चार पुरुषार्थ – धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष – भाग 2

धर्मस्तिष्ठति केवलम् !

संसार में मनुष्य का श्रेष्ठ सुहृद् धर्म ही है। वही परलोक में साथ देता है। वहाँ इसके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं होता—वहाँ तो ‘धर्मस्तिष्ठति केवलम्’।

धनानि भूमौ पशवश्च गोष्ठे नारी गृहद्वारि जनाः श्मशाने ।

देहश्चितायां परलोक मार्गे धर्मानुगो गच्छति जीव लोकः ॥

शास्त्र के अनुसार प्राणी का धन भूमि तक साथ देता है, पशु गोष्ठ तक, नारी घर के द्वार तक, प्रियजन श्मशान तक और शरीर चिता तक का साथी है, किंतु परलोक की अखण्ड एवं बाधा-रहित  यात्रा में धर्म अन्त तक साथ देता है। कहा भी गया है-

भगवान् भी उसी पर प्रसन्न होते हैं, जो धर्मनिष्ठ होते हैं। यदि धर्म-हीनों पर वे अनुग्रह करते हैं तो भी उन्हें धर्मनिष्ठ बनाने के ही लिये

पुरुषार्थचतुष्टय – धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष

चार पुरुषार्थ यानि मनुष्य जीवन के सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य । पुरुषार्थ वह कर्म है जो फल प्राप्ति की कामना से किया जाये। सनातन धर्म शास्त्रों में धर्म अर्थ काम और मोक्ष चार पुरुषार्थ कहे गए हैं इनके मूल में धर्म ही है !

पुरुषार्थचतुष्टय के सिद्धांत को सरलता से समझने के लिए शीर्षक में जो रेखा चित्र है उसे समझना आवश्यक है। इन चार पुरुषार्थों में २ साधन हैं और २ लक्ष्य हैं

अर्थ और काम बंधन कारक हैं ! और मोक्ष है बंधनों से मुक्ति ! तो अर्थ और काम पुरुषार्थ में क्यों?

“पुरुषार्थ” का अर्थ है  “पुरुष अर्थात मनुष्य (विवेकशील प्राणी) और “अर्थ” का तात्पर्य उद्देश्य या लक्ष्य। 

लक्ष्य का एक तात्पर्य फल से भी है, यानी पुरुष (मनुष्य) जिस फल की इच्छा करे उसका नाम पुरुषार्थ है ।

वेद पुराण और धर्मशास्त्रों में मनुष्य जीवन की सभी अभीष्ट (कामनाओं) में प्रमुख केवल धर्म अर्थ काम और मोक्ष ही बताये गए हैं । अतः मनुष्य के जो मुख्य अभिलषित विषय हैं उन्हें ही पुरुषार्थ कहते हैं – “धर्मार्थ काम मोक्षाणां पुरुषार्थं चतुर्विधम” ।

धर्म के अनुसार धन का उपार्जन करना चाहिए छल, कपट या चोरी से कमाया धन अमंगलकारी ही होता है । इसी प्रकार कामनाएं भी धर्मोचित ही होनी चाहिए, किसी को दुःख या हानि पहुंचाने वाली कामनाएं स्वयं के लिए दुःख का कारण बनती हैं ।

अगर मनुष्य अपनी इक्षानुसार धनार्जन करेगा और कामनाओं की पूर्ति करेगा तो अर्थ और काम दोनों मोक्ष प्राप्ति में बाधक होंगे !  और अगर अर्थ और काम धर्मानुकूल होंगे तो वे मोक्ष प्राप्ति में साधक होंगे ।

चतुर्विध पुरुषार्थ में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य

  • अर्थ : का मतलब धन तो होता है पर पुरुषार्थ के सन्दर्भ में “अर्थ” का तात्पर्य हर उस वस्तु से है जो मनुष्य के लिए उपयोगी है, और जिसकी प्राप्ति के लिए उसे श्रम करना पड़ता है ।
  • काम अर्थात कामनाएं ११ स्थानों में अपना अधिकार रखतीं है, जिनमें पांच कर्मेन्द्रियाँ और पांच ज्ञानेन्द्रियाँ और ग्यारहवां मन

भूमिरापोऽनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च | अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा || 7, 4||

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार—ये आठ चीजें (अष्टधा प्रकृति) मेरी भिन्न-भिन्न प्रकृति के रूप में हैं। ये सब मिलकर इस संसार (सृष्टि) की रचना करती हैं।

