श्रीकृष्ण जन्म के दुर्लभ रहस्य: जो बहुत कम लोग जानते हैं
श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य भारतीय वांग्मय की सर्वाधिक भावपूर्ण एवं दार्शनिक लीलाओं में से एक है। सामान्यतः लोक-कथाओं और प्रचलित मान्यताओं में इस प्रसंग का वर्णन केवल इतना ही मिलता है कि कंस के कारागार में वासुदेव-देवकी के सम्मुख चतुर्भुज रूप में प्रभु प्रकट हुए, वसुदेव जी उन्हें यमुना पार कराकर नन्दालय में रख आए और वहाँ से कन्या को लेकर लौट आए।
किंतु आर्ष ग्रंथों—यथा श्रीमद्भागवत, महाभारत के खिलभाग ‘हरिवंश पुराण’, ‘विष्णु यामल आगम’ तथा गौड़ीय वैष्णव आचार्यों की प्रामाणिक टीकाओं के अनुशीलन से विदित होता है कि इस प्राकट्य के अंतर्गत अनेक ऐसे सूक्ष्म और तात्विक पक्ष हैं, जो जनमानस में प्रायः स्पष्ट नहीं हैं। पूज्य संतों के प्रवचनों और शास्त्रीय प्रमाणों के प्रकाश में इन विषयों का सांगोपांग विवेचन प्रस्तुत है।

इस आलेख में हम पूज्य संतों के प्रवचनों और शास्त्रों के आधार पर श्रीकृष्ण जन्म से जुड़े इन प्रमुख रहस्यों पर विस्तार से चर्चा करेंगे:
- क्या यशोदा जी के गर्भ से भी श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था?
प्रचलित कथा कहती है कि यशोदा जी ने केवल एक कन्या (माया) को जन्म दिया था और कृष्ण मथुरा से आए थे। परंतु हरिवंश पुराण और विष्णु यामल आगम के अनुसार, यशोदा जी के गर्भ से एक साथ दो संतानों (लाला और लाली) ने जन्म लिया था। फिर मथुरा वाले लाला और गोकुल वाले लाला आपस में कैसे विलीन हो गए?
- ‘वासुदेव‘ और ‘बिहारी‘ नाम के पीछे का ज्योतिषीय भेद:
मथुरा और गोकुल में भगवान के प्राकट्य समय में कुछ पलों का अंतर था। रोहिणी नक्षत्र के अलग-अलग चरणों के आधार पर एक ही प्रभु का नाम मथुरा में ‘वासुदेव’ और गोकुल में ‘बांके बिहारी’ कैसे पड़ा?
- बलराम जी को देवकी के गर्भ से रोहिणी के गर्भ में क्यों भेजना पड़ा?
देवकी का सातवाँ गर्भ नष्ट नहीं हुआ था, बल्कि शेषजी को स्थानांतरित किया गया था। यदि बलराम जी कारागार में जन्म लेते, तो कंस का वध उसी दिन क्यों हो जाता और श्रीकृष्ण की पूरी बाल-लीला ही क्यों रुक जाती?
- आकाशवाणी ने ‘पुत्र‘ या ‘कन्या‘ न कहकर ‘आठवाँ गर्भ‘ ही क्यों कहा?
देवताओं ने कंस से यह क्यों नहीं कहा कि आठवाँ बेटा तुम्हें मारेगा? इस एक शब्द ‘गर्भ’ के पीछे देवताओं की क्या कूटनीति थी जिससे कंस भ्रम में पड़ गया?
- कंस के हाथ से छूटी कन्या (महामाया) और उनके १४ गुप्त धाम:
वह कन्या आकाश में जाकर विंध्यवासिनी बनी। भगवान ने उन्हें कौन से १४ नाम और स्थान दिए, जिनकी पूजा आज वैष्णो देवी, विंध्याचल और शारदा पीठ जैसे प्रमुख धामों में होती है?
- हाथ में कृष्ण आए तो बेड़ियाँ खुलीं, कन्या आई तो दोबारा क्यों बंधीं?
वसुदेव जी जब श्रीकृष्ण को लेकर चले तो कारागार के ताले और हथकड़ियाँ स्वतः टूट गईं। लेकिन गोकुल से जब वे कन्या (माया) लेकर लौटे, तो बेड़ियाँ अपने आप फिर से क्यों लग गईं? इसका वास्तविक आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
- ठाकुर जी तीन जगह से टेढ़े (त्रिभंग ललित) क्यों हुए और नंद बाबा कपड़े सहित यमुना में क्यों कूदे?
