आश्चर्य ! दीपावली रावण-वध से पहले भी मनाई जाती थी

क्या आप जानते हैं –

दीपावली रावण-वध से पहले भी मनाई जाती थी! –

🌟 आनंद रामायण का एक अद्भुत रहस्य 🌟

दीपावली रावण-वध से पहले भी मनाई जाती थी

दीपावली को भगवान श्रीराम के रावण-वध के पश्चात अयोध्या लौटने की स्मृति में मनाया जाने वाला पर्व माना जाता है। यह प्रसंग निस्संदेह इस पर्व की सबसे प्रसिद्ध और भावपूर्ण धार्मिक मान्यताओं में से एक है। किंतु दीपोत्सव की परम्परा और इससे जुड़ी धार्मिक कथाओं का विस्तार इससे कहीं अधिक है।

आनंद रामायण में वर्णित एक अद्भुत प्रसंग इनको और भी रोचक बना देता है। इसमें भगवान श्रीराम के विवाह के पश्चात मिथिला में दीपावली मनाए जाने का वर्णन मिलता है। अर्थात् जिस दीपोत्सव को सामान्यतः रावण-वध और श्रीराम के अयोध्या आगमन से जोड़कर देखा जाता है, उसकी एक परम्परा स्वयं रामकथा में इससे पहले भी दिखाई देती है।

इतना ही नहीं, दीपावली से जुड़े पुराणों के वर्णन में अनेक अन्य दिव्य प्रसंग, देवताओं की लीलाएँ, वरदान और धार्मिक परम्पराएँ भी मिलती हैं। इनमें कुछ घटनाएँ दीपावली से पहले की तिथियों से संबंधित हैं, कुछ कार्तिक अमावस्या (स्कन्द पुराण इस कृष्ण पक्ष को आश्विन कहता है, जो अमान्त गणना है, जबकि उत्तर भारत में इसे कार्तिक कहते हैं। ) की रात्रि से और कुछ अगले दिनों में मनाए जाने वाले उत्सवों से।

आइए, दीपावली से जुड़े इन रोचक प्रसंगों को क्रम से जानते हैं।

जब भगवान श्रीराम रावण-वध कर 14 वर्ष के वनवास के पश्चात अयोध्या लौटे। आनंद से अभिभूत अयोध्या-वासियों ने दीपक प्रज्ज्वलित कर अपने प्रिय प्रभु का स्वागत किया और यह परम्परा युगों से चलती आ रही है।  यह सत्य है, पर बहुत कम लोगों को यह ज्ञात है कि दीपोत्सव की परम्परा श्रीराम के अयोध्या लौटने से पहले भी  विद्यमान थी।

श्री राम का अयोध्या आगमन शुभ और पवित्र कार्तिक माह की अमावस्या तिथि पर हुआ। और साथ ही  यह तिथि, युगों-युगों से कई अन्य कारणों से ‘दीपोत्सव’ के रूप में मनाई जाती रही है।

इसका उल्लेख हमें “आनंदरामायण” नामक प्राचीन ग्रन्थ में मिलता है। जी हाँ! यह अद्भुत रहस्य हमें आनंद रामायण से ज्ञात होता है – एक ऐसा ग्रंथ जो श्री राम कथा के कम प्रसिद्ध लेकिन गूढ़ और अलौकिक प्रसंगों को उजागर करता है।

आनंद रामायण और अन्य शास्त्रों के आधार पर, इस बहुआयामी पर्व के अनसुने रहस्य

इस नीचे दिए चित्र में आनंद रामायण के सारकाण्ड के चतुर्थः सर्गः से (पृष्ठ-३४,३५) में विवरण है। राजा जनक महाराज दशरथ को सकुटुम्ब, मंत्रियों सहित दिवाली पर्व के उत्सव पर मिथिला आने का निमंत्रण दे रहे हैं ।

आनंद रामायण का यह प्रसंग इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि यह दीपोत्सव रावण वध से पहले भी मनाया जाता था। यह प्रसंग सीता-राम विवाह के कुछ समय बाद का है, जब श्री सीता राम अयोध्या लौट चुके थे।

