“वेद क्या हैं? साक्षात् नारायण का स्वरूप, सर्वविद् ज्ञान-विज्ञान, सृष्टि, और मोक्ष का अक्षय महासागर”

भाग १

इस लेख-शृंखला का ध्येय

वेदों के प्रति जिज्ञासा रखना प्रत्येक हिंदू का सौभाग्य है, किंतु उस जिज्ञासा की दिशा का शास्त्रीय होना अनिवार्य है। आज के इस संक्रमण काल में, जहाँ सूचनाओं का अंबार है किंतु ज्ञान का अभाव, वेदों को लेकर समाज में अनेक संशय व्याप्त हैं। इस २५-३० कड़ियों की विशेष लेख-शृंखला ‘वेद क्या हैं?‘ का सूत्रपात किसी को मंत्रों का सस्वर पाठ सिखाने के लिए नहीं किया जा रहा है—चूँकि मैं कोई ‘गुरु’ नहीं हूँ और न ही वेद कोई ऐसी साधारण विद्या हैं जिसे बिना गुरु-मुख के और बिना शास्त्रीय पात्रता के आत्मसात किया जा सके। बाज़ार में उपलब्ध मंत्रों की पुस्तकों को पढ़कर स्वयं कोई प्रयोग करना न केवल मर्यादा के विरुद्ध है, अपितु यह हमारे शास्त्रसम्मत विधान का घोर उल्लंघन भी है ।

इस ‘वेद क्या हैं?’ श्रृंखला का एकमात्र लक्ष्य सामान्य हिंदू जनमानस को अपने धर्म की उस शाश्वत आधारशिला से परिचित कराना है, जिस पर हमारे समस्त शास्त्र, पुराण और स्मृतियाँ प्रतिष्ठित हैं ।

आज जब आध्यात्मिक जगत में अपुष्ट मान्यताओं और भ्रामक व्याख्याओं की भरमार है, आज के इस ‘छद्म-युग’ में, जहाँ ढोंगी और स्वयंघोषित विशेषज्ञ ‘वैदिक विज्ञान’ के नाम पर आपको दिग्भ्रमित कर रहे हैं, वहाँ यह अनिवार्य है कि आप वेदों की वास्तविक मर्यादा, उनके विधान और उनकी शब्दावलियों (जैसे कल्प, निरुक्त, छंद, ब्राह्मण, उपनिषद आदि) के मर्म को समझें । आगामी लेखों में हम वेदों के उन गूढ़ रहस्यों और अनिवार्य मर्यादाओं (विधि-निषेध) पर चर्चा करेंगे, जो आपके विवेक को जाग्रत करेंगी। यह प्रयास आपको उन महान सिद्धांतों से जोड़ने का है, जो हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं, ताकि आप स्वयं सत्य और असत्य के मध्य का भेद समझ सकें, अपनी संस्कृति के वास्तविक वैभव को पहचान सकें और कोई भी आपको आपके मूल सिद्धांतों से भटका न सके।

वेदों के इस दिव्य सागर में गहरे उतरने से पूर्व, यह अनिवार्य है कि आप सनातन धर्म के संपूर्ण शास्त्र-साहित्य की उस विशालता और विस्तार को समझें जिसे इस लेख में विस्तार से समाहित किया है।”-  LINK- https://dharmsanatan.com/how_-vast_are-sanatan-dharm-scriptures/

वेद साक्षात् नारायण हैं ! ज्ञान-विज्ञान, मोक्ष का अक्षय महासागर हैं

भारतीय संस्कृति की गौरव गाथा वेदों से ही प्रारंभ होती है । ये केवल ग्रंथ नहीं, बल्कि विश्व-वाङ्मय की वह अमूल्य निधि हैं जिनके उदात्त सिद्धांतों* ने संपूर्ण मानवता को अपनी ओर आकर्षित किया है । वास्तव में, जो वेद को जानता है वह सब कुछ जानता है, क्योंकि इस संसार का जो भी ज्ञातव्य अर्थ है, वह वेदों में ही प्रतिष्ठित है ।

