भाग -१
संख्या १०८: पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व का वह ‘ब्रह्मांडीय सूत्र‘ जिससे आधुनिक विज्ञान आज भी अनभिज्ञ है!
आज का आधुनिक विज्ञान जिन सत्यों को अरबों डॉलर के उपकरणों और सुपर-कंप्यूटरों की मदद से खोजने का प्रयास कर रहा है, भारत के द्रष्टा ऋषियों ने उन्हें ध्यान की पराकाष्ठा में केवल ‘१०८’ के एक बीज-अंक में सूत्रबद्ध कर दिया था। यह अंक केवल एक संख्या नहीं, बल्कि वेदों का वह वैज्ञानिक प्रमाण है जिससे आधुनिक विज्ञान आज भी अनभिज्ञ है।”
सनातन धर्म के गहनतम ग्रंथों में एक संख्या बार-बार उभरती है—१०८ (108 ) । आधुनिक जगत के लिए यह केवल एक अंक हो सकता है, परंतु वैदिक ऋषियों के लिए यह ब्रह्मांडीय अस्तित्व का ‘कोड’ था। यह लेख उस विस्मयकारी सत्य को उजागर करता है कि कैसे हज़ारों वर्ष पूर्व ऋषियों ने खगोल विज्ञान, शरीर विज्ञान और गणित के उन गुप्त अनुपातों को पहचान लिया था, जिन्हें खोजने में आधुनिक विज्ञान को सदियों लग गए । “यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे” (जैसा सूक्ष्म शरीर है, वैसा ही विशाल ब्रह्मांड है) का सिद्धांत भी १०८ अंक के माध्यम से स्पष्ट होता है —चाहे वह सूर्य की दूरी हो या हमारे हृदय की नाड़ियाँ, सभी का १०८ अंक से गूढ़ सम्बन्ध है ।
वैदिक ऋषियों ने जिस ब्रह्मांडीय नियतांक (Cosmic Constant) को 108 के रूप में प्रतिष्ठापित किया, वह आज के आधुनिक विज्ञान के लिए एक रहस्यमयी चुनौती है। यह विस्मयकारी सत्य है कि सूर्य और चंद्रमा का पृथ्वी से जो दूरी-व्यास अनुपात है, वही हमारे शरीर की प्राणिक तरंगों में भी प्रतिबिंबित होता है। 108 बार मंत्रोच्चार करना – अपने सूक्ष्म शरीर को ब्रह्मांड की मूल आवृत्ति (Frequency) के साथ तदात्म्य करने की एक वैज्ञानिक विधि है।

सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा का त्रिकोणीय संबंध
आधुनिक खगोल विज्ञान (Modern Astronomy) ने हाल की शताब्दियों में दूरबीनों की सहायता से जो गणनाएँ की हैं, वे हमारे ‘सूर्य सिद्धांत’ और ‘पंचसिद्धांतिका’ जैसे ग्रंथों में लाखों वर्ष पूर्व ‘सूत्र’ रूप में विद्यमान थीं। यहाँ सबसे विस्मयकारी तथ्य ‘कोणीय व्यास’ (Angular Diameter) का है।
सूर्य का औसत व्यास पृथ्वी के व्यास का लगभग 108 गुना है। इसके अतिरिक्त, यदि आप सूर्य के व्यास को 108 से गुणा करें, तो आपको पृथ्वी से सूर्य की औसत दूरी प्राप्त होगी। यही गणित चंद्रमा पर भी लागू होता है; चंद्रमा के व्यास को 108 से गुणा करने पर पृथ्वी से चंद्रमा की औसत दूरी प्राप्त होती है।
यह ब्रह्मांडीय नियतांक (Cosmic Constant) 108 वह संख्या है जो हमारे सौर मंडल को एक ज्यामितीय लय (Geometric Harmony) प्रदान करती है। यदि यह अनुपात 108.0 के स्थान पर 107 या 109 होता, तो इस पृथ्वी पर कभी ‘पूर्ण सूर्य ग्रहण’ की अलौकिक घटना घटित नहीं होती। ऋषियों ने इस गणित को ‘ईश्वरीय हस्ताक्षर’ समझा।
आधुनिक विज्ञान आज हमें बताता है कि सूर्य और चंद्रमा की दूरियाँ और उनके आकार एक अद्भुत संयोग बनाते हैं। लेकिन ‘सूर्य सिद्धांत‘ के स्पष्टाधिकार अध्याय में यह रहस्य लाखों वर्ष पूर्व दर्ज था।


