भाग ३
(इस शृंखला के पिछले भागों को यहाँ पढ़ें: – 84 lakh yoniyan part 1, 84 lakh yoniyan part 2)

देवताओं की योनि के अद्भुत रहस्य
दशम देवसर्ग
देव सर्ग – (दशम देवसर्ग) यह देव, पितर, असुर, गन्धर्व – अप्सरा, यक्ष, राक्षस, सिद्ध-चारण-विद्याधर, भूत-प्रेत-पिशाच, किन्नर-किम्पुरुष और अश्व-मुख आदि भेद से आठ प्रकार का है। ।
देव योनि को पुण्य और श्रेष्ठ कर्मों का सर्वोच्च फल माना जाता है। देव योनि वह वर्ग है, जहाँ आत्मा को उत्कृष्ट आनंद (भोग), शक्ति, चिर यौवन और लंबी आयु प्राप्त होती है। आइए, शास्त्रों के आधार पर सर्वप्रथम प्रमुख देवताओं के बारे में और उनकी विशेषताओं को विस्तार से समझते हैं ।
देव योनियों का परिचय
यह लेख उपनिषदों, वेदों, पुराणों और महाभारत जैसे ग्रंथों के आधार पर देवताओं की संख्या, स्वरूप, स्थान और विविधताओं का वर्णन करता है । इसका मुख्य उद्देश्य यह समझाना है कि तत्त्वतः परमात्मा एक है, परंतु वह विभिन्न रूपों, गुणों और शक्तियों के कारण अनेक देवताओं के रूप में प्रकट होता है।
एक देव (परमेश्वर)
- सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक, प्राणसंज्ञक अव्याकृतरूप (अव्यक्त) तत्त्वतः सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा ही एक देव है । श्वेताश्वतर उपनिषद् (६.११) में कहा गया है, “एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ।” “। इसका अर्थ है—वह एक ही देव है जो सभी प्राणियों में छिपा हुआ है, सर्वव्यापक (हर जगह मौजूद), सभी जीवों का अंतरात्मा, कर्मों को देखने वाला, साक्षी और निर्गुण (गुणों से परे) है ।
- वही परमात्मा नाम, रूप, कर्म, गुण, शक्ति और अधिकार के भेद से अष्ट वसु, एकादश रुद्र, द्वादश आदित्य, इंद्र, प्रजापति, अग्नि आदि रूपों में अवतरित होता है ।
- आत्मा ही सर्वदेव: मनुस्मृति (१२.११९) में कहा गया है—’आत्मैव देवताः सर्वाः सर्वमात्मन्यवस्थितम्’ (स्वप्रकाश परमानन्दस्वरूप आत्मा ही मायायोग से सर्वदेवों का परमाश्रय और स्वरूप है) ।
- निवास स्थान: देवताओं का सामान्य निवासस्थान स्वर्ग (‘द्यौर्वै सर्वेषां देवानामायतनम्’) और नक्षत्रों को देवों का घर (‘देवगृहा वै नक्षत्राणि’) कहा गया है, लेकिन कर्म और अधिकार के कारण पृथ्वी और अन्तरिक्ष भी उनके स्थान हैं ।
- देवताओं को ऐश्वर्यशाली चेतन माना गया है । विग्रह, हविर्ग्रहण (हवन स्वीकार करना), हविर्भोजन, तृप्ति और प्रसाद (अनुग्रह) ये पाँच सिद्धियाँ देवता के चेतन स्वरूप को सिद्ध करती हैं । –
- विग्रह (शरीर): देवताओं का अपना रूप (मूर्ति या दिव्य शरीर) है।
- हविर्ग्रहण -वे यज्ञ में अर्पित की गई सामग्री (जैसे घी, अनाज) को स्वीकार करते हैं।
- हविर्भोजन (आहुति का उपभोग): वे उस अर्पित सामग्री को वास्तव में खाते या उपयोग करते हैं।
- तृप्ति (संतुष्टि): हविष्य ग्रहण करने से वे संतुष्ट होते हैं।
- प्रसाद (अनुग्रह/कृपा): संतुष्ट होकर भक्त पर कृपा करना।
- देवता चेतन शक्तियाँ हैं।, ब्रह्मसूत्र (१.३.९.२६-३३) के अनुसार देवता यज्ञ में हवि स्वीकार करते हैं और फल प्रदान करते हैं। अग्नि, वायु, सूर्य आदि देवता वास्तव में जीवों के कर्मों के अधिष्ठाता हैं। देवता केवल स्वर्ग में नहीं रहते; वे पृथ्वी, अन्तरिक्ष, अग्नि, जल, वायु और नक्षत्रों में भी विद्यमान हैं। देवता सर्वव्यापक हैं और हर तत्व में कार्यरत हैं।