नवजात कन्हैया के तीन जगह से मुड़ने के पीछे माता देवकी के वात्सल्य की क्या मधुर कथा है? साथ ही, पुत्र जन्म का समाचार सुनते ही नंद बाबा ने कपड़े पहने हुए ही यमुना जी में छलांग क्यों लगाई?
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क्या यशोदा जी के गर्भ से भी श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था?

साधारणतः यह समझा जाता है कि माता यशोदा के गर्भ से केवल एक कन्या (महामाया) का जन्म हुआ था। किंतु महाभारत के खिलभाग ‘हरिवंश पुराण’ में महर्षि वेदव्यास ने स्पष्ट उल्लेख किया है कि नन्द-रानी यशोदा के गर्भ से एक साथ दो संतानों का प्राकट्य हुआ था:
नन्द पत्न्यां यशोदायां मिथुनं समपद्यत। ततोऽनुजायत यशोदायाः समे तदहनि द्वयम्॥
यहाँ ‘मिथुनं’ पद का स्पष्ट अर्थ है—जुड़वाँ संतानें। यशोदा जी के गर्भ से एक साथ बालक (श्रीगोविन्द) और कन्या (भगवती योगमाया) का प्राकट्य हुआ।
गोकुल की प्राचीन परंपरा में भी यह विवरण मिलता है कि प्रसव के पूर्व नन्द बाबा के पिता पर्जन्य जी के समय की वृद्धा दाई ने यशोदा जी के उदर का परीक्षण करके सूचित किया था कि गर्भ में बालक और बालिका दोनों के लक्षण उपस्थित हैं।
फिर यह प्रश्न उपस्थित होता है कि यदि यशोदा जी के भी पुत्र हुआ, तो दो बालक दृष्टव्य क्यों नहीं हुए? इसका समाधान ‘विष्णु यामल आगम’ के उस श्लोक से प्राप्त होता है, जिसे श्रील सनातन गोस्वामी पाद ने श्रीमद्भागवत (१०.३.४७) की ‘बृहद्वैष्णवतोषणी’ टीका में उद्धृत किया है:
वासुदेव-समानेतो वासुदेवोऽखिलात्मनि। लीनो नन्दसुते राजन् घने सौदामिनी यथा॥
अर्थात्, मथुरा से वसुदेव जी जिस बालक को लेकर आए थे, वे वासुदेव गोकुल पहुँचते ही यशोदा-नन्दन बालक में उसी क्षण विलीन हो गए, जैसे सघन मेघ में तड़ित् (आकाशीय विद्युत) समाहित हो जाती है।
दो स्वरूपों का तात्विक भेद:
- नन्दनन्दन श्रीकृष्ण: यह भगवान का नित्य माधुर्य-विग्रह है, जो ब्रजधाम को छोड़कर कभी अन्यत्र नहीं जाते (वृन्दावनं परित्यज्य पादमेकं न गच्छति)। वे नित्य गऊ-चारण, माखन-चोरी और रास आदि माधुर्य-लीलाओं के अधिष्ठाता हैं।
- वसुदेव-नन्दन श्रीकृष्ण: यह ऐश्वर्य-विग्रह है, जो असुरों (पूतना, तृणावर्त, बकासुर, कंस आदि) के संहार और मथुरा-द्वारका की राज-लीलाओं का निर्वहन करते हैं।
२. नक्षत्र-चरण के आधार पर नामकरण का शास्त्रीय विज्ञान
ज्योतिष शास्त्र की नामाक्षर-पद्धति के अनुसार भी मथुरा और गोकुल के प्राकट्य में सूक्ष्म चरण-भेद था। भगवान का अवतरण रोहिणी नक्षत्र में हुआ। रोहिणी के चार चरण क्रमशः ‘ओ, वा, वी, वू’ अक्षरों का प्रतिनिधित्व करते हैं:
- द्वितीय चरण (अक्षर ‘वा’): मथुरा के कारागार में अर्धरात्रि के समय रोहिणी नक्षत्र के द्वितीय चरण में देवकी-नन्दन का प्राकट्य हुआ, जिससे वे ‘वासुदेव’ कहलाए।
- तृतीय चरण (अक्षर ‘वी/बी’): इसके अनंतर रोहिणी के तृतीय चरण में नन्द-भवन में प्राकट्य हुआ, जिससे नामाक्षर ‘वी’ के आधार पर उनका नाम ‘बिहारी’ (बांके बिहारी, ब्रज बिहारी) हुआ।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने ‘विनय पत्रिका’ में इसी तथ्य को रेखांकित करते हुए लिखा है:
सुर मुनि विप्र बिहाय बड़े कुल, गोकुल जन्म गोप ग्रह लीनो।
अर्थात् प्रभु ने गोकुल में गोप (नन्द जी) के घर वास्तविक रूप से जन्म ग्रहण किया।
३. सप्तम गर्भ का संकर्षण एवं शेषजी के स्थानांतरण का कारण
प्रायः लोग समझते हैं कि देवकी माता का सातवाँ गर्भ स्वाभाविक रूप से गिर गया था, किंतु यह भगवान की अत्यंत सुविचारित और रणनीतिक लीला थी।
जब देवकी के सातवें गर्भ में स्वयं शेषावतार लक्ष्मण जी (बलराम जी) पधारे, तो भगवान ने अपनी शक्ति योगमाया को आज्ञा दी कि वे इस गर्भ को सुरक्षित निकालकर गोकुल में नंद भवन में निवास कर रहीं वसुदेव जी की दूसरी पत्नी माता रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दें।
लेकिन ऐसा क्यों किया गया?
पूज्य श्री राजेन्द्र दास जी महाराज इसका अत्यंत अद्भुत और तार्किक रहस्य बताते हैं। दाऊ दादा (बलराम जी) साक्षात् शेषनाग हैं। उनका स्वभाव पीठ दिखाकर भागने का नहीं, अपितु अड़कर दिनदहाड़े रणभूमि में मुकाबला करने का है। वे मध्याह्न १२ बजे प्रकट होने वाले ठाकुर हैं।
यदि दाऊ जी मथुरा के कारागार में जन्म लेते और कंस पूर्ववत नवजात शिशु को मारने के लिए कारागार में आता, तो शेष स्वरूप दाऊ दादा को प्रचंड क्रोध आ जाता। उनकी केवल एक फुफकार से पापी कंस उसी क्षण भस्म हो जाता!
यदि कंस का वध सातवें गर्भ के समय ही हो जाता, तो फिर भगवान श्रीकृष्ण की संपूर्ण अवतार-योजना, उनकी अद्भुत बाल लीलाएँ, माखन चोरी, गोवर्धन धारण और मथुरा गमन की लीलाएँ अवरुद्ध हो जातीं। साथ ही, दाऊ दादा संपूर्ण जीवों के ‘जीवाचार्य’ हैं। शास्त्रों का नियम है कि भगवान का उत्सव आचार्यों की उपस्थिति में ही संपन्न होता है। अतः नंदोत्सव की पूर्णता के लिए जीवाचार्य बलराम जी का पहले से ब्रज में विद्यमान होना अनिवार्य था। इसलिए योगमाया ने उन्हें रोहिणी के गर्भ में संकर्षित कर दिया, जिससे उनका एक नाम ‘संकर्षण‘ भी पड़ा। कंस को यही ज्ञात हुआ कि सातवाँ गर्भ नष्ट हो गया है।

४. आकाशवाणी में ‘अष्टमो गर्भ – देवताओं की कूटनीति
विवाह के उपरांत देवकी की विदाई के समय जब कंस रथ चला रहा था, तब आकाशवाणी हुई थी:
अस्यास्त्वामष्टमो गर्भो हन्ता यं वहसेऽबुध॥
देवताओं ने इस उद्घोषणा में ‘अष्टमः पुत्रः’ अथवा ‘अष्टमा कन्या’ न कहकर केवल ‘अष्टमो गर्भः’ कहा। यह एक अत्यंत सुविचारित शास्त्रीय विधान था। यदि ‘पुत्र’ कहा जाता, तो जब कंस के सम्मुख कन्या (योगमाया) उपस्थित होती, तो आकाशवाणी के प्रति संशय उत्पन्न होता। यदि ‘कन्या’ कहा जाता, तो पुत्र रूप में अवतरित श्रीकृष्ण की सुरक्षा का संकट रहता। ‘गर्भ’ शब्द व्यापक था, जिससे कंस की मति भ्रमित रही और भगवान के प्राकट्य की योजना निर्विघ्न संपन्न हुई।
५. भगवती योगमाया के १४ नाम एवं शक्ति-पीठ
भगवान की आज्ञा पाकर योगमाया ने माता यशोदा के गर्भ से अवतार लिया। जब कंस ने उस सुकोमल नवजात कन्या को शिला पर पटकना चाहा, तो वह उसके हाथ से छिटककर आकाश में अष्टभुजा रूप में प्रकट हो गईं। उन्होंने अट्टहास करते हुए कंस को चेतावनी दी: “अरे मूर्ख! मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारने वाला तो ब्रज में जन्म ले चुका है!”