वेद कोई साधारण ‘पोथी’ या किसी मनुष्य द्वारा लिखा गया निबंध नहीं है । हमारे पूज्य महर्षियों ने उद्घोष किया है— ‘वेदो नारायणः साक्षात् स्वयम्भूरिति शुश्रुम’ अर्थात वेद साक्षात् भगवान नारायण का ही प्रकट रूप हैं ।

  • दिव्य श्वास: जिस प्रकार मनुष्य की श्वास स्वाभाविक होती है, उसी प्रकार वेद परमेश्वर की दिव्य श्वास हैं ।
  • अपौरुषेय: वेदों का कोई निर्माता नहीं है, इसलिए इन्हें ‘अपौरुषेय’ कहा जाता है ।
  • इतिहासकारों का भ्रम: वे इतिहासकार जो वेदों को कुछ हजार वर्ष प्राचीन बताते हैं, वे पूर्णतः भ्रमित हैं । वेद ‘अनादि’ और ‘नित्य’ हैं; यहाँ तक कि ब्रह्मा जी भी इनके रचयिता नहीं हैं, उन्हें भी सृष्टि के प्रारंभ में भगवान ने यह ज्ञान केवल हृदय में प्रदान किया था ।

भारत प्राचीन काल में जिस विशेष ज्ञान और विज्ञान के बल पर दुनिया का नेतृत्व करता था, वह सब वेदों की ही देन है। हमारे ऋषियों ने जिस परम सत्य को जानकर जीवन की पूर्णता प्राप्त की और जिस ज्ञान के माध्यम से पूरे विश्व में सुख, समृद्धि और शांति का मार्ग प्रशस्त किया, वह अनमोल खजाना वेदों में सुरक्षित है। इसी दिव्य ज्ञान ने हमारी इस पुण्यभूमि आर्यावर्त को ‘स्वर्ग से भी बढ़कर’ (स्वर्गादपि गरीयसी) बनाया था।

वेद भारतीय संस्कृति के मूल स्रोत हैं। मनुष्य के इस लोक (वर्तमान जीवन) और परलोक—दोनों के कल्याण के लिए धर्म का विस्तार से वर्णन करते हैं। धर्म के साथ-साथ अध्यात्म-मर्यादा, लोक-आचर, ज्ञान-विज्ञान, कला-कौशल, शिल्प-उद्योग आदि ऐसा कौन-सा विषय है, जिसका प्रतिपादन वेदों में न किया गया हो । सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि आज के दौर के जो आधुनिक वैज्ञानिक आविष्कार हमें नए लगते हैं, उनके सूत्र और सिद्धांत भी वेदों में पहले से मौजूद हैं। इसी कारण वेदों को सनातन, पूर्ण और सर्वविद् ज्ञान-विज्ञान के आधार हैं।

इसीलिये मनीषियों ने वेदों को अक्षय ज्ञान का सिन्धु तथा समस्त धर्मो का मूल बताया है

महात्मा मनु ने वेदों को ‘वेदोऽखिलो धर्ममूलम्’ कहा है

मनु महाराज ने कहा है—

चातुर्वर्ण्यं त्रयो लोकाश्चत्वारश्चाश्रमाः पृथक्। भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदात् प्रसिध्यति॥ (मनु० १२। ९७)

‘वेद से ही चारों वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र), तीनों लोक (भूर्लोक, भुवलोक तथा स्वर्लोक), चारों आश्रम (ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थाश्रम और संन्यासाश्रम) की व्यवस्था की गयी है। केवल यही नहीं, अपितु भूत, भविष्यत् तथा वर्तमान-कालिक धर्म-कर्मों की व्यवस्था भी वेद के अनुसार ही की गयी है।’ वेद-धर्म उस ईश्वरीय ज्ञानकोश से ही प्रकट हुआ है, जो अनादि और अनन्त है। इसलिये बृहदारण्यक श्रुति में कहा गया है—

