माँ दुर्गा !
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
आदिशक्ति ही परब्रह्म परमात्मा हैं !
जगत-जननी , महाशक्ति ही परब्रह्म परमात्मा हैं, जो विविध रूपों में विभिन्न लीलाएं करतीं हैं। इन्हीं की शक्ति से ब्रह्मा विश्व की उत्पत्ति करते हैं, इन्हीं की शक्ति से भगवान् विष्णु सृष्टि का पालन करते हैं, और भगवान् शंकर संहार करते हैं । अर्थात ये ही सृजन, पालन और संहार करनेवाली आद्या (सर्वप्रथम शक्ति) पराशक्ति हैं ।
ये ही पराशक्ति नवदुर्गा हैं , दशमहाविद्या हैं। ये ही अन्नपूर्णा, जगद्धात्री, कात्यायनी, ललिताम्बा हैं । गायत्री, भुवनेश्वरी, काली, तारा, बगला, षोडशी, त्रिपुरा, धूमावती, मातंगी, कमला, पद्मावती, दुर्गा आदि सब इन्हीं के रूप हैं ।
आदिशक्ति के विविध रूप –
मूल प्रकृति स्वरूपा पांच देवियां
श्री हरि नारायण श्रीमद देवीभागवत महापुराण नौं वे स्कंध में नारद जी से कह रहे हैं – हे देवर्षि नारद ! गणेश माता श्री दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, सावित्री तथा राधा – ये पाँचों देवियां प्रकृति कही जाती हैं । इन्ही पर सृष्टि के सभी कार्य अवलम्बित (आश्रित) हैं ।
देवर्षि नारद के विस्तार से बताने के आग्रह पर भगवान् बोले – हे वत्स ! उस मूलप्रकृति के लक्षण बताने में यद्दपि कोई समर्थ नहीं हो सकता, तथापि मैं संक्षेप में बता रहा हूँ ध्यान से सुनो! पहले प्रकृति शब्द की व्युत्पत्ति सुनो –
“प्र” का अर्थ है प्रकृष्ट तथा “कृति” का अर्थ है सृष्टि-कर्तत्व। अर्थात जो सृष्टि करने में कुशल हो, उसे प्रकृति कहते हैं। अथवा सर्वोत्तम सत्वगुण के अर्थ में “प्र”, मध्यम रजोगुण के अर्थ में “कृ”, एवं अधम तमोगुण के अर्थ में “ति” शब्द व्यहृत है । अर्थात जो त्रिगुणात्मिका है, वही परम शक्ति-संपन्न देवी, सृष्टि विधान (जगत) में ‘प्रधान प्रकृति’ कहलाती है। यहाँ पर “प्र” प्रारंभिक अर्थ में तथा “कृति” सृष्टि अर्थ में है।
देवी प्रकृति ब्रह्मस्वरूपा, नित्या एवं सनातनी हैं
अतः सृष्टि के आदि में जो देवी (चित् शक्तिरूपा, मूलप्रकृति) विराजती रहती है, उसे ‘प्रकृति’ कहा गया है। सृष्टि करने के लिये योगमाया का आश्रय लेकर परमात्मा दो रूपों में विभक्त हो गये, उनका आधा दाहिना भाग पुरुष और बायां आधा भाग प्रकृति कहा गया है। वे देवी प्रकृति ब्रह्मस्वरूपा, नित्या एवं सनातनी हैं। परमात्मा के समान सभी गुण इन प्रकृति (सत-रज-तम) में भी उसी प्रकार निहित हैं, जिस प्रकार अग्नि में दाहकत्व शक्ति विद्यमान रहती है। इसीलिये परम ज्ञानी योगीजन स्त्री-पुरुष (लिङ्ग-भेद) का भेद नहीं मानते। हे नारद! उनका कहना है कि सत्-असत् जो कुछ भी दृश्यमान जगत् है, वह सब एक ब्रह्ममय है।