राजा जनक ने अपने परम प्रिय जामाता श्रीराम और पुत्री सीता सहित समस्त अयोध्या-राजपरिवार को आमंत्रित कर दीपोत्सव महोत्सव का आयोजन किया। पाठ में यह भी स्पष्ट है कि यह दीपोत्सव “शुभ मुहूर्त में सम्पूर्ण राजाओं, ऋषियों और जनसमाज के बीच” संपन्न हुआ।

1. भगवान धन्वन्तरि का समुद्र मंथन से प्राकट्य – धनतेरस का दिव्य प्रसंग

दीपावली के दो दिन पहले धनतेरस त्यौहार मनाया जाता है – इस दिन का संबंध भगवान धन्वन्तरि से है, जिन्हें आयुर्वेद का अधिष्ठाता और देवताओं का वैद्य माना जाता है।

पौराणिक कथा के अनुसार, देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए क्षीरसागर का मंथन किया। मन्दराचल पर्वत को मथानी और वासुकि नाग को रस्सी बनाकर समुद्र मंथन प्रारम्भ हुआ। इस मंथन से क्रमशः अनेक दिव्य वस्तुएँ, रत्न और देवशक्तियाँ प्रकट हुईं।

इसी क्रम में भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर समुद्र से प्रकट हुए। उनका स्वरूप अत्यंत दिव्य था और उनके हाथों में अमृत से भरा कलश था। भगवान धन्वन्तरि के प्राकट्य को आयुर्वेद और आरोग्य परम्परा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

इसी कारण धनतेरस को धन्वन्तरि जयंती भी कहा जाता है। इस दिन भगवान धन्वन्तरि की पूजा की जाती है और उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु तथा आरोग्य की कामना की जाती है।

भगवान धन्वन्तरि का समुद्र मंथन से प्राकट्य

–श्रीमद्भागवत महापुराण, अष्टम स्कन्ध, अध्याय 8; विष्णु पुराण, प्रथम अंश, अध्याय 9।

2.भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर का वध – नरक चतुर्दशी 

दीपावली से ठीक एक दिन पहले कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी मनाई जाती है। इसे छोटी दीपावली भी कहा जाता है। इस तिथि का संबंध भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध से है।

नरकासुर, जिसे भौमासुर भी कहा जाता है, प्राग्ज्योतिषपुर का अत्यंत शक्तिशाली असुर राजा था। अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अहंकार में वह देवताओं तथा अन्य प्राणियों को कष्ट देने लगा था। उसने देवराज इन्द्र की माता अदिति के दिव्य कुण्डल छीन लिए थे और अनेक राजकुमारियों को बंदी बनाकर रखा था।

नरकासुर के अत्याचारों से परेशान होकर देवताओं ने भगवान श्रीकृष्ण से सहायता की प्रार्थना की। भगवान श्रीकृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ गरुड़ पर सवार होकर नरकासुर के नगर पहुँचे। वहाँ भयंकर युद्ध हुआ और अंततः भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध कर दिया।

उसके अत्याचारों से मुक्त कराई गई स्त्रियों को स्वतंत्रता मिली और देवताओं को भी राहत प्राप्त हुई।

नरकासुर के वध की स्मृति में नरक चतुर्दशी मनाने की परम्परा है। इस दिन प्रातःकाल अभ्यंग स्नान किया जाता है, शरीर पर तेल लगाया जाता है और दीपदान किया जाता है। दक्षिण भारत में इस उत्सव का विशेष महत्व है।

भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर का वध

-श्रीमद्भागवत महापुराण, दशम स्कन्ध, अध्याय 59; विष्णु पुराण, पंचम अंश, अध्याय 29।

