भाग २
श्रीमद देवीभागवत महापुराण के अनुसार मूल प्रकृति स्वरूपा पांच देवियों के जो अंश, अंशांश, अर्धांश आदि भेद से अनेक रूप हैं, उनके वषय में भाग २ में हम विस्तार से जानेंगे
यदि आपने भाग १ नहीं पढ़ा है, तो यहाँ क्लिक करें: [Link to Part 1]”

परब्रह्मस्वरूपा, महाकारुण्यरूपिणीं, भुक्तिमुक्ति-प्रदायिनीं -माँ दुर्गा ! भाग १ में हमने माता के बारे में जाना की जगत-जननी , महाशक्ति ही परब्रह्म परमात्मा हैं, जो विविध रूपों में विभिन्न लीलाएं करतीं हैं। इन्हीं की शक्ति से ब्रह्मा विश्व की उत्पत्ति करते हैं, इन्हीं की शक्ति से भगवान् विष्णु सृष्टि का पालन करते हैं, और भगवान् शंकर संहार करते हैं । अर्थात ये ही सृजन, पालन और संहार करनेवाली आद्या (सर्वप्रथम शक्ति) पराशक्ति हैं ।
हमने मूल-प्रकृति स्वरुप परब्रह्म पांच महाशक्तियों के बारे में विस्तार से जाना – श्री दुर्गा, माता लक्ष्मी, सरस्वती जी , सावित्री जी तथा श्री राधा
भाग २ में इन मूल प्रकृति स्वरूपा पांच देवियों के जो अंश, अंशांश, अर्धांश कला, कालांश, कलाशाँश तथा कला शतांश भेद से अनेक रूप हैं, हम उनके विषय में जानेंगे श्रीमद देवीभागवत महापुराण के अनुसार!
श्री हरि नारायण श्रीमद देवीभागवत महापुराण नौं वे स्कंध में नारद जी से कह रहे हैं:
मूल प्रकृति के अंश भेद से अनेक रूप हैं, संसार की सभी स्त्रियां इन्हीं की रूप मानी जातीं हैं। ये पांचो देवियां परिपूर्णतम हैं (श्री गणेश माता दुर्गा, भगवती लक्ष्मी, वाणीदेवी सरस्वती, सावित्री गायत्री और श्री राधा)।, अतः इन्हे साक्षात विद्या स्वरूपा कहा गया है । हे मुनिवर ! इन देवियों के जो-जो प्रधान अंश हैं, उन्हें में कहता हूँ, सावधानी से सुनो।

मूल प्रकृति का प्रधान अंश – गंगा जी !
उन देवी मूल प्रकृति का प्रधान अंश है – गङ्गाजी, जो तीनों लोकों को पवित्र करती है। ये सनातनी ‘गङ्गा’ जलमयी हैं, इनका प्रादुर्भाव विष्णु भगवान के पद-नख से हुआ है। ये पापियों के पाप कर्मों को जलाने / नष्ट करने के लिये प्रज्वलित अग्नि के समान हैं। इनके स्पर्श से, स्नान अथवा पान करने से मनुष्य मोक्ष के अधिकारी हो जाते हैं। गोलोक-धाम में जाने के लिए तो ये सुखप्रद सोपान के समान मानी जातीं हैं, जो तीर्थों में पवित्रता तथा नदियों में श्रेष्ठतरा कही जाती हैं।

जब वे विष्णु-पद (आकाश) से उतरीं, तब कैलास पर भगवान शंकर की जटा में रुक गयीं। किसी प्रकार वहाँ से निकलकर सीधे भारतवर्ष में आ गयीं मानो तपस्वियों के तपस्या में शीघ्र सिद्धि प्रदान करने के लिये ही इनका यह शुभागमन हुआ हो।
इनका शुद्ध एवं सुधोपम सलील शुद्ध सत्वरूप है। ये चन्द्रमा, श्वेतकमल (पुण्डरीक) और दूध के समान स्वच्छ हैं। मल तथा मद का लेशमात्र भी इनमें नहीं है। ये परम पवित्रा (पतिव्रता) गङ्गा विष्णु भगवान् को अति प्रिय है।
