वेद क्या हैं ? भाग २
वेद क्या हैं ? भाग १
भाग १ में वेदों के स्वरूप को शास्त्रीय आधार पर स्थापित किया गया है—वेद साक्षात् नारायण का स्वरूप हैं; सर्वविद् ज्ञान-विज्ञान, सृष्टि और मोक्ष का अक्षय महासागर। वेद अपौरुषेय और अनादि हैं; सृष्टि के प्रारम्भ में यही दिव्य ज्ञान ब्रह्मा के हृदय में संप्रेषित होता है और श्रुति परंपरा से ऋषियों के माध्यम से प्रवाहित रहता है। कालानुसार मानव की क्षीण होती स्मरण-शक्ति और सामर्थ्य को ध्यान में रखते हुए महर्षि वेदव्यास ने इसी एक वेद-ज्ञान को चार भागों में विभाजित किया तथा आगे चलकर महाभारत और पुराणों के माध्यम से उसी तत्त्व को अधिक सुगम रूप में उपलब्ध कराया, ताकि कलियुग में भी धर्म का आधार सुरक्षित रह सके।
वेद-अध्ययन को लेकर प्रचलित आधुनिक धारणाओं से भिन्न, शास्त्र वेद-बोध को एक अत्यंत अनुशासित और मर्यादित साधना मानते हैं—यज्ञोपवीत, शास्त्रीय पात्रता, गुरु-मुख से श्रवण और दीर्घकालीन ब्रह्मचर्य इसके अनिवार्य अंग हैं। वेदों के मंत्र ‘शब्द-ब्रह्म’ की सूक्ष्म और शक्तिशाली सत्ता हैं, जिनका अध्ययन केवल विधि और संरक्षण के साथ ही फलदायक माना गया है।
इस लेख-शृंखला का उद्देश्य सामान्य हिंदू जनमानस को अपने धर्म की उस शाश्वत आधारशिला से परिचित कराना है, जिस पर समस्त शास्त्र, पुराण और स्मृतियाँ प्रतिष्ठित हैं—ताकि वेदों के वास्तविक स्वरूप, उनकी मर्यादा और उनके महत्व को शास्त्रीय दृष्टि से समझा जा सके।

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क्या–क्या मुख्य विषय हैं वेदों में जो सभी हिन्दुओं को जानना ही चाहिए !
भाग 1 में हमने वेदों के मूलभूत स्वरूप, चारों वेदों के परिचय और उनमें सन्निहित यज्ञ, विधि (नियम) तथा निषेध जैसे विषयों पर संक्षेप में चर्चा की थी । भाग 2 में हम वेदों के उस ‘अथाह ज्ञान’ के परिचय को ही जारी रखेंगे और कुछ ऐसे विषयों को जानेंगे जिन्हें हम आधुनिक जगत में कभी स्वप्न में भी नहीं सोच सकते । जी हाँ! वेदों में 32 विद्याएँ, 64 कलाएँ, “अर्थ पंचक” और धर्म अर्थ काम मोक्ष – ‘पुरुषार्थ चतुष्टय’ सिद्धांत आदि ज्ञान की ऐसी श्रेणियाँ हैं जो किसी भी बुद्धिमान व्यक्ति या आधुनिक विज्ञान के जानकार को भी अचंभित करने का सामर्थ्य रखती हैं।
मनुष्य जीवन का उद्देश्य: तत्त्व–जिज्ञासा
“जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नार्थो यश्चेह कर्मभिः” (श्रीमद्भागवत १.२.९-१०)।
मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य धन, यश आदि प्राप्त करना नहीं, बल्कि “तत्त्व को जानने की जिज्ञासा” ही मुख्य लक्ष्य है। “तत्त्व” का अर्थ है परम सत्य, ईश्वर और जीव का वास्तविक स्वरूप और इस सृष्टि का मूल कारण । अर्थात् मनुष्य को तत्व जानने की जिज्ञासा होना ही जीवन का प्रमुख लक्ष्य है। यदि मनुष्य भौतिक सुखों में उलझा रहता है और इन प्रश्नों पर विचार नहीं करता, तो शास्त्रों के अनुसार उसका जीवन निरर्थक है, व्यर्थ है।
मनुष्य जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति है, और बाकी सभी क्रियाएँ उसी की प्राप्ति के साधन हैं। शास्त्रानुसार धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये चार पुरुषार्थ हैं।
(इनके (चार पुरुषार्थ) बारे में विस्तार से जानने के लिए ये लेख पढ़ें – https://dharmsanatan.com/dharmarthkammoksh/, https://dharmsanatan.com/charpurusharth/ ).
