
वेद और “(14) चतुर्दश विद्यासंस्थान
प्राचीन वैदिक परंपरा में समस्त ज्ञान को चौदह प्रमुख शाखाओं में विभाजित किया गया है, जिन्हें “चतुर्दश विद्यासंस्थान” कहा जाता है — अर्थात् ज्ञान के चौदह पवित्र स्थान।
इनमें पुराण का स्थान अत्यंत विशेष और गौरवपूर्ण है, क्योंकि इनमें वैदिक सत्य, दैवी इतिहास और धर्म के शाश्वत सिद्धांत — कथा और प्रसंगों के माध्यम से संरक्षित हैं।
- ऋक्, यजुः, साम और अथर्व — ये ४ वेद हैं। वेदों के अध्ययन और उनके सही अर्थ को समझने के लिए ६ छह वेदांग बताए गए हैं –शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द तथा ज्योतिष (कालगणना और मुहूर्त निर्धारण)।
- इनके अतिरिक्त ४ चार उपांग हैं — पुराण, न्याय, मीमांसा, और धर्मशास्त्र।
पुराणों में समस्त सृष्टि — देवता, मनुष्य और धर्म के सनातन सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन मिलता है।, इस प्रकार, वेदज्ञान की दृष्टि से पुराण अत्यंत व्यापक और आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। - इस प्रकार चार वेद, छह वेदांग और चार उपांग —
मिलकर १४ चौदह चतुर्दश विद्यासंस्थान बनाते हैं —
जो सनातन धर्म के आध्यात्मिक और बौद्धिक ज्ञान का आधार स्तंभ हैं।
१४ चौदह विद्या–संस्थानों में पुराणों का महत्त्व
“पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः। वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश।।”
(याज्ञवल्क्यस्मृति १.३)
पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र और छह वेदाङ्गों सहित चारों वेद – ये धर्म और ज्ञान के चौदह स्थान माने गए हैं।”
“अङ्गानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्यायविस्तरः । धर्मशास्त्रं पुराणं च विद्या ह्येताश्चतुर्दश।।”
(महाभारत – आश्वमेधिक पर्व ९२)
चार वेद, उनके छह वेदाङ्ग, मीमांसा, न्याय, धर्मशास्त्र और पुराण – ये सब मिलकर धर्म की चौदह विद्याएँ कही गई हैं।”
पुराणों में समस्त सृष्टि — देवता, मनुष्य और धर्म के सनातन सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन मिलता है। इस प्रकार, वेदज्ञान की दृष्टि से पुराण अत्यंत व्यापक और आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
“श्रुतिस्तु वेदविज्ञेया धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः।
पुराणानि तु इतिहासो वेदानाम् उपबृंहणम्॥” – (विष्णु पुराण (३.६.२७))
जिसका अर्थ है: वेद को श्रुति कहा गया है, स्मृति धर्मशास्त्र कहलाती है, और पुराण- इतिहास और वेदों की व्याख्या और विस्तार हैं।

पुराण क्या हैं?
- “जिस ग्रंथ में सृष्टि की उत्पत्ति, संहार, वंशों की कथा, मन्वन्तर और वंशानुचरित का वर्णन हो — उसे पुराण कहा जाता है।”
- पुराण हमारे वेदों का व्यावहारिक रूप हैं — जो गूढ़ वैदिक ज्ञान को लोक के लिए सरल कथा और उदाहरणों में प्रस्तुत करते हैं।
श्रीकृष्ण द्वैपायन वेदव्यास जी ने अठारह (१८) महापुराण, अठारह (१८) उपपुराण और अठारह (१८) औपपुराण की रचना की। - इन ग्रंथों में केवल देवताओं या ऋषियों की कथाएँ ही नहीं हैं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र का ज्ञान समाहित है —
भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्षा, विवाह, कृषि, वाणिज्य, गो-रक्षा, यज्ञ, नीति, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष — सबका विस्तृत विवेचन मिलता है।
यही कारण है कि पुराणों को सर्वविद्या का भंडार और कालातीत ज्ञानकोश कहा गया है।
देवलोक में पुराण सौ (100) करोड़ श्लोकों में विस्तृत, विशाल रूप में विद्यमान है!
