
चारों पुरुषार्थ (धर्म अर्थ काम मोक्ष) के मूल में धर्म है । भाग १ में हम “धर्म” क्या है यह संक्षिप्त में समझेंगे और भाग २ में चार पुरुषार्थ (पुरुषार्थचतुष्टय-धर्म अर्थ काम मोक्ष)
धर्म की परिभाषा है जो धारण किया जा सके !
- जिससे जो धारण किया जा सके वह उसका धर्म होता है जैसे अग्नि का धर्म उष्णता, जल का धर्म शीतलता दूसरे शब्दों में –
- जो धारण करने योग्य हो वह धर्म है जैसे अन्य जीवों की हत्या करना स्वाद के या स्वार्थ के लिए धारण करने योग्य नहीं है इसलिए अधर्म है और अहिंसा धारण करने योग्य है इसलिए वह धर्म है।
- -जो अकाट्य सत्य हैं वह धर्म है, ऐसे सत्य, जिनको झुठलाया नहीं जा सकता जैसे प्रकृति के नियम उदाहरण के लिए सेब के पेड़ सेब ही उगाएंगे बेर या अंगूर नहीं यह सेब के वृक्ष का धर्म है ।
धर्म यानी प्रकृति के नियम जो सार्वभौमिक हैं सम्पूर्ण विश्व पर लागू होते हैं ।
दूसरे शब्दों में धर्म यानी प्रकृत्ति के नियम ! अर्थात प्रकृति के नियम प्रकृति के बनाये होते हैं या भगवान् के बनाये होते हैं उन्हें मनुष्य नहीं बनाता न इनमें कोई परिवर्तन कर सकता हैं । प्रकृति के नियम सभी पर लागू होते हैं, चाहे वह कोई भी मत, पंथ या संप्रदाय हो ।
इसलिए धर्म यानि – प्रकृति के नियम हैं कोई उन्हें अपनी सुविधा या स्वार्थ के लिए नहीं बना सकता इसलिए धर्म की जो परिभाषा है उसके अनुसार धर्म का कोई समानार्थी शब्द नहीं है ।
इसलिए कोई भी मत, पंथ, विचार या सम्प्रदाय धर्म नहीं हैं, क्योंकि वे मानव निर्मित है । कल्पित हैं । वे इसलिए भी धर्म की परिभाषा में नहीं हैं क्योंकि उनकी बहुत सी बातें धारण करने योग्य नहीं हैं ।
धर्म यानी “प्रकृति के नियम” का पालन करना क्यों महत्वपूर्ण है ?
- क्योंकि आप सुखी और स्वस्थ रहना चाहते हैं
- क्योंकि धर्म के नियम भगवान् ने सबके हित को ध्यान रखकर बनाये हैं
- धर्म के नियम किसी से राग, द्वेष, शत्रुता या मित्रता को ध्यान रखकर नहीं बनाये गए
महात्मा मनु ने धर्म के दस लक्षण या कर्तव्य बताये हैं, जीवन में सुख शान्ति और सम्पन्नता के लिए इन १० कर्तव्यों का पालन आवश्यक है ।
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः । धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥ – मनु स्मृति
1). धृति अर्थात धैर्य 2) क्षमा यानी सहनशीलता 3) दम अर्थात इन्द्रियों का संयम, 4) अस्तेय यानी चोरी अथवा छल से परहेज़, 5) शौच अर्थात शरीर और मन की शुद्धि, 6) इन्द्रिय-निग्रह यानी विषय-वासना पर नियंत्रण, 7) धी अर्थात विवेकपूर्ण बुद्धि, 8) विद्या यानी सच्चा ज्ञान, 9) सत्य का पालन और 10) अक्रोध यानी क्रोधरहित स्वभाव – धर्म वही है जिसमें ये १० लक्षण हैं, ये सब गुण समाहित हों ।
महा-भागवत के सप्तम स्कन्ध में धर्म के 30 लक्षण प्राप्त होते हैं