अर्थ पंचक: वेद और सभी शास्त्रों का प्रतिपाद्य (मुख्य) विषय
वेदों का विस्तार अनंत है। ऋषियों और महर्षि वेद व्यास ने इस ज्ञान-राशि को चार वेदों में विभक्त किया, तथा पंचम वेद के रूप में पुराणों और महाभारत की रचना की। लेकिन एक जिज्ञासु के मन में स्वाभाविक प्रश्न उठता है—इन हजारों मंत्रों और ऋचाओं का मूल उद्देश्य क्या है?
संपूर्ण वेद, उपनिषद्, पुराण और इतिहास का समन्वय करने पर केवल पाँच मूल विषय (अर्थ पंचक) ही सिद्ध होते हैं। वेदों के वास्तविक मर्म को समझने के लिए अर्थ पंचक का ज्ञान अनिवार्य है। सभी शास्त्र—जो मूलतः वेदों का ही विस्तार हैं—उनका प्रतिपाद्य विषय (मुख्य उद्देश्य) इसी अर्थ पंचक के माध्यम से पूर्णतः स्पष्ट होता है। वेदों, सनातन धर्म के अनंत शास्त्रों और पुराणों का निचोड़ इसी एक संकल्पना में समाहित है।
अर्थ पंचक वे पाँच मूल प्रश्न हैं, जिनका उत्तर सभी शास्त्रों का उद्देश्य है। यही वेदों का प्रतिपाद्य विषय है और यही मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य भी। जीव पर ईश्वर की असीम कृपा होने पर ही सत्संग के माध्यम से इन पाँच सत्यों का ज्ञान प्राप्त होता है।
जब जीव पर ईश्वर की असीम कृपा होती है, तभी उसे सत्संग के माध्यम से इन पाँच सत्यों का ज्ञान प्राप्त होता है।
ये पाँच तत्व निम्नलिखित हैं:
- प्राप्त (स्व-स्वरूप – जीव का वास्तविक परिचय) अर्थ पंचक का पहला प्रश्न है—“हम कौन हैं? – हम शरीर नहीं, बल्कि ‘जीवात्मा’ हैं।
- प्राप्य (पर-स्वरूप – परमात्मा का स्वरूप)– दूसरा प्रश्न है ईश्वर के वास्तविक रूप को समझना, जिसे ‘प्राप्य’ यानी जो पाने योग्य है भी कहते हैं। भगवान विष्णु ही ‘परम तत्व’ हैं। भगवान् विष्णु ही प्राप्य हैं।
- प्राप्ति के उपाय (साधनाआदि)- तीसरा प्रश्न है कि ईश्वर मिलेंगे कैसे ?- शरणागति’ ही सबसे बड़ा उपाय है।
- प्राप्ति का फल – सामान्यतः लोग चार पुरुषार्थ आदि में अर्थ (धन सम्पदा, ऐश्वर्य, मान सम्मान प्रसिद्धि) और अंतिम लक्ष्य मोक्ष को ही फल समझते हैं। लेकिन वैष्णव मत में पाँचवाँ फल ‘पंचम पुरुषार्थ’ यानी ‘भगवद-प्रेम’ है (सभी सुकृतों का अंतिम फल भगवान के चरणों में स्नेह होना ही है) ।
- प्राप्ति के विरोधी (मार्ग की बाधाएं)–भगवान् की प्राप्ति में बाधक जो कारण हैं वे पांचवे अर्थ पंचक के अंतर्गत आते हैं। राग, रोष, ईर्ष्या, मद और मोह’—ये पाँचों सेवा के मार्ग में सबसे बड़े विरोधी हैं। साधक को सपने में भी इन विकारों के वश में नहीं होना चाहिए। अहंकारी व्यक्ति कभी सेवक नहीं हो सकता और क्रोधी व्यक्ति कभी प्रेमी नहीं हो सकता। इन दोषों का त्याग ही ईश्वर के निकट ले जाता है।
ऋषियों को वेद ज्ञान की प्राप्ति,
वेद अनादि (जिसका कोई प्रारम्भ नहीं) हैं , अनन्त (जिसका कोई अन्त नहीं) है। सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सर्वस्रष्टा और सर्वेश्वर के स्वरूप से सम्बन्धित तथा सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और संहार से सम्बन्धित जो ज्ञान है, वही वेद है। वेद दिव्य ज्ञान का भण्डार हैं, जो ईश्वर से प्रकट हुए हैं, स्वयं प्रमाण हैं, और जो मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का मार्ग दिखाते हैं।
सृष्टि के आरम्भ में सर्वेश्वर की प्रेरणा से वेद सर्वप्रथम ब्रह्मा जी के अन्तःकरण में स्वयं प्रकाशित होते हैं। इसके पश्चात् ब्रह्मा जी इस ज्ञान को अपने मानस पुत्रों—जैसे मरीचि, अत्रि, अंगिरा आदि ऋषियों—को प्रदान करते हैं, और उन्हीं के आधार पर सृष्टि का क्रम व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ता है ।