कल्पों के प्रारंभ में जब ब्रह्मा जी ने तप किया, तब उसी तप की शक्ति से वेदों का प्रादुर्भाव हुआ। मत्स्यपुराण में उल्लेख आता है कि जब ब्रह्माजी ने महाकल्प के प्रारम्भ में तप किया, तब उनके ध्यान से शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, छन्द — ये वेदाङ्ग प्रकट हुए; पुराण, न्याय, मीमांसा और धर्मशास्त्र — ये वेदोपाङ्ग प्रकट हुए।
“पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम्। नित्यं शब्दमयं पुण्यं शतकोटिप्रविस्तरम्।।
(मत्स्यपुराण ३.२–४, ५३.३)
सभी शास्त्रों से पहले पुराण का स्मरण ब्रह्माजी ने किया। वह नित्य, शब्दमय, पुण्य और सौ करोड़ श्लोकों में विस्तृत था। देवलोक में आज भी पुराण का वही विशाल रूप विद्यमान है।
पृथ्वी पर — ४ लाख श्लोकों में पुराण साररूप हैं
द्वापर युग में जब भगवान वेदव्यास जी ने यह जानते हुए कि आगामी कलियुग में मनुष्य की स्मृति, आयु, शक्ति और बौद्धिक क्षमता अत्यंत क्षीण हो जाएगी, उन्होंने कलियुग के मनुष्यों को वेदों के ज्ञान और उपदेश का लाभ मिल सके, इसलिए
- एक वेद को चार भागों में विभक्त किया और – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद।
- और फिर पुराणों की रचना की, ताकि वेदों का गूढ़ ज्ञान कथाओं, दृष्टांतों और जीवनोपयोगी प्रसंगों के माध्यम से सरलता से समझाया जा सके।
वेद अत्यंत गूढ़ हैं — उनके अध्ययन के लिए गुरु-परंपरा, संस्कार, और कठोर साधना आवश्यक है। कलियुग के लोग ना तो इतनी दीर्घ आयु रखते हैं, ना ही इतनी एकाग्रता।
भगवान वेदव्यास जी विष्णु के अंशावतार हैं, जो प्रत्येक द्वापर युग में अवतरित होकर वेद और पुराणों का पुनः संकलन करते हैं। इसलिए कहा गया — “कलियुग के मानवों के लिए पुराण ही वेद हैं।”
पुराणों का उद्देश्य
पुराण केवल धार्मिक कथा नहीं हैं – वे विज्ञान, इतिहास, समाज और अध्यात्म का संगम हैं। उनका मुख्य उद्देश्य है – “सत्य का अनुसंधान, धर्म की रक्षा और जीवन को सम्यक मार्ग पर ले जाना।”
“अत्र सर्गो विसर्गश्च स्थानं पोषणमूतयः। मन्वन्तरेशानुकथा निरोधो मुक्तिराश्रयः।।
दशमस्य विशुद्धयर्थं नवानामिह लक्षणम्।”-(श्रीमद्भागवत २.१०.१–२)
अर्थात् — पुराणों के दस लक्षण हैं: सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वन्तर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय। इन लक्षणों के माध्यम से वे सृष्टि, धर्म और मोक्ष का रहस्य प्रकट करते हैं।
पुराणों का क्रम सृष्टि प्रक्रिया को समझने की उत्कृष्ट वैज्ञानिक जिज्ञासा पर आधारित है। इस रहस्य को जानने के लिए
