गीता के 18 अध्याय, 18 दिन का महाभारत युद्ध, 18 पुराण…

क्या यह मात्र संयोग है?

 18 संख्या सिर्फ़ एक संयोग नहीं है! क्या है इस का रहस्य ?

  • श्रीमद्भगवद्गीता में — 18 अध्याय
  • महाभारत युद्ध18 दिनों तक चला
  • महाभारत युद्ध में18 अक्षौहिणी सेना
  • पुराणों की संख्या18 मुख्य पुराण और 18 उप पुराण और 18 औप पुराण ।
  • श्रीमद्भागवत महापुराण18,000 श्लोक
  • धर्मशास्त्रों में प्रमुख 18 स्मृतियाँ
  • श्रुति (वेद) स्मृति (धर्मशास्त्र) में18 विद्यास्थान (4 वेद + 4 उपवेद + 6 वेदांग + 4 शास्त्र)

क्या है 18 संख्या का रहस्य ?

  1. मानव-शरीर में कार्य करनेवाले तत्त्व अट्ठारह (18) हैं

इनसे ही मनुष्य शुभ और अशुभ कर्म करता है। इसलिए कहा गया कि पापों और पुण्यों के 18 द्वार हैं। इन 18 प्रकार के कर्मों की शुद्धि के लिए ही 18 शास्त्र बनाए गए — जिनमें 18 पुराण प्रमुख हैं

अच्छे और बुरे कामों को पुण्य और पाप कहा जाता है, और सभी कर्म  इन १८ तत्वों से ही किये जाते हैं – इससे सिद्ध हुआ कि पाप करने के द्वार अट्ठारह हैं, इसलिए अट्ठारह प्रकार से होनेवाले पापों की निवृत्ति के लिए उपाय भी अट्ठारह प्रकार के ही होने चाहिए । इसलिए, पाप-निवर्त्तक या धर्म-प्रतिपादक शास्त्रों में अट्ठारह संख्या को विशेष स्थान दिया गया है, जिससे कि अट्ठारह प्रकार के पापों की निवृत्ति इन अट्ठारह ध्यायों / उपायों से हो सके ।

 

  1. 10 पाप + 8 पुण्य = 18 कर्म

न्याय दर्शन (तर्क और कर्म का शास्त्र) ने हमारे कर्मों को गहराई से बाँटा है

अशुभ कर्म (पाप) – 10 प्रकार:

मन से 3: दूसरों से द्वेष, किसी और का धन चुराने की इच्छा, धर्म या ईश्वर पर अविश्वास

वाणी से 4: झूठ, कड़वे शब्द, चुगली, व्यर्थ बकवास

शरीर से 3: हिंसा, चोरी, अनैतिक संबंध।

शुभ कर्म (पुण्य) – 8 प्रकार:

मन से 3: दीन पर दया करना, गलत लालच को रोकना, गुरु/शास्त्र में श्रद्धा।

वाणी से 2: सत्य, प्रिय और हितकारी बोलना, शास्त्रों का अध्ययन (स्वाध्याय)।

शरीर से 3: दान, परोपकार, सबकी सेवा

इन्हीं शुभ-अशुभ प्रवृत्तियों को नियंत्रित और शुद्ध करने का संकेत ही 18 अठारह ग्रंथों की संख्या में निहित है।

  1. श्रुति (वेद) स्मृति (धर्मशास्त्र) में 18 विद्याएँ

“पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः। वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश।।”
(याज्ञवल्क्यस्मृति १.३)

पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र और 6 छह वेदाङ्गों सहित 4 चारों वेद – ये धर्म और ज्ञान के चौदह स्थान माने गए हैं।” चौदह विद्याएँ जो गिनी गई हैं, वह गणना ब्राह्मणों के लिए है और क्षत्रियों के पक्ष में चार विद्याएँ कही जाती हैं : आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता और दण्डनीति ।

ब्राह्मणों की 14 विद्याएँ — (4 वेद, 4 उपवेद, 6 वेदाङ्ग)

क्षत्रियों की 4 विद्याएँ

  • आन्वीक्षिकी (तर्क या न्याय-शास्त्र)
  • त्रयी (तीनों वेदों का ज्ञान)
  • वार्ता (कृषि, व्यापार और अर्थशास्त्र का ज्ञान)
  • दण्डनीति (राजनीति और शासन का ज्ञान)

इस प्रकार कुल मिलाकर 14 + 4 = 18 विद्याएँ होती, आन्वीक्षिकी यह नाम न्यायविद्या का है। त्रयी नाम से तीनों वेद ही कहे गये हैं ।” 👉 अर्थ: “आन्वीक्षिकी” का मतलब है न्याय और तर्कशास्त्र, और “त्रयी” का अर्थ है तीनों वेदों का अध्ययन (ऋग, यजुः, साम), ये दोनों विद्याएँ यद्यपि पूर्व-गणित 14 (चौदह विद्याओं) में भी आ जाती हैं… इसलिए यहाँ पुनरुक्ति प्रतीत होगी; किन्तु… पुनरुक्ति नहीं होती। क्योंकि:

  • ब्राह्मणों के लिए वेद और न्याय का प्रयोग धर्म और अध्यात्म के लिए होता है,
  • जबकि क्षत्रियों के लिए वही विद्या राजनीति और व्यवहारिक जीवन में प्रयुक्त होती है।

इन अट्ठारह प्रकार की विद्याओं का स्थान-स्थान पर निरूपण पुराणों में मिलता है, इसी कारण पुराणों की संख्या भी अट्ठारह रखना उचित है —

क्योंकि पुराण सम्पूर्ण ज्ञान का सार हैं।

 याज्ञवल्क्य स्मृति में 18 प्रमुख धर्म बताए गए हैं

याज्ञवल्क्य स्मृति में 9 प्रमुख धर्म बताए गए हैं — अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), शौच, इन्द्रिय संयम, दान, दया, दम और क्षमा।

  • अणुव्रत: सीमित रूप में पालन, समय और पात्र के अनुसार पालन
  • महाव्रत: सभी स्थानों, कालों और प्राणियों पर समान रूप से पालन

इस प्रकार 9×2 = 18 अट्ठारह धर्म रूप बनते हैं, जिनका पालन पुराणों में बताया गया है।

 

  1. त्रिलोकी 3 (पृथ्वी, अन्तरिक्ष तथा आकाश) में दिखने वाली सभी चीज़ों की 6 छः अवस्थाएं होती हैं 3X6=18

हम जिस दृश्य ब्रह्मांड में रहते हैं, वह 3 तीन लोकों में बँटा है — भू (पृथ्वी), भुवः (अंतरिक्ष) और स्वः (आकाश)।
इन तीनों लोकों में मौजूद हर एक वस्तु या तत्व छह अवस्थाओं से गुजरता है —

  1. अस्ति (पदार्थ का अस्तित्व में आना)
  2. जायते (उसका जन्म या उत्पत्ति होना)
  3. वर्धते (उसका बढ़ना या विकसित होना)
  4. परिणमते (परिपक्व होना या बदलना)
  5. अपक्षीयते (उसका ह्रास या कम होना)
  6. विनश्यति ((उसका विनाश होना)
तीन लोक × छह अवस्थाएँ = 18

ये छः अवस्थाएं ही सृष्टि का – सम्पूर्ण सृष्टि के सृजन, पालन और संहार दर्शाती हैं …जो की – पुराणों का विषय है।

इस दृष्टि से भी पुराणों का 18 होना केवल संयोग  नहीं, बल्कि ब्रह्माण्ड की लय और गति का गणितीय रहस्य है

 

 

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