प्रकृति देवी की अंशावतार रूपा ‘तुलसी माता ‘

इसके बाद प्रकृति देवी की अंशावताररूपा ‘तुलसी’ का नाम आता है। ये विष्णुप्रिया हैं, विष्णु के विभूषित किये रहना इनका प्राकृतिक गुण है। भगवान् विष्णु के चरणों में ये सर्वदा विराजित रहती हैं। हे नारद! तपस्या, संकल्प, पूजा-आदि समस्त शुभ कृत्य श्रीतुलसी देवी की कृपा से ही सिद्ध होते हैं। अतः पुष्पों (वनष्पतियों) में ये मुख्य मानी जाती हैं। ये परम पवित्र एवं पुण्यदायिनी हैं, ये अपने दर्शन एवं स्पर्श से शीघ्र ही मनुष्यों को परम धाम का अधिकारी बना देती हैं। हे नारद! तपस्या, संकल्प, पूजा-आदि समस्त शुभ कृत्य श्रीतुलसी देवी की कृपा से ही सिद्ध होते हैं। अतः पुष्पों (वनष्पतियों) में ये मुख्य मानी जाती हैं। ये परम पवित्र एवं पुण्यदायिनी हैं, ये अपने दर्शन एवं स्पर्श से शीघ्र ही मनुष्यों को परम धाम का अधिकारी बना देती हैं। विशेषतः कलियुग में पाप रूपी सूखी लकड़ी को भस्म करने के लिये मनो ये प्रज्वलित अग्नि के समान हैं।
जिनके चरण-स्पर्श से यह पृथ्वी शीघ्र ही पवित्र हो गयी और तीर्थ भी स्वयं जिनके दर्शन मात्र से विशुद्ध होना चाहते हैं, यहाँ तक की समस्त संसार में – जिनके बिना सभी कर्म निष्फल हो जाते हैं तथा जिनकी कृपा से मुमुक्षु जन मोक्ष पा जाते हैं—ऐसी वनस्पति- ईश्वरी ये तुलसी देवी हैं।
सबकी इच्छाओं को पूरा करनेवाली ये तुलसी देवी भारतवर्ष में कल्पवृक्ष के समान हैं।
मुक्तिदायिनी देवी के अन्य एक प्रधान अंश का नाम ‘मनसा‘ देवी है

‘मनसा’ देवी कश्यप की पुत्री हैं, जिनको भगवान् शंकर ने उपदेश दिया है। ये मनसा देवी महा विदुषी तथा शिव-शिष्या कहि जाती हैं। ये नागराज शेष की बहन हैं, अतः ये नाग जातियों में अत्यन्त आदरणीया देवी हैं। नाग की सवारी पर चलने वाली इन परम सुंदरी देवी को ‘नागेश्वरी’ तथा ‘नागमाता’ भी कहते हैं। ये नागों से सदा सुशोभित रहती हैं और नागराज भी सदा इनकी स्तुति किया करते हैं । ये योगसिद्धियों की साक्षात मूर्ति हैं।, इनकी शय्या नाग हैं।
ये स्वतः विष्णु स्वरूपिणी हैं, भगवान् श्रीहरि में इनकी अटल श्रद्धा है, ये सदा उनकी पूजा में संलग्न रहती हैं। ये तपोमूर्ति होने के कारण तपस्वियों को फल प्रदान करने में बड़ी निपुण हैं।
ये स्वयं भी परम तपस्विनी हैं । इन्होंने दिव्य तीन लाख वर्षों तक विष्णु भगवान की तपस्या की है। भारतवर्ष में जितने तपस्वी एवं तपस्विनियाँ हैं, उन सभी में ये श्रेष्ठ कही जाती हैं; क्योंकि सभी मन्त्रों की अधिष्ठात्र होने से इनका शरीर ब्रह्म तेज से देदीप्यमान रहता है । ये ब्रह्मचिन्तन में सदा निरत रहतीं हैं, अतएव इन्हें परब्रह्मस्वरूपा भी कहते हैं ।