क्षीर सागर में शेषशायी भगवान् विष्णु के चित्र का ध्यान करें। यह क्रम प्रत्येक प्रश्न का उत्तर अगले पुराण में देता है:
- उत्पत्ति का मूल: प्रथम जिज्ञासा उठती है कि इस ब्रह्मांड का रचयिता कौन है? इसका उत्तर देता है ब्रह्म पुराण (१) – ब्रह्म ही स्वयं ब्रह्मा के रूप में सृष्टिकर्ता हैं।
- रचयिता का आधार: दूसरा प्रश्न उठता है कि ब्रह्मा कहाँ से प्रकट हुए? उत्तर है पद्म पुराण (२) – ब्रह्मा, ब्रह्म के नाभि कमल (‘पद्म’) से उत्पन्न हुए।
- आधार का भी आधार: तीसरा प्रश्न – वह कमल कहाँ से निकला? इसका समाधान करता है विष्णु पुराण (३) – वह कमल भगवान् विष्णु की नाभि से प्रकट हुआ।
- विष्णु का आधार: चौथा प्रश्न – विष्णु किस पर टिके हैं? इसका गूढ़ उत्तर है वायु/शिव पुराण (४) – वे शेष-शय्या पर स्थित हैं (शेष, वायु तत्त्व का प्रतीक है)।
- चरम भौतिक आधार: पाँचवां प्रश्न – शेष का आधार क्या है? उत्तर है भागवत पुराण (५) – शेष का आधार क्षीर समुद्र है।
- क्षीरसमुद्र में शेषशय्या के पास वीणाधारी नारद जी सदा विराजते हैं। इस रहस्य को व्यक्त करने के लिए छठा नारदीय पुराण है। ये छह पुराण स्थूल तत्त्व से सूक्ष्म तत्त्व की ओर संकेत करते हैं । इसके बाद, अगली जिज्ञासा उठती है कि इन सब का मूल तत्त्व क्या है? इसका उत्तर सातवां मार्कण्डेयपुराण बताता है
- मार्कण्डेयपुराण (प्रकृति को मूल तत्त्व बताता है),
- अग्निपुराण (अग्नि को आधार बताता है), और
- भविष्य पुराण (सूर्य को प्रधान तत्त्व बताता है) । अंत में,
- ब्रह्मवैवर्त पुराण निष्कर्ष देता है कि यह सब ब्रह्म का ही विवर्त है और ब्रह्मा ही मूल तत्त्व हैं।
- सृष्टि के पूर्ण विकास का निरूपण करने के बाद, यह जिज्ञासा होती है कि उस मूल तत्त्व ब्रह्म को कैसे जाना जाए और कैसी उपासना की जाए? इसका उत्तर लिंगपुराण और
- वाराह पुराण और
- स्कन्दपुराण (भगवान् शंकर का निर्देश) देते हैं। इसी क्रम में वामन, कूर्म, और मत्स्य पुराण भगवान् विष्णु के चार अवतारों का विवरण देते हैं, जिन्हें सृष्टि प्रक्रिया में विशेष प्रधानता दी गई है—यह पुराणों का नामकरण भी सृष्टि प्रक्रिया में उनके उपयोग के क्रम पर आधारित है।
- वामन,
- कूर्म,
- मत्स्य पुराण
- गरुड़पुराण जीव की विविध गतियाँ बताता है, और
- ब्रह्माण्डपुराण सृज्यमान जगत् की सीमा और सब गतियों का आधार बताता है।
इस प्रकार, यह क्रम ‘पुरुषान्न परं किञ्चित्सा काष्ठा सा परा गतिः’ के अनुसार ब्रह्म से आगे कोई ज्ञातव्य वस्तु शेष न रहने के सिद्धांत पर पूर्ण होता है।
१८ महापुराण के अतिरिक्त और कितने पुराण हैं?