इसके उपरांत वे भगवती विंध्याचल पर्वत पर जाकर विंध्यवासिनी के रूप में प्रतिष्ठित हुईं। प्राकट्य के समय स्वयं श्रीहरि ने उन्हें वरदान दिया था कि कलियुग में उनके चौदह विशिष्ट स्वरूपों और धामों की पूजा होगी, जो भक्तों के समस्त कष्टों का हरण करेंगे:
- दुर्गा: काशी में पावन दुर्गाकुंड पर प्रतिष्ठित।
- भद्रकाली: अवंतिका (उज्जैन) की पावन भूमि पर।
- विजया: जगन्नाथ पुरी में माता विमला देवी के रूप में।
- वैष्णवी: जम्मू के त्रिकूट पर्वत पर कटरा में विराजमान माँ वैष्णो देवी।
- कुमुदा: राजस्थान के करौली में कैला मैया के रूप में पूजित।
- चण्डिका: पंजाब क्षेत्र में चंडी देवी।
- कृष्णा: दक्षिण भारत में कृष्णा नदी के पावन तट पर।
- माधवी: दक्षिण भारत के दिव्य क्षेत्र में।
- कन्यका: भारत के दक्षिणी छोर पर कन्याकुमारी के रूप में।
- माया: हरिद्वार में प्राचीन मायापुरी की अधिष्ठात्री माया देवी।
- नारायणी: कोल्हापुर की प्रसिद्ध महालक्ष्मी।
- ईशानी: दक्षिण भारत के शक्ति क्षेत्र में।
- शारदा: मध्य प्रदेश के मैहर पर्वत पर विद्यादायिनी शारदा भवानी।
- अम्बिका: मथुरा और वृंदावन के मध्य स्थित अम्बिका वन में।

पूज्य श्री राघवाचार्य जी महाराज के अनुसार, कृष्णावतार में यही योगमाया प्रभु की लीलाओं को सिद्ध करने के लिए तीन रूपों में उनकी बहन बनकर प्रकट हुईं पहली यशोदा-सुता विंध्यवासिनी, दूसरी जगन्नाथ पुरी में विराजित माता सुभद्रा, और तीसरी द्रौपदी, जिन्हें प्रभु ने सदैव अपनी बहन मानकर उनकी रक्षा की।
६. कारागार ईश्वर को पकड़ा तो मुक्ति, माया को पकड़ा तो बंधन
पूज्य श्री रत्नेश जी महाराज ने कारागार के उस दृश्य का अत्यंत गंभीर दार्शनिक मर्म समझाया है, जो प्रत्येक साधक के जीवन का सत्य है। जब मध्यरात्रि में वसुदेव जी ने साक्षात् परब्रह्म श्रीकृष्ण को अपनी गोद में उठाया और मस्तक पर धारण किया, तो तत्क्षण चमत्कार घटित हुआ:
- कारागार के लोहे के कपाट स्वतः खुल गए।
- हाथों और पैरों की बेड़ियाँ टूटकर गिर गईं।
- कंस के दुर्दांत पहरेदार गहरी निद्रा में अचेत हो गए।
- उफनती यमुना जी ने मार्ग दे दिया।
किंतु इसके ठीक विपरीत, जब वसुदेव जी गोकुल में प्रभु को छोड़कर केवल ‘माया’ (उस कन्या) को गोद में लेकर वापस मथुरा आए, तो क्या हुआ? जैसे ही उन्होंने माया को पकड़ा, कारागार के कपाट पुनः बंद हो गए, पहरेदार जाग उठे और वसुदेव जी के हाथों-पैरों में वही लोहे की हथकड़ी-बेड़ियाँ फिर से जकड़ गईं!
