84 lakh yoniyan part 2 (चतुर्विध सर्ग सृष्टि) भाग २
यदि आपने पहला भाग नहीं पढ़ा है, तो यहाँ पढ़ें: 84 lakh yoniyan part 1
चतुर्विध सर्ग – चार प्रकार की सृष्टि
चतुर्विध सर्ग: भारतीय दर्शन में सृष्टि का वैज्ञानिक और रहस्यमय वर्गीकरण
प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान की गहराई को यदि समझना हो, तो हमें केवल खगोल या गणित तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि जीवन की उत्पत्ति के विज्ञान को भी देखना चाहिए। आज से हज़ारों वर्ष पहले, जब आधुनिक जीव विज्ञान (Biology) अपनी शैशवावस्था में था, हमारे ऋषियों ने प्राणियों की उत्पत्ति और उनके वर्गीकरण का एक ऐसा अद्भुत और वैज्ञानिक ढाँचा प्रस्तुत किया, जिसे ‘चतुर्विध सर्ग’ (चार प्रकार की सृष्टि) कहा जाता है।
महाभारत, मनुस्मृति और अन्य पुराणों में वर्णित यह सिद्धांत बताता है कि इस ब्रह्मांड में जीवात्माएं मुख्य रूप से चार प्रकार से शरीर में प्रविष्ट होतीं हैं । यह मात्र एक धार्मिक वर्गीकरण नहीं, बल्कि जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों के जन्म की प्रक्रिया (Embryology) और उनके मूल तत्व (Pancha Mahabhuta) को समझने का एक गहरा विज्ञान है ।
आइए, इस महान प्राचीन विज्ञान को जानें कि ऋषियों ने जीवन के रहस्यों को, जीव योनिओं को किस प्रकार चार श्रेणियों में बाँटा था ।
यहाँ इन चार श्रेणियों और उनसे जुड़े अद्भुत तथ्यों का सरल विवरण दिया गया है।

सृष्टि में मूलतः दो प्रकार के जीव हैं — स्थावर (जो स्थिर हैं, जैसे पेड़) और जंगम (जो गतिशील हैं, जैसे पशु-मनुष्य)। इन जंगम और स्थावर जीवों की उत्पत्ति के लिए चार प्रकार की योनियाँ (जन्म प्रक्रियाएँ) बताई गई हैं। आत्मा अपने कर्मों के अनुसार इन शरीरों को धारण करती है:
क. जरायुज
यह सृष्टि का वह वर्ग है जो सबसे उन्नत और जटिल माना जाता है। जरायुज वे प्राणी हैं जो गर्भ (जेर/Placenta) के आवरण से ढके हुए पैदा होते हैं।
उत्पत्ति का विज्ञान: जरायुज प्राणी रज (मातृ अंश) और वीर्य (पितृ अंश) के संयोग से गर्भ में विकसित होते हैं। उदाहरण: मनुष्य, सभी प्रकार के पशु (जैसे गाय, शेर, हाथी), और हिंसक प्राणी (व्याल)। महत्त्व: सभी जरायुज प्राणियों में मनुष्य को सर्वोपरि स्थान दिया गया है, क्योंकि यही वह योनि है जहाँ आत्मा को अपने कर्मों को समझने और मोक्ष की ओर बढ़ने की सबसे अधिक स्वतंत्रता मिलती है।

ख. अण्डज
जैसा कि नाम से स्पष्ट है, ये वे जीव हैं जिनका जन्म अंडे से होता है।
उत्पत्ति का विज्ञान: अण्डज प्राणियों का जन्म नमी (क्लेद) और बीज के मेल से अंडे के रूप में होता है। उदाहरण: पक्षी (खेचर), साँप (सर्प), मगरमच्छ (नक्र), मछली (मत्स्य) और कछुए। इसमें स्थलचर और जलचर दोनों शामिल हैं। पहचान: शास्त्रों में इनकी एक अद्भुत पहचान बताई गई है—इनके कान बाहर नहीं दिखते, बल्कि केवल एक छोटा छेद (छिद्र) होता है।