वेदों के अलग अलग विषय अन्यान्य ऋषियों और देवताओं को भगवान की कृपा से प्राप्त होता है – , बृहस्पति को वेदाङ्गों का, शुक्राचार्य को नीतिशास्त्र का, नारदजी को गान्धर्ववेद का, भरद्वाज को धनुर्वेद का, और कृष्णात्रेय को आयुर्वेद का । इसी प्रकार सृष्टि संचालन में उपयोगी सभी विद्याओं का ज्ञान ब्रह्मा जी के द्वारा उनके मानस पुत्र मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ आदि महर्षियों को प्राप्त होता है।
चतुर्दश (14), अष्टादश (18) तथा चतुर्विंशति (24) विद्यासंस्थान
चतुर्दश और अष्टादश विद्यासंस्थान
प्राचीन वैदिक परंपरा में समस्त ज्ञान को चौदह प्रमुख शाखाओं में विभाजित किया गया है, जिन्हें “चतुर्दश विद्यासंस्थान” कहा जाता है — अर्थात् ज्ञान के चौदह पवित्र स्थान।
4 वेद, 6 वेदाङ्ग और 4 उपांग (पुराण, न्याय, मीमांसा, और धर्मशास्त्र) —इनके समन्वय से चतुर्दश (१४) विद्यासंस्थान हैं । इसके पश्चात् वैदिक वाङ्मय में ज्ञान-रचना का विस्तार उपवेदों के सम्मिलन से किया गया है, जिसके द्वारा विद्यासंस्थानों की संख्या अष्टादश (१८) कही गई है ।
आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद और अर्थशास्त्र—ये चार उपवेद हैं। इनका सम्बन्ध जीवन के उन क्षेत्रों से है जो प्रत्यक्ष व्यवहार, व्यवस्था और संरक्षण से जुड़े हुए हैं, और जिनका उल्लेख वैदिक परम्परा में पृथक् रूप से किया गया है।
आयुर्वेद
आयुर्वेद में शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा के सम्बन्ध का विचार करते हुए स्वास्थ्य और रोग के स्वरूप का निरूपण किया गया है। इसमें धातु, दोष, मल, अग्नि, रस, वीर्य, ओज, तथा रोग के कारण, लक्षण और चिकित्सा के उपायों का विधान है। आहार, विहार, दिनचर्या, ऋतुचर्या और औषध-प्रयोग के माध्यम से शरीर की रक्षा और संतुलन की व्यवस्था आयुर्वेद में वर्णित है। इस प्रकार आयुर्वेद शरीर और स्वास्थ्य से सम्बन्धित ज्ञान का अंग है।
धनुर्वेद
धनुर्वेद में आयुध, अस्त्र-शस्त्र, युद्ध-विन्यास, सेना-संरचना और युद्ध-नीति का प्रतिपादन है। इसमें धनुष, बाण, तलवार, गदा आदि शस्त्रों का प्रयोग, युद्ध में चाल-प्रयोग, रथ, अश्व, हाथी आदि की व्यवस्था, तथा युद्ध में आक्रमण और रक्षा के उपायों का विधान किया गया है। धनुर्वेद का सम्बन्ध केवल युद्ध से ही नहीं, बल्कि राज्य और समाज की रक्षा से भी है।
गान्धर्ववेद
गान्धर्ववेद में स्वर, श्रुति, ताल, लय, राग, वादन और गान का निरूपण है। इसमें संगीत, नृत्य और वादन के माध्यम से अभिव्यक्ति, उपासना और मनोरंजन का विधान किया गया है। स्वर की उत्पत्ति, स्वर-भेद, राग-रचना, वाद्य-प्रयोग तथा नृत्य की गतियों का विवेचन गान्धर्ववेद में प्राप्त होता है।
अर्थशास्त्र
अर्थशास्त्र में राज्य-व्यवस्था, धन-प्रबन्ध, कर-व्यवस्था, दण्डनीति, शासन-तंत्र और सामाजिक संरचना का निरूपण है। इसमें राजा, मन्त्री, अमात्य, कोष, सेना, दुर्ग, मित्र आदि के सम्बन्ध का विचार किया गया है, तथा राज्य की स्थिरता और समृद्धि के उपायों का विधान किया गया है।
इन चार उपवेदों के सम्मिलन से विद्यासंस्थानों की संख्या अष्टादश कही गई है—
“आयुर्वेदो धनुर्वेदो गान्धर्वश्चेत्यनुक्रमात् । अर्थशास्त्रं परं तस्माद्विद्या ह्यष्टादश स्मृताः ।।”
(शिवपुराण)
References:
- https://www.youtube.com/watch?v=IwNJNRVbJ90 (Shri DevaDas ij Maharaj)
- https://www.youtube.com/watch?v=2One3dFA3OI (Shri ratnesh ji maharaj)
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