सनातन परंपरा में कुल ५४ पुराण माने गए हैं –
१८ महापुराण, १८ उपपुराण, और १८ औपपुराण।
(कुछ ग्रंथों में १०८ पुराणों का उल्लेख भी आता है, किंतु वे शाखाओं और प्रकरण भेदों के कारण हैं
१८ उप–पुराण: (पद्मपुराणके नृसिंहावतारके वृत्तान्तको नरसिंहपुराण कहते हैं। जिसमें स्वामिकार्तिकेय ने नन्दीके माहात्म्यका वर्णन किया है, उसे नन्दीपुराण कहते हैं। जिसमें भविष्यकी चर्चाके सहित साम्बके प्रसङ्गका कथानकके माध्यमसे प्रतिपादन किया गया है, उसे साम्बपुराण कहते हैं। सूर्यमहिमाके निरूपणके कारण उसीको दित्यपुराण भी कहते हैं। महाभारतके खिलपर्व (परिशिष्ट) को हरिवंशपुराण कहते हैं।

पुराणों में अध्याय एवं श्लोक संख्या

भाग–१ में हमने पुराणों से संबंधित निम्नलिखित मूलभूत तथ्यों और विषयों पर विस्तार से चर्चा की—
पुराणों के क्रम और नामकरण के पीछे निहित रहस्य
महापुराण, उपपुराण एवं औपपुराण — उनकी संख्या एवं नाम
अठारह महापुराणों में निहित अध्यायों तथा श्लोकों की कुल संख्या
भाग–२ में हम पुराणों से जुड़े और भी अधिक गूढ़ एवं रहस्यमय तथ्यों का उद्घाटन करेंगे।
पुराण ज्ञान का एक अनंत और अक्षय भंडार हैं। सृष्टि का कोई भी क्षेत्र—चाहे वह ज्ञान (ज्ञान), विज्ञान (विज्ञान) अथवा इतिहास (इतिहास) हो—ऐसा नहीं है, जिसका विस्तृत एवं सूक्ष्म विवेचन पुराणों में उपलब्ध न हो।
पुराणों में समस्त सृष्टि का बहुआयामी, गहन और समग्र निरूपण प्राप्त होता है।
references:
- सार्वभौम सनातन सिद्धांत, रचयिता- पूर्वाम्नायगोवर्धनमठ – पुरी पीठाधीश्वर – श्रीमद जगतगुरु शंकराचार्य – पूज्यनीय स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी
- सनातनधर्म-प्रश्नोत्तर –मालिका, रचयिता-पूर्वाम्नायगोवर्धनमठ – पुरी पीठाधीश्वर – श्रीमद जगतगुरु शंकराचार्य – पूज्यनीय स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी
- ब्रह्म पुराण, अनुवादक — श्री तरिणीश झा, प्रकाशक — हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग
यदि आपने अभी तक भाग 1 नहीं पढ़ा है, उसका लिंक -> “पुराण क्या हैं – भाग 1”
वेद और पुराण का सम्बन्ध: क्या पुराण सच में ‘पांचवां वेद’ हैं?
वेद और पुराण — दोनों ही भारतीय ज्ञान-परम्परा के मूल स्तम्भ हैं। शास्त्रों में बार-बार कहा गया है कि पुराण वेदों के अर्थ को “पूरा” करते हैं। वेद और पुराणों के आपसी संबंध और उनकी प्रमाणिकता (Validity) पर विचार पुराणों और दर्शन ग्रंथों में मिलता है। पुराणों में यह बात कई बार कही गई है कि वेदों के अर्थ को पुष्ट (Reinforcement/Elaboration) करना पुराणों का काम है।
इस कथन की पुष्टि में श्री जीव गोस्वामी ने ‘पुराण’ शब्द की व्युत्पत्ति (Etymology) एक नए तरीके से की है। उन्होंने कहा है – ‘पूरणात् पुराणम्‘ अर्थात, जो (वेद के अर्थ को) पूर्ण करता है, वह ‘पुराण’ कहलाता है।
इस व्युत्पत्ति का छिपा हुआ अर्थ (व्यङ्ग्यार्थ) बहुत गहरा है। आमतौर पर यह माना जाता है कि जिस चीज से किसी दूसरी चीज को पूरा किया जाता है, उन दोनों में समानता और अभिन्नता (Non-difference) होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि सोने के किसी अधूरे कंगन को पूरा करना हो, तो यह सोने से ही किया जाएगा, लाख (Lac) से नहीं। ऐसा इसलिए है क्योंकि सोना और लाख दो अलग-अलग तरह के पदार्थ हैं।