नरक चतुर्दशी पर भगवान यम के लिए दीपदान – अकाल मृत्यु से रक्षा की कामना

नरक चतुर्दशी का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष भगवान यमराज से जुड़ा है। सामान्यतः लोग इस दिन को केवल नरकासुर-वध की स्मृति में मनाया जाने वाला पर्व समझते हैं, लेकिन पुराणों में इस तिथि के लिए विशेष धार्मिक अनुष्ठानों का भी वर्णन मिलता है।

पद्म पुराण के उत्तरखण्ड में कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन प्रातः स्नान, यमराज के नामों से तर्पण तथा नरक के निमित्त दीपदान करने का विधान वर्णित है। इस दिन भगवान यम को स्मरण करते हुए उनके विभिन्न नामों से तर्पण किया जाता है। इसके पश्चात संध्या के समय दीपदान किया जाता है।

इस परम्परा का धार्मिक उद्देश्य अकाल मृत्यु से रक्षा, पापों से मुक्ति और नरक की यातनाओं से बचने की कामना है। कुछ परम्पराओं में घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर यमदीप जलाया जाता है।

नरक चतुर्दशी पर भगवान यम के लिए दीपदान

– पद्म पुराण, उत्तरखण्ड, अध्याय 122, श्लोक 6–16; स्कन्द पुराण, वैष्णव खण्ड, अध्याय 9, श्लोक 56।

भगवान विष्णु द्वारा राजा बलि को दिया गया अद्भुत वरदान – दीपोत्सव और बलिराज्य की कथा

दीपावली से जुड़ा एक अत्यंत रोचक प्रसंग भगवान विष्णु के वामन अवतार और राजा बलि से संबंधित है।

राजा बलि असुर कुल में उत्पन्न होने के बावजूद अत्यंत दानी, पराक्रमी और धर्मपरायण राजा थे। उन्होंने अपने पराक्रम से तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया और राजा बलि के यज्ञ में पहुँचे।

भगवान ने उनसे केवल तीन पग भूमि दान में माँगी। राजा बलि ने सहर्ष यह दान स्वीकार कर लिया। इसके बाद भगवान वामन ने विराट रूप धारण किया। उनके पहले पग में पृथ्वी और दूसरे पग में समस्त आकाश तथा स्वर्गलोक समा गए। तीसरे पग के लिए कोई स्थान शेष नहीं रहा, तब राजा बलि ने अपना मस्तक भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया।

भगवान विष्णु उनकी दानशीलता और समर्पण से प्रसन्न हुए। इस प्रसंग का एक विशेष विस्तार स्कन्द पुराण में मिलता है।

वर्णन के अनुसार, राजा बलि ने भगवान से ऐसा वरदान माँगा जिससे उनकी प्रजा का कल्याण हो सके। उन्होंने इच्छा व्यक्त की कि वर्ष के कुछ विशेष दिनों में पृथ्वी पर उनका राज्य रहे और जो लोग उन दिनों अपने घरों में दीपदान करें, उनके घरों में माता लक्ष्मी का निवास हो।

भगवान विष्णु ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की।

इस प्रसंग में विशेष बात यह है कि राजा बलि ने अपने लिए कोई व्यक्तिगत संपत्ति अथवा वैभव नहीं माँगा, बल्कि अपनी प्रजा के सुख और समृद्धि की कामना की। दीपावली के आसपास मनाए जाने वाले बलि प्रतिपदा पर्व का संबंध इसी परम्परा से है। इस दिन राजा बलि का स्मरण और पूजन किया जाता है। कुछ क्षेत्रों में इसे बलिराज्य अथवा बाली पाडवा भी कहा जाता है।

भगवान विष्णु द्वारा राजा बलि को दिया गया अद्भुत वरदान,

-स्कन्द पुराण, वैष्णव खण्ड, अध्याय 106, श्लोक 47–56; पद्म पुराण, उत्तरखण्ड, अध्याय 122, श्लोक 43–69।

कार्तिक अमावस्या की रात्रि में माता लक्ष्मी की आराधना – भगवान विष्णु के जागरण का प्रसंग

