हिन्दू का अर्थ वो नहीं जो आपने सुना है !

हिन्दू का अर्थ, जो हमने सुना है परिकल्पना है असत्य है !

हिन्दू शब्द के अर्थ को साहित्यकारों और इतिहासकारों ने जो अब तक कहा है वह एक अनुमान है, परिकल्पना है और वस्तुतःअसत्य है

हिन्दू शब्द का अर्थ जो हमने अब तक सुना है वह इस प्रकार है :-

कहा जाता है कि जो लोग सिन्धु नदी के पूर्वी तट पर रहते थे, उन्हें म्लेच्छ आक्रांता “सिन्धु” शब्द का ‘स’ उच्चारण न कर पाने के कारण “हिन्दू” कहने लगे, क्योंकि वे “स’ की जगह “ह” कहते थे या “स” का उच्चारण नहीं कर पाते थे । अगर यह सत्य होता तो – “ईसामसीह” का “इहामाहीह” क्यों नहीं हुआ पैगम्बर  मूसा को मूहा क्यों नहीं कहा गया इससे ही यह सिद्ध होता है की यह केवल एक परिकल्पना (hypothesis) है, पर चूँकि सत्य की जानकारी किसी को न होने के कारण यही परिकल्पना सत्य जैसी प्रतीत होने कारण सत्य मानी जाने लगी ।  सत्य प्रतीत होने का एक बड़ा कारण सिंधु नदी भी है जिसका विवरण वेदो में भी मिलता है

हिन्दू’ शब्द मुग़ल आक्रांताओं की देन नहीं है ? मुग़ल और ईसाई पंथों की उत्पत्ति से हज़ारों वर्षों पूर्व भी हिन्दू शब्द का उपयोग मिलता है और उनमें कई ग्रन्थ (पुराण, बृहस्पति-आगम, वृद्धस्मृति आदि) वेदों की ही व्याख्या के स्वरूप होने के कारण हम कह सकते हैं की “हिन्दू” शब्द अत्यंत प्राचीन है और वेदों के सामान ही शाश्वत है ।

हिन्दू का अर्थ क्या है? और क्या प्रमाण हैं?

  • मुग़ल और ईसाई पंथों की उत्पत्ति से हज़ारों वर्षों पूर्व हिन्दू-शब्द का प्रयोग सौम्य, सुन्दर, सुशोभित, शीलनिधि, दमशील और दुष्टदलन में दक्ष – अर्थों में प्रयुक्त और प्रचलित था।
  • सिकन्दर ने भारतमें आकर अपने मन्त्री से हिन्दूकुश (हिन्दूकूट) पर्वत के दर्शन की इच्छा व्यक्त की थी।
  • पारसियों के धर्मग्रन्थ शातीर में हिन्दू शब्द का उल्लेख है। अवेस्ता में हजारों वैदिक-शब्द पाये जाते हैं। सिकन्दर से भी सैकड़ों वर्ष पूर्वका यह शब्द है।

सिन्धुस्थानमिति ज्ञेय राष्ट्रमार्यस्य चोत्तमम्।“भविष्यपुराण

भविष्यपुराण में हिन्दुस्थान को सिन्धुस्थान आर्यों का राष्ट्र कहा गया है।

हिमालयं समारभ्य यावदिन्दुसरोवरम्। तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते ।।“ बृहस्पति आगम

बृहस्पति आगम के अनुसार हिमालय से इन्दुसरोवर तक का देव-निर्मित भूभाग हिन्दुस्थान कहा जाता है। इसमें परम्परा से निवास करनेवाले और उनके वंशधर हिन्दु कहे जाते हैं।

 बलिना कलिनाऽऽच्छन्ने धर्मे कवलितौ कलौ । यवनैरवनिः क्रान्ता हिन्दवो विन्ध्यमाविशन् ।।

कालेन बलिना नूनमधर्मकलिते कलौ । यवनैर्घोरमाक्रान्ता हिन्दवो विन्ध्यमाविशन् ।। (कालिकापुराण)

यवनैरवनिः क्रान्ता हिन्दवो विन्ध्यमाविशन् । बलिना वेदमार्गोऽयं कलिना कवलीकृतः ।।शार्ङ्गधरपद्धति

कालिका पुराण और शार्ङ्गधर-पद्धति के अनुसार वेदमार्ग का अनुसरण करनेवाले हिन्दु मान्य हैं।

 शास्त्रों के अनुसार हिन्दू के क्या लक्षण हैं ?