वेद और पुराण का संबंध भी ठीक ऐसा ही है। वेद के अर्थ को पुष्ट करना या पूरा करना, वेद से अलग किसी चीज द्वारा कभी नहीं किया जा सकता। इस व्युत्पत्ति पर आधारित तर्क से यह सिद्ध होता है कि पुराण भी वेद के समान ही है (पुराण का वेदत्व सिद्ध होता है)।
‘पुराण‘ वेद के समकक्ष ही है।
स्कन्दपुराण के प्रभास खण्ड में कहा गया है कि: “सृष्टि के आरंभ में, देवताओं के पितामह ब्रह्मा ने कठोर तपस्या की, जिसके फलस्वरूप षडङ्ग (छः सहायक अंग), पद और क्रम से युक्त वेदों का जन्म हुआ। उसके बाद सभी शास्त्रों से युक्त पुराण का भी जन्म हुआ, जो हमेशा रहने वाला (नित्य-शब्दमय), पुण्य देने वाला और विस्तार में एक सौ करोड़ श्लोकों वाला था। यह पुराण भी वेद के समान ही ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न हुआ।”
श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कन्ध में इसी तथ्य को इस प्रकार कहा गया है कि—
ऋक्, यजुः, साम और अथर्व वेद ब्रह्मा के चारों मुखों से उत्पन्न हुए, और फिर इतिहास-पुराण, जो पञ्चम वेद है, उन्हीं मुखों से प्रकट हुआ।
यहाँ पुराणों के लिए प्रत्यक्षतः “वेद” शब्द का प्रयोग हुआ है। उपनिषद् भी यही सत्य प्रकट करते हैं। बृहदारण्यक उपनिषद् (२।४।१०) में कहा गया है कि जैसे वेद ब्रह्म का “निःश्वास” हैं, वैसे ही “इतिहास और पुराण” भी ब्रह्म से ही निःसृत हैं। अतः पुराण भी वेदों की तरह स्वयं प्रमाण (स्वत:प्रमाण्य) हैं।
‘पुराण‘ वेद के ही स्वरूप हैं
पूज्यनीय धर्म सम्राट श्री करपात्री जी महाराज जी के विवेचन का एक अंश सिद्धान्त‘ (षष्ठ वर्ष, १९४५, पृ० १८-१९) से यहाँ दिया गया है:
‘बृहन्नारदीय पुराण’ में बताया गया है कि श्री रघुनाथचरित रामायण की तरह सभी पुराण सौ करोड़ श्लोकों तक विस्तृत हैं। वहाँ का वचन है:
“हरिर्व्यासस्वरूपेण जायते च युगे युगे । चतुर्लक्षप्रमाणेन द्वापरे द्वापरे सदा ॥
तदष्टादशधा कृत्वा भूर्लोके निर्दिशत्यपि । अद्यापि देवलोके तु शतकोटिप्रविस्तरम् ॥”
अर्थात— भगवान हरि, व्यास के रूप में प्रत्येक द्वापर में अवतीर्ण होकर चार लाख श्लोकों वाले पुराणों का संहिताकरण करते हैं। पर देव-लोक में आज भी पुराणों का विस्तार सौ करोड़ श्लोकों में विद्यमान है।
(इससे यह जानना चाहिए कि पुराणों का विस्तार भूलोक (पृथ्वी लोक) में चार लाख और देवलोक में सौ करोड़ श्लोकों का है।)
इससे यह भी सिद्ध होता है कि पुराण भी वेदों की भाँति अनादि हैं। जैसे प्रत्येक कल्प में वेदों का आविर्भाव भगवान से होता है, वैसे ही पुराणों का भी। इसी कारण इतिहास-पुराण वेद के उपबृंहक कहे गए हैं।
जैसे सोने की कमी सोने से ही पूरी हो सकती है, वैसे ही वेद के अर्थ की पूर्ति अवेद से नहीं हो सकती। इसलिए पूरण करने के कारण ही उनका नाम पुराण है (कहा गया- “पूरणाच्च पुराणम्” और “पुराणं वेदसम्मितम्।”) ।
इतिहास-पुराण पाँचवाँ वेद क्यों?
