भगवान् की कृपा धन, संपत्ति, ऐश्वर्य, वैभव, मान-सम्मान, पदवी, प्रतिष्ठा आदि नहीं है!

जी हाँ ! यह तो आपके ही कर्मों का फल है, आवश्यक नहीं की वर्तमान जन्म के कर्मों का फल , पूर्व जन्म के कर्मों के कारण भी ये फल किसी-किसी को जन्म से ही प्राप्त हो सकते हैं या जीवन काल में प्रारब्ध अनुसार कभी भी प्राप्त हो सकते हैं।
जीवन में सुख, समृद्धि और सफलता की प्राप्ति को अक्सर लोग भगवान् की कृपा मान लेते हैं। यह एक सामान्य धारणा है। परन्तु, जब हम सनातन धर्म के गूढ़ शास्त्रों और संतों के वचनों का अवलोकन करते हैं, तो पाते हैं कि भगवान् की वास्तविक कृपा के लक्षण संसार के मापदंडों से पूर्णतः विपरीत हैं।
भौतिक सफलता: भगवान् की कृपा नहीं, अपने ही कर्मों का फल होता है
धन-वैभव, उच्च पदवी, प्रतिष्ठा—यह सब प्रारब्ध (पूर्व या वर्तमान जन्म के कर्मों) के अनुसार प्राप्त होते हैं। इसे “कृपा” मानना एक सांसारिक भ्रम है। भगवद् गीता का सिद्धांत स्पष्ट है: भौतिक जगत में मिलने वाला सुख और दुःख, दोनों ही कर्म-फल के अधीन हैं। यदि आपको बहुत सुख मिल रहा है, तो यह आपके शुभ कर्मों का परिणाम है।
भगवान् की कृपा का अर्थ क्या है? और कृपा (अहेतुक) सिर्फ भगवान् ही कर सकते हैं !
मूल सिद्धांत: कृपा केवल वही कर सकता है जो परिपूर्ण (Complete) है और जिसका कोई स्वार्थ शेष नहीं है।
संसार में प्रत्येक व्यक्ति माया-बद्ध है उसका हर कार्य, दान, सेवा आदि अपनी आनंद (सुख) पाने की इच्छा से प्रेरित होता है। यह स्वार्थ है, इसलिए यह वास्तविक कृपा नहीं हो सकती। अर्थात न आप कृपा करते हैं, न कोई और आप पर कृपा करता है। सांसारिक कृपा का आदान-प्रदान किसी न किसी स्वार्थ से ही किया जाता है इसीलिए असली कृपा तो सिर्फ भगवान् ही करते हैं , सिर्फ वो ही कर सकते है। और सांसारिक कृपा जो हम समझते हैं की कृपा है वह कृपा है ही नहीं वह आपके पूर्व जन्म के या इस जन्म के शुभ कर्मो का फल है।
संत भी परिपूर्ण हैं, अतः वे भी भगवान् की ही तरह भगवन के प्रताप से अहेतुकी कृपा करने में समर्थ होते हैं
वास्तविक कृपा का अटल चिह्न: सत्संग और सद्गुण
भौतिक हानियों के बीच भी, यदि कोई व्यक्ति भगवान की ओर उन्मुख हो रहा है, तो यह भगवान् की कृपा का सबसे मधुर और निश्चित लक्षण है अर्थात – सत्संग की प्राप्ति।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है: बिनु सत्संग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई ॥
सत्संग के बिना विवेक (सत्य-असत्य, गलत सही का ज्ञान) प्राप्त नहीं होता, और वह सत्संग भी श्री रामजी की कृपा के बिना सहज में प्राप्त नहीं होता।
भगवान के प्रसन्न होने के सकारात्मक लक्षण
हमें यह पता लगाने के लिए कि भगवान हमसे प्रसन्न हैं या नहीं, किसी बाहरी संकेत की आवश्यकता नहीं है, अगर आपके अंदर ये लक्षण हैं तो ये स्पष्ट संकेत है की भगवान् की खूब कृपा आप पर हो रही है ।
- भगवान् की कथा सुनने में रूचि बढ़ने लगे – सबसे महत्वपूर्ण लक्षण
- सत्कर्म: जब हमारा मन अच्छे कामों में लगने लगे
- संत प्रेम: जब हमें संत प्रिय लगने लगे, और संतो का दर्शन सानिध्य प्राप्त हो
- शास्त्र में विश्वास: जब हमें शास्त्र के वचन पूर्ण श्रद्धा विश्वास पूर्वक सत्य लगने लगे
- सर्वत्र सेवा: जब हमें बुजुर्गों में भगवान की भावना करके सेवा करने में सुख मिलने लगे, पशु-पक्षियों में भी भगवान की भावना आने लगे
यह मन का झुकाव ही सबसे बड़ा प्रमाण है कि भगवान् की कृपा आप पर पूर्ण रूप से बरस रही है
भगवान् की एक कृपा ऐसी भी जिसमें भक्त का सब संसार नष्ट हो जाता है