“हिंसया दूयते यश्च सदाचारतत्परः । ।। वेदगोप्रतिमासेवी स हिन्दुमुखशब्दभाक् ।। वृद्धस्मृति

वृद्धस्मृति के अनुसार हिंसा से दुःखित होने वाला, सदाचरण-तत्पर (वर्णोचित आचरण – सम्पन्न), वेद -गोवंश और देव-प्रतिमा सेवी हिन्दू समझने योग्य है ।

ओङ्कारमूलमन्त्राढ्यः पुनर्जन्मदृढाशयः । गोभक्तो भारतगुरुर्हिन्दुहिंसनदूषकः ।।माधवदिग्विजय

माधवदिग्विजय के अनुसार सनातनी, आर्यसमाजी, जैन, बौद्ध और सिक्खादि में अनुगत लक्षण के अनुसार “ओङ्कार को मूल-मन्त्र मानने वाला, पुनर्जन्म में दृढ आस्था रखने-वाला, गोभक्त और भारतीय मूल के सत्पुरुषद्वारा प्रवर्तित पथ का अनुगमन करनेवाला तथा हिंसा को निन्द्य मानने वाला हिन्दू कहने योग्य है।

“यो वर्णाश्रमनिष्ठावान् गोभक्तः श्रुतिमातृकः । मूर्तिं च नावजानाति सर्वधर्मसमादरः ।।

उत्प्रेक्षते पुनर्जन्म पुनर्जन्म तस्मान्मोक्षणमीहते। * भूतानुकूल्यं भजते स वै हिन्दुरिति स्मृतः ।।

की हिंसया दूयते चित्तं तेन हिन्दुरितीरितः ।। सन्त श्रीविनोबाभावे

“जो वर्णों और आश्रमोंकी व्यवस्थामें आस्था रखने-वाला, गो-सेवक, पुनर्जन्म को मानता और उससे मुक्त होने का प्रयत्न करता है और जो सदा सब प्राणियोंके अनूकूल वर्ताव करता है, वही हिन्दू माना गया है। हिंसा से उसका चित्त दुःखी होता है, अतः उसे हिन्दू कहा गया है।।”

हिन्दुर्दुष्टो न भवति नानार्यो न विदूषकः । सद्धर्मपालको विद्वान् श्रौतधर्मपरायणः । । “ रामकोष

हिन्दू दुर्जन नहीं होता, न अनार्य होता है, न निन्दक ही होता है। जो सद्धर्मपालक, विद्वान् और श्रौतधर्म – परायण है, वह हिन्दु है ।

हिनस्ति तपसा पापान् दैहिकान् दुष्टमानसान्। हेतिभिः शत्रुवर्गं च स हिन्दुरभिधीयते ।। पारिजातहरणनाटक

जो अपनी तपस्यासे दैहिक पापों तथा चित्त को दूषित करनेवाले दोषों का नाश करता है तथा जो शस्त्रों से अपने शत्रु – समुदाय का भी नाश करता है, वह हिन्दू कहलाता है।।

हिन्दुर्दुष्टो न भवति नानार्यो न विदूषकः । सद्धर्मपालको विद्वान् श्रौतधर्मपरायणः ।। “रामकोष

हिन्दू दुर्जन नहीं होता, न अनार्य होता है, न निन्दक ही होता है। जो सद्धर्मपालक, विद्वान् और श्रौतधर्म – परायण है, वह हिन्दु है ।।

ध्यान रहे, अरबी कोष में हिन्दुका अर्थ खालिस अर्थात् शुद्ध होता है, न कि चोर आदि मलिन – निकृष्ट । यहूदियों के मतमें हिन्दू का अर्थ शक्तिशाली वीर पुरुष होता है। ‘भारतका नाम ऋग्वेदमें ‘सप्तसिन्धु’ या संक्षिप्त नाम ‘सिन्धु’ आया है, न कि आर्यावर्त या भारतवर्ष । वेदों में ‘सप्तसिन्धवः’ देश के अतिरिक्त किसी देश का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। सनातनप्रसिद्धि के अनुसार वे सातों नदियाँ अखण्ड भारत को द्योतित करती हैं। –

गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति ! नर्मदे सिन्धुकावेरि जलेऽस्मिन् सन्निद्धिं कुरु ।।

पुष्कराद्यानि तीर्थानि गङ्गाद्याः सरितस्तथा ।आगच्छन्तु महाभागाः स्नानकाले सदा मम ।।-(नारदपुराण पूर्व ० २७.३३,३४)

गङ्गा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु तथा कावेरी आदि नदियाँ इस जल में निवास करें।।” ” पुष्कर आदि तीर्थ और गङ्गादि परम सोभाग्यशालिनी सरिताएँ सदा मेरे स्नानकालमें यहाँ पधारें।।“

वैदिक संस्कृत व्याकरण और उच्चारण -परंपरा में कुछ शब्दों में ‘स’ का रूप ‘ह’ में परिवर्तित हो जाता है।