अस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसः॥ (बृहदारण्यक० ४। ५। ११)

‘ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—ये चारों उस महान् परमेश्वर के श्वास से ही प्रकट हुए हैं।’ ऐतरेय ब्राह्मण में भी कहा गया है— ‘प्रजापतिर्वा इमान् वेदानसृजत्॥’ ‘प्रजापति ने समस्त प्रजाओं के कल्याण के लिये ही वेदों का सृजन किया है।’

शास्त्र, उपनिषद्, दर्शन, पुराण आदि सभी धर्मग्रन्थों के मूल आधार वेद ही हैं। वास्तव में जीव, जगत्, प्रकृति और परमात्मा के स्वरूप का वास्तविक

ज्ञान ही वेद का स्वरूप है। कहा गया है कि जो वेद से अनभिज्ञ है, वह कुछ भी नहीं जानता। वेद को जान करके सम्पूर्ण पिण्ड-ब्रह्माण्ड और परमात्मा को जाना जा सकता है। अतः भारतीय संस्कृति के प्राण वेद के स्वरूप, महिमा और सिद्धान्त को हृदयंगम करके उसके अनुरूप आचरण करना प्रत्येक भारतीय का पुनीत कर्तव्य है।

महर्षि वेदव्यास की करुणा: कलियुग के लिए वेद-विस्तार

द्वापर युग के समाप्ति के समय भगवान् नारायण अवतार श्री कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास जी ने, वेद जो एक ही था उसको कलयुग के मनुष्यों की अल्पायु शक्तिहीनता और स्मरण शक्ति को ध्यान में रखते हुए, चार भागों में विभक्त किया (मूलतः वेद एक ही है ) ।

वेद अनादि हैं उनका निर्माता नहीं (अपौरुषेय). हर बार सृष्टि के प्रारम्भ में भगवान् ब्रह्मा जी के ह्रदय में वेद प्रकट करते हैं और वैदिक मन्त्रों का ज्ञान एक दूसरे से सुनकर होता है इसलिए वेदों को श्रुति कहा जाता है ।

वेदव्यासजी ने वेद के चार भाग किये, महाभारत में इस ऐतिहासिक तथ्य का उद्घाटन इस प्रकार किया गया है—

 यो व्यस्य वेदांश्चतुरस्तपसा भगवानृषिः। लोके व्यासत्वमापेदे कृष्णद्वैपायनस्तु सः॥

अर्थात्— ‘जिन्होंने निज तप के बल से वेद का चार भागों में विस्तार कर लोक में व्यासत्व-संज्ञा पायी और शरीर के कृष्णवर्ण होने के कारण कृष्ण कहलाये।’ उन्हीं भगवान वेदव्यास ने ही वेद को चार भागों में विभक्त कर अपने चार प्रमुख शिष्यों को वैदिक संहिताओं का अध्ययन कराया।

उन्होंने अपने प्रमुख शिष्यों में पैल को ऋग्वेद, वैशम्पायन को यजुर्वेद, जैमिनि को सामवेद तथा सुमन्तु को अथर्ववेद—संहिता का सर्वप्रथम अध्ययन कराया था।

महाभारत-युद्ध के पश्चात् वेदव्यासजी ने तीन वर्षों के सतत परिश्रम के उपरान्त श्रेष्ठ काव्यात्मक इतिहास ‘महाभारत’ की रचना की थी। यह महाभारत पंचम वेद कहलाता है और इसे व्यासजी ने अपने पंचम शिष्य लोमहर्षण को पढ़ाया था, जैसा कि महाभारत के अन्तःसाक्ष्यभूत इन श्लोकों से विदित होता है—

वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान्। सुमन्तुं जैमिनिं पैलं शुकं चैव स्वमात्मजम्॥
प्रभुर्वरिष्ठो वरदो वैशम्पायनमेव च। संहितास्ते पृथक्तेन भारतस्य प्रकाशिताः॥