ये मनसा देवी भगवान श्री कृष्ण के अंशावतार “जरत्कारु” मुनि की पत्नी एवं तपस्वीप्रवर ‘आस्तीक” मुनि की माता हैं ।
मूल-प्रकृति की षष्ठांश ‘देवसेना’ या ‘षष्ठी’ देवी

इसी प्रकार प्रकृति देवी के एक प्रधान अंश को ‘देवसेना’ कहते हैं। ये मातृकाओं में श्रेष्ठ ‘षष्ठी’ देवी के नाम से भी लोक में पूज्य एवं प्रसिद्ध हैं। ये पुत्र-पौत्र-प्रदात्री तथा समस्त संसार की पालयित्री हैं। ये मूलप्रकृति की षष्ठांश भाग हैं। इसलिये भी इनका नाम ‘षष्ठी’ देवी पड़ा। सन्तानोत्पत्ति के अवसर पर अभ्युदय के लिये इन षष्ठी योगिनी की पूजा विहित है। अतः संसार में बारहों मास इनकी पूजा होती रहती है।
पुत्र उत्पन्न होने पर छठें दिन सूतिकागृह में इनकी पूजा का विधान है। साथ ही कल्याण चाहनेवाले व्यक्ति इक्कीसवें दिन भी इनकी पूजा करते हैं, यह पुरानी पद्धति है। इनका एक नाम ‘मातृका’ भी है; क्योंकि ये दयास्वरूपिणी एवं माता के समान सुरक्षिका हैं। मुनियों से सर्वदा वन्दिता एवं पूजिता ये देवी सभी कामनाओं को देनेवाली हैं। अतः इन्हें सर्वश्रेष्ठ देवी माना गया है। प्राणिमात्र की रक्षा के लिये ये सर्वदा तत्पर रहती हैं। यहाँ तक कि जल, थल, आकाश, गृह-गुहा-सर्वत्र ही ये षष्ठीदेवी विशेषकर नवजात शिशुओं की रक्षा करती हैं।
प्रकृति देवी का एक प्रधान अंश ‘मंगलचण्डी’ के नाम से प्रसिद्ध है, जो प्रकृति देवी के मुख से प्रकट हुई हैं। उनकी कृपा से सभी मंगल कार्य सफल होते हैं। सृष्टिकाल में इनका शरीर मंगलमय रहता है, परन्तु संहार के समय ये क्रोधमयी बन जाती हैं। इसीलिये विद्वज्जन इन्हें ‘मंगल-चण्डी’ कहते हैं। अत: प्रत्येक मंगलवार को इनका पूजन संसार में सर्वत्र होता है। इनकी कृपा से साधकजन पुत्र-पौत्र, धन-सम्पत्ति तथा यशोगौरव प्राप्त करते हैं । प्रसन्न होने पर समस्त स्त्रियों के मनोरथ पूर्ण करना इनका स्वाभाविक गुण है।
काली देवी – प्रकृति देवी की प्रधानांश, दुर्गा देवी के ललाट से उत्पन्न

इसके बाद क्रम आता है उन काली देवी का – जो प्रकृति देवी की प्रधानांश हैं और दुर्गा देवी के ललाट से जिनकी उत्पत्ति हुई है । इन देवी के नेत्र कमल के समान शोभा देते हैं । ये महादेवी क्रोधित होने पर क्षण भर में विश्व का संहार भी सकती हैं । जिस समय शुम्भ और निशुम्भ दोनों महादानव युद्धस्थल में चण्डिका के सामने आ डटे थे, उसी समय भगवती दुर्गा के ललाट से वे काली प्रकट हुई थीं— जो मूल-प्रकृति-सम्भवा दुर्गा की अर्द्धांशा मानी जाती हैं। ये गुण एवं तेज में भी दुर्गा के समान ही हैं। इनका