“अग्निः पृथिवीस्थानो वायुर्वेन्द्रो वा अन्तरिक्षस्थानः सूर्यो द्युस्थानः।” (निरुक्त ७.५.२)
देवता अनेक नामों और रूपों में की गई पूजा को एक साथ स्वीकार कर सकते हैं
देवता सजीव हैं और चूंकि उनकी शक्ति असीमित है, इसलिए वह एक होते हुए भी अनेक नामों और रूपों में की गई पूजा को एक साथ स्वीकार कर सकते हैं
- सूर्य और आदित्य नाम से कहे जाने वाले एक ही अधिष्ठातृ देवता अलग-अलग अर्पित चरु (हविष्य) को ग्रहण करने में समर्थ होते हैं।
- परम-ऐश्वर्यशाली इन्द्रादि विविध यजमानों द्वारा निवेदित चरु को एक ही समय में ग्रहण करने में समर्थ होते हैं।
- वैसे ही एक ही देव अपने विविध नामों द्वारा प्रदत्त चरु को भी ग्रहण करने में समर्थ हैं, अतः पृथक्-पृथक् विधि सार्थक है।

त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश)
- उक्त परमेश्वर एक देव ही रजोगुण के नियामक होकर ब्रह्मा रूप से जगत् के उत्पादक, सत्त्वगुण के नियामक होकर विष्णु रूप से जगत् के पालक और तमोगुण के नियामक होकर रुद्र रूप से जगत् के संहारक होते हैं ।
आधारभूत वर्गीकरण: वैदिक तैंतीस देवता
देव योनियों का सबसे मूल और महत्वपूर्ण वर्गीकरण वेदों में मिलता है। त्रिदश (तीस और तीन, यानी तैंतीस) देवता उन प्रमुख शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो प्रकृति और ब्रह्मांडीय तत्वों का संचालन करती हैं।
शतपथ ब्राह्मण और बृहदारण्यक उपनिषद् (खंड 3.9.2) में इन 33 प्रमुख देवताओं को चार मुख्य समूहों में वर्गीकृत किया गया है:

शास्त्रों में ’33 कोटि देवता’ पद का प्रयोग मिलता है। विद्वानों के अनुसार, वैदिक संदर्भों में ‘कोटि’ का अर्थ ‘करोड़’ (दस मिलियन) नहीं, बल्कि ‘प्रकार’ या ‘वर्ग’ होता है, जो इन 33 मूलभूत श्रेणियों की अनंत अभिव्यक्ति को दर्शाता है।
शेष दो देव पर विभिन्न मत
तैंतीस देवों की संख्या पूर्ण करने के लिए 2 अश्विनी कुमार पर शास्त्रानुसार विभिन्न मत हैं:
- दो अश्विनीकुमार: (महाभारत और रामायण मत) ।
- नाम: नासत्य और दस्र ।
- उत्पत्ति: ये सूर्यदेव के पुत्र हैं, जो अश्वरूपधारिणी संज्ञादेवी की नासिका से उत्पन्न हुए ।
- विश्वेदेव और मरुत्: (बृहदारण्यकोपनिषद् मत) ।
- प्रजापति और वषट्कार: (कुछ विद्वानों का मत) ।
- प्रजापति और इन्द्र: (कुछ विद्वानों का मत) ।
- द्यौ (आकाश) और पृथ्वी: (कुछ विद्वानों का मत) ।
एकादश रुद्र
रुद्र नाम का अर्थ है ‘रुदन कराने वाले’। जब प्राणसहित आत्मा (जीव/मन) शरीर से उत्क्रमण करता है, तो सगे-सम्बन्धी रुदन करते हैं, इसलिए इन्हें रुद्र कहा जाता है ।
- नाम: दशविध प्राण (पञ्च ज्ञानेन्द्रिय + पञ्च कर्मेन्द्रिय) और आत्मा (मन) ये एकादश रुद्र हैं । ये करणात्मक माने जाते हैं ।
- उत्पत्ति और नाम: क्रोधित ब्रह्माजी की भौंहों के मध्य से नीललोहित बालक के रूप में प्रकट हुए। रोने के कारण ‘रुद्र’ कहलाए ।
- एकादश नाम, स्थान और पत्नियाँ (दुर्लभ दार्शनिक सामंजस्य):

नव (९) देवों का उत्तरोत्तर उत्कृष्ट क्रम
तैत्तिरीय श्रुति के अनुसार, नौ देवों के मुख्य प्रभेद उत्तरोत्तर उत्कृष्ट (परोवरीय) क्रम से सिद्ध होते हैं:
- देवगन्धर्व: जन्मतः गन्धर्व
- पितृदेव: पूर्वज देवता
- आजानजदेव: वे देव जो स्मार्त कर्मों (स्मृति ग्रंथों पर आधारित धर्म कर्म) के फल स्वरूप देवलोक विशेष में उत्पन्न हुए हैं।
- कर्मदेव: वे जो वैदिक कर्मों (जैसे अग्निहोत्र) को करके देवभाव (देवता की पदवी) को प्राप्त हुए हैं। देव: यज्ञ में हविर्भाग ग्रहण करने वाले ।