ग. स्वेदज
यह वह वर्ग है जिसे आज हम ‘सूक्ष्म जीव’ या ‘कीट-पतंगे’ कहते हैं, जिनकी उत्पत्ति के पीछे नमी, गर्मी और गंदगी मुख्य कारण होती है।
उत्पत्ति का विज्ञान: स्वेदज जीव सर्दी, गर्मी और नमी (पसीना या सीलन) के मेल से जीवन पाते हैं। ये किसी बीज या गर्भ से नहीं, बल्कि स्वयं ही उत्पन्न होते हुए प्रतीत होते हैं। उदाहरण: मच्छर (दंश/मशक), जूँ (यूका), मक्खी, खटमल और गोबर (गोमय) आदि से पैदा होने वाले कीड़े (कृमि)। महत्त्व: यह श्रेणी बताती है कि जीवन के लिए जटिल यौन प्रजनन हमेशा आवश्यक नहीं होता; अनुकूल वातावरणीय परिस्थितियाँ भी जीवन को जन्म दे सकती हैं।

घ. उद्भिज्ज
यह सृष्टि का वह स्थिर, शांत और हरा-भरा भाग है, जिसे हमने अक्सर अचेतन मान लिया है। ‘उद्भिज्ज’ का अर्थ है—जो धरती को फोड़कर बाहर निकलता है (उद् + भिज्)। उत्पत्ति का विज्ञान: इनका जन्म पृथ्वी और जल के संयोग से होता है। उदाहरण: वृक्ष, लताएँ (बेल), वल्ली (लताएँ), गुल्म (झाड़ियाँ) और तृण (घास) आदि।

उद्भिज्ज का रहस्य: पौधों में चेतना (अन्तःसंज्ञा)
उद्भिज्ज यानी पेड़-पौधे। आधुनिक विज्ञान ने 19वीं सदी के बाद यह स्वीकार किया कि पौधों में भी जीवन और संवेदनशीलता होती है, लेकिन भारतीय शास्त्रों ने तो हज़ारों साल पहले ही यह तथ्य स्थापित कर दिया था। मनुस्मृति और महाभारत स्पष्ट रूप से कहते हैं कि वृक्ष केवल जड़ पदार्थ नहीं हैं:
“पूर्व जन्मके कर्मों के अनुसार अत्यधिक तमोगुणसे युक्त ये ‘वृक्ष’ आदि अन्तश्चेतनावाले तथा सुख-दुःख से युक्त हैं।”
इसका अर्थ है कि वृक्ष आदि जीव अत्यधिक अज्ञान (तमोगुण) से ढके रहने के कारण बाहर से स्थिर दिखते हैं, लेकिन उनमें भीतरी चेतना (अन्तश्चेतना) होती है, और वे सुख-दुःख दोनों महसूस करते हैं।
पौधों के तीन मुख्य प्रकार
शास्त्रों ने उद्भिज्ज श्रेणी को भी उनकी जन्म और जीवन-शैली के आधार पर तीन उप-भागों में बाँटा है:
- ओषधि (Oushadhi): वे पौधे जो बहुत फल-फूल देते हैं, लेकिन फल पकने के बाद स्वयं नष्ट (सूख) जाते हैं (जैसे धान, गेहूँ)।
- वनस्पति (Vanaspati): वे पेड़ जिनमें फूल नहीं लगते, पर फल लगते हैं (जैसे अंजीर, गूलर)।
- वृक्ष (Vriksha): वे पेड़ जिनमें फूल लगने के बाद फल आते हैं (जैसे आम, सेब)।
इसके अलावा, गुच्छ (झाड़ियाँ), गुल्म, तृण और वल्ली (बेल) भी उद्भिज्ज श्रेणी के ही अंग हैं।
वृक्षों में पाँच इन्द्रियों का प्रमाण
वृक्षों में चेतना (जीवन) सिद्ध करने के लिए शास्त्रों ने पंच ज्ञानेन्द्रियों की उपस्थिति को उदाहरणों के साथ समझाया, जो आज के बॉटनी (Botany) से मेल खाता है:

इस प्रकार, हजारों वर्ष पहले ही यह सिद्ध किया गया कि वृक्ष केवल अचेतन जड़ पदार्थ नहीं हैं, बल्कि वे जीवन (जीव) हैं।
जीवन का वास्तुशिल्प: पाञ्चभौतिक शरीर
चतुर्विध सर्ग के किसी भी प्राणी का शरीर—चाहे वह उड़ता पंछी हो या स्थिर पौधा—मूल रूप से एक ही वास्तुशिल्प पर आधारित है: पाँच महाभूत (Pancha Mahabhuta)।
शास्त्रों का सिद्धांत है: “सर्व द्रव्यं पाञ्च भौतिकम्” (हर पदार्थ पाँच तत्वों से बना है)। ये पाँच तत्व केवल बाहरी पर्यावरण में नहीं हैं, बल्कि वे हमारे शरीर के आंतरिक हिस्सों का भी निर्माण करते हैं।

शरीर के निर्माण में माता-पिता का योगदान
स्थूल (बाहरी) शरीर को षट्कोशिक (छह कोशों वाला) कहा गया है, जिसका निर्माण माता और पिता के अंशों से होता है:
- पितृज गुण (पिता से): अस्थि (हड्डी), स्नायु (नसें) और मज्जा।
- मातृज गुण (माता से): त्वचा, मांस और रक्त (खून)।
चतुर्विध सर्ग का यह ज्ञान अंततः उस व्यापक सिद्धांत से जुड़ता है जिसे ‘चौरासी लाख योनियाँ’ कहा गया है। यह संख्या कोई मनगढ़ंत कल्पना नहीं, बल्कि सृष्टि में जीवन के विभिन्न प्रकारों का प्राचीन गणित है:

यह गणित बताता है कि जीव (आत्मा) अपने कर्मों के अनुसार इन योनियों में भटकता है। जब पुण्य और पाप बराबर होते हैं, तब जीव को मनुष्य योनि प्राप्त होती है—जो सभी जरायुजों में श्रेष्ठ है—क्योंकि केवल मनुष्य शरीर से ही मोक्ष प्राप्ति संभव है और ८४ लाख योनियों में किसी भी योनि में नहीं
मनुष्य जीवन और दुर्लभ मनुष्य देह को समझना
चतुर्विध सर्ग का यह सिद्धांत दिखाता है कि भारतीय ऋषि जीवन को टुकड़ों में नहीं, बल्कि एक अखंड इकाई के रूप में देखते थे। उन्होंने यह समझा कि पत्थरों से लेकर मनुष्य तक हर चीज़ पाँच तत्वों से बनी है; हर गतिशील प्राणी पाँच प्राण वायुओं से चलता है; और हर जीव—चाहे वह पेड़ हो या पशु—सुख-दुःख महसूस करता है।
इस ज्ञान को हृदय से समझने वाला व्यक्ति अवश्य ही कृतार्थ (सफल) होता है, क्योंकि वह स्वयं को सृष्टि के नियमों से अलग नहीं, बल्कि उसी का एक हिस्सा मानता है। यह केवल जीवन का वर्गीकरण नहीं, बल्कि जीवन की महानता को समझने का एक गहरा, शाश्वत और वैज्ञानिक विवरण है।
देव योनियों के अद्भुत रहस्य हम भाग ३ में विस्तार से जानेगें
इस शृंखला के अगले महत्वपूर्ण भाग को पढ़ने के लिए क्लिक करें: : 84 lakh yoniyan part 3
References:
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सार्वभौम सनातन सिद्धांत, रचियता – पूर्वाम्नाय गोवर्धनमठ- पुरी पीठाधीश्वर – श्रीमद जगतगुरु शंकराचार्य – पूज्यनीय स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी ।
- https://www.youtube.com/watch?v=iPF2XAzGx2M

Anupam Trivedi has spent over three decades studying and reflecting upon Sanatan scriptures, including the Vedas, Upanisads, Itihāsa, and Purāṇas. He writes on cultural philosophy and ancient literature to present traditional insights with accuracy and clarity. Read full bio →

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