
क्यों पंचदेवों में भगवान सूर्यनारायण विशेष हैं
- एकमात्र प्रत्यक्ष देवता: पंचदेवों में भगवान सूर्यनारायण की विशिष्टता का प्रथम कारण यह है कि वे एकमात्र प्रत्यक्ष देवता हैं। अन्य देवताओं की उपासना प्रतीक या मूर्ति के माध्यम से होती है, जबकि सूर्यनारायण ‘प्रत्यक्षं ब्रह्म’ हैं—जिनका दर्शन, स्पर्श और अनुभव प्रत्येक प्राणी प्रतिदिन करता है।
- “सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च” (ऋग्वेद) – वेदवचन के अनुसार भगवान सूर्य सम्पूर्ण चराचर जगत की आत्मा हैं। स्थावर और जंगम — दोनों प्रकार की सृष्टि में जो जीवन, गति और चेतना कार्य करती है, वह सूर्यतत्त्व से ही सम्भव है। उदयकाल से अस्तकाल तक सूर्य ही दैनिक सृष्टि के उद्भावक, जाग्रतकर्ता और संचालक माने गये हैं। रात्रिकाल में जीवों के शयन के पश्चात् उन्हें विश्राम देने वाला तत्त्व भी सूर्यदेव को ही माना गया है
- “आदित्यो वै तेज ओजो बलं यशश्चक्षुः श्रोत्रे आत्मा मनः” (नारायणोपनिषद् – 25)- नारायणोपनिषद् में आदित्य को तेज, ओज, बल, यश, चक्षु, श्रोत्र, आत्मा और मन कहा गया है।
- माता अदिति के पुत्र होने के कारण वे आदित्य कहलाते हैं, इनकी संख्या द्वादश है। द्वादश आदित्यों का उल्लेख – शतपथ ब्राह्मण, पुराणों तथा महाभारत में प्राप्त होता है — धाता, मित्र, अर्यमा, शक्र, वरुण, इन्द्र, विवस्वान, विष्णु, अंशु, भग, पूषा और सविता।
- सूर्यदेव आगम-निगम-संस्तुत और ज्ञान-विज्ञान-सम्मत देवाधिदेव परम देवता हैं। उन्हें पृथ्वी के लोकजीवन का साक्षी और सांसारिक प्राणियों के नेत्रों का प्रकाशक कहा गया है। इसलिए उनको “लोकसाक्षी” और “जगच्चछु” भी कहते हैं।
- लिङ्गपुराणके उत्तरभागके २२वें अध्यायमें सूर्योपासनाका बहुत ही सुन्दर वर्णन किया गया है। सूर्यमें और ब्रह्म परमात्मामें कोई भेद नहीं है। ब्रह्मके भर्ग-तेजका रूप ही सूर्यनारायण हैं। जो तीनों काल भगवती गायत्रीका जप करते हैं, वे सूर्यनारायणकी ही उपासना करते हैं। लिङ्गपुराणद्वारा बतायी विधिसे जो सूर्योपासना करेंगे, उनकी मन:कामना तत्काल पूर्ण होगी—ऐसा पुराण का मत है।
- सूर्यरथ में जुते हुए घोड़े वैदिक सप्त संख्यात्मक छन्द हैं जिनके नाम – गायत्री, त्रिष्टुप् जगती, अनुष्टुप्, पंक्ति, वृहती एवं उष्णिक् हैं ।
- सूर्य के गमन से ही संवत्सर, ऋतुएं, काल, दक्षिणायन एंव उत्तरायण, मुहूर्त,कला, क्षण, निमेष, रात तथा दिन का सम्बन्ध है ।
- देवताओं में सूर्य का एक विशिष्ट स्थान है, वे पंचदेवों में एक देव हैं, वे शरीर धारण करके प्रगट हो जाते हैं, वे मनुष्यों से भी सम्बन्ध स्थापित करते हैं , सूर्यदेव का वंश पृथ्वी पर इक्ष्वाकु के नाम से चलता है । भगवान् ने सूर्य को, सूर्यदेव ने मनु जी को, मनु ने इक्ष्वाकु आदि को कर्मयोगधर्म का उपदेश भी दिया है ऐसा भगवत गीता में उल्लेख है।
- योग आसनों में ‘सूर्यनमस्कार’ अत्यंत प्राथमिकता दी गयी है। सूर्य देव को नमस्कार प्रिय है और शास्त्रों में कहा गया है की जो व्यक्ति प्रतिदिन सूर्य देव को नमस्कार करता है वह हज़ार जन्मो में भी कभी दरिद्र नहीं होता।