इसका तात्विक संदेश अत्यंत स्पष्ट है:
जब तक जीव अपने जीवन में परमात्मा को सिरोधार्य करता है, संसार के सारे बंधन, सारी चिंताएँ और सारे ताले स्वतः कट जाते हैं। किंतु ज्यों ही जीव परमात्मा को विस्मृत करके केवल ‘माया’ को पकड़ने का प्रयास करता है, वह पुनः संसार, मोह और भय के कारागार में बंदी बन जाता है।

७. प्राकट्य के माधुर्य पक्ष
त्रिभंग स्वरूप का रहस्य:
भगवान के ‘त्रिभंग ललित’ (तीन स्थानों से मुड़े हुए) स्वरूप के पीछे संत-परंपरा में एक अत्यंत मधुर भाव प्राप्त होता है। चतुर्भुज रूप का उपसंहार करने के उपरांत प्रभु जब अतिशय सुकोमल नवजात शिशु बने, तो माता देवकी ने वात्सल्य भाव से उन्हें दुग्धपान कराना चाहा। माता के पयोधर के तनिक से भार को भी अति-सुकुमार नवजात प्रभु सहन न कर सके और उस सुकुमारता के कारण वे तीन स्थानों से झुक गए, जिससे वे नित्य ‘त्रिभंग ललित’ कहलाए।
नन्द बाबा का सवस्त्र तीर्थ-स्नान:
पुत्र-जन्म का समाचार पाकर नन्द बाबा ने यमुना जी के जल में ऊँचाई से सवस्त्र छलांग लगाई। धर्मशास्त्रों का यह विधान है कि प्रथम पुत्र के जन्म का समाचार मिलते ही पिता को सवस्त्र पवित्र तीर्थ में कूदकर स्नान करना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि पिता के वेगपूर्वक जल में प्रवेश करने से जो जल-कण ऊपर उछलते हैं, वे पितरों को परम तृप्ति और शांति प्रदान करते हैं। नन्द बाबा ने इसी शास्त्र-मर्यादा का पालन करते हुए पितरों की तृप्ति हेतु यमुना जी में स्नान किया।

उपसंहार
श्रीकृष्ण जन्म का यह प्रसंग केवल कंस-वध की पूर्वपीठिका नहीं है, अपितु यह ऐश्वर्य और माधुर्य के समन्वय, शास्त्र-विधान, योगमाया की शक्ति और विशुद्ध जीव-मुक्ति के दर्शन का एक अद्भुत समागम है। जब इस कथा को संतों और शास्त्रों के इस प्रामाणिक दृष्टिकोण से देखा जाता है, तो इसके प्रति श्रद्धा और तत्व-बोध दोनों सुदृढ़ होते हैं।

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सभी शास्त्रीय स्रोतों, ग्रन्थ-उद्धरणों तथा पूज्य संतों के प्रवचनों के विस्तृत संदर्भ (References) निम्नलिखित हैं:
मुख्य शास्त्रीय संदर्भ एवं ग्रन्थ-उद्धरण (Scriptural References)
- श्रीमद्भागवत महापुराण (दशम स्कन्ध, पूर्वार्ध)
- अध्याय १, श्लोक ३४: आकाशवाणी प्रसंग (“अस्यास्त्वामष्टमो गर्भो हन्ता यं वहसेऽबुध…”) — ‘गर्भ‘ शब्द के शास्त्रीय औचित्य का आधार।
- अध्याय २, श्लोक ६-१२: भगवान द्वारा योगमाया को सप्तम गर्भ (शेषजी) के संकर्षण का आदेश एवं महामाया के १४ पवित्र नामों की उद्घोषणा।
- अध्याय ३, श्लोक ९-१०, ४७-५०: भगवान का चतुर्भुज रूप में प्राकट्य, माता देवकी की प्रार्थना, प्राकृत शिशु बनना तथा वसुदेव जी द्वारा गोकुल गमन।
- अध्याय ४, श्लोक ९-१३: कंस द्वारा कन्या का शिला पर प्रहार, योगमाया का अष्टभुजा रूप में आकाश में प्राकट्य एवं विंध्याचल प्रस्थान।