सर्वत्र स्वतंत्र आनन्दकन्द भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र (परमात्मा) के मन में सृष्टि करने की इच्छा होते ही उनकी मूलप्रकृति (परमेश्वरी) एकाएक आविर्भूत (उत्पन्न) हो गयीं। परमात्मा के आज्ञानुसार वे पाँच प्रकार की बन गयीं। अनेक प्रकार का लोक-सर्जन करना इनका प्रधान उद्देश्य है; क्योंकि वह मूल प्रकृति ही भक्तों के अनुरोध से किंवा उन पर दया दर्शाने के लिये अनेक रूप धारण करती हैं।
गणेश माता श्री दुर्गा

उनमें सर्वप्रथम गणेशजननी भगवती ‘दुर्गा‘ हैं, जिन्हें ‘शिवरूपा’ कहा जाता है। वे भूतभावन भगवान भव (शिव) की प्रिय भार्या है। ।
ब्रह्मादि देवता, मुनिगण एवं ‘मनु’ आदि राजा भी इन्हीं की अर्चना करते हैं। ये महादेवी ही समस्त संसार के भरण-पोषण तथा सनातन मर्यादा-संरक्षण का प्रबन्ध करती हैं। उनका चरित्र परम पवित्र है। धर्म, सत्य पुण्य, यश, मंगल, सुख, कीर्त्ति, हर्ष एवं परम मुक्ति प्रदान करना इनका प्राकृतिक गुण है। दुःख, शोक तथा चिन्ता को ये सर्वदा दूर कर देती हैं। यहाँ तक की शरणागत-पालन एवं दीनों पर दया करने में ये सर्वदा तत्पर रहती हैं। स्वयं ज्योतिर्मयी होने के कारण उनका शरीर तेजःपुञ्ज है। तभी तो इन्हें तेज की अधिष्ठात्री देवी कहा गया है। सूर्य में जो तेज है, वह उन्हीं की देन है। सर्वशक्तिस्वरूपा वह देवी ही शंकरजी को सर्वदा शक्तिशाली बनाये रखती हैं।
इनके नाम इस प्रकार हैं— ‘सिद्धेश्वरी, सिद्धिरूपा, सिद्धिदा, सिद्धि, ईश्वरी, बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, पिपासा, छाया, तन्द्रा, दया, स्मृति, जाति, क्षान्ति, भ्रान्ति, शान्ति, कान्ति, चेतना, तुष्टि, पुष्टि, लक्ष्मी, धृति तथा माया। परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण के निकट शक्तिरूप से ये देवियाँ विराजती रहती है। वेदों और आगमों में इनका सुयश गाया गया है, ये अनन्ता हैं, इनमें अनन्त गुण हैं।
भगवती लक्ष्मी

भगवान् देवी के दूसरे रूप के बारे में बताते हैं – हे नारद! ध्यान से सुनो। जो परम पवित्रा सत्त्वस्वरूपा हैं, उन्हें भगवती ‘लक्ष्मी’ कहा गया है। परम प्रभु श्रीहरि की वे शक्ति कहलाती हैं। समस्त भूमण्डल की सम्पदाएँ उनकी ही स्वरूप हैं। उन्हें सम्पत्ति की अधिष्ठात्री देवता कहा जाता है। वे परम सुन्दरी, अपूर्व संयमशीला, शान्तस्वरूपा, सुहृदभाव-सम्पन्ना तथा मंगलमयी आनन्दमूर्ति हैं। लोभ, मोह, काम, क्रोध, मद, मत्सर तथा अहङ्कार आदि षड्विकारों से वे सर्वदा दूर रहती हैं। भक्तों पर अनुकम्पा एवं अपने स्वामी श्रीहरि से प्रेम करना उनका स्वभाव-सा है। जगत् की नारीजाति में सर्वोत्तम पतिपरायणा ये ही हैं। श्रीहरि भगवान् विष्णु भी इन्हें अपने प्राणों से अधिक मानकर उनसे विशुद्ध प्रेम रखते हैं। वे कभी कटु वचन नहीं बोलतीं । धान्य आदि सभी (पौधे) उनके रूप हैं; क्योंकि प्राणियों के जीवनाधार के लिये ही देवी ने अपना यह रूप धारण कर रखा है। वे परम पतिव्रता ‘महालक्ष्मी’ के नाम से विख्यात होकर वैकुण्ठपुरी में अपने पति (श्रीहरि) की सेवा में सर्वदा संलग्न रहती हैं।