अग्नि-चयन (यज्ञ वेदी का निर्माण) का १०८ से सम्बन्ध
वैदिक काल में ‘यज्ञ’ केवल घी और सामग्री की आहुति नहीं थी, बल्कि वह ‘ब्रह्मांडीय ऊर्जा‘ को आमंत्रित करने की एक जटिल वैज्ञानिक प्रक्रिया थी। इसमें ‘अग्नि-चयन’ सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान था।
संवत्सर और मुहूर्त की गणना
शतपथ ब्राह्मण (10.4.2.2) में स्पष्ट उल्लेख है— “संवत्सरः प्रजापतिः” अर्थात समय (वर्ष) ही सृष्टिकर्ता है। ऋषियों ने समय को ‘इकाइयों’ में विभाजित किया।
वैदिक काल में ‘अग्नि-चयन’ (यज्ञ वेदी का निर्माण) केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि ‘स्पेस-टाइम’ का भौतिक चित्रण था। शतपथ ब्राह्मण (10.4.2.2) के अनुसार, वेदी का निर्माण ‘संवत्सर’ (Cosmic Year) के अंगों के रूप में किया जाता है।

एक सौर वर्ष में लगभग 10,800 मुहूर्त होते हैं (1 मुहूर्त = 48 मिनट) ।
- वेदी की ईंटों की संख्या और परतों का विन्यास इस प्रकार होता था कि वह इन 10,800 मुहूर्तों का प्रतिनिधित्व करे।
- 10,800 का 100वां भाग है—108।
- ऋषि जब वेदी बनाते थे, तो वे ‘पृथ्वी’ की सामग्री (ईंट) का उपयोग करके ‘समय’ (मुहूर्त) की गणना कर रहे होते थे। वेदी का क्षेत्रफल और उसकी ऊँचाई का अनुपात ब्रह्मांडीय दूरियों (108) के समानुपाती रखा जाता था।
अतः, यज्ञ की वेदी एक ‘कॉस्मिक क्लॉक‘ (Cosmic Clock) थी। जब यजमान वेदी के सामने बैठता था, तो वह ब्रह्मांड के केंद्र में स्थित होता था,
संस्कृत की वर्णमाला 54 मूल वर्ण (ध्वनियाँ) हैं (54 अक्षर X 2 ऊर्जा पक्ष = 108)
संस्कृत की वर्णमाला में कुल 54 मूल वर्ण (ध्वनियाँ) हैं। तंत्र शास्त्र के अनुसार, सृष्टि का प्रत्येक तत्व दो ऊर्जाओं के मिलन से बना है:
- प्रत्येक वर्ण का एक ‘प्रकाश‘ पक्ष है (जो उसका मूल स्वरूप है – शिव)।
- प्रत्येक वर्ण का एक ‘विमर्श‘ पक्ष है (उसकी शक्ति या अभिव्यक्ति – शक्ति)।
जब हम इन 54 वर्णों को इन दोनों पक्षों के साथ अनुभव करते हैं, तो संख्या 108 उत्पन्न होती है।
जब हम 54 वर्णों को इन दो ऊर्जाओं (54 अक्षर X 2 ऊर्जा पक्ष = 108) के साथ जपते हैं तो हम सृष्टि की समस्त ध्वन्यात्मक ऊर्जाओं को अनुप्राणित करते हैं। इसका प्रमाण ‘मातृका चक्र‘ और ‘विज्ञान भैरव तंत्र‘ जैसे ग्रंथों में मिलता है।

“यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे” (जो ब्रह्मांड में है, वही पिंड (शरीर) में है)
यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे” का शाश्वत सिद्धांत यह प्रतिपादित करता है कि मानव शरीर (पिंड) कोई स्वतंत्र इकाई नहीं, अपितु इस विराट ब्रह्मांड का ही एक लघु-प्रतिरूप है। इस सूक्ष्म शरीर और विशाल अंतरिक्ष के मध्य जो अदृश्य सूत्र है, वह १०८ का रहस्यमयी अंक है। आधुनिक शरीर-क्रिया विज्ञान (Physiology) और खगोल विज्ञान के अंतर्संबंधों का गहन विश्लेषण करने पर यह विस्मयकारी सत्य उजागर होता है कि हमारी शरीर की अनेक क्रियाएं —चाहे वह हृदय के स्पंदन की लय हो, श्वसन की गति हो, या नारी का मासिक धर्म —सब कुछ खगोलीय पिण्डों – ग्रहों, उपग्रहों और नक्षत्रों से नियंत्रित है।
पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे= “यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे” के सिद्धांत को समझने के लिए हमें अपने शरीर की आंतरिक घड़ी और पृथ्वी की गति के बीच के अद्भुत गणित को देखना होगा। यह संबंध १०८ के उस रहस्यमयी अंक पर टिका है जो पिंड को ब्रह्माण्ड से जोड़ता है।
खगोलीय पिंडों की गति और मानवीय शरीर-क्रिया विज्ञान (Physiology) के अंतर्संबंधों को समझने पर बड़े बड़े अद्भुत रहस्य उजागर होते हैं और इन सभी में १०८ अंक का ही महत्त्व है । पिंड यानी हमारा शरीर के सभी क्रिया कलाप जैसे ह्रदय की धड़कने की गति, श्वास लेने की संख्या, महिलाओं का मासिक धर्म और कई अन्य शारीरिक क्रियाएं , सभी खगोलीय ग्रहों उपग्रहों , नक्षत्रों आदि से सम्बंधित हैं और १०८ अंक सभी क्रियाओं में आता है जिससे हमारा शरीर इस ब्रह्माण्ड का ही एक स्वरुप है यानी यथा पिंडे तथा ब्रह्मांड को चरितार्थ करता है ।
प्राणिक गणित: आपकी धड़कन और श्वास में ब्रह्मांडीय लय
मानव शरीर की कार्यप्रणाली और पृथ्वी के घूर्णन (Rotation) के बीच एक विस्मयकारी ज्यामितीय (Geometric) संबंध है। यह संयोग नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म ‘ब्रह्मांडीय संरेखण’ (Celestial Alignment) है।
पृथ्वी के घूमने में और मानवीय शरीर की लय के बीच का गणितीय – 108- संबंध “यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे” के सिद्धांत को जीवंत कर देता है। इसे निम्न गणनाओं से समझा जा सकता है:
- पृथ्वी की कोणीय दूरी: ३६० अंश X ६० कला (Arc-minutes) = २१,६०० कला (नॉटिकल मील)। – (यही संख्या २४ घंटे में एक स्वस्थ व्यक्ति द्वारा ली जाने वाली श्वासों के बराबर है)

- एक दिन की कुल श्वास: २४ घंटे X १५ श्वास प्रति मिनट X ६० मिनट = २१,६०० श्वास।
- हृदय का स्पंदन: एक स्वस्थ व्यक्ति का हृदय प्रति मिनट ६० बार (प्रति सेकंड एक बार) धड़कता है।
- २४ घंटे में कुल धड़कन: २४ घंटे X ६० मिनट X ६० सेकंड = ८६,४०० धड़कन ।
- श्वास और धड़कन का अनुपात (१:४):
- १ मिनट में हृदय की धड़कन = ६० बार
- १ मिनट में श्वास की संख्या = १५ बार
- निष्कर्ष: प्रत्येक १ श्वास के दौरान हृदय ठीक ४ बार धड़कता है। (१५ X ४ = ६०)
- २४ घंटे का कुल योग: * कुल हृदय स्पंदन = ८६,४००
- कुल श्वास = ८६,४०० / ४ = २१,६००
यह “यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे” का विस्मयकारी गणित है । यदि हम पृथ्वी और अन्य खगोलीय पिंडों (नक्षत्र, चंद्रमा और अन्य ग्रहों) के साथ पूर्ण सामंजस्य में हैं, तो हमारा हृदय प्रति मिनट ६० बार धड़केगा और पृथ्वी द्वारा अपनी धुरी पर तय किए गए प्रत्येक १ नॉटिकल मील के साथ हम ठीक १ बार श्वास लेंगे ।
लेख के इस प्रथम भाग में हमने १०८ संख्या के उन विस्मयकारी रहस्यों को स्पर्श किया, जो सिद्ध करते हैं कि १०८ कोई साधारण अंक नहीं, बल्कि ईश्वरीय सृष्टि की वह अद्भुत व्यवस्था है जिससे ब्रह्मांड का कण-कण एक अदृश्य सूत्र में बंधा है। ‘यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे’ के जिस सूक्ष्म गणितीय सत्य का हमने सूक्ष्म अवलोकन किया, वह इस तथ्य का जीवंत प्रमाण है कि हमारा शरीर इस विराट ब्रह्मांड का ही एक लघु-स्वरूप है।
ऋषियों द्वारा प्रदत्त वैदिक नियमों के अनुसार जीवन यापन करना वास्तव में स्वयं को इसी ब्रह्मांडीय लय के साथ अनुशासित करना है। जब हम प्रकृति के इन अभेद्य नियमों के अनुकूल होते हैं, तभी हम पूर्ण स्वास्थ्य और सच्ची समृद्धि को प्राप्त करते हैं—यही ‘योग’ है, अर्थात अपनी सीमित सत्ता का उस असीम प्रकृति के साथ पूर्ण जुड़ाव।
परंतु १०८ का यह रहस्य यहीं समाप्त नहीं होता। आगामी भाग-२ में हम ‘यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे’ की गहराइयों में उतरते हुए उन गुप्त सत्यों का रहस्योद्घाटन करेंगे, जो हमारी धड़कन, श्वास और चेतना के उस महा-विज्ञान को प्रकट करेंगे जिससे आधुनिक विज्ञान आज भी अनभिज्ञ है। “