तेज:पुंज शरीर करोड़ों सूर्य के समान देदीप्यमान है। समस्त शक्तियों में ये सर्वश्रेष्ठ हैं, इनसे अधिक कोई भी शक्ति बलवती नहीं है। ये सब प्रकार की सिद्धियों को देनेवाली परम सिद्ध महायोगिनी हैं। ये परमात्मा कृष्ण की परम भक्त हैं, इनमें भी उन्हीं के समान सभी दिव्य गुण विद्यमान हैं। इनका सारा समय कृष्ण भगवान् के अनुचिन्तन में ही बीतता है, ये उन्हीं के समान कृष्णवर्ण की सनातनी भगवती हैं, ये चाहें तो क्षणभर में समस्त ब्रह्माण्ड का प्रलय कर दें। इनका दैत्यों के साथ समर करना केवल क्रीड़ा एवं लोक-शिक्षा के लिये है; क्योंकि ये भगवती महाकाली धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष चारों पदार्थों को देने में सर्वदा समर्थ एवं सर्वदेवताओं से भी पूजित हैं। सुतराम् ब्रह्मादि देवता, मुनिवृन्द एवं मन्वादि राजर्षिगण भी इनकी सर्वदा उपासना किया करते हैं।
भगवती ‘वसुन्धरा’ – प्रकृतिदेवी के प्रधान अंश से प्रकट

इसी प्रकार भगवती ‘वसुन्धरा’ भी प्रकृतिदेवी के प्रधान अंश से प्रकट हुई हैं। समस्त भूमण्डल इन्हीं पर आधारित है। ये ‘सर्वसस्या’ भी कही जाती हैं, इन्हें कुछ लोग ‘रत्नगर्भा’ तथा ‘रत्नाकरा’ भी कहते हैं; क्योंकि समस्त रत्नों की खान इन्हीं वसुन्धरा देवी के भीतर विद्यमान हैं। ये राजा प्रजा से सर्वदा सुपूजित एवं सेवित हैं, समस्त प्राणियों को जीविका प्रदानार्थ ही इन्होंने यह पार्थिवरूप धारण कर रखा है। ये सब प्रकार के वैभवों की विधात्री हैं। हे मुनिवर ! जिस महाशक्ति के बिना समस्त चराचर जगत् कहीं भी ठहर नहीं सकता, उस मूलप्रकृति देवी की जो-जो कलाएँ हैं और वे जिनकी पत्नियाँ हैं— उन सबों को मैं बताता हूँ, उन्हें तुम ध्यान से सुनो।
उनमें प्रथम ‘स्वाहा’ देवी अग्निदेव की पत्नी हैं, जो सर्वत्र पूजी जाती हैं। इनको दिये बिना अर्पित की गई हवि कोई भी देवता पाने में समर्थ नहीं होते। यज्ञ भगवान् की | पत्नी का नाम ‘दक्षिणा’ है, जिन्हें ‘दीक्षा’ भी कहते हैं, इनका सर्वत्र समादर होता है; क्योंकि इनके बिना सभी यज्ञ निष्फल हो जाते हैं। इसी प्रकार ‘स्वधा’ पितरों की पत्नी हैं। मुनि, मनु एवं समस्त मानव इनकी पूजा करते हैं। इनके उच्चारण बिना पितरों को दी गयी वस्तु उन्हें नहीं मिलती। अर्थात् देवताओं के लिये ‘स्वाहा’ एवं पितरों के लिये ‘स्वधा’ शब्द अनिवार्य है।
वायु की पत्नी का नाम ‘स्वस्ति‘ देवी है। समस्त विश्व में इनका समादर होता है। इनके बिना आदान-प्रदान की सभी क्रियाएँ निष्फल हैं। गणेशजी की पत्नी का नाम ‘पुष्टि’ है। भूतल पर इनकी पूजा सभी करते हैं। इनके बिना स्त्री तथा पुरुष सभी शक्तिहीन हो जाते हैं। अनन्त की पत्नी ‘तुष्टि’ नाम से प्रसिद्ध हैं। सभीलोग इनकी स्तुति-पूजा करते हैं । इनके बिना कोई भी कभी सन्तुष्ट नहीं हो सकता। ईशान की पत्नी का नाम है ‘सम्पत्ति’। देव, दानव या मानव सभी इनका आदर करते हैं। इनके अभाव में समस्त संसार की जनता दरिद्र कहलाती है। इसी प्रकार कपिलमुनि की पत्नी ‘धृति’ हैं। सर्वत्र सभी धृति (धैर्य) का स्वागत करते हैं; क्योंकि यदि धैर्य न रहे तो जगत् के सभी प्राणी ‘अधीर’ हो जायँ।