क्योंकि वेद में जो बातें प्रत्यक्षरूप से नहीं मिलतीं—ग्रहों की चाल, तिथियों की शुद्धि, पर्वों व व्रतों की निश्चित नियमावली, कालगणना, ऋतु-विन्यास— उनकी स्पष्ट जानकारी स्मृति और पुराण में मिलती है। इसलिए वेद कहता है: “इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपवृंहयेत्।” और इसी कारण इतिहास-पुराण को “पञ्चम वेद” कहा गया है-
“इतिहासः पुराणञ्च पञ्चमो वेद उच्यते।”
“न वेदे ग्रहसञ्चवारो न शुद्धिः कालबोधिनी । तिथिवृद्धिक्षयो वापि न पर्वग्रहनिर्णयः ॥ इतिहासपुराणैस्तु कृतोऽयं निर्णयः पुरा । यन्न दृष्टं हि वेदेषु तत्सर्वं लक्ष्यते स्मृतौ॥ उभयोर्यन्न दृष्टं हि तत्पुराणैः प्रगीयते । वेदार्थादधिकं मन्ये पुराणार्थं वरानने ॥ वेदाः प्रतिष्ठिताः सम्यक् पुराणे नात्र संशयः ।” —उत्तरार्द्ध, अध्याय २४
एकादशी व्रत के संबंध में बताया गया है कि एकादशी व्रत वेद में वर्णित नहीं है, इसलिए वैदिक लोगों को वह नहीं करना चाहिए। इस आक्षेप का यही समाधान किया गया है कि जो बात वेद में साफ तौर पर उपलब्ध नहीं होती, वह भी पुराणों में कही गई होने के कारण ग्रहण करने योग्य है ही, क्योंकि वेद में ग्रहों का घूमना (ग्रह-संचार), काल की शुद्धि, तिथियों का घटना-बढ़ना (क्षय-वृद्धि) और पर्व, ग्रहण आदि का निर्णय नहीं किया गया। परंतु इतिहास, पुराणों के द्वारा यह निर्णय पहले से ही किया हुआ है।
जो बात वेदों में नहीं मिलती, वह स्मृतियों में मिल जाती है, जो दोनों में उपलब्ध नहीं होती, उसका वर्णन पुराणों में मिल जाता है। शिवजी पार्वती से कहते हैं कि वे वेद के अर्थ की अपेक्षा पुराण के अर्थ को अधिक (विशद/स्पष्ट) मानते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि पुराण में वेद अच्छी तरह स्थापित हैं—
“श्रुतिस्मृती उभे नेत्रे पुराणं हृदयं स्मृतम् । एकेन हीनः काणः स्याद् द्वाभ्यामन्धः प्रकीर्त्तितः ॥ पुराणहीनाद् हृच्छून्यात्काणान्धावपि तौ वरौ ।”
कहीं तो श्रुति (वेद) और स्मृति को दो आँखें और पुराण को हृदय बताया गया है। आँख से हीन मनुष्य काना (एक आँख वाला) और दोनों से हीन अंधा कहा गया है, परंतु पुराण से हीन तो हृदयशून्य है, काने और अंधे उनकी अपेक्षा कहीं अच्छे हैं—
वेद साक्षात् स्वयं नारायण हैं, ऐसा सुनते आए हैं। वेद ईश्वर का स्वरूप हैं, उनमें बड़े-बड़े विद्वानों को भी मोह (भ्रम) होता है—
“वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः । वेदो नारायणः साक्षात्स्वयम्भूरिति शुश्रुम । वेदस्य चेश्वरात्मत्वात्तत्र मुह्यन्ति सूरयः ॥”
इत्यादि वचनों से पुराणों में ही वेदों का अपौरुषेयत्व, नित्यत्व और स्वतः प्रामाण्य कहा गया है।
इसके अलावा, जिस योगज प्रभाव (योग से उत्पन्न शक्ति) से पुराण के अर्थ का साक्षात्कार करके पुराण बनाए गए हैं, वह भी केवल वेद से ही जाना जा सकता है। इससे भी वेदों का पुराणों के लिए आधार (उपजीव्यत्व) होना सिद्ध होता है।
पुराण: वेद के अर्थ का पुष्टीकरण और विस्तार (उपबृंहण)
पुराणों में वेद के अर्थ का उपबृंहण (पुष्टीकरण और विस्तार) किया गया है। यह बात महाभारत काल में निश्चित रूप से प्रसिद्ध हो गई थी, क्योंकि महाभारत में इस तथ्य को सिद्ध करने वाले कई वाक्य मिलते हैं।
