिवार में सुख होता, कभी किसी को रोग घेर लेता, कभी पुत्रों के बीच मतभेद होता और कभी घरेलू चिन्ताएँ उत्पन्न होतीं। फिर भी यह भावना दृढ़ बनी रही कि ये सब उसके अपने हैं और इनके बिना उसका जीवन अधूरा है।

नारदजी कहते हैं कि इस अवस्था में उन्हें अपने वास्तविक स्वरूप का कोई स्मरण नहीं था। उन्हें कभी यह विचार तक नहीं आया कि वे नारद हैं और भगवान विष्णु की माया ने उन्हें इस प्रकार मोहित कर रखा है। वे स्वयं को एक शुभाचरण वाली, पतिव्रता और अनेक पुत्रों की माता मानती थीं। यही माया का प्रभाव था  जिसने उनके ज्ञान, स्मृति और पूर्व परिचय को ढक दिया था।

युद्ध में पुत्रों और पौत्रों का विनाश

कुछ समय बाद दूर देश के एक शक्तिशाली राजा ने तालध्वज से शत्रुता कर ली। वह हाथियों, घोड़ों और रथों से युक्त विशाल सेना लेकर कान्यकुब्ज नगर पर चढ़ आया। उसने नगर को घेर लिया और युद्ध आरम्भ हो गया।

राजा तालध्वज के पुत्र और पौत्र भी नगर से बाहर निकले और शत्रु की सेना से भिड़ गए। भयंकर युद्ध हुआ। दोनों ओर से प्रहार होने लगे, परन्तु काल के प्रभाव से तालध्वज के पुत्र रणभूमि में मारे गए।

राजा तालध्वज पराजित होकर अपने नगर लौट आए। जब सौभाग्यसुन्दरी को यह समाचार मिला कि उसके पुत्र और पौत्र युद्ध में मारे गए हैं, तो वह असहनीय दुःख से व्याकुल हो उठी। वह रोती हुई रणभूमि की ओर दौड़ी।

वहाँ उसने अपने पुत्रों और पौत्रों को मृत पड़ा देखा। जिस परिवार को वह अपने जीवन का आधार मानती थी, वह उसके सामने नष्ट हो चुका था। वह विलाप करने लगी—

“हाय मेरे पुत्रो! तुम कहाँ चले गए? उस अत्यन्त बलवान् और पापी शत्रु ने मेरा सर्वनाश कर दिया! आज मेरा सब कुछ छिन गया!”

वह अपने पुत्रों और पौत्रों के शवों के बीच रोती रही। उसका शोक इतना प्रबल था कि उसे किसी दूसरी बात का ध्यान नहीं रहा।

उसी समय भगवान मधुसूदन एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण करके वहाँ पहुँचे। वे वेदों के ज्ञाता थे और सुन्दर वस्त्र पहने हुए थे। उन्होंने रणभूमि में विलाप करती हुई सौभाग्यसुन्दरी को देखा और उसके पास जाकर कहा—

“हे तन्वंगी! तुम क्यों शोक कर रही हो? यह मोह से उत्पन्न भ्रम है। पति, पुत्र और घर का यह प्रपञ्च स्थायी नहीं है। तुम विचार करो कि तुम्हारी वास्तविक गति क्या है। रोना छोड़कर उठो और अपने मन को स्थिर करो।

जो पुत्र परलोक चले गए हैं, उनके लिए स्नान और तिलदान करो। धर्मशास्त्र का विधान है कि मृत बन्धुओं के निमित्त तीर्थ में स्नान करना चाहिए।”

वृद्ध ब्राह्मण के वचन सुनकर सौभाग्यसुन्दरी कुछ सँभली। राजा तालध्वज और अन्य बन्धु-बान्धव भी उसके साथ हो लिए। ब्राह्मण आगे-आगे चले और वे सब उनके पीछे एक पवित्र तीर्थ की ओर बढ़े।

मार्ग में ब्राह्मण ने उसे समझाया-

“हे गजगामिनी! इस पवित्र सरोवर में स्नान करो और पुत्रों के लिए शोक करना छोड़ दो। जन्म-जन्मान्तरों में तुम्हारे करोड़ों पुत्र, पिता, पति, भाई और बन्धु हो चुके हैं। वे सब कहाँ हैं? इस मन से उत्पन्न भ्रम के कारण तुम किस-किस के लिए शोक करोगी? यह संसार स्वप्न के समान है और देहधारी जीव को ताप देने वाला है।”