‘सती’ को सत्य की स्त्री कहा है। सबसे सत्कार पानेवाली ये देवी अत्यन्त लोकप्रिय हैं। इनके बिना संसार सचमुच बन्धुत्व-विहीन हो जाता है। मोह की पत्नी का नाम ‘दया’ है— जो जगत्पूज्या एवं सर्व-हितकारिणी हैं। दया के अभाव में समस्त जीव सर्वत्र निष्फल माने जाते हैं। पुण्य की पवित्र पत्नी का नाम ‘प्रतिष्ठा’ है। सौभाग्यवश मिलनेवाली ये देवी यशस्वी जनों को सर्वदा प्रिय हैं। हे नारद! प्रतिष्ठा बिना सारा संसार जीते हुए भी मृतकतुल्य है। सुकर्म की पत्नी का नाम ‘कीर्त्ति‘ है, जिन्हें प्राय: सभी जानते एवं मानते हैं। भाग्यशाली पुरुषों द्वारा इनका आदर सर्वत्र होता है। कीर्त्ति के बिना भी जीना न जीने के समान है। ‘क्रिया’ उद्योग की पत्नी हैं, इनके बिना तो संसार का कोई काम नहीं चल सकता। इसलिये इन आदरणीया देवी से सभी सहमत हैं ।
हे मुनीन्द्र ! अधर्म की पत्नी ‘मिथ्या’ हैं, इनका आदर केवल धूर्त्तलोग ही किया करते हैं। जिसके बिना धूर्त्त जगत् का सभी प्रपंच नष्टप्राय हो जाता है। यद्यपि सत्ययुग में यह मिथ्यादेवी नाममात्र की थीं अर्थात् अदृश्य-सी थीं, त्रेता में सूक्ष्मरूप धारण करके प्रकट हुई
तथा द्वापर में अपने अर्ध शरीर से सुशोभित हुई और कलियुग में सर्वाङ्गपूर्ण मिथ्यामूर्त्ति रूप से दृष्टिगोचर होती हैं और सर्वत्र अपना सिक्का जमाये रहती हैं । मिथ्या देवी के भ्राता का नाम ‘कपट’ है । उसके साथ ये घर-घर में चक्कर लगाती रहती हैं। परन्तु सुशील देव की दो पत्नियाँ हैं — ‘शान्ति’और ‘लज्जा’ । हे नारद! इनके न रहने पर समस्त प्राणी उन्मत्त की भाँति नग्न नर्तन करने लगते हैं। इसी प्रकार ज्ञान की भी तीन पत्नियाँ हैं—‘बुद्धि’, ‘मेधा’ तथा ‘धृति’। यदि ये संग त्याग दें तो सारा संसार मूर्ख एवं पागल-तुल्य हो जाय। धर्म की भार्या का नाम ‘मूर्ति’ है। सुन्दर शोभावाली ये देवी सबके मन को मोहित किये रहती विश्व-संचालक परमात्मा भी इनका सहयोग पाये बिना निराधार रहते हैं। इनके स्वरूप को पाकर ही पति-परायणा लक्ष्मीजी सर्वत्र शोभा एवं आदर पाती हैं। इनके दो स्वरूप हैं- ‘श्री’ और ‘मूर्ति’। ये परमपूज्य, मान्य एवं धन्यतम हैं ।