संस्कृत की प्राचीन शब्द-परंपरा में कुछ शब्दों में ‘स’ का रूप ‘ह’ में परिवर्तित हो जाता है।
जैसे — अस्मि का रूप अहम् और सप्त का रूप हप्त होता है। (सप्ताह (week) को हफ्ता भी बोलते हैं )
यह परिवर्तन कोई बाहरी प्रभाव नहीं, बल्कि वेदोक्त भाषा-नियमों का स्वाभाविक अंग है।
इसी परंपरा के अनुसार सप्तसिन्धु का रूप हप्तहिन्दु के रूप में मिलता है, जिसका उल्लेख ईरान के अवेस्ता ग्रन्थों में भी है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि ‘हिन्दू’ शब्द का जन्म हमारे अपने वैदिक शब्दरूपों से हुआ है — यह हमारी सनातन परंपरा का ही विस्तार है।

सनातन धर्म या हिन्दूधर्म ने मानवता को “धर्म”, “कर्म”, “पुनर्जन्म” और “मोक्ष” जैसे सार्वभौम सिद्धांत दिए। वेद, उपनिषद, स्मृतियाँ, आगम, भगवत गीता और पुराण आदि ग्रन्थ दिए जिनमे मानव जीवन का लक्ष्य क्या है बताया गया है और लक्ष्य की प्राप्ति कैसे हो उसके मार्ग प्रशस्त किया गया है ।

हिन्दू वह है जो वेद की वाणी में विश्वास रखता है

हिन्दू वह है जो हर प्राणी में परमात्मा का अंश देखता है, जो पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश — पंचमहाभूतों को पूज्य मानता है।

हिन्दू वह है जो वेद की वाणी में विश्वास रखता है, कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धांत को मानता है, वृद्धस्मृति कहती है — “हिंसा से दुःखित होने वाला, वेद-गो-प्रतिमा सेवी ही हिन्दू कहलाता है।” यानी हिन्दू का लक्षण करुणा, शुचिता और आचरण है — न कि वेशभूषा या पंथ।

यह सम्पूर्ण लेख पूर्वाम्नायगोवर्धनमठ-पुरी पीठाधीश्वर, श्रीमद् जगद्गुरु शंकराचार्य, पूज्यनीय स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी की अमर कृति ‘सनातनधर्म-प्रश्नोत्तर-मालिका’ में दिए गए प्रामाणिक विचारों पर आधारित है।

पूज्य गुरुदेव ने शास्त्रों के स्पष्ट प्रमाणों के आधार पर सदियों से चली आ रही उस भ्रामक परिकल्पना का समूल खंडन किया है कि ‘हिन्दू’ शब्द किसी विदेशी आक्रांता के उच्चारण दोष की देन है। भविष्यपुराण और बृहस्पति-आगम जैसे ग्रन्थ इस नाम को मुग़ल/ईसाई पंथों की उत्पत्ति से हजारों वर्ष पूर्व ही, इस देव-निर्मित राष्ट्र की पहचान बताते हैं।

गुरुदेव स्थापित करते हैं कि यह नाम हमारी ही सनातन परंपरा और वैदिक व्याकरण से जन्मा है—जहाँ ‘सप्तसिन्धु’ का रूप ‘हप्तहिन्दु’ के रूप में मिलता है। यह भाषाई रूपांतरण कोई बाहरी प्रभाव नहीं, बल्कि वेदोक्त भाषा-नियमों का स्वाभाविक अंग है।

‘हिन्दू’ का वास्तविक अर्थ किसी भौगोलिक सीमा तक सीमित नहीं है, अपितु यह आचरण, करुणा और शौर्य का प्रतीक है। श्रीमद् जगद्गुरु शंकराचार्य जी के अनुसार, ‘हिन्दू’ के शास्त्रीय सद्गुणों का सार यह है:

  • करुणा और अहिंसा: वह जिसका चित्त हिंसा से दुःखित होता है और जो सदा सर्वभूतों के अनुकूल रहता है।
  • आचार और भक्ति: वेद-गो-प्रतिमा सेवी, सदाचार-तत्पर और वर्णाश्रम व्यवस्था में निष्ठा रखनेवाला।
  • सनातन आस्था: ‘ओङ्कार’ को मूल-मन्त्र मानना और पुनर्जन्म-मोक्ष में दृढ़ आस्था रखना।
  • शौर्य और ज्ञान: सद्धर्मपालक, विद्वान्, श्रौतधर्म परायण और अन्यायकारी दुष्टों का दमन करने में सक्षम।

रामकोष और अन्य मतों में भी इस शब्द को दुर्जन या निकृष्ट नहीं, बल्कि ‘शुद्ध (खालिस)’ और ‘शक्तिशाली वीर पुरुष’ के रूप में वर्णित किया गया है।

अतः, यह लेख उस सनातन सत्य का उद्घोषणा पत्र है: ‘हिन्दू का अर्थ वो नहीं जो आपने सुना है!’ अब समय आ गया है कि हम उस भ्रामक इतिहास को त्याग कर, अपने पूज्य गुरुदेव द्वारा स्थापित ‘हिन्दू’ की वास्तविक, गौरवशाली और शाश्वत पहचान को स्वीकारें और उसके अनुरूप जीवन जिएँ।”

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