सनातन-धर्म की आस्था का सूचक चिन्ह क्या है?

सनातन-धर्म की आस्था का सूचक चिन्ह क्या है?

हर हिन्दू के द्वार पर अंकित, हर शुभ कार्य की शुरुआत में .. यह कौन सा चिन्ह है, जिसे हम नित्य बहुत बार जगह जगह देखते हैं, पर इसकी असीमित शक्ति और ब्रह्माण्डीय रहस्य को कम ही लोग जानते हैं?
यह केवल एक शुभ चिह्न ही नहीं है । यह वेदों का निचोड़ है, गणित का आधार है, सृष्टि के संतुलन का सूत्र है! महान शंकराचार्य जी के ग्रंथ पर आधारित यह लेख है जो सिद्ध करता है  कि सनातन धर्म की आस्था का मूल सूचक चिन्ह कोई और नहीं, बल्कि वह साक्षात ‘स्वस्तिक’ ही है जो कल्याण और परम तत्त्व का प्रतिनिधित्व करता है। आइए, इस शाश्वत प्रतीक के हर मोड़ में छिपे गहरे अर्थों को जानें।
हम सब ‘ॐ’, ‘त्रिशूल’, ‘भगवान् के चरण कमल’, दीपक, त्रिपुण्ड तिलक, वैष्णव ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक, स्वास्तिक आदि अनेक चिन्हों को रोज़ ही देखते हैं, सभी चिन्ह सनातन धर्म से सम्बंधित ही हैं परंतु एक चिन्ह ऐसा है जो हर द्वार पर अंकित होता है, हर पूजा में उपस्थित होता है, फिर भी उसकी गहराई को बहुत कम लोग समझते हैं। वह चिन्ह है—स्वास्तिक ।

जी हाँ ! सनातन-धर्मावलांबियों की आस्था का सूचक चिन्हों में सबसे प्रमुख चिन्ह है स्वास्तिक !

‘स्वस्ति’(क)शब्द की उत्पत्ति

स्वास्तिक सनातन धर्म के मूल सिद्धांत यानी कल्याण और परम तत्त्व का प्रतिनिधित्व करता है। मूल अर्थ:– ‘सबका कल्याण हो’

  • स्वास्तिक दो शब्दों से मिलकर बना है: ‘सु’ (अच्छा/शुभ) + ‘अस्ति’ (होना/अस्तित्व)। इसका शाब्दिक अर्थ है ‘कल्याण हो’
  • ‘निरुक्त’ (३.२१) में कहा गया है —स्वस्तीत्यविनाशनाम — अर्थात् स्वस्तिक ऐसी स्थिति का नाम है जो कभी नष्ट नहीं होती; यह शाश्वत कल्याण का प्रतीक है।
  • यह चिन्ह हमारे वैदिक आदर्श ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ (सब सुखी हों) का दृश्य रूप है। स्कंद पुराण और महाभारत में इसकी कामना की गई है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, गोवंश, प्रजा और संपूर्ण जगत का स्वस्ति (कल्याण) हो।
  • स्वस्तिक सनातन (हमेशा से चली आ रही) वैदिक आर्यों का शाश्वत चिन्ह है। स्वस्तिवाचन (कल्याण के लिए पाठ), स्वस्तिकासन (योग का आसन) जैसे शब्द वैदिक साहित्य में जगह-जगह मिलते हैं।
  • निरुक्त ३.२१ के अनुसार, ‘स्वस्ति’ का अर्थ है अविनाश (जो कभी नष्ट न हो)।
  • सामवेद संहिता के अंतिम मन्त्र में, पूरे संसार के कल्याण की भावना से इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से प्रार्थना करते हुए चार बार स्वस्ति शब्द का प्रयोग किया गया है।

सामवेद की स्वस्ति प्रार्थना

स्वास्तिक पांच तत्वों (पृथ्वी जल वायु, अग्नि और आकाश) का भी प्रतीक है  जिनसे ही सब संसार बना है ।

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु।। 
(सामवेद ९..२१.../ ऋग्वेद १.८९.६)