यह सुनकर सौभाग्यसुन्दरी स्नान करने के लिए सरोवर में उतरी। उस तीर्थ का नाम पुरुषतीर्थ बताया गया है।

जैसे ही उसने जल में डुबकी लगाई, उसी क्षण उसका स्त्री-स्वरूप समाप्त हो गया और वह पुनः पुरुष बन गई। वह कोई और नहीं, स्वयं देवर्षि नारद थे।

नारदजी जल से बाहर आए तो उन्होंने भगवान विष्णु को अपने वास्तविक स्वरूप में तट पर खड़े देखा। भगवान के हाथ में उनकी वीणा थी। उन्हें देखते ही नारदजी के मन में पूर्व की सारी घटनाएँ जाग उठीं।

उन्होंने स्मरण किया—“मैं नारद हूँ। मैं भगवान विष्णु के साथ यहाँ आया था। महामाया के प्रभाव से स्त्री बन गया था और राजा तालध्वज की पत्नी के रूप में जीवन बिताने लगा था।”

नारदजी स्वयं अपने अनुभव से चकित थे। उन्हें समझ में आया कि माया का प्रभाव कितना प्रबल है। एक महान ज्ञानी ऋषि भी अपने पूर्वस्वरूप, ज्ञान और परिचय को भूलकर पति, पुत्र, परिवार और सांसारिक सम्बन्धों में पूरी तरह डूब सकता है।

राजा तालध्वज का विलाप और भगवान विष्णु का उपदेश

उधर राजा तालध्वज ने अपनी पत्नी को सरोवर में जाते देखा था। जब जल से बाहर नारदजी का पुरुष-स्वरूप प्रकट हुआ, तो राजा स्तब्ध रह गए। उन्हें समझ में नहीं आया कि उनकी पत्नी कहाँ चली गई और यह मुनि कौन हैं।

वे बार-बार विलाप करने लगे—

“हाय प्रिये! तुम मुझे छोड़कर कहाँ चली गईं? तुम्हारे बिना मेरा जीवन, मेरा घर और मेरा राज्य सब व्यर्थ हैं। हे कमलपत्राक्षि! हे मधुर मुस्कान वाली! मैं अब क्या करूँ? तुम्हारे वियोग में मेरे प्राण क्यों नहीं निकल जाते?

हे विशालनेत्रों वाली! मैं तुम्हें पुकार रहा हूँ, तुम मुझे उत्तर क्यों नहीं देतीं? हमारे प्रथम मिलन के समय जो प्रेम था, वह कहाँ चला गया? क्या तुम जल में डूब गईं? क्या तुम्हें मछलियाँ और कछुए खा गए? या मेरे दुर्भाग्य से वरुण तुम्हें अपने साथ ले गए?

तुम्हारे बिना मेरा जीवन सूना हो गया है। मेरे पुत्र पहले ही चले गए और अब तुम भी मुझे छोड़कर चली गईं। मैं किसके सहारे रहूँ?”

राजा के लिए यह वियोग असहनीय था। पहले पुत्रों और पौत्रों का नाश हुआ था और अब पत्नी भी उनके सामने नहीं थी। वे संसार को निरर्थक समझने लगे, परन्तु मोह अभी भी उन्हें छोड़ नहीं रहा था।

भगवान विष्णु ने यह सब देखा। उन्होंने राजा को समझाने के लिए माया, देह और सम्बन्धों की अस्थिरता का बोध कराया। कथा का आशय यही है कि जिस पत्नी को राजा अपना सर्वस्व मान रहे थे, वह वास्तव में देवर्षि नारद का माया से उत्पन्न स्त्री-भाव था। जिन पुत्रों को सौभाग्यसुन्दरी अपना स्थायी परिवार मानती थी, वे भी उस अनुभव के भीतर उत्पन्न सम्बन्ध थे।

इस घटना ने राजा तालध्वज के सामने यह प्रश्न खड़ा कर दिया कि जिसे मनुष्य ‘मेरा’ कहकर जीवन भर पकड़े रहता है, क्या वह वास्तव में सदा उसके साथ रह सकता है? देह बदलती है, सम्बन्ध बनते और मिटते हैं, समय सबको आगे ले जाता है। फिर भी जीव उन्हीं सम्बन्धों को स्थायी मानकर उनमें बँध जाता है।

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