जब भगवान किसी भक्त पर विशेष कृपा करते हैं, तो यह सांसारिक दृष्टिकोण से ‘विपत्ति’ या ‘हानि’ के रूप में प्रकट होती है।
श्रीमद भागवत में भगवान् कहते हैं –
यस्याहमनुगृह्णामि हरिष्ये तद्धनं शनैः। ततोऽधनं त्यजन्ति अस्य स्वजना दुःखदुःखितम्॥
“जिस पर मैं अनुग्रह (विशेष कृपा) करता हूँ, उसकी धन-संपत्ति को धीरे-धीरे हरण कर लेता हूँ। उसके बाद, जब वह धनहीन और दुःख-पर-दुःख से पीड़ित होता है, तो उसके अपने ही लोग (स्वजन) उसका त्याग कर देते हैं।” एक प्रसंग में भगवान श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी जी से कहा है कि धनी-मानी लोग मेरा भजन इसलिए नहीं करते, क्योंकि उन्हें डर रहता है कि कहीं मैं धन छीनने वाली कृपा न कर दूँ। जब तक मन में यह भाव है कि “धन के बिना काम नहीं चलेगा,” तब तक भगवत् प्रेम मिलना कठिन है।
इस प्रकार की कृपा भगवान् सब पर नहीं करते जो इस कृपा के अधिकारी होते हैं और सह सकते हैं उनको ही ऐसी कृपा प्राप्त होती। आमतौर पर यह सुनकर लोगो को भय हो जाता है, इस कारण भी महात्मा गण इस प्रकार की कृपा पर अधिक विस्तार नहीं करते। आपको भय करने की आवश्यकता नहीं है , इस कृपा से भगवत प्राप्ति अत्यंत सुलभ हो जाती है, भक्त भगवान् का प्रेम प्राप्त करता है जिसके बाद उसे कुछ भी प्राप्त करना नहीं होता। यही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है !
विडंबना यही है कि हम सारा जीवन उस चीज़ के पीछे भागते रहते हैं जो हमारे प्रारब्ध अधीन है और बिना प्रयास के प्राप्त होगी ही ।
कोई व्यक्ति अत्यंत बुद्धिमान, मेहनती, सक्षम, प्रतिभाशाली होता है… पर फिर भी धन, पद, सफलता उसके जीवन में नहीं आती। तो वहीं कोई दूसरा व्यक्ति — बिना विशेष प्रयास के — वह सब पा लेता है जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता।
क्यों?
क्योंकि यह सब प्रारब्ध का खेल है। हमारा जन्म, परिवार, आर्थिक स्थिति, प्रतिष्ठा, अवसर — ये सब पहले से तय होकर आया है। लेकिन असली प्रश्न यहाँ यह नहीं है कि “प्रयास करें या न करें।” क्योंकि प्रयास करना भी हमारा ही स्वभाव (स्वधर्म) है, और वही प्रारब्ध की गति को बदल भी सकता है।
असली प्रश्न यह है — कि हम प्रयास किस चीज़ में लगा रहे हैं?, जहाँ ज्यादा लगाना चाहिए वहां नहीं लगा रहे !
अति–दुर्लभ मनुष्य योनि हमें किसलिए मिली है?
देवताओं के पास अनंत सुख है, पर वे मोक्ष नहीं पा सकते।
तिर्यक योनियाँ (पशु-पक्षी) अपनी प्रवृत्तियों से बंधी हैं — वे भी मोक्ष नहीं पा सकते। नीचे की योनियों में तो पीड़ा ही पीड़ा है — वहाँ मुक्ति का प्रश्न ही नहीं उठता। केवल मनुष्य-योनि सीधे भगवान को पाने का मार्ग देती है।
यह एकमात्र जन्म है जहाँ—
- संशय करने की शक्ति है
- जिज्ञासा करने की शक्ति है
- धर्म समझने की शक्ति है
- श्रद्धा जागने की शक्ति है
- और सबसे महत्वपूर्ण — अपने कर्मों को बदलने की शक्ति है
मोक्ष, भगवान की प्राप्ति — ये प्रारब्ध पर निर्भर नहीं होते. यह केवल पुरुषार्थ (स्वयं के प्रयास) पर निर्भर है। यही वह रहस्य है जिसे हम जीवन भर समझते ही नहीं। हम सारा जीवन शरीर के भोगों को प्राप्त करने के लिए दौड़ते हैं —ऐसी सांसारिक वस्तुओं के लिए जो हर क्षण नष्ट हो रही है; दुर्लभ मनुष्य जन्म हमें भगवान् को प्राप्त करने के लिए मिला है, शास्त्रों के अनुसार जिसे पाना सबसे आसान है, और केवल मनुष्य देह के द्वारा ही संभव है, उसके लिए हम प्रयत्न ही नहीं करते ।
भगवान् से भगवान् को ही मांगे तो वो मिल जायेंगे, सम्पूर्ण शरणागति से !