भविष्यपुराण के अनुसार प्रत्यक्षदेव तथा संसार के नेत्रस्वरूप समस्त कालखण्ड को दिन एवं रात्रि में विभाजित करने वाले सूर्य सर्वश्रेष्ठ देव हैं। युगों की काल– व्यवस्था, जगत की उत्पत्ति, स्थिति एवं लय सूर्य से ही सम्बन्धित हैं। इसी कारण ग्रह, नक्षत्र, योग, राशि, करण, वसुदेवता, रुद्र, अश्विनी कुमार, वायु, अग्नि, प्रजापति, भूः, भुवः, स्वः — सभी लोक, नदी, पर्वत, सागर, जीव-समूह — सभी सूर्य से ही उत्पन्न होते हैं। सूर्य के उदय एवं अस्त से ही प्राणिमात्र चराचर विश्व का उदय एवं अस्त तथा क्रियाशीलता निर्धारित एवं निश्चित है।
श्री गणेश, सूर्य-देव , माँ दुर्गा , शिव जी और भगवान विष्णु ही पांच-देव हैं – सभी कार्यों में पंचदेवों का पूजन अनिवार्य है
पञ्चदेवोपासना में सूर्य-पूजा होती है । श्री गणेश, सूर्य-देव , माँ दुर्गा , शिव जी और भगवान विष्णु – ये पाँच देव हैं, जिनकी पूजा वैष्णवजन सब कार्यों के आरम्भ में करते हैं। इनकी पूजा करनेवाले कभी भी संकट या कष्टों में नहीं पड़ते । इन पञ्चदेवों की उपासना के लिये शैव, गाणपत्य, शाक्त, सौर और वैष्णव-सम्प्रदाय पृथक्-पृथक् भी हैं; किंतु सामान्य वैष्णव-पूजा में कपिलतन्त्र के अनुसार पञ्चदेवोपासना को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है । कारण यह है कि पञ्चदेव पञ्चभूत (पांच तत्व) के अधिष्ठाता हैं। आकाश के विष्णु जी, वायु के सूर्य-देव, अग्नि की शक्ति (माँ दुर्गा ) , जल के श्री गणेश और पृथ्वी के शिव जी अधिपति हैं । पञ्चभूत ब्रह्म के स्वरूप हैं। अतः पञ्चदेवोपासना ब्रह्म की ही उपासना है ।
पंचदेवों में सूर्यदेव ही ब्रह्मा हैं जो सृष्टि का सृजन करते हैं
सूर्य जगत्के सृष्टिकर्ता – ब्रह्मा हैं – अमरकोश (स्व० व० १६) में ब्रह्माको हिरण्यगर्भ कहा गया है –
ब्रह्मात्मभूः सुरज्येष्ठः परमेष्ठी पितामहः । हिरण्यगर्भो लोकेशः स्वयम्भूश्चतुराननः ॥
वेदोंमें और पुराणादि धर्म-ग्रन्थों में भी सूर्य को हिरण्यगर्भ, आदित्य तथा विधाता के नामों से सृष्टिकर्ता कहा गया है; यथा-
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । स दाधार दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥
(ऋ० १० । १२१ । १; वा यजु० १३ । ४; अथर्व० ४। २ । ७; तै० सं० ४। १ । ८ । ३; ताण्ड्य ब्रा० ९ । ९ । १२; नि० १० । २३)
निरुक्तके टीकाकार दुर्गाचार्य के अनुसार उक्त मन्त्रका अर्थ यह है—हिरण्यगर्भ ब्रह्मा (ब्रह्मणो या हिरण्यगर्भावस्था ) सकल प्राणियों की उत्पत्ति के पूर्व स्वयं शरीरधारण करते हैं। वे एकमात्र सृष्टिकर्ता हैं जो जगत के सम्बन्ध-भूत स्थावर-जङ्गमादि के ईश्वर हैं। वे अन्तरिक्ष लोक, द्युलोक और भूलोक को धारण करते हैं। इन सभी तत्त्वों में वे ओतप्रोत होकर वास करते हैं। उन महान् प्रजापति के लिये हम हवि प्रदान करते हैं।
आकाशस्याधिपो विष्णुरग्नेश्चैव महेश्वरी । वायोः सूर्यः क्षितेरीशो जीवनस्य गणाधिपः ॥
विष्णु आकाश के स्वामी हैं, अग्नि की महेश्वरी, वायु के सूर्य, पृथ्वी के शिव जी और जल श्री गणेश अधिदेवता हैं । इनके अस्तित्व के बिना पांचभौतिक देह का कोई अस्तित्व नहीं रह जाता , इसी कारण सभी कर्मों और पूजन आदि में पाँचों देवताओं की पूजा उपासना का विधान है ।

संध्या वंदन ही वैदिक सनातन धर्म में प्रमुख और अनिवार्य नित्य कर्म है!