कार्तिक अमावस्या की रात्रि दीपावली का सबसे महत्वपूर्ण अवसर है। इस दिन पूरे भारत में माता लक्ष्मी की विशेष पूजा की जाती है। घरों, मंदिरों और प्रतिष्ठानों में दीप जलाए जाते हैं तथा धन, ऐश्वर्य और समृद्धि की कामना की जाती है।

पद्म पुराण के उत्तरखण्ड में दीपावली के अवसर पर माता लक्ष्मी की उपासना का विशेष वर्णन मिलता है।

पौराणिक परम्परा के अनुसार चातुर्मास के समय भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं। देवशयनी एकादशी से प्रारम्भ हुई यह अवधि देवउठनी एकादशी पर समाप्त होती है। भगवान विष्णु के जागरण के पश्चात मांगलिक कार्यों का पुनः आरम्भ होता है।

पद्म पुराण में दीपावली की रात्रि में माता लक्ष्मी को जगाने और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए विशेष पूजा तथा दीपदान का वर्णन मिलता है।

माता लक्ष्मी की पूजा केवल धन प्राप्त करने की कामना तक सीमित नहीं है। वे समृद्धि, सौभाग्य, ऐश्वर्य और मंगल की अधिष्ठात्री हैं। इसलिए इस रात्रि में घरों को स्वच्छ करके दीपों से सजाया जाता है और माता से स्थायी मंगल तथा समृद्धि का आशीर्वाद माँगा जाता है।

समुद्र मंथन से माता लक्ष्मी के प्राकट्य की कथा भी इस पूजा के धार्मिक महत्व को समझने में विशेष स्थान रखती है। हालांकि समुद्र मंथन के प्रसंग में उनके प्राकट्य की तिथि कार्तिक अमावस्या स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं की गई

कार्तिक अमावस्या की रात्रि में माता लक्ष्मी की आराधना

– पद्म पुराण, उत्तरखण्ड, अध्याय 122, श्लोक 20–32; श्रीमद्भागवत महापुराण, अष्टम स्कन्ध, अध्याय 8।

भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला – दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा

दीपावली के अगले दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को अनेक स्थानों पर गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव मनाया जाता है।

इसका संबंध भगवान श्रीकृष्ण की उस अद्भुत लीला से है जिसमें उन्होंने इन्द्र के अहंकार को दूर किया और ब्रजवासियों की रक्षा की। एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को इन्द्र की पूजा के स्थान पर गोवर्धन पर्वत की पूजा करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने समझाया कि गोवर्धन पर्वत, वन, गौवंश और प्रकृति ब्रजवासियों के जीवन का वास्तविक आधार हैं।

ब्रजवासियों ने श्रीकृष्ण की बात मानकर गोवर्धन पूजा की। इससे क्रोधित होकर इन्द्र ने मूसलाधार वर्षा प्रारम्भ कर दी। वर्षा इतनी भयंकर थी कि समस्त ब्रज जलमग्न होने लगा। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठा अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया और सभी ब्रजवासियों तथा गोवंश को उसके नीचे आश्रय दिया। सात दिनों तक भगवान ने पर्वत धारण किए रखा और अंततः इन्द्र को अपनी भूल का अनुभव हुआ।

गोवर्धन पूजा में इसी लीला का स्मरण किया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण को अन्नकूट का भोग लगाया जाता है। अनेक प्रकार के व्यंजन अर्पित किए जाते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला

श्रीमद्भागवत महापुराण, दशम स्कन्ध, अध्याय 24–27; पद्म पुराण, उत्तरखण्ड, अध्याय 122।

भाई दूज का पौराणिक प्रसंग – धर्मराज यमराज का अपनी बहन यमुना के घर आगमन

दीपावली के पाँच दिवसीय उत्सव का समापन भाई दूज अथवा यम द्वितीया से होता है। यह पर्व भाई और बहन के पवित्र प्रेम तथा स्नेह का प्रतीक है।