महाभारत (१।१।८६) में यह बात स्पष्ट रूप से कही गई है कि:
“पुराणरूपी पूर्ण चन्द्रमा ने श्रुति (वेद) की चाँदनी को प्रकाशित किया।” – (पुराणपूर्णचन्द्रेण श्रुतिज्योत्स्नाः प्रकाशिताः)
वह प्रसिद्ध श्लोक, जिसमें यह उपदेश दिया गया है कि इतिहास-पुराणों के द्वारा वेदार्थ का उपबृंहण करना चाहिए, और जिसमें बताया गया है कि कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति (अल्पश्रुत) से वेद हमेशा डरते हैं कि कहीं वह उन्हें नुकसान न पहुँचा दे (या दूसरे पाठ के अनुसार ठग न ले), मूलतः महाभारत का ही है और संभवतः बाद में अन्य पुराणों में भी उद्धृत किया गया है।
वह प्रसिद्ध श्लोक है:
“इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत् । बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ॥”
(इतिहास और पुराणों के द्वारा वेद को अच्छी तरह पुष्ट करना चाहिए। वेद कम पढ़े-लिखे व्यक्ति से डरता है कि कहीं यह मुझ पर प्रहार (अर्थात गलत अर्थ समझ कर अनर्थ न कर दे ) न कर दे।)
‘उपबृंहण’ शब्द का अर्थ है किसी तथ्य की पुष्टि करना (Confirmation) और उसका विस्तार करना (Elaboration)। ‘बृंह’ धातु का मुख्य अर्थ ही बढ़ाना होता है। इस प्रकार, वेद के मंत्रों द्वारा कहे गए अर्थ, सिद्धांत और तथ्य का विस्तार और पोषण पुराणों के श्लोकों में किया गया है। पूर्वोक्त श्लोक का यही मतलब समझना चाहिए।
श्रीमद्भागवत ने खुद को इसी परंपरा का हिस्सा माना है। भागवत ने कई जगहों पर स्पष्ट शब्दों में खुद को वेद के अर्थ को बताने वाला माना है। भागवत ने खुद को कल्पवृक्ष रूपी वेद का गला हुआ, पूरी तरह पका हुआ, इसलिए मधुरतम फल माना है (निगम कल्पतरोर्गलितं फलम् – १।१।३)। ग्रंथ के अंत में वह खुद को ‘सर्ववेदांतसार’ (सभी वेदों और उपनिषदों का सार) बताता है (भाग० १२।१२।१५)।
इसका परिणाम यह है कि सामान्य रूप से पुराणों में, और विशेष रूप से श्रीमद्भागवत में, वेद के अर्थ का उपबृंहण किया गया है।
पुराण वेदों के अर्थ का पुष्टीकरण और विस्तार करते हैं
पुराणों की खोज करने पर वेदार्थ के उपबृंहण (वेदों के अर्थ का पुष्टीकरण और विस्तार) के कई तरीके साफ तौर पर दिखाई देते हैं:
वैदिक पदों / मन्त्रों का सीधा प्रयोग
- कहीं-कहीं पर वैदिक मंत्रों के कुछ विशिष्ट पद (शब्द) ही पुराणों की स्तुतियों (प्रार्थनाओं) में स्पष्ट रूप से ले लिए गए हैं।
- विष्णु की स्तुतियों में विष्णु मंत्रों के विशिष्ट पद और शिव स्तोत्रों (शिव की प्रार्थना) के विशिष्ट पद तथा पूरा भाव ज्यों का त्यों (अक्षरशः) रखा गया है।
- उदाहरणार्थ: वायुपुराण के ५५वें अध्याय में दी गई दार्शनिक शिव स्तुति में, यजुर्वेद के रुद्राध्याय (अध्याय १६, माध्यन्दिन संहिता) के मंत्रों के भाव और पद कई जगह लिए गए हैं।
पुरुषसूक्त का विवरण: वेदार्थ का सीधा समावेश
श्रीमद्भागवत पुराण ने पुरुषसूक्त (ऋग्वेद का सबसे महत्वपूर्ण मंत्रों में से एक, ऋक् १०।९०।१) के भाव को सीधे अपनाकर वेदों के साथ अपनी अभिन्नता सिद्ध की है।
- सीधा रूपांतरण: भागवत ने पुरुषसूक्त के कई मंत्रों का, जैसे “ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत्” (ब्राह्मण इनके मुख थे) और “चन्द्रमा मनसो जातः” (मन से चंद्रमा का जन्म हुआ) का भाव, अपने अध्यायों में विस्तृत रूप में समझाया है।