- अध्याय ५, श्लोक १-३: नन्द भवन में पुत्र-जन्म पर नन्द बाबा का सवस्त्र तीर्थ-स्नान (जातकर्म संस्कार) एवं उत्सव विधान।
- हरिवंश पुराण (महाभारत का खिलभाग – विष्णुपर्व, अध्याय ४)
- श्लोक संख्या: नन्दपत्न्यां यशोदायां मिथुनं समपद्यत। ततोऽनुजायत यशोदायाः समे तदहनि द्वयम्॥
- विवरण: माता यशोदा के गर्भ से एक ही साथ बालक (श्रीगोविन्द) और कन्या (योगमाया) के ‘मिथुन‘ (जुड़वाँ) प्राकट्य का मूल शास्त्रीय प्रमाण।
- विष्णु यामल आगम (एवं श्रील सनातन गोस्वामी पाद कृत ‘बृहद्वैष्णवतोषणी‘ टीका – भागवत १०.३.४७)
- श्लोक संख्या: वासुदेव-समानेतो वासुदेवोऽखिलात्मनि। लीनो नन्दसुते राजन् घने सौदामिनी यथा॥
- विवरण: मथुरा से लाए गए वसुदेव-नन्दन का गोकुल में यशोदा-नन्दन के भीतर सघन मेघ में विद्युत की भाँति विलीन होने का प्रमाण।
- गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘विनय पत्रिका‘
- पद संदर्भ: “सुर मुनि विप्र बिहाय बड़े कुल गोकुल जन्म गोप ग्रह लीनो…” — भगवान द्वारा नन्दालय में वास्तविक जन्म ग्रहण करने का प्रमाण।
संत-प्रवचन संदर्भ एवं वीडियो लिंक्स (Pravachan Sources & URLs)
- यशोदा-गर्भ से दो संतानों का जन्म, विष्णु यामल आगम प्रमाण, नक्षत्र-चरण भेद एवं त्रिभंग स्वरूप रहस्य
- वक्ता: पूज्य श्री राजेन्द्र दास जी महाराज
- शीर्षक/प्रसंग: श्रीकृष्ण जन्म के अति गोपनीय रहस्य (वासुदेव नंदन एवं नंदनंदन का विलय, रोहिणी नक्षत्र चरण भेद, हरिवंश पुराण प्रमाण)
- वीडियो लिंक: https://www.youtube.com/watch?v=4n0fWGDPcKY
- महामाया के १४ नाम, उनके शक्तिपीठ स्थल एवं दाऊ दादा के संकर्षण का सामरिक कारण
- वक्ता: पूज्य श्री राजेन्द्र दास जी महाराज
- शीर्षक/प्रसंग: भगवती योगमाया के १४ विशिष्ट नाम (दुर्गा, भद्रकाली, विमला, वैष्णवी आदि), दाऊ दादा का प्राकट्य रहस्य एवं नन्दोत्सव महिमा
- वीडियो लिंक: https://www.youtube.com/watch?v=4AAM32WCvKA
- ईश्वर और माया का तात्विक दर्शन (बंधनों का खुलना और पुनः लगना), काल-मध्य रहस्य
- वक्ता: पूज्य श्री रत्नेश जी महाराज
- शीर्षक/प्रसंग: कारागार में हथकड़ी-बेड़ियों का खुलना (ईश्वर आश्रय) एवं पुनः बंधना (माया आश्रय), ऋतु-तिथि-सप्ताह के मध्य का समन्वय
- वीडियो लिंक: https://www.youtube.com/watch?v=_A22vnQfcHw
- योगमाया के तीन रूप (विंध्यवासिनी, सुभद्रा, द्रौपदी) एवं श्रीकृष्ण प्राकट्य लीला
- वक्ता: पूज्य श्री राघवाचार्य जी महाराज
- शीर्षक/प्रसंग: द्वापर-कलियुग संधि, नारद जी की युक्ति, देवकी का सप्तम गर्भ एवं कृष्णावतार में योगमाया के तीन भगिनी स्वरूप
- वीडियो लिंक: https://www.youtube.com/watch?v=FN8u7RiRIks

Anupam Trivedi has spent over three decades studying and reflecting upon Sanatan scriptures, including the Vedas, Upanisads, Itihāsa, and Purāṇas. He writes on cultural philosophy and ancient literature to present traditional insights with accuracy and clarity. Read full bio →