रुद्र की धर्मपत्नी का नाम है ‘कालाग्नि, ‘योगनिद्रा’ तथा ‘सिद्धयोगिनी’ भी इन्हीं का नाम है। रात में इनका सहयोग पाकर संसार के सभी प्राणी आच्छन्न (निद्राग्रस्त) हो जाते हैं। काल की भी तीन स्त्रियाँ हैं- ‘सन्ध्या’, ‘रात्रि’ और ‘दिवा’। इनके बिना ब्रह्मा भी संख्या-गणना में सफल नहीं हो सकते । लोभ की दो भार्या हैं-‘क्षुधा’ तथा ‘पिपासा’। ये परम मान्य एवं धन्यवाद की पात्र हैं। यदि ये अनुकूल न हों तो सारा संसार चिन्तातुर हो जाय। ‘प्रभा’ एवं ‘दाहिका’ – ये दोनों तेज की पत्नियाँ हैं। इनके अभाव में सृष्टिकर्ता ब्रह्मा अपना कार्य सम्पादन नहीं कर सकते ।
काल की दोनों कन्याएँ ‘जरा’ और ‘मृत्यु’– ये दोनों ज्वर की अत्यन्त प्रिय भार्या हैं। यदि इनकी सत्ता न रहे, तो विधाता के विधान की व्यवस्था ही अस्त-व्यस्त (बिगड़) हो जाय। निद्रा की कन्या का नाम है ‘तन्द्रा’। ‘तन्द्रा’ तथा ‘प्रीति’– ये दोनों सुख की स्त्रियाँ हैं। हे मुनिवर! विधि-विधान में निर्मित समस्त संसार इनसे व्याप्त है। ‘श्रद्धा’ एवं ‘भक्ति’ ये दो पूज्य पत्नियाँ वैराग्य-देव की हैं।

हे मुने! इन दोनों की अनुकम्पा से सभी जीव मुक्त हो सकते हैं। साथ ही देवताओं की माता ‘अदिति’ तथा गौओं की माता ‘सुरभि’ एवं दैत्यों की माता दिति, क्रदू, विनता एवं दनु’- ये सभी देवियाँ सृष्टि का कार्य सँभालती हैं। इन उपर्युक्त सभी देवियों को भगवती ‘प्रकृति’ की ‘कला’ कहते हैं।। १२४-१२५।। इनके अतिरिक्त अन्यान्य कलाओं में से भी कतिपय कलाओं का संक्षिप्त परिचय कराये देता हूँ। हे नारद! सुनो, चन्द्रमा की भार्या ‘रोहिणी‘ तथा सूर्य की ‘संज्ञा’ नाम की भार्या हैं। मनु की भार्या का नाम ‘शतरूपा‘ और इन्द्र की पत्नी का नाम ‘शची’ है। ‘तारा‘ बृहस्पति की स्त्री का नाम तथा ‘अरुन्धती’ वसिष्ठजी की पत्नी का नाम है। गौतम मुनि की पत्नी ‘अहल्या‘, अत्रि की ‘अनुसूया’, कर्दममुनि की पत्नी का नाम ‘देवहूति’ तथा दक्ष की भार्या का नाम ‘प्रसूति‘ है ।
पितरों की मानसी कन्या ‘मेनका’ हैं, जो पार्वती की माता कही जाती हैं। लोपामुद्रा, कुन्ती तथा कुबेर-पत्नी, वरुण-पत्नी एवं राजा बलि की पत्नी ‘विन्ध्यावली’ को भी सभी जानते हैं। इसी प्रकार ‘कान्ता’, साध्वी ‘दमयन्ती’, ‘यशोदा’, ‘देवकी’, ‘गान्धारी’, पतिव्रता ‘द्रौपदी’, ‘शैव्या’, ‘सत्यवती’ तथा वृषभानु की प्रियपत्नी कुलीना राधिका (राधा) की जननी संसार में प्रसिद्ध हैं। ‘मन्दोदरी’, ‘कौसल्या’, ‘सुभद्रा’, कौरवी, ‘रेवती’, ‘सत्यभामा’, कालिन्दी’ (यमुना), ‘लक्ष्मणा’, ‘जाम्बवन्ती’, ‘नाग्नजिती’, ‘मित्रविन्दा’, ‘रुक्मिणी’, लक्ष्मी की साक्षात् अवतार ‘सीता’, ‘काली’, ‘योजनगन्धा’ (व्यासजी की माता ‘मत्स्योदरी’) एवं बाणपुत्री ‘उषा’, उसकी सखी ‘चित्रलेखा’ भी प्रसिद्ध हैं। ‘प्रभावती’, ‘भानुमती’, ‘मायावती’ तथा सती ‘रेणुका‘ – जो परशुराम की माता हैं और बलरामजननी ‘रोहिणी’
