शास्त्रों में वर्णित सरल उपायों के बाद भी मोक्ष असंभव क्यों है?
सर्वप्रथम हम मोक्ष का अर्थ समझेंगे तत्पश्चात शास्त्रों में मोक्ष प्राप्ति के अनेक सरल उपाय बताये गए हैं उनको ऊपर विस्तृत चर्चा करेंगे। अगर शास्त्रों के अनुसार मोक्ष पाना इतना सुलभ है तो हम “मोक्ष असंभव क्यों है ?” क्यों कह रहे हैं?
मोक्ष का साधारण अर्थ जो हम समझते हैं
मुक्ति, कैवल्य (सांख्य योग) निर्वाण (बौद्ध) निःश्रेयस (न्याय), अमृतत्व (उपनिषद) आदि मोक्ष के अनेक नाम हैं ।
मोक्ष या मुक्ति का साधारण अर्थ जो हम समझते हैं : सभी प्रकार के दुःखों, बंधनों, इक्षाओं और वासनाओं से छुटकारा पाना लेकिन यह एक पारिभाषिक दार्शनिक शब्द है जिसका अर्थ है सदा-सदा के लिए जन्म मरण (पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी जठरे शयनं) के दुःसह दुःखपूर्ण बंधन से मुक्त हो जाना ।
दूसरे शब्दों में मुक्ति या सभी दुःखों से निवृति तभी संभव है जब हमारा जन्म मरण का प्रवाह समाप्त हो जाये … इस परिभाषा के अनुसार मोक्ष सिर्फ तभी संभव है जब भगवान् की प्राप्ति हो जाये ।
मोक्ष क्यों समझ में नहीं आता आसानी से ?
- क्योंकि मोक्ष के बारे में सभी वक्तव्य निम्नलिखित कठिन (विद्वानों के लिए सरल)भाषा में होते है ।
“भारतीय दार्शनिक चिन्तन परम्परा में मोक्ष परम साध्य अवश्य रहा है, परन्तु मोक्ष के स्वरूप को लेकर उनमें मतैक्य नहीं है। कोई इसे ज्ञान की, चरमावस्था मानता है, तो कोई इसे सुख-दुःख से परे परमानन्द की अवस्था कहता है, कोई इसे भवचक्र से मुक्त अभयम्, अजरम्,, अमृत्युपदम् की अवस्था मानता है, तो कोई इसे कार्य-कारण श्रृंखला से मुक्त नित्य और सर्वव्यापक कहता है, तो कोई इसे पुद्गल विनाश मानता है, तो कोई इसे अनिर्वचनीय कहता है। इस मतवैभिन्य के बाद भी प्रायः सभी इस विचार से सहमत हैं कि मोक्ष की अवस्था ज्ञान की अवस्था है, जिसमें मानव को आध्यात्मिक, आधिभोतिक एवं आधिदैविक दुःखों से पूर्णतया मुक्ति मिल जाती ………”।
जब कोई विषय समझ नहीं आये या शंका या अविश्वास हो ….जैसे परलोक, स्वर्ग, नर्क, पुनर्जन्म इत्यादि तब शास्त्रों में लिखे वाक्यों को ही सत्य मान उसपर श्रद्धा करनी चाहिए । सर्वोपरि शास्त्रों का सार भगवान् की वाणी भगवत गीता है। दूसरा सबसे विश्वसनीय श्रीमद भागवत पुराण जो स्वयं भगवान ही हैं । तो हम भी शास्त्रीय वाणी / संत वाणी से ही मोक्ष समझेंगे।
- मोक्ष न समझ में आने का, दूसरा कारण है श्रद्धा-विश्वास की कमी, शास्त्रों के बारे में अज्ञान, और कोई ऐसा द्रष्टान्त नहीं की मृत्यु के बाद किसी ने आकर बताया हो की उनको मोक्ष प्राप्ति हो गयी।
शास्त्रों में वर्णित मोक्ष प्राप्ति के सुनने में अत्यंत सरल प्रतीत होने वाले उपाय
- भगवन्नाम का प्रताप: मृत्यु के समय यदि अनजाने में भी मुख से भगवान का नाम निकल जाए, तो जीव तत्क्षण मुक्त हो जाता है।
- मोक्षदायिनी सप्त-पुरियां : अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, कांची, अवंतिका (उज्जैन) और द्वारावती (द्वारका)—इन सात पवित्र पुरियों में से किसी भी स्थान पर यदि शरीर छूट जाए, तो उस पुरी के प्रभाव से जीव को मोक्ष मिल जाता है।