जो अष्टधा प्रकृति को अपने वश में रखता है वही मोक्ष प्राप्त कर पाता है । वास्तव में जो प्रकृति के वश में जो वह जीव है जो प्रकृति पर विजय प्राप्त कर ले इन्द्रिय सयम  के द्वारा वही ईश्वर है। पुरुषार्थ चतुष्टय में प्रथम धर्म है और अंत में मोक्ष अर्थात धर्म और मोक्ष के बीच में अर्थ और काम का विवेकपूर्वक उपभोग करता है वह ही मनुष्य जीवन के परम पुरुषार्थ को प्राप्त कर पाता है।

इसके विपरीत जो हर समय अर्थ और काम के पीछे भागता है उसका धर्म और मोक्ष तो बिगड़ता ही है यह लोक और परलोक भी बिगड़ जाता है । कामनाओं का बोझा लेकर देह त्यागता है और बार बार जन्म लेता है।

धर्म अथवा अधर्म के परिणाम स्वरुप गतियां

मनुष्य का कोई भी कर्म  छुप नहीं सकता क्योंकि उसके साक्षी हैं पंच-तत्व, दिशाएं, रात, दिन, संध्या… !

चारों पुरुषार्थ की प्राप्ति के लिए मनुष्य को कर्म करना पड़ता है, वेदों के अनुरूप कर्म धर्म है और उसके अतिरिक्त सब अधर्म । मनुष्य का कर्म छुपा कर नहीं किया जा सकता क्योंकि – 

सूर्य, अग्नि, आकाश, वायु, इन्द्रियाँ, चन्द्रमा, संध्या, रात-दिन, दिशाएँ, जल, पृथ्वी, काल और धर्म-ये देहधारीके कर्म-साक्षी हैं।’ सूर्य रात्रिमें नहीं रहता और चन्द्रमा दिनमें नहीं रहता, प्रज्वलित अग्नि भी सामने न हो, यह सम्भव है, किंतु रात-दिन अथवा संध्याका समय तो होगा ही दिशाएँ होंगी। आकाश, वायु, पृथ्वी, जल को छोड़कर आप कहाँ चले जायेंगे? आपकी अपनी इन्द्रियाँ, काल तथा धर्म तो आकाशमें घूमते हवाई जहाज  में भी आपके साथ रहेंगे। आपके कर्मोंके इतने साक्षी हैं। देहधारी के अधर्म करने पर इन पर प्रभाव पड़ता है।

धर्म अथवा अधर्म से प्राप्त होने वाली गतियाँ और लोक , परलोक !

धर्म का अनुसरण कर जीवन यापन करने वाले पुण्यात्मा मनुष्यों को यमराज (धर्मराज) के दूत सौम्य रूप में आकर उसे पहले यमलोक ले जाते हैं, वहां से वह अपने पुण्य कर्मोके अनुसार स्वर्गादि उच्च लोकों में ले जाया जाता है । गन्धर्वलोक से लेकर ब्रह्मलोक तक पुण्यकर्मी की गति है। पुण्य-भोग समाप्त होने पर उसे पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ता है।

यदि वह पापकर्मा है तो उसे यमदूत भयानक वेशमें मिलते हैं। मार्गमें भी उसे असह्य क्लेश होता है। यमराज उसे भयंकर वेशमें दीखते हैं। उसे नरकोंमें डाला जाता है। पापके उत्कट भोग समाप्त होनेपर उसे पृथ्वीपर कर्मानुसार वृक्ष अथवा कीटादि तिर्यक्- योनियों में पहले जन्म मिलता है।

मनुष्य एक दिन एक मुहूर्त में ऐसे पुण्य या पाप कर सकता है / करता है कि उसका भोग सहस्र वर्ष में भी पूर्ण न हो। पृथ्वी पर जो देह हैं, उनमें एक सीमा तक ही दुःख या सुख भोगनेकी क्षमता है। जो पुण्य या पाप पृथ्वी के किसी देहमें भोगने सम्भव नहीं, उनका फल स्वर्ग या नरक आदि में जीव भोगता है (स्वर्ग में दिव्य देह मिलता है और नर्क में यातना देह) । पाप अथवा पुण्य जब इतने रह जायँ कि पृथ्वी पर उनका भोग सम्भव हो, तब वह पृथ्वी पर किसी देह में जन्म लेता है।

पितृलोक – यह एक प्रकारका प्रतीक्षालोक है। एक जीवको पृथ्वीपर अमुक माता-पितासे जन्म लेना है, अमुक भाई-बहिन, पत्नी पाना है। अमुक लोगों के द्वारा उसे सुख या दुःख मिलना है। वे सब जीव भिन्न-भिन्न कर्म करके स्वर्ग या नरकमें हैं । जब तक वे सब भी पृथ्वी पर इस जीव के अनुकूल योनि में जन्म लेने की स्थितिमें न आ जायँ, इसे प्रतीक्षा करनी पड़ती है। पितृ-लोक इस प्रकार प्रतीक्षा-लोक है।