तथा ‘एकनन्दा’—जो श्रीकृष्ण की बहन पतिव्रता ‘दुर्गा’ नाम से प्रसिद्ध हैं- इत्यादि प्रकृति देवी की असंख्य कलाएँ भारतवर्ष में विख्यात हैं । इसी प्रकार जो-जो ग्राम-देवियाँ हैं, वे सभी प्रकृति की कलाएँ हैं। समस्त विश्व में जितनी स्त्रियाँ हैं, वे सभी तो प्रकृति-कला के अंशांश ही है। इसलिय स्त्रियों के अपमान से प्रकृति देवी का अपमान होना समझना चाहिये। अतः स्त्रियों का समादर सब देशों में होता है, विशेष करके सौभाग्यवती एवं पुत्रवती ब्राह्मणी देवी के समान ही पूजनीया है। उसकी पूजा से मूलप्रकृति की पूजा का फल मिलता है। तात्पर्य यह कि जिसने अष्टवर्षीया कुमारी का वस्त्रालंकार चन्दनादि से पूजन कर लिया, मानों उसके द्वारा भगवती प्रकृति देवी स्वतः प्रपूजित हो गयीं; क्योंकि उत्तम, मध्यम, निकृष्ट-प्रायः स्त्रियाँ प्रकृति की अंशांशी भाव से एक अंग ही हैं, इसमें वर्ण या जाति का विभेद नहीं है।

उपर्युक्त स्त्रियों में जो श्रेष्ठ आचरणवाली पतिव्रता स्त्रियाँ हैं, वे प्रकृति देवी की सत्त्वांशा हैं, इनको उत्तम एवं पूज्या समझना चाहिये। परन्तु जिनको भोग ही प्रिय हैं, वे प्रकृति देवी के राजस अंश से उत्पन्न मध्य श्रेणी की मानी गयी हैं । जो स्त्रियाँ ऐहिक सुख भोगने के लिये विवश होकर सर्वदा अपने कार्य में लगी रहती हैं, वे प्रकृति देवी के तामस अंश से उत्पन्न होने के कारण ‘अधम’ श्रेणी की कही गयी हैं, उनके कुल का कुछ पता नहीं रहता, वे दुर्मुखी, धूर्त्ता, स्वेच्छाचारिणी एवं कलही होती हैं, वे भूमण्डल पर ‘कुलटा’ कही जाती हैं। ऐसी पुंश्चली स्त्रियाँ भी उसी प्रकृति के तामस-अंश से उत्पन्न कही गयी हैं।
हे नारद! इस प्रकार मैंने प्रकृति के समस्त रूपों का विवेचन कर दिया । इस परम पवित्र ‘भारतवर्ष’ में विशेषकर सभी शक्तियाँ पूजित एवं सम्मानित हुई हैं। उनमें प्रधान देवी ‘दुर्गा’ हैं—जो दुर्गतिका नाश करती हैं-राजा सुरथ ने सर्वप्रथम उनकी उपासना की है । उनके बाद रावण के वधार्थ श्रीरामचन्द्रजी ने उन भगवती दुर्गा की आराधना की। तत्पश्चात् जगज्जननी भगवती तीनों लोकों में पूजी जाने लगीं । सर्वप्रथम वह मूलप्रकृति अपने प्रधान अंश से महाराज दक्ष के यहाँ अवतरीं, जो शिव से ब्याही थीं, वहाँ दैत्यों का वध करके अपने स्वामी का अपमान देखकर, उन्होंने दक्ष यज्ञ में अपना शरीर त्याग दिया। तत्पश्चात् वे पुनः हिमालय की पत्नी के उदर से उत्पन्न हुईं। उस समय भी उन्होंने शिव को ही अपना पति बनाया। इन पार्वती के दो पुत्र जन्मे—’गणेश’ और ‘स्कन्द’। उनमें गणेश को साक्षात् परमात्मा श्रीकृष्ण माना जाता है और ‘स्कन्द’ विष्णु के अंश से उत्पन्न हैं ।