- अक्षरशः अनुवाद: भागवत के नौवें स्कंध में पुरुषसूक्त के कई मंत्रों का अक्षरशः (शब्दशः) अनुवाद भी मिलता है।
- तत्त्व का समर्थन: इस प्रकार, पुराणों ने वेदों के सर्वोच्च आध्यात्मिक तत्त्वों (जैसे विराट् पुरुष की कल्पना) को सरल कथा और व्याख्या के माध्यम से पुष्ट किया है, जो वेदार्थ के उपबृंहण का सबसे मजबूत उदाहरण है।
- पुरुषसूक्त (ऋग्वेद १०।९०) की महिमा बहुत बड़ी और असीम है। इस सूक्त का उपयोग विष्णु भगवान् की स्तुति के अवसर पर हूबहू या थोड़ा बदलकर कई बार पुराणों में किया गया है।
पुराणों का महत्त्व: वेदों का विस्तार और कलियुग की आवश्यकता
पुराण केवल वेद से अलग साहित्य नहीं हैं, बल्कि वेदों के अर्थ को पुष्ट करने वाले (उपबृंहण) और व्यावहारिक रूप से सुलभ माध्यम हैं:
१. वेदों की सुरक्षा और विस्तार का साधन (उपबृंहण)
- वेद का भय: वेद स्वयं कम पढ़े-लिखे व्यक्ति (‘अल्पश्रुत’) से डरते हैं कि कहीं वह उन्हें गलत न समझ ले या क्षति न पहुँचा दे (जैसे: “बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति”)। पुराण (और इतिहास) वेदों को इसी गलत अर्थ लगाने के खतरे से बचाते हैं, क्योंकि वे सरल और विस्तृत व्याख्या प्रदान करते हैं।
- ज्ञान का उद्गम: मत्स्य पुराण के अनुसार, समस्त साहित्य (वाङ्मय) की उत्पत्ति पुराणों से ही हुई है, और नारद पुराण उन्हें स्वयं भगवान् नारायण का स्वरूप मानता है। इससे पुराणों का महत्त्व वेदों के बराबर (या उससे भी अधिक विशेषकर कलियुग में) सिद्ध होता है।
२. व्यावहारिक धर्म निर्णय में श्रेष्ठता
- व्यवहारिक ज्ञान का अभाव: वेदों में ग्रह-संचार, तिथियों की क्षय-वृद्धि (घटना-बढ़ना) और पर्व-ग्रहण के निर्णय जैसी रोजमर्रा की व्यावहारिक बातें स्पष्ट रूप से नहीं दी गई हैं।
- पुराणों का समाधान: पुराण इन व्यावहारिक विषयों पर निर्णय देते हैं। नारद पुराण में शिवजी पार्वती से कहते हैं: “मैं वेद के अर्थ की अपेक्षा पुराण के अर्थ को अधिक विशद (अधिक स्पष्ट, ‘विस्तृत) मानता हूँ, क्योंकि वेद पूरी तरह से पुराणों में स्थापित हैं।” (“वेदार्थादधिकं मन्ये पुराणार्थं वरानने। वेदाः प्रतिष्ठिताः सर्वे पुराणेष्वेकत्र संशयः।”)
- यह कथन पुराणों को गृहस्थ और सामान्य मनुष्यों के लिए सर्वोच्च मार्गदर्शक के रूप में स्थापित करता है।
३. सभी वर्गों के लिए धर्म का द्वार (कलियुग के लिए अनिवार्य)
- सरलीकरण: एक समय ऐसा आया जब वैदिक कर्मकांड कठिन माने जाने लगे और पौराणिक कृत्यों को करना अधिक श्रेयस्कर माना गया।
- समावेशी पूजा: पुराण वेदों के गूढ़ अर्थ को सरल बनाकर सभी के लिए सुलभ बनाते हैं। उदाहरण के लिए, शूद्रों को वैदिक मंत्रों का पूरा पाठ न करने पर भी, उनके भाव पर आधारित केवल ‘नमः’ का उच्चारण करके पूजा-पुण्यादि कार्य करने का अधिकार दिया गया, जो पुराणों के समावेशी दृष्टिकोण को दर्शाता है।
Reference :
- पुराण विमर्श पुस्तक; लेखक – आचार्य श्री बलदेव उपाध्याय, भूतपूर्व संचालक – अनुसंधान संस्थान, श्री सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी, चौखम्बा विद्याभवन चौक – (Publisher )
अनंत कोटि धन्यावाद
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