पौराणिक कथा के अनुसार भगवान यमराज और देवी यमुना भाई-बहन थे। यमुना अपने भाई यमराज से बार-बार आग्रह करती थीं कि वे उनके घर आएँ और उनका आतिथ्य स्वीकार करें। एक दिन यमराज अपनी बहन यमुना के घर पहुँचे। यमुना ने उनका आदर-सत्कार किया, तिलक लगाया और उन्हें प्रेमपूर्वक भोजन कराया। अपनी बहन के इस स्नेह से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें वरदान माँगने के लिए कहा।

यमुना ने प्रार्थना की कि जो भाई इस दिन अपनी बहन के घर जाकर उसका सत्कार, बहन के हाथ का भोजन स्वीकार करेगा, उसे कभी नर्क यातना नहीं भोगनी पड़ेगी और उसका कल्याण होगा उसे धन-समृद्धि की प्राप्ति होगी । यमराज ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली।

इसी मान्यता के आधार पर कार्तिक शुक्ल द्वितीया को भाई दूज मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाती हैं, उनकी आरती उतारती हैं और उनके दीर्घायु तथा सुखी जीवन की कामना करती हैं।

यमराज और यमुना का मिलन – दीपावली के बाद भाई दूज का पावन पर्व

पद्म पुराण, उत्तरखण्ड, अध्याय 122, यम द्वितीया का वर्णन।

दीपावली की परम्परा : एक तिथि, अनेक पौराणिक प्रसंग

धनतेरस पर भगवान धन्वन्तरि का स्मरण, नरक चतुर्दशी पर नरकासुर-वध की परम्परा, कार्तिक अमावस्या पर माता लक्ष्मी की आराधना तथा भगवान श्रीराम के अयोध्या आगमन का उत्सव और इसके बाद गोवर्धन पूजा एवं यम द्वितीया जैसे पर्व – ये सभी मिलकर दीपावली के व्यापक धार्मिक स्वरूप को सामने रखते हैं।

विशेष रूप से आनंद रामायण में वर्णित मिथिला के दीपोत्सव का प्रसंग इस विषय को एक नई दृष्टि प्रदान करता है। यह संकेत करता है कि दीपोत्सव की परम्परा को केवल रावण-वध के पश्चात भगवान श्रीराम के अयोध्या आगमन से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं है। अन्य पुराणों में वर्णित राजा बलि, भगवान विष्णु, और माता लक्ष्मी से संबंधित प्रसंग इस पर्व की धार्मिक परम्पराओं के और भी व्यापक आयाम प्रस्तुत करते हैं।

इन कथाओं और परम्पराओं का महत्व केवल उनके धार्मिक पक्ष तक सीमित नहीं है। ये हमारी सांस्कृतिक स्मृति, धार्मिक चेतना और पीढ़ियों से चली आ रही विरासत का अभिन्न अंग हैं। इनके माध्यम से हम अपने धर्मग्रंथों, पुराणों और रामकथा परम्परा में निहित उस ज्ञान से परिचित होते हैं, जो हमारे त्योहारों को केवल उत्सव नहीं, बल्कि अर्थपूर्ण सांस्कृतिक परम्पराएँ बनाता है।

विशेषकर प्रत्येक हिन्दू को अपनी संस्कृति, धर्मग्रंथों, संस्कारों और त्योहारों से जुड़े इन प्रसंगों एवं उनके वास्तविक महत्व की जानकारी स्वयं होनी चाहिए। यह जानकारी केवल व्यक्तिगत ज्ञान तक सीमित न रहे, बल्कि अगली पीढ़ी तक भी पहुँचे। अपने बच्चों को हमारे पर्वों के पीछे छिपी कथाओं, मान्यताओं और धार्मिक परम्पराओं से परिचित कराना भी हमारी सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने का महत्वपूर्ण दायित्व है।

किसी संस्कृति की निरन्तरता तब सुनिश्चित होती है जब उसकी अगली पीढ़ी उन त्योहारों के मूल अर्थ, उनसे जुड़ी कथाओं और उनके सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्व को भी समझती है। दीपावली के इन विविध प्रसंगों को जानना और आगे पहुँचाना इसी परम्परा को जीवित रखने की दिशा में एक सार्थक प्रयास है।

