भाग 1
भाग २ में हम युग की विशेषताएं, उसके कारण, और उसके जीवों पर प्रभाव जानेंगे
युगों की विशेषताएं जानना आवश्यक है-
- भाग १ में हमने युगों के बारे में, उनकी (युगों की) आयु आदि के बारे में, और सनातन धर्म में सभी पूजन कार्य और कर्मकांड के अंतर्गत वाले सभी कर्मों में संकल्प मन्त्र का महत्व आदि जाना।
- संकल्प काल-विवरण से आरंभ होता है और उसी काल-विवरण में ही सृष्टि के अनेक रहस्य छुपे हुए हैं , चार युगों की आयु, अलग-अलग युगों में जन्म लेने वाले जीवों की विशेषताएं जानने से हमारी बहुत सी शंकायें दूर होती हैं, पुराणों की कथाओं में जो चमत्कारी और विस्मित करने वाले प