त्रिकाल संध्या:
दो कालों की संधि (मिलन) को संध्या कहते हैं,
प्रातः संध्या : सुबह सूर्योदय के समय जब रात्रिकाल का समापन होता है और दिन का प्रारम्भ होता है वह प्रातःकाल की संध्या काल है,
सांय संध्या : इसी तरह सांय काल में जब सूर्यास्त होता है और रात्रि के प्रारम्भ होने का समय होता है वह सायं काल की संध्या कहलाती है,
मध्यान्ह संध्या : प्रातः काल और सायं काल के मध्य का काल मध्यान्ह संध्या काल कहलाता है (दोपहर के समय)
ये तीन काल प्रतिदिन संध्या-वंदन अर्थात सांध्या काल में विधि-अनुसार गायत्री जप करने के समय / काल हैं । इन तीनो कालों में संध्या वंदन करने को ही त्रिकाल संध्या कहा जाता है।
द्विजातियों (अर्थात जो यज्ञोपवीत धारण करते हैं – ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ण के पुरुष) को संध्या-वंदन करना अनिवार्य है , संध्या वंदन किये बिना किसी भी मनुष्य का कोई भी वैदिक धर्म-कार्य सफल नहीं होता, जो पुरोहित जी धर्म अनुष्ठान करवाते हैं उनका त्रिकाल संध्या वंदन करना अनिवार्य होता है अन्यथा उनके द्वारा करवाए गए सभी पूजन अनुष्ठान व्यर्थ होते हैं, श्राद्ध में भोजन आदि ग्रहण करने के लिए तो त्रिकाल-संध्या करने वाले ब्राह्मण ही अनिवार्य हैं जो कम से कम १००० बार नित्य गायत्री मन्त्र जाप करते हों, अन्यथा श्राद्ध कर्म में उलटे परिणाम भी हो सकते हैं जो की पितरों के कुपित होने के कारण होते हैं ।ये तीन काल प्रतिदिन संध्या-वंदन अर्थात सांध्या काल में विधि-अनुसार गायत्री जप करने के समय / काल हैं । इन तीनो कालों में संध्या वंदन करने को ही त्रिकाल संध्या कहा जाता है।
ध्येयः सदा सवितृ-मण्डल-मध्य-वर्ती | नारायणः सरसिजासन-सन्निविष्टः ||
केयूरवान् मकर-कुण्डलवान् किरीटी | हारी हिरण्यमय-वपुर्धृत-शङ्ख-चक्रः ||
भगवान् सूर्य नारायण तपे हुए स्वर्ण जैसे कांतिमान शरीर को धारण किये हुए हैं, उनके गले में हार एवं सर पर किरीट विराजमान है । उनके कान मकरकुण्डल से सुशोभित हैं। वे कंगन से अलंकृत अपने दोनों हांथों में भक्त भय निवारण के लिए शंख-चक्र धारण किये हुए हैं। वे सूर्यमण्डल में कमलासन पर विराजित हैं। इसी प्रकार गायत्री का जप करते समय भी सूर्यमण्डल में भगवान् का चिंतन करना चाहिए । जो दैनिक पूजा का एक महत्वपूर्ण एवं अनिवार्य नित्य कर्म है ।
संध्या-वंदन में गायत्री-मन्त्र जाप भगवान सूर्य की ही उपासना है
भगवान् सूर्य परमात्मा नारायण के साक्षात् प्रतीक हैं, इसीलिये वे सूर्यनारायण कहलाते हैं । यही नहीं, सर्ग के आदि में भगवान् नारायण ही सूर्यरूप में प्रकट होते हैं, इसलिये पञ्चदेवों में सूर्य की भी गणना है। यों भी वे भगवान् की प्रत्यक्ष विभूतियों में सर्वश्रेष्ठ, हमारे इस ब्रह्माण्ड के केन्द्र, स्थूल काल के नियामक, तेज के महान् आकर, विश्व के पोषक एवं प्राणदाता तथा समस्त चराचर प्राणियों के आधार हैं। वे प्रत्यक्ष दिखने वाले सारे देवों में श्रेष्ठ हैं। इसलिये सन्ध्या (संध्या-वंदन) में सूर्यरूप से ही भगवान् की उपासना की जाती है । उनकी उपासना से हमारे तेज, बल, आयु एवं नेत्रों की ज्योति की वृद्धि होती है और अंत समय वे हमें अपने लोक में से होकर भगवान के परमधाम में ले जाते हैं; क्योंकि भगवान् के परमधाम का रास्ता सूर्य-लोक में से होकर ही गया है। शास्त्रों में लिखा है कि योगी लोग तथा कर्तव्य रूप से युद्ध में वीरगति को प्राप्त होने वाले क्षत्रिय वीर, सूर्य-मण्डल को भेदकर भगवान् के धाम जाते हैं। गायत्री मन्त्र में भगवान् सूर्य की ही परमात्मा भाव से स्तुति की गयी है ।