(महा० आदि० ६३। ८९–९०)

वेद के अन्य नाम एवं उनका अर्थ

श्रुति

वेद के पठन-पाठन के क्रम में गुरुमुख से श्रवण कर स्वयं अभ्यास करने की प्रक्रिया होती है। गुरु मुख से श्रवण किये बिना केवल पुस्तक के आधार पर ही मन्त्राभ्यास करना निंदनीय एवं निष्फल माना जाता है ।

इस प्रकार वेद के संरक्षण एवं सफलता की दृष्टी से गुरुमुख से श्रवण कर नियम पूर्वक अभ्यास द्वारा कंठस्त करने का अत्यंत महत्त्व है । इस कारण ही वेद को श्रुति कहते हैं।

आम्नाय

वेद परिश्रम पूर्वक  अभ्यास द्वारा संरक्षणीय हैं इस कारण वेद को आम्नाय भी कहा जाता है ।

त्रयी (वेद-त्रयी)

संसार में अभिव्यक्ति की तीन मुख्य शैलियाँ प्रचलित हैं: पद्य (कविता), गद्य और गान। वेदों में भी इन्हीं तीन रूपों का समावेश है। जब मंत्र निश्चित अक्षर संख्या, चरण और विराम के नियमों में बंधे होते हैं, तो उन्हें ‘ऋक’ कहा जाता है। इसके विपरीत, जिन मंत्रों में छंदों का बंधन नहीं होता और वे गद्यात्मक होते हैं, उन्हें ‘यजुः’ की संज्ञा दी गई है। वहीं, जो मंत्र संगीतमय या गायन योग्य हैं, वे ‘साम’ कहलाते हैं।

इन तीन विशिष्ट प्रकाशन शैलियों के कारण ही वेदों को सम्मिलित रूप से ‘त्रयी’ कहा जाता है। यहाँ ‘त्रयी’ का अर्थ वेदों की संख्या (तीन) से नहीं, बल्कि शब्द प्रयोग की इन तीन विधाओं से है ।

वेद में कर्मकांड, उपासनाकाण्ड और ज्ञानकाण्ड तीन विषय होने के कारण भी त्रयी कहा गया

चार वेदों का विभाजन में मुख्य विषय (यज्ञीय विज्ञान)

वेद चार हैं 1. ऋग्वेद, 2. यजुर्वेद, 3. सामवेद, 4. अथर्ववेद किन्तु ये वेद के विभाजन हैं । मूलतः वेद एक ही है। वेदों का यह विभाजन करने के कारण ही महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास कहे जाते हैं। वेदों का प्रारंभिक भाग कर्मकांड है और ज्ञान और उपासना काण्ड से बहुत अधिक है (८० %) ।, कर्मकांड में मुख्यतः यज्ञ अनुष्ठान सम्बन्धी विधि-निषेध का सर्वांगीण विवेचन है । कर्मकांड का प्रधान उपयोग यज्ञानुष्ठान में ही होता है ।

जब कोई व्यक्ति (यजमान) यज्ञ करवाने हेतु वैदिक विद्वान् ब्राह्मण को नियुक्त करता है तब वो अधिकारी ब्राह्मण “ऋत्विक” कहलाते हैं  । ऋत्विजों के चार गण होते हैं अर्थात हर ऋत्विक एक -एक वेद के ज्ञाता होते हैं जो चार वर्गों में बंटकर अपना -अपना  कार्य करते हुए यज्ञ को सर्वांगीण बनाते हैं (यज्ञ सफलता के लिए चारों के कार्य आवश्यक हैं) इन गणों के नाम हैं  ।

१. होतृगण २. अध्वर्युगण ३. उद्गातृगण ४. ब्रह्मगण

वेदों का विभाजन का एक आधार इन्ही चार गणो के उपयोगी मन्त्रों के अनुसार है,

“वेद-मर्यादा का विस्मृत सत्य: क्यों गुरु, यज्ञोपवीत और पात्रता के बिना वेद-बोध असंभव है?”