- पतित पावनी गंगा की महिमा: कोई व्यक्ति कहीं भी मरा हो, यदि उसका अंतिम संस्कार गंगा तट पर हो और उसकी चिता की राख गंगा जल को स्पर्श कर ले, तो उसे मुक्ति मिल जाती है। जैसे राजा सगर के भस्म हुए पुत्रों को केवल गंगाजल के संस्पर्श से मोक्ष मिल गया था। शास्त्रों में स्पष्ट उद्घोष है—”गंगे तव दर्शनात मुक्तिः” (गंगा के दर्शन मात्र से मुक्ति) और “काश्याम मरणान मुक्तिः” (काशी में प्राण त्यागने से मुक्ति)।
- पवित्र वस्तुओं और संतों का संग: मृत्यु के समय गले में तुलसी की माला हो, या किसी परम भगवद्भक्त (संत) की कृपादृष्टि या स्पर्श जीव पर पड़ जाए, तो वह तत्काल मुक्त हो जाता है।

इस सूची को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि मुक्ति पाना बहुत सरल है। परंतु यहीं पर मुख्य आध्यात्मिक मोड़ आता है, जो हमें यह सोचने पर विवश करता है कि व्यावहारिक रूप से मोक्ष असंभव क्यों है?
दार्शनिक वास्तविकता: आखिर मोक्ष असंभव क्यों है?ऊपर बताए गए सभी साधन सत्य और अकाट्य हैं, परंतु आधुनिक मनुष्य की आंतरिक स्थिति, उसकी मानसिकता और प्रकृति के नियम इन साधनों के मार्ग में ऐसी बाधाएं खड़ी करते हैं कि मोक्ष लगभग असंभव हो जाता है।
इसके निम्नलिखित मुख्य कारण हैं:
1. प्रारब्ध कर्म का कठोर नियंत्रण हम चाहे कितनी भी योजना बना लें कि हम अंतिम समय में काशी चले जाएंगे या गंगा तट पर रहेंगे, परंतु मृत्यु का समय और स्थान पूरी तरह से हमारे प्रारब्ध कर्म के अधीन है। प्रारब्ध की गति इतनी प्रबल है कि इसके आगे ज्ञानी और अज्ञानी सबको झुकना पड़ता है। (उदाहरणार्थ जब महाराज युधिष्ठिर और साक्षात भगवान कृष्ण के सखा अर्जुन जैसे धर्मात्माओं को प्रारब्ध के कारण दुःसह कष्ट भोगने पड़े, तो साधारण मनुष्य की क्या बिसात है? अंतिम समय में बुद्धि मतिभ्रम का शिकार हो जाए, या जीव किसी ऐसी जगह हो जहाँ पवित्र वातावरण न हो, यह सब प्रारब्ध तय करता है। इसलिए अंतिम समय में “सहज मोक्ष” की परिस्थितियां बनना स्वयं में असंभव जैसा है)।
2. सांसारिक कामनाओं और वासनाओं का जाल :
शास्त्रों के अनुसार, प्राण रहते हुए सभी कामनाओं का चले जाना ही वास्तविक “मुक्ति” है । यदि मन में एक भी इच्छा शेष रही और प्राण चले गए, तो उसे केवल “मृत्यु” कहा जाएगा और पुनः जन्म लेना ही पड़ेगा । आगे बाजार का दृष्टांत: इस सिद्धांत को बहुत अच्छे से समझाता है ।
आज का मनुष्य ईश्वर के पास भी सांसारिक सुख, नौकरी, बीमारी से मुक्ति या मुकदमों में जीत जैसी कामनाएं लेकर जाता है, मृत्यु के समय भी अनेकों अपूर्ण कामनाएं सभी के मस्तिष्क में होती हैं तो भगवान् का स्मरण असंभव होता है। जब तक हमारी भक्ति सकाम (व्यावसायिक) है, तब तक मोह का क्षय नहीं हो सकता (मोक्ष यानी मोह का क्षय), और मोह का क्षय न होना ही यह सिद्ध करता है कि मोक्ष असंभव क्यों है।
मृत्यु के उपरांत वाला मोक्ष चाहते है ? या जीवित रहते हुए मोक्ष की प्राप्ति ?