वे ही स्वर्ग में ‘स्वर्गलक्ष्मी’, राजाओं के यहाँ ‘राजलक्ष्मी’ और भूलोकवासी मानवमात्र के घर ‘गृहलक्ष्मी’ के रूप में विराजती रहती हैं। समस्त जीवों एवं सभी द्रव्यों में सर्वोत्तम शोभा जो देखी जाती है, वह उन्हीं का स्वरूप है। वे परम मनोहरिणी हैं। पुण्यात्माओं की कीर्ति उन्हीं की प्रतिमूर्ति है। वे राजाओं में ‘प्रभा’ रूप से रहती हैं । यहाँ तक कि व्यापारियों के यहाँ वे ही वाणिज्य रूप से, विद्वानों के यहाँ ‘विद्या’ रूप से विराजती हैं। पापीजनों के यहाँ वे कलह रूप से विद्यमान रहती हैं। ‘वे कभी दयारूपिणी बनकर धरातल में पधारी थीं – यह बात श्रुति-विहित एवं लोक-सम्मत है। सबने इनको अपनाया है, सभी इनकी स्तुति पूजा करते हैं
वाणीदेवी सरस्वती

श्री हरि नारायण भगवान् ने कहा अब मै वाणीदेवी के विषय में विशेष चर्चा करता हूँ, सुनो। इनका नाम ‘सरस्वती’ है। ये परब्रह्म परमात्मा से सम्बन्ध रखनेवाली वाणी, बुद्धि, विद्या तथा ज्ञान की अधिष्ठातृ देवता हैं। समस्त विद्याएँ इन्हीं की रूप हैं। अतएव मनुष्यों को बुद्धि, मेधा, कविता, प्रतिभा एवं स्मरणशक्ति भी इन्हीं की कृपा से प्राप्त होती है। अनेक सिद्धान्तों (मत-मतान्तरों) को अलग-अलग करना इनका स्वाभाविक गुण है। वे व्याख्या एवं बोधस्वरूपा हैं। उनकी ही अहैतुकी कृपा से समस्त शंकाओं का समाधान होता है और जिज्ञासुओं की जिज्ञासा उन्हीं से पूर्ण होती है। उन सरस्वती को ही विवेकशक्ति एवं ग्रंथकर्तृत्वशक्ति कहा जाता है। उन्हें ही स्वर, (षड्जादि सप्तस्वर) संगीत, अनुसन्धानपूर्वक ताल आदि विषयों का प्रतिपादन करनेवाली कहा गया है, अर्थात् साहित्य-संगीत कला-विशिष्टा देवी वे ही हैं। वे विषय ज्ञान एवं वाद-विवाद की अधिष्ठात्री एवं शान्तमूर्त्ति हैं । अतः वे हाथ में वीणा और पुस्तक लिये रहती हैं। उनका शरीर शुद्ध सत्त्वमय है, वे परम सुशीला तथा विष्णुप्रिया हैं। इनके शरीर की कान्ति हिम, चन्दन, चन्द्रमा, कुन्द, कुमुद एवं श्वेतकमल के समान शुभ्र है । तपःस्वरूपा, तपस्वियों को उनकी तपस्या का
फल देनेवाली वे भगवती शारदा परमात्मस्वरूप वासुदेव श्रीकृष्ण को रत्नमाला द्वारा स्वयं पूजती एवं जपती हैं। सिद्धि-विद्यास्वरूपिणी वे सरस्वती सर्वदा सब प्रकार की सिद्धियाँ अपने भक्तों को देती हैं ।
सावित्री गायत्री