आधुनिक जगत में यह भ्रम है  पुस्तक के समान कि कोई भी व्यक्ति कभी भी वेद पढ़ सकता है। किंतु वेद साधारण पुस्तकों की तरह नहीं हैं ।

  • अधिकार (पात्रता): वेद अध्ययन के लिए उपयुक्त आध्यात्मिक पृष्ठभूमि (द्विज: होना आवश्यक -ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) और अध्ययन पूर्व ‘यज्ञोपवीत’ (जनेऊ) संस्कार का होना अनिवार्य है ।
  • अनेक जन्मों की साधना: वैदिक ज्ञान प्राप्त करना एक जन्म का कार्य नहीं, बल्कि अनेक जन्मों की निरंतर साधना का प्रतिफल है ।
  • गुरु-मुख परंपरा (श्रुति): वेदों को ‘श्रुति’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनका ज्ञान एक दूसरे से ‘सुनकर’ प्राप्त होता है । गुरु के सम्मुख बैठकर, ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए, उनके मुख से उच्चारित ध्वनियों को सीधे ग्रहण करना ही इसकी दिव्य पद्धति है ।

 अनध्याय ( अध्ययन के प्रतिबंध और नियम) और शास्त्रीय अनुशासन:

वेदों का अध्ययन काल और परिस्थिति की मर्यादाओं से बंधा है:

  • तिथि निषेध: प्रतिपदा, अष्टमी और चतुर्दशी जैसी विशिष्ट तिथियों पर वेदों का अध्ययन वर्जित है ।
  • अवरोध और मर्यादा: अचानक भारी वर्षा, बिजली कड़कना, या अध्ययन के दौरान गुरु-शिष्य के मध्य से किसी पशु का निकल जाना भी ” वेद-अध्ययन ‘ ‘ में बाधा माना जाता है और अध्ययन तत्काल रोक दिया जाता है ।
  • वेदारम्भ संस्कार: शास्त्रों को स्पर्श करने से पूर्व, यज्ञोपवीत के पश्चात एक शुभ मुहूर्त में ‘वेदारम्भ संस्कार’ का विधान

वेद क्या हैं? इस विशेष लेख-शृंखला के प्रथम भाग में हमने वेदों के स्वरूप और उनकी पावन मर्यादाओं का केवल एक संक्षिप्त परिचय प्राप्त किया है। यह तो उस अनंत ज्ञान-सागर की केवल कुछ बूंदें मात्र हैं।

आगामी लगभग २५ कड़ियों की इस यात्रा में हम वेदों के उन अनसुलझे रहस्यों को सुलझाएंगे, जिनके बारे में आधुनिक समाज प्रायः अनभिज्ञ है। हम चर्चा करेंगे—वेदों और दिव्य ऋषियों-ऋषिकाओं के अभूतपूर्व संबंधों पर, वेदों के छह अंगों (वेदांगों) की वैज्ञानिकता पर, और उस विलक्षण ज्ञान-विज्ञान पर जो आज भी आधुनिक आविष्कारों का आधार है।

अतः, अपनी जड़ों और वास्तविक सांस्कृतिक वैभव को गहराई से समझने के लिए इस शृंखला के अगले भाग की प्रतीक्षा करें।

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 Ref:

  1. https://www.youtube.com/watch?v=C7MAfqqOF_0, total lakh mantr in veda and 16108 patniyan shri krishna ki (108 upnishad, 16000 upasna kand mantr
  2. Kalyan – Ved Katha ANK, Geeta Press
  3. Kalyan – Dharm Shastrank – Geeta Press
  4. Raghavacharya JI’s pravachan on Vedas https://www.youtube.com/watch?v=4WM0Q75VjfE,
  5. https://www.youtube.com/watch?v=FH8Sndp9Cvk (veda adhikar and strict rules)

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