कामनाएं / इच्छाएं रहते हुए प्राण चले जाएँ तो “मृत्यु” हो गयी, फिर जन्म लेना पड़ेगा।
प्राण रहते सभी कामनाएं चली जायें “मुक्ति” हो गयी।
उदाहरण से समझें :
बाज़ार से सामान खरीदने गए और पैसे ख़त्म हो गए सामान सब नहीं खरीद पाए तो दुबारा बाजार आना पड़ेगा …(पुनर्जन्म लेना पड़ेगा), पैसे हैं पर कुछ लेना बाकी नहीं रहा तो बाजार दुबारा क्यों आना ?
जो इस जीवन में मुक्त नहीं होता वह मरने के बाद भी मुक्त नहीं होता। जो मनुष्य यह मानता है मुक्ति अभी नहीं मिली मरने के बाद मिलेगी वह स्वयं को धोखा देता है।
वैदिक दर्शन में मोक्ष
मोक्ष यानी बंधनों से छुटकारा, तो बंधन क्या है ?
पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी जठरे शयनं–
जन्म मरण के चक्र को ही बंधन कहते हैं। हम बार-बार जन्म लेते हैं और बार-बार मरते हैं , या अगर ये कहें की हम जन्म लेते हैं मरने के लिए और मरते हैं फिर से जन्म लेने के लिए तो बिलकुल सत्य होगा, भगवत गीता में भगवान् के वचन हैं-
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । (2/27) – अर्थात जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है, और मरे हुए का जन्म निश्चित है
जन्म मरण के चक्र से छुटकारा भगवान् की कृपा से ही मिल सकता है…

एक प्रकार का मोक्ष ऐसा भी होता है !
आपका कोई अस्तित्व ही नहीं रहता ! अर्थात उदाहरण के लिए आप (की जीवात्मा) एक जल की बूंद हैं, और आपको समुद्र में डाल दिया जाए या मिला दिया जाए तो एक प्रकार का कैवल्य (एकत्व, सायुज्य ) मोक्ष हो गया आपको अब भगवान् के अलावा और कोई नहीं वापस अस्तित्व में नहीं ला सकता
क्या आप चाहेंगे की आपको यह मोक्ष प्राप्त हो जाए जिसमें आपका अस्तित्व ही न रहे, न शरीर, न इन्द्रियां ?