श्री हरि नारायण भगवान् बोले – हे नारद! इनके अतिरिक्त दो और देवियाँ हैं, उनका भी मैं यहाँ शास्त्रानुसार वर्णन करता हूँ, सुनो- जो चारों वर्णों की माता हैं, सभी वेद और वेदाङ्गों की जो जननी हैं, सन्ध्या-वन्दन के मंत्र तथा तंत्र-यंत्रों का जो एकमात्र आधार हैं, जिन्होंने द्विजातिमात्र के लिये अपना एक विशिष्ट रूप धारण किया है, वे जपरूपी तपस्विनी सर्वदा ब्रह्म-तेज से सम्पन्न एवं सर्वसंस्कारमयी हैं। ऐसी पवित्र रूप धारण करनेवाली देवी को ‘सावित्री’ अथवा ‘गायत्री’ कहते हैं।
वे ब्राह्मणों की अनुपम शक्ति हैं, तीर्थ भी अपनी शुद्धि के लिये उनके स्पर्श की इच्छा रखते हैं। गायत्री देवी शुद्धस्फटिक मणि के समान शुक्ल वर्ण की हैं, वे अपनी शुद्ध सतोगुणमयी काया से अत्यन्त सुशोभित रहती हैं। उनका स्वरूप परमानन्दमय है और उनका यह अनुपम रूप सर्वदा चमकता रहता है । वे परम शक्ति-सम्पन्ना, मोक्ष पद प्रदान करनेवाली एवं परब्रह्मस्वरूपा हैं। उन्हें सभी शक्तियों की अधिष्ठात्री देवी कहते हैं । हे नारद! जिनके चरण-कमलों की विमल विभूति से समस्त संसार पवित्र हो जाता है, उन भगवती सावित्री (चतुर्थी देवी) के विषय में मैंने सुनाया।
राधा रानी

तत्पश्चात विष्णु जी ने नारद जो से कहा – अब तुम्हें पाँचवीं देवी श्रीराधा का निर्मल चरित्र सुनाता हूँ-जो अन्यत्र कहीं नहीं मिलेगा। ये पाँचवीं देवी पंचप्राणों की अधिष्ठातृ देवी हैं, जो परमात्मा श्रीकृष्ण को प्राणों से भी प्यारी हैं और उपर्युक्त सभी देवियों की अपेक्षा सुन्दर भी हैं ।ये सर्वगुण-सम्पन्ना एवं परम सौभाग्यशालिनी हैं। इन्हें अनुपम गौरव प्राप्त है, ये ब्रह्म के समान गुण और तेजवाली हैं। अतः परब्रह्म परमात्मा का वामाङ्ग इन्हें स्वभावतः उपलब्ध है इन्हें परावरा, सारभूता, परमा, आद्या, सनातनी, परमानन्दरूपा, धन्या, मान्या तथा पूज्या भी कहा जाता है, ये नित्य निकुंज-निवासिनी एवं रासक्रीड़ा-विलासिनी हैं। इनका प्रादुर्भाव परमात्मा श्रीकृष्ण के मण्डल में हुआ है, इनके विराजने से रासमण्डल की अपूर्व शोभा बढ़ जाती है।
गोलोक-धाम में रहने के कारण ये ‘रासेश्वरी’ तथा ‘सुरसिका’ नाम से विशेष प्रसिद्ध हैं। रासमण्डल में उपस्थित रहना इन्हें अतिप्रिय है। ये वहाँ गोपी के वेष में विराजती रहती हैं। ये परम आनन्दस्वरूपिणी हैं, इनका शरीर हर्ष एवं सन्तोष से परिपूर्ण रहता है। ये निर्गुणा, निराकारा, निर्लिप्ता तथा आत्मस्वरूपिणी हैं। ये इच्छा एवं अहंकार से रहित हैं। इन्होंने केवल भक्तों पर अनुकम्पा करने के लिये अवतार धारण किया है। इनके इस रहस्यपूर्ण चरित एवं स्वरूप को वैदिक विधि से ध्यान करने पर ही कोई ज्ञानी पुरुष जान सकता है। यहाँ तक कि