सत्यं दया तपः शौचं तितिक्षेक्षा शमो दमः । अहिंसा ब्रह्मचर्यं च त्यागः स्वाध्याय आर्जवम्।।11.8।।
सत्य, दया, तप, शौच (पवित्रता), तितिक्षा (सहनशीलता), अच्छा-बुरा समझना, मन का संयम, इन्द्रियों का संयम, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, त्याग, स्वाध्याय (शास्त्रों का अध्ययन), और सरलता—ये सब धर्म के लक्षण हैं।
संतोषः समदृक्सेवा ग्राम्येहोपरमः शनैः । नृणां विपर्ययेहेक्षा मौनमात्मविमर्शनम्।।11.9।।
संतोष, समदृष्टि वाले महात्माओं की सेवा, धीरे-धीरे सांसारिक भोगों की प्रवृत्ति से निवृत्ति, दूसरों की विपरीत परिस्थितियों के प्रति चिंता, मौन और आत्मचिंतन—ये भी धर्म के लक्षण हैं
अन्नाद्यादे संविभागो भूतेभ्यश्च यथार्हतः । तेषात्मदेवताबुद्धिः सुतरां नृषुपाण्डव।।11.10।।
हे पाण्डव ! अन्न आदि पदार्थों का यथायोग्य प्राणियों में समान विभाजन करना और सब में आत्मा रूप से ईश्वर का ही भाव रखना — विशेषतः मनुष्यों में — यह भी धर्म का अंग है
श्रवणं कीर्तनं चास्य स्मरणं महतां गतेः। सेवेज्यावनतिर्दास्यं सख्यमात्मसमर्पणम्।।11.11।।
भगवान के गुणों और लीला का श्रवण (सुनना), कीर्तन (गाना), स्मरण (स्मरण करना), महान भक्तों की सेवा, पूजा, विनम्रता, दासभाव, सख्यभाव (मित्रभाव) और आत्मसमर्पण — ये सब भक्तिधर्म के लक्षण हैं।
नृणामयं परो धर्मः सर्वेषां समुदाहृतः। त्रिंशल्लक्षणवान् राजन्सर्वात्मा येन तुष्यति ।। 11.12 ।।
हे राजन्! मनुष्यों के लिए यही परम धर्म बताया गया है — जो इन तीस लक्षणों (गुणों) से युक्त हो और जिससे सर्वात्मा भगवान प्रसन्न होते हैं।
धर्म सनातन ही है ! केवल ?
भगवत गीता में भगवान् ने अपने अवतार के कारणों में साधुओं की रक्षा, अधर्मियों का विनाश और धर्म की स्थापना आदि बताते हैं । वे धर्म की स्थापना कहते हैं वह धर्म जो एक ही है वे कोई नए धर्म की स्थापना नहीं करते हैं जो अनंत काल से चला आ रहा है वही सनातन धर्म है ।
धर्म जब एक ही है तो आगे सनातन क्यों लगाया गया जिसको आज “सनातन-धर्म” कहते हैं?
लगभग 2000 वर्ष पहले “धर्म” केवल “धर्म” ही था, अर्थात सम्पूर्ण विश्व में केवल एक ही धर्म था जो वेदों का अनुगमन करता था। जब नये-नये पंथ, सम्प्रदाय और मज़हब उत्पन्न होने लगे (जो कि प्रत्येक कलियुग में होता है), तब उन्होंने शक्ति, धन, यश और प्रसिद्धि की लालसा में स्वयं को अलग दिखाना चाहा और किसी भी प्रकार से अपनी संख्या अधिक करने का प्रयास किया। इसी क्रम में उन्होंने अपने पंथ को भी “धर्म” कहना प्रारम्भ कर दिया। उस समय इसके लिए भाषा की दृष्टि से धर्म के अनुवाद सबसे आसान शब्द मिला – “Religion”, इस प्रकार “Religion” और “धर्म” को भोले लोग समानार्थी समझने लगे।
धर्म के अतिरिक्त सब अधर्म है व्यापार है! कल्पित है!!