मनुष्य जीवन का लक्ष्य ?- चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष
मनुष्य जब फल की इच्छा से कोई कर्म करता है तो उसे पुरुषार्थ कहते हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चार पुरुषार्थ हैं। इन चारों पुरुषार्थों के मूल में धर्म है । शास्त्रों में मोक्ष प्राप्ति मनुष्य का परम लक्ष्य माना गया है , इसी कारण से मोक्ष को परम पुरुषार्थ कहा गया है ।
चार पुरुषार्थों (धर्म अर्थ काम मोक्ष) को दो भाग में विभक्त किया है, पहला धर्म और अर्थ एवं दूसरा काम और मोक्ष।
काम का अर्थ है सांसारिक सुख की कामनाएं और मोक्ष का अर्थ है सांसारिक कामनाओं बंधनो और दुःख से मुक्ति
इन दो पुरुषार्थों काम और मोक्ष को प्राप्त करने के साधन हैं धर्म और अर्थ
अर्थ से काम और धर्म से मोक्ष साधा जाता है , साथ ही धनोपार्जन भी धर्मानुकूल होकर ही करना चाहिए, अधर्म पूर्वक कमाए धन से कामनाएं नहीं पूर्ण होतीं
धर्म –चारों पुरुषार्थों के मूल में धर्म है सभी पुरुषार्थ धर्म पूर्वक करने पर ही साधे जा सकते हैं। धर्म पालन में वर्णानुसार धर्म पालन का भी महत्त्व है विशेषकर कलयुग में जहाँ लोगों को ज्ञान ही नहीं है की उनका क्या वर्ण है और उन्हें क्या करना चाहिए क्या नहीं। विदेशी शिक्षा पद्दति में पढाई लिखाई ने सभी संस्कारों और वर्ण-धर्म आदि ज्ञान को लुप्त कर दिया है।
अर्थ – भौतिक सुख समृद्धि को पाने के लिए धन का होना आवश्यक है , गृहस्थ धर्म में आने के पहले शास्त्रों में निर्देश है की सभी को वर्णानुसार धर्म पालन करते हुए धनोपार्जन की अच्छी व्यवस्था कर लेनी चाहिए , अर्थ से ही सभी भौतिक कामनाओं और परिवार के भरण-पोषण आदि आवश्यकताओं की सिद्धि संभव है।
काम – संसार के सभी सुख काम के अंतर्गत आते है, भगवान् के वचन है की कामनाएं ही भगवत प्राप्ति में मोक्ष प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा है, कामनाएं ही बंधनों का कारण है। अगर पूरी हो जाएँ तो और लोभ बढ़ातीं है छणिक सुख प्राप्त होता है पर अंत में दुःख ही देतीं है , अगर नहीं पूरी हों तो क्रोध उत्पन्न होता है जिससे विवेक का नाश होता है और मनुष्य अधर्म पूर्वक आचरण करता है , नए बंधनों में पढता है ।
मोक्ष – मोह का क्षय होना ही मोक्ष है क्योंकि मोह ही बंधन का कारण है, और मोक्ष का शाब्दिक अर्थ मुक्ति.. अथवा बंधनों से मुक्ति है। मोह से, बंधनो से मुक्ति आसान नहीं है, बिना भगवान् की कृपा से मुक्ति नहीं मिलती इसीलिए मोक्ष प्राप्ति के इक्षुक मनुष्य को भगवान् की प्रसन्नता पाने और उनके प्रति प्रेम हो इसके लिए संघर्ष करना चाहिए साधन करना चाहिए , भगवान् की प्राप्ति हो गयी तो मोक्ष हो गया।
मोक्ष के प्रकार
मोक्ष प्राप्ति के शास्त्रों में कई प्रकार कहे गए है , मनुष्य सभी बंधनों दुखों से सदा सदा के लिए छुटकारा पा जाता है और अप्राकृत दिव्य देह प्राप्त कर भगवान् के लोक में निवास सुखपूर्वक निवास करता है। प्रेमी-भक्तों के लिए ४ प्रकार के मोक्ष हैं।
सालोक्य: भगवान् के लोक में निवास
सामीप्य : भगवान् की सन्निधि में निवास
स्राष्टी: भगवान् के लोक में उनके ही सामान ऐश्वर्य और निवास
सारूप्य: भगवान् के सामान रूप की प्राप्ति
एक मोक्ष जो “सायुज्य” कहलाता है उसमे भगवान् में विलीन हो जाते हैं यह कुछ ज्ञानी भक्तो को अभीष्ट होता है, सायुज्य मोक्ष में शरीर इन्द्रीओं से विहीन होने के कारण जीवात्मा का कोई अस्तित्व नहीं रहता

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