यशस्वी इन्द्र देव हमें सुख दें, सर्वज्ञ पूषा (सूर्य) हमारे जीवन में प्रकाश लाएँ, अजेय तार्क्ष्य (गरुड़) हमारी रक्षा करें और बृहस्पति देव हमें ज्ञान और कल्याण प्रदान करें।

ये चार देव — बृहस्पति (आकाश), इन्द्र (तेज), पूषा (जल-धरा) और तार्क्ष्य (वायु, गरुड़) — मिलकर चार दिशाओं के प्रतीक हैं। इन्हीं से स्वस्तिक के चार भुजाएँ अर्थ प्राप्त करती हैं।

इन चार देवों में प्रत्येक एक तत्व का प्रतिनिधित्व करता है — बृहस्पति आकाश के देवता हैं (शब्द के रूप में)। इन्द्र तेज (ऊर्जा) के अधिदेव हैं।, पूषा पृथ्वी और जल के पालनकर्ता हैं। तार्क्ष्य (गरुड़) वायु के अधिदेव हैं। इस प्रकार यह ब्रह्माण्ड की चार शक्तियों — आकाश, अग्नि, वायु, जल और पृथ्वी — का प्रतीक है।

भगवान गणेश और स्वास्तिक

  • जैसे गायत्री मन्त्र सूर्य, विष्णु, शिव, शक्ति और गणपति के रूप में प्रकट होने के कारण सर्वदेव मन्त्रात्मक है, फिर भी इसका प्रयोग अक्सर सूर्योपासना में होता है; उसी प्रकार शिवस्वरूप कल्याणकारी पाँच देवताओं का यंत्र रूप प्रतीक स्वस्तिक सभी देवताओं को व्यक्त करने वाला स्थान है, फिर भी यह विघ्न विनाशक विश्व मंगल गणपति की उपासना में अधिक प्रयोग किया जाता है।
  • स्वस्तिक का अर्थ है कल्याण देने वाला और स्वस्ति का अर्थ है कल्याण। सनातन धर्म को मानने वालों में पहले “श्रीगणेशाय नमः” लिखने के बाद “स्वस्ति श्री” लिखने की पुरानी प्रथा है।
  • गजमुख स्वरुप भगवान गणपति, कार्य ब्रह्म, कारण ब्रह्म और कार्य-कारण से परे परब्रह्म (ओङ्कार रूप) स्वरूप हैं, जो स्वस्ति (कल्याण) कहलाते हैं और कल्याण प्रदान करने वाले हैं।
  • स्वस्तिक सर्वदेवात्मक प्रतीक है जैसेॐ सबका ध्वनि-रूप है। गायत्री मंत्र सूर्य, विष्णु, शिव, शक्ति और गणपति सबका प्रतिनिधि है, उसी प्रकार स्वस्तिक भी कल्याणकारी पंचदेव का सम्मिलित यंत्रात्मक चिन्ह है।
  • संनिहित स्वरूप में स्वस्तिक का अर्थ शुभता, संतुलन और शक्ति है; विशेषतः भगवान गणेश की उपासना में यह विघ्न-विनाशक प्रतीक माना गया है।

स्वास्तिक और गणित

  • व्यापार जगत में: सूर्य जोड़ (+) के, चन्द्रमा घटाव (-) के, वायु गुणा (×) के और अग्नि भाग (:) के अधिष्ठाता देव हैं।
  • स्वस्तिक चिन्ह में:
    • दो सीधी रेखाओं के मेल से जोड़ (+) चिन्ह बनता है।
    • समतल सीधी रेखा से घटाव (-) चिन्ह बनता है।
    • चार बिंदुओं के मुड़कर मिलने से गुणा (×) चिन्ह बनता है।
    • समतल सीधी रेखा के ऊपर और नीचे स्थित एक-एक बिंदु के मेल से भाग (:) चिन्ह बनता है।
  • बिंदु शून्य (०) का और लंबी सीधी रेखा एक (१) का मौलिक स्वरूप है। गणित में मूल रूप से शून्य (०) और एक (१) का ही समावेश होता है।
  • इस तरह स्वस्तिक गणित का भी आधार है।