हे नारद! इसके बाद महाराज ‘मंगल’ ने सर्वप्रथम ‘लक्ष्मी’ की आराधना की है। तदनन्तर तीनों लोकों में देव, दानव एवं मानवों (ऋषियों) ने इनकी पूजा-अर्चना की। महाराज अश्वपति ने सर्वप्रथम ‘सावित्री’ (गायत्री) का अनुष्ठान किया। तत्पश्चात् सुर-मुनियों ने सावित्री का अनुष्ठान किया। सर्वप्रथम ब्रह्मा ने ही सरस्वती का समाराधन किया। इसके बाद ये देवी तीनों लोकों में देवताओं एवं मुनियों द्वारा पूजित हुईं। इसी प्रकार ‘राधा’ देवी की सर्वप्रथम पूजा गोलोक में रासमण्डल के अवसर पर हुई है। कार्तिक की पूर्णिमा को निशीथ में सर्वप्रथम भगवान् श्रीकृष्ण ने गोप-गोपियों, गोपकुमारों तथा कुमारियों के साथ ‘रास’ रचाया था, जिसमें राधा की पूजा हुई थी ।
गौवों से सुशोभित उस गोलोक में श्रीकृष्ण भगवान् की आज्ञानुसार ब्रह्मादि देवता एवं मुनिगण बड़े आनन्दोत्साह के साथ भक्तिपूर्वक पुष्प-फल, धूप-दीप आदि सामग्रियों से उनकी (राधा-कृष्ण की) पूजा-स्तुति करने लगे। तत्पश्चात् सुयज्ञ राजा ने पृथ्वी में उस ‘राधा’ देवी का पूजन किया । इस पुण्य क्षेत्र भारतवर्ष में भगवान् शंकर के उपदेश से सबने राधा की उपासना की। तत्पश्चात् श्रीकृष्ण भगवान् के आदेशानुसार मुनिगण पुष्प एवं धूप आदि पूजा-द्रव्यों से भक्तिपूर्वक इनकी पूजा में संलग्न हो गये। अर्थात् जो-जो कलाएँ उत्पन्न हुईं हैं, उन सबकी भारतवर्ष में पूजा होती है और होनी चाहिये। हे देवर्षि नारद! तभी से सर्वत्र गाँवों एवं नगरों में भी उन-उन स्थानीय देवियों की भी पूजा होने लगी। इस प्रकार भगवती मूलप्रकृति का समस्त शुभ चरित्र मैंने तुम्हें सुना दिया। वे सभी वैदिक लक्षणों से युक्त हैं। अतः इसके बाद अब क्या सुनने की इच्छा है?
क्या आप जानते हैं?
श्रीमद्देवीभागवत के अनुसार मूल प्रकृति कौन हैं? (उत्तर: भगवती दुर्गा)
मनसा देवी और भगवान शिव का क्या संबंध है? (उत्तर: वे शिवजी की शिष्या हैं)
महाकाली का प्रादुर्भाव कैसे हुआ? (उत्तर: वे दुर्गा जी के ललाट से प्रकट हुईं)
“आगामी भाग ३ में हम जानेंगे कि माँ भगवती को प्रसन्न करने की सरल विधि क्या है? साथ ही, हम विस्तार से चर्चा करेंगे कि माँ दुर्गा (मूल प्रकृति) के किन विशिष्ट रूपों के पूजन से कौन सी मनोकामनाओं की शीघ्र पूर्ति होती है। माता के इन रूपों के पीछे छिपे उन गुप्त रहस्यों को जानकर आप सरलता से उनकी दिव्य कृपा प्राप्त कर सकते हैं। जुड़े रहिये धर्म सनातन के साथ!”
Reference:
1 . श्रीमद देवीभागवत महापुराण ; ९ वां स्कंध, प्रथम अध्याय; सम्पादक तथा टीकाकार – श्री विद्या भास्कर पंडित सरयू प्रसाद शास्त्री “द्विजेन्द्र” (गार्ग्यमुनि) काव्यतीर्थ, साहित्यरत्न, साहित्याचार्य, प्रकाशक – रुपेश ठाकुर प्रसाद प्रकाशन, कचौड़ीगली, वाराणसी -२२१००१,
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