सूर्य का एक नाम सविता भी है। सविता की शक्ति को ही सावित्री कहते हैं। ‘तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात्’ – यह सविता का मन्त्र है। इसमें गायत्री छन्द का प्रयोग होने के कारण इसी को गायत्री-मन्त्र कहने लगे हैं । संक्षेप में इस मन्त्र का अर्थ है—देदीप्यमान भगवान् सविता (सूर्य) के उस तेज का हम ध्यान करते हैं। वह (तेज) हमारी बुद्धि का प्रेरक बने, सत्मार्ग पर लगाए ।
जितने महत्वपूर्ण हमारे नित्य स्नान, शौचाचार, भोजन और निद्रा आदि के नियम हैं और अनिवार्य हैं उतने ही महत्वपूर्ण और अनिवार्य संध्या-वंदन यानि नित्य प्रति भगवान् सूर्य का पूजन भी है।
प्रातःकाल सन्ध्या का सही समय
उत्तमा तारकोपेता मध्यमा लुप्ततारका । कनिष्ठा सूर्यसहिता प्रातः सन्ध्या त्रिधा स्मृता ॥ – ( देवीभागवत ११। १६। ४)
जो लोग सन्ध्योपासन करते ही नहीं, उनकी अपेक्षा तो वे भी अच्छे हैं जो देर-सबेर, कुछ भी खानेके पूर्व सन्ध्या कर लेते हैं। उनके द्वारा कर्म का अनुष्ठान तो हो ही जाता है और इस प्रकार शास्त्रकी आज्ञा का निर्वाह हो। जाता है। वे कर्मलोप के प्रायश्चित्त के भागी नहीं होते। उनकी अपेक्षा वे अच्छे हैं, जो प्रातःकाल में तारों के लुप्त हो जाने पर सन्ध्या प्रारम्भ करते हैं। किंतु उनसे भी श्रेष्ठ वे हैं, जो उषाकाल में ही तारे रहते सन्ध्या करने बैठ जाते हैं, सूर्योदय होने तक खड़े होकर गायत्री मन्त्र का जप करते हैं। इसी बातको लक्ष्य में रखकर सन्ध्या के उत्तम, मध्यम और अधम-तीन भेद किये गये हैं।
सायं-सन्ध्या का सही समय
उत्तमा सूर्यसहिता मध्यमा लुप्तभास्करा । कनिष्ठा तारकोपेता सायंसन्ध्या त्रिधा स्मृता ॥ – (देवीभागवत ११। १६ । ५)
प्रातः सन्ध्या के लिये जो बात कही गयी सायं-सन्ध्या के लिये उससे विपरीत बात समझनी चाहिये। अर्थात् सायंसन्ध्या उत्तम वह कहलाती है, जो सूर्यके रहते की जाय तथा मध्यम वह है, जो सूर्यास्त होनेपर की जाय और अधम वह है, जो तारों के दिखाई देने पर की जाए
भाग -१ में हमने संक्षेप में सूर्यनारायण भगवान् के माहात्म्य को जाना, सबसे महत्वपूर्ण जानकारी जिसके बारे में बहुत काम लोगो को ज्ञात है वह है –
१. सूर्य देव पञ्च-देवों में हिरण्यगर्भ भगवान् ब्रह्म हैं और सृष्टि का सृजन करते हैं
२. संध्या वंदन, में गायत्री जप के साथ पूरी विधि भगवान् सूर्य की ही उपासना है
आगे आने वाले भागों में हम सूर्य भगवान् के अन्य उपासना विधि और उनके अनेक लाभों के बारे में जानेंगे
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References:
- Kalyan, Suryank, Geetapress Gorakhpur,
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जनकसुता जग जननी जानकी, अतिशय प्रिय करुणा निधान की।। ताके जुगपद कमल मनावउँ, जासु कृपा निर्मल मति पावउँ।
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