 स्वास्तिक की नीचे से दाईं ओर मुड़ती हुई चार भुजाओं का सम्बन्ध दिशाओं, वेदों और शिवावतार आदि शंकराचार्य द्वारा बनाए गए मठों से

महर्षियों के मतानुसार

चार वेदों और चार दिशाओं का सम्बन्ध इस प्रकार है —

पूर्व दिशा – ऋग्वेद

दक्षिण दिशा – यजुर्वेद

पश्चिम दिशा – सामवेद

उत्तर दिशा – अथर्ववेद

  • इन चारों दिशाओं में शक्तियाँ स्वस्तिक की चार भुजाओं द्वारा प्रकट मानी गई हैं। इसीलिए स्वस्तिक का स्वरूप वेदात्मक ब्रह्माण्ड का चित्र है । स्वस्तिक की नीचे से दाईं ओर मुड़ती हुई चार भुजाएँ क्रमशः ऋक्, यजुः, साम और अथर्ववेद की प्रतीक हैं।
  • दाईं ओर मुड़ते हुए चारों बिंदु क्रमशः अग्नि, वायु, सूर्य और चन्द्रमा के प्रतीक हैं।

श्री भगवत्पाद शिवावतार शंकराचार्य महाभाग द्वारा बनाए गए मठाम्नाय के अनुसार:

  • पूर्वाम्नाय गोवर्द्धनमठ से ऋग्वेद।
  • दक्षिणाम्नाय शृंगेरी से यजुर्वेद।
  • पश्चिमाम्नाय द्वारका (शारदामठ) से सामवेद।
  • उत्तराम्नाय ज्योतिर्मठ से अथर्ववेद जुड़ा हुआ है।

 स्वास्तिक का दार्शनिक रहस्य

  • अध्यात्म में ‘स्वस्ति’ केवल एक शब्द नहीं, बल्कि परमात्मा और प्रकृति का सम्पूर्ण दर्शन है।
  • स्वस्ति = स्व + स्ति
    • स्व: वेदान्त में इसका अर्थ आत्मा या परमात्मा है।
    • स्ति: इसके तीन अक्षर (, त, इ) क्रमशः सत्त्वगुण, तमोगुण और रजोगुण (काम) का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो मिलकर त्रिगुणात्मिका प्रकृति या माया बनाते हैं।

इन तीनों (सत्त्वगुण, तमोगुण और रजोगुण ) के संतुलन से ही पूरे जगत का संचालन होता है। इसलिए स्वस्तिक में ब्रह्म (आत्मा) और प्रकृति (तीन गुण) दोनों का मिलित स्वरूप है।

स्वस्ति का अर्थ है पुरुषा-धिष्ठित प्रकृति का सम्पूर्ण विलास । यह परब्रह्म (स्व) और अपरब्रह्म (स्ति) का प्रतिपादन करने वाला प्रणव (ॐ) स्वरूप है।

निष्कर्ष

स्वस्तिक केवल एक चिन्ह नहीं — यह वेद, देवार्चना, दिशाएँ, संख्या, संतुलन, और आत्म-ज्ञान, सबका प्रतीक है। यह बताता है कि ब्रह्माण्ड और मनुष्य दोनों में समान दिव्यता है — सदैव शुभता, प्रकाश और शान्ति का प्रवाह बना रहना ही स्वस्ति का सच्चा अर्थ है।

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Reference: 

  1. पूर्वाम्नायगोवर्धनमठ – पुरी पीठाधीश्वर – श्रीमद जगतगुरु शंकराचार्य – पूज्यनीय स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी  के ग्रंथ – सनातनधर्म-प्रश्नोत्तर –मालिका , पर आधारित 

1 thought on “सनातन-धर्म की आस्था का सूचक चिन्ह क्या है?”

  1. स्वास्तिक के बारे में बहुत गूढ़ और रोचक जानकारी प्राप्त हुई

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