प्रेतलोक – अनेक बार मनुष्य पृथ्वी के किसी बहुत प्रबल राग, द्वेष, लोभ या मोह का आकर्षण लिये देह छोड़ता है; क्योंकि मनुष्य को अन्तिम इच्छा के अनुसार गति प्राप्त हो, यह नियम है, अतः वह मृत पुरुष वायवीय देह पाकर अपने राग-द्वेष के बन्धन से बँधा उस राग-द्वेष के कारण के आस-पास भटकता रहता है। यह बड़ी यातना-भरी योनि है। इससे छुटकारे के उपाय शास्त्रों में अनेक कहे गये हैं।

विशेष मनुष्य  बहुत अधिक पुण्य-कर्मा, तपस्वी तथा महान योगी यमलोक नहीं जाते। इनकी दो गतियाँ हैं। भगवत गीता में शुक्ल तथा कृष्णमार्ग कहकर इन गतियों का वर्णन है। इनमें से जिनमें वासना शेष है, वे धूम्र, रात्रि, कृष्णपक्ष, दक्षिणायन के देवताओं द्वारा ले जाये जाते हैं। ऊर्ध्वलोक में अपने पुण्य भोगकर ये फिर पृथ्वी पर जन्म लेते हैं।

जिनमें वासना शेष नहीं है, वे अग्नि, दिन, शुक्लपक्ष, उत्तरायण के देवताओंद्वारा ले जाये जाते हैं। वे फिर पृथ्वीपर जन्म लेने नहीं लौटते। सती नारियाँ, धर्म-युद्धमें मारे गये क्षत्रिय तथा उत्तरायण के शुक्ल-मार्ग से जानेवाले योगी सूर्य-मण्डल भेदकर मुक्त हो जाते हैं। ब्रह्मलोक में दो प्रकार के पुरुष पहुँचते हैं। एक यज्ञ-तप आदि करनेवाले पुण्यात्मा । ये लोग ब्रह्माकी आयुतक वहाँ सुख भोगते हैं । प्रलय के समय ब्रह्माजी में लीन रहते हैं, किंतु अगली सृष्टिमें जन्म लेते हैं। दूसरे वे योगी अथवा ज्ञानी, जिनके कर्मभोग समाप्त हो चुके हैं – जो शुद्धान्तःकरण हैं । प्रलय से पूर्व ब्रह्माजी उन्हें तत्त्व – ज्ञान का उपदेश कर देते हैं। इससे वे मुक्त हो जाते हैं। आगामी सृष्टि में वे जन्म नहीं लेते।

मुक्त पुरुष (जिन्हें मोक्ष प्राप्ति हो चुकी है) – तत्त्वज्ञानी पुरुष ज्ञान-समकाल मुक्त हो जाते हैं। उनका आवागमन नहीं होता। उनके विषयमें श्रुतिने कहा है-  “न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति । तत्रैव प्रविलीयन्ते ।” उसके प्राण कहीं निकलकर जाते नहीं। वहीं सर्वात्मामें लीन हो जाते हैं। भक्त अपने आराध्य के लोकमें जाते हैं । भगवान्‌के लोकमें कुछ भी बनकर रहना सालोक्य-मुक्ति है। भगवान्‌के समान ऐश्वर्य प्राप्त करना सार्ष्टि-मुक्ति है। भगवान के  समान रूप पाकर वहाँ रहना सारूप्य-मुक्ति है। भगवान्के आभूषणादि बनकर रहना सामीप्य-मुक्ति है। भगवान के श्रीविग्रहमें मिल जाना सायुज्य मुक्ति है। भगवद् – धाम प्राप्त भक्त भगवान्‌की इच्छा से उनके साथ या पृथक् भी संसारमें दिव्य जन्म ले सकता है, वह कर्मबन्धमें बँधा नहीं होता। भगवत्कार्य सम्पन्न करके वह पुनः भगवत धाम चला जाता है ।

References:

  1. https://www.youtube.com/watch?v=gUVkKphQLNI,
  2.  कल्याण धर्म शास्त्र-अंक, गीता प्रेस गोरखपुर, धर्म-तत्व विमर्श p-140
  3. https://qr.ae/pCnK3M  
  4. https://qr.ae/pCnKjL
  5. https://www.youtube.com/watch?v=rM1xUT7UIkY&t=384s
  6. , https://www.youtube.com/watch?v=jnEoJEmI_JM&t=131s,
  7. https://www.youtube.com/watch?v=Oa58_9GsB_Y&t=542s
  8. https://www.vridhamma.org/discourses/The-True-Meaning-of-Dharma

2 thoughts on “चार पुरुषार्थ – धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष – भाग 2”

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