धर्म जब एक ही है तो आगे सनातन क्यों लगाया गया जिसको आज “सनातन-धर्म” कहते हैं?
कुछ उदाहरणों के द्वारा इस महत्वपूर्ण तथ्य को समझना आवश्यक है –
- गाय जो सिर्फ गाय ही थी उसे देसी गाय क्यों कहा जाने लगा ? जब नकली जर्सी नाम के पशु को लाया गया जो की दिखने में गाय जैसी थी (दूध अधिक मात्रा में देती थी लेकिन वह दूध गाय के दूध की तुलना में बहुत निम्न स्तर का था स्वास्थ्य के लिए हानिकारक था ) तब असली गाय को “देसी गाय” कहा गया ठीक वैसे ही जैसे धर्म को “सनातन धर्म”
- गाय के दूध से बना घी (घृत) को भी देसी-घी कहना शुरू किया गया जब वनस्पति घी आदि कई उत्पाद बाज़ार में आये। नहीं तो घी को पहले दूध से ही निकला हुआ माना जाता था ।
सनातन धर्म छोड़ अन्य पंथ, मत, आदि में गए लोगों को बहुत-बहुत बड़ी हानि!
सनातन धर्म के सभी सिद्धांत अकाट्य हैं और सत्य हैं और दूसरे पंथ चूँकि सनातन धर्म से पृथक हुए इसलिए सनातन धर्म के अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांतों से दूरी कर ली, जिसका अर्थ है प्रकृति के नियमों को न मानकर अपने कल्पित नियम बनाये जिसके कारण ही हम आज देख रहे हैं की पुरे विश्व में अधर्म, अत्याचार, मार, काट मची हुई है ।
वेदों में कड़े शब्दों में स्पष्ट निर्देश हैं स्वयं भगवान् के कि वेद का अनुकरण ही धर्म है उसके अलावा सब अधर्म। और वेद को न मानने से मनमानी करने से नए-नए पंथ और मत बनाने से सिर्फ भयंकर उपद्रव उत्पन्न होगा और वही हो रहा है आज पूरे विश्व में ।
जीवन रहते धर्म-त्याग की हानि संभव हैं की न पता पड़े पर देह त्याग उपरान्त तो जो सनातन धर्म में लिखा है वही सत्य है । मरणोपरांत दुर्गति होती ही है, और इसके कुछ प्रमाण भी हैं (प्रेत योनि में फंसे कई व्यक्तियों ने आज के समय में भी कई महात्माओं के सामने प्रकट होकर उनसे अपने उद्धार के लिए प्रार्थना की है ) अंत्येष्टि क्रिया वैदिक विधि से होना अनिवार्य है अथवा मृत्युपरांत प्रेत योनि में हज़ारों साल बिताना पढता है, जो बहुत ही कष्टमय योनि है ।
महान आत्मा गीता प्रेस के प्रथम सम्पादक, भगवान् के बहुत बड़े भक्त एवं भगवत प्राप्त अवतारी पुरुष श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार जी को एक प्रेत ने प्रकट होकर विनती की थी! प्रेत ने अपना घर है पता आदि सभी सही दिया था और वो पारसी थे । youtube में इस प्रसंग पर कई videos उपलब्ध हैं । उस प्रेत ने बहुत बातें श्री हनुमान प्रसाद जी को बतायीं जिससे सनातन धर्म के सभी नियम और विधि निषेध आदि की सत्यता स्पष्ट होती है।
Useful References:
- https://qr.ae/pCnK3M
- https://qr.ae/pCnKjL
- https://www.youtube.com/watch?v=gUVkKphQLNI,
- https://www.youtube.com/watch?v=rM1xUT7UIkY&t=384s
- , https://www.youtube.com/watch?v=jnEoJEmI_JM&t=131s,
- https://www.youtube.com/watch?v=Oa58_9GsB_Y&t=542s
- https://www.vridhamma.org/discourses/The-True-Meaning-of-Dharma

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