सुरेन्द्र, मुनीन्द्र आदि भी अपने चर्म-चक्षुओं से इन्हें देखने में सर्वथा असमर्थ हैं। ये देवी अनेक प्रकार के वस्त्राभूषणों से विभूषित रहती हैं। इनकी शोभा करोड़ों चन्द्रमा के समान देदीप्यमान है, इनका सम्पूर्ण विग्रह अतुल वैभवों से परिपूर्ण है, भगवान् श्रीकृष्ण की सर्वदा सेवा करते रहना ही इनका स्वाभाविक गुण है; क्योंकि वे सम्पूर्ण सम्पत्तियों से बढ़कर पतिसेवा को ही सर्वश्रेष्ठ मानती हैं।

वाराहकल्प में वृषभानु के घर जो कन्या उत्पन्न हुई थीं, उनके चरण-कमल के स्पर्श से भूतल-विशेषकर भारतवर्ष परम पवित्र हो गया था। हे नारद ! जिन महादेवी को ब्रह्मा आदि देवता भी नहीं देख पाये, वही ये देवी भारतवर्ष में आज प्रत्यक्ष सबको दृष्टिगोचर हो रही हैं। ये नारीरत्नों में श्रेष्ठ हैं, जो भगवान् श्रीकृष्ण के हृदय पर इस प्रकार शोभा दे रही हैं, मानो गगनस्थित नवीन नील नीरदों (मेघों) में बिजली चमक रही हो। इनके दर्शन प्राप्त करने के लिये ब्रह्मा ने कभी साठसहस्र वर्षों तक घोर तप किया था। उनके तप का लक्ष्य यही था कि आदिशक्ति के पद- नख के दर्शन मिल जाँय, जिससे मैं भी पवित्र हो सकूँ, परन्तु स्वप्न में भी ब्रह्मा भगवती के दर्शन न प्राप्त कर सके, तब फिर प्रत्यक्ष दर्शन की बात ही क्या करनी है ?
उसी तप के प्रभाव से ये देवी वृन्दावन के वन में श्रीकृष्णचन्द्र के समक्ष प्रकट हुई हैं, अर्थात् भूतल पर इनका आविर्भाव हुआ है। ये ही पाँचवीं देवी भगवती ‘राधा’ या ‘राधिका’ के नाम से विख्यात हैं। उन मूलप्रकृति देवी के अंश, अशांश, अर्द्धांश, कला, कलांश, कलांशांश तथा कला-शतांश-भेद से अनेक रूप हैं। संसार की सभी स्त्रियाँ इन्हीं की रूप मानी जाती हैं। ये पाँचों देवियाँ परिपूर्णतम हैं। अत: इन्हें साक्षात् विद्यास्वरूपा कहा गया है।
– श्रीमद देवीभागवत महापुराण ९ वां स्कंध, प्रथम अध्याय
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माँ की स्तुति के नौ दिनों के दौरान, उनकी महिमामंडन करता यह लेख बहुत ही आनंद दायी और ज्ञानवर्धक रहा! ऐसी सुन्दर प्रस्तुति के लिए अनुपम जी को कोटि कोटि धन्यवाद!!!!
देवी माता के बारे में जानकारी प्रदान करने के लिए साधुवाद। लेख में चित्र का प्रयोग लेख को रोचक बनाता है।
प्रिय अनुपम जी,
इस अति सुन्दर अभिव्यक्ति और विस्तृत जानकारी के लिए आपको साधुवाद। इस प्रस्तुति ने मुझे त्रिगुणात्मिका देवी स्वरूप के अतिरिक्त दो अन्य दिव्य देवी स्वरूपों का भेद बताया जो कि साधारणतया सर्वविदित नहीं है। आपको बहुत सारी बधाई और शुभ कामनाएं।
माँ का आशीर्वाद आपकी लेखनी में दिखता है, आपका बहुत धन्यावाद
Very nice
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