इस लेख में दीपावली से सम्बन्धित विभिन्न पौराणिक प्रसंगों एवं धार्मिक परम्पराओं का वर्णन करते समय मूल ग्रन्थों में उपलब्ध कथाओं और सन्दर्भों की प्रामाणिकता तथा विवरणों की शुद्धता का यथासम्भव पूरा ध्यान रखा गया है। फिर भी, प्राचीन ग्रन्थों के विभिन्न संस्करणों, पाठभेदों अथवा सन्दर्भों के अध्ययन में अनजाने में कोई त्रुटि रह जाने की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता। यदि किसी विद्वान, आचार्य अथवा शास्त्र के गम्भीर अध्येता को इस लेख में कोई तथ्यात्मक अशुद्धि, कथानक सम्बन्धी त्रुटि या सन्दर्भगत विसंगति दिखाई दे, तो कृपया उसे उचित ग्रन्थ-सन्दर्भ सहित अवगत कराने का कष्ट करें। ऐसे प्रत्येक प्रामाणिक सुझाव का स्वागत है और सत्यापन के पश्चात आवश्यक संशोधन अवश्य किया जाएगा। हमारा उद्देश्य किसी मान्यता को स्थापित करना नहीं, बल्कि शास्त्रों में वर्णित प्रसंगों को यथासम्भव प्रामाणिक एवं शुद्ध रूप में पाठकों तक पहुँचाना है।

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संदर्भ ग्रन्थ एवं शास्त्रीय स्रोत

  1. आनन्द रामायण – सारकाण्ड, चतुर्थ सर्ग, पृष्ठ 34–35 (मिथिला में दीपोत्सव का प्रसंग)।

  2. श्रीमद्भागवत महापुराण – अष्टम स्कन्ध, अध्याय 8 (समुद्र मंथन एवं भगवान धन्वन्तरि का प्राकट्य)।

  3. विष्णु पुराण – प्रथम अंश, अध्याय 9 (समुद्र मंथन एवं दिव्य प्राकट्य)।

  4. श्रीमद्भागवत महापुराण – दशम स्कन्ध, अध्याय 59 (भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर वध)।

  5. विष्णु पुराण – पंचम अंश, अध्याय 29 (नरकासुर वध)।

  6. पद्म पुराण – उत्तरखण्ड, अध्याय 122, श्लोक 6–16 (यमदीपदान एवं नरक चतुर्दशी के विधान)।

  7. स्कन्द पुराण – वैष्णव खण्ड, अध्याय 9, श्लोक 56 (नरक चतुर्दशी का दीपदान)।

  8. स्कन्द पुराण – वैष्णव खण्ड, अध्याय 106, श्लोक 47–56 (राजा बलि को भगवान विष्णु का वरदान)।

  9. पद्म पुराण – उत्तरखण्ड, अध्याय 122, श्लोक 43–69 (बलिराज्य एवं दीपोत्सव की परम्परा)।

  10. पद्म पुराण – उत्तरखण्ड, अध्याय 122, श्लोक 20–32 (कार्तिक अमावस्या, माता लक्ष्मी की आराधना एवं दीपदान)।

  11. श्रीमद्भागवत महापुराण – दशम स्कन्ध, अध्याय 24–27 (गोवर्धन लीला)।

  12. पद्म पुराण – उत्तरखण्ड, अध्याय 122 (गोवर्धन पूजा एवं यम द्वितीया के प्रसंग)।

 

3 thoughts on “आश्चर्य ! दीपावली रावण-वध से पहले भी मनाई जाती थी”

    1. Thanks for your message plwaae also see रामायण कितनी हैं ? क्या विशेष है “आनंद रामायण” में (भाग-3) very few people know about anand रामायण

  1. Pingback: Ramayana Granthas: Beyond the Ramayana You Know

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