सांसारिक सुख की कामनाएं भगवान् की कृपा होते हुए भी उसका अनुभव नहीं होने देती, क्योंकि भगवान् माया को स्वयं दूर नहीं करते जब तक मनुष्य पूर्ण रूप से उनके शरण में न आये (सम्पूर्ण शरणागति)।
इसलिए भगवान् से सांसारिक वस्तुएँ न मांग कर उनसे उनको ही माँगना चाहिए। यह एक बहुत साधारण सा लगने वाला कार्य होते हुए भी बहुत जटिल है और बिना भगवान् या संतों की कृपा के ऐसा भाव बनना बहुत कठिन होता है , क्योंकि सभी मनुष्य भगवान् से कुछ प्राप्त करने की कामना से ही उनका भजन पूजन करतें हैं भगवान को प्राप्त करने के लिए नहीं।
सम्पूर्ण शरणागति क्या है ?
भगवान् के सिवाय और किसी का भी आश्रय न हो शरणागति के नियम :पूर्ण शरणागति के छह सूत्र
शास्त्रों में शरणागति के छह अंग बताए गए हैं, जिन्हें जीवन में उतारना ही पूर्ण समर्पण है:
- आनुकूल्यस्य संकल्पः (अनुकूल संकल्प): यह दृढ़ निश्चय करना कि हम केवल वही कार्य करेंगे जो भगवान् और शास्त्रों के अनुकूल हैं।
- प्रातिकूलस्य वर्जनम् (प्रतिकूल का त्याग): उन सभी निषिद्ध कर्मों, विचारों, या छल-कपट (मोह-कपट छल-छिद्र) का पूर्ण त्याग करना जो भगवान् को प्रतिकूल हैं। भगवान् को हमारा धन नहीं, बल्कि निर्मल मन चाहिए।
- रक्षिष्यतीति विश्वासः (रक्षा का दृढ़ विश्वास): यह अटल विश्वास रखना कि “भगवान् हमारी रक्षा करेंगे ही।” भगवान् ने स्वयं गीता में कहा है—योगक्षेमं वहाम्यहम्।- हम संसार के झूठे वादों पर विश्वास करते हैं, पर भगवान् के इस वचन पर नहीं करते।
- गोप्तृत्वे वरणम् (रक्षक रूप में वरण): भगवान् को अपना एकमात्र रक्षक (पति) मान लेना, जैसे विवाह के बाद कन्या अपना गोत्र त्यागकर पति का गोत्र स्वीकार करती है। यह स्वीकारोक्ति ही शरणागति की दीक्षा है।
- आत्म-निक्षेप (स्वयं को सौंप देना): अपने-आपको पूरी तरह भगवान् के हाथों में सौंप देना, जैसे एक डंडे की तरह (दंडवत) या जलधारा में बहते तिनके की तरह। यह भाव कि अब मेरा उत्थान और पतन, सब प्रभु की इच्छा पर निर्भर है।
- कार्पण्यम् (दीनता): दीनता ही शरणागति का अंतिम और सबसे प्रिय अंग है। पूज्य हनुमान जी की तरह, जो सकलगुणनिधान होकर भी स्वयं को “कपि चंचल सबहिं बिधि हीना” कहते हैं। जो जितना अबोध और दीन बनकर रहेगा, ठाकुर जी उस पर उतना ही ध्यान केंद्रित करेंगे।
References:
- http://youtube.com/watch?v=Z0AItSyFjlw
- https://www.youtube.com/shorts/DEbKRTDI–8
- https://www.youtube.com/watch?v=n9_ZofWZGM0
- https://www.youtube.com/watch?v=0a1OCeqJSdo
- https://www.youtube.com/shorts/B747_OubuHg
- https://www.youtube.com/shorts/UwKwZt4LSzI
- https://www.youtube.com/shorts/0XehWAUSC6k
- https://www.youtube.com/watch?v=pB7jA93BPgY&t=385s
(dharm arth kaam moksha, & dangerous krupa)
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