- देवराज इन्द्र: देवों के राजा ।
- देवगुरु बृहस्पति: देवों के गुरु ।
- प्रजापति (विराट्): देवगुरु बृहस्पति का प्रेरक और प्रकाशक तत्त्व ।
- ब्रह्मा (हिरण्यगर्भ): प्रजापति का प्रेरक और प्रकाशक तत्त्व; त्रैलोक्यशरीरधारी जो समस्त संसारमण्डल में व्याप्त है ।
देवगणों की संख्या और गणदेवता (देवताओं के नौ गण भी होते हैं):
देवताओं की संख्या अनन्त है, जो उनकी अभिव्यक्ति के स्तर को दर्शाती है।
- अखंड प्रभेद: दार्शनिक मत के अनुसार, इस संसार का प्रत्येक स्थावर (स्थिर) और जंगम (गतिशील) भेद अधिदैव (दैवीय शक्ति) की दृष्टि से चेतन है, इसलिए देवों की संख्या अनन्त है।
- गणदेवता : ३३ देवों के अलावा, देवों के नौ प्रमुख गण (समूह) भी होते हैं, जैसे आदित्य, वसु, रुद्र, आदि। इनमें कुछ कम ज्ञात गण भी हैं:
- आदित्य (12)
- तुषित (30)
- विश्वेदेव (10)
- साध्य (12)
- आभास्वर (64)
- मरुत् (49)
- महाराजिक (220)
- रुद्र (11)
- वसु (8)
विश्वेदेवों का विशेष कार्य
ये दक्षकन्या विश्वा के गर्भ से उत्पन्न हुए हव्य-कव्य के निर्वाहक (संचालक) देव समूह हैं।
- हव्य-कव्य: हव्य देवों को दिए जाने वाली आहुति है और कव्य पितरों (पूर्वजों) को दिए जाने वाले श्राद्ध की वस्तुएँ हैं।
- ये यज्ञ और श्राद्ध (पितरों को तर्पण) के मुख्य अंग हैं। अग्नि देवता को इनका मुख कहा गया है। ये अपनी विशाल संख्या (६३ तक) के बावजूद एकीभूत (एक रूप) होकर कार्य करते हैं।
मरुद्गणों का अद्भुत योगबल
उत्पत्ति का रहस्य: दिति ने इन्द्र के प्रकोप से बचने के लिए योगबल से पुत्र को गर्भ में एक पिण्ड के रूप में था । इन्द्र ने इस एक पिण्ड को वज्र से पहले सात और फिर उनचास टुकड़ों में विभक्त कर दिया ।
- योगबल की सिद्धि: योग के वैभव से ये खंडित होने पर भी मरे नहीं और उनचास (49) मरुतों के रूप में प्रसिद्ध हुए। ये बल, वीर्य और पराक्रम के अधिष्ठाता (संरक्षक) देव हैं ।
भगवान विष्णु की दिव्य प्रशासनिक व्यवस्था
- सभी देवता, सप्तर्षि, मनु और इन्द्र—ये सभी मूल रूप से भगवान् विष्णु की विभूतियाँ (ऐश्वर्यशाली अभिव्यक्ति) ही हैं।
- ग्रहों के अधिदेवता (संरक्षक देव): प्रत्येक ग्रह का एक संरक्षक देवता होता है, जैसे:
- सूर्य के अधिदेवता ईश्वर हैं।
- चन्द्रमा के अधिदेवता उमा हैं।
- मंगल के अधिदेवता स्कन्द हैं।
- बुध के अधिदेवता विष्णु हैं।
- राहु के अधिदेवता काल हैं।
- ‘प्रजापति’ का अर्थ केवल ब्रह्माजी नहीं है, बल्कि मरीचि आदि सप्तर्षि और चतुर्दश मनु (चौदह मनु) भी प्रजापति कहे गए हैं, जिससे इक्कीस प्रजापतियों का उल्लेख मिलता है।
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भाग ३ में हमने प्रमुख देवताओं के बारे में जानकारी प्राप्त की, भाग ४ में हम देवताओं के बारे में और विशेषताएं जानेंगे, उनकी अनेक चमत्कारी शक्तियां, उनके दिव्य शरीर, प्रमुख, अप्सराएं यक्ष आदि
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Anupam Trivedi has spent over three decades studying and reflecting upon Sanatan scriptures, including the Vedas, Upanisads, Itihāsa, and Purāṇas. He writes on cultural philosophy and ancient literature to present traditional insights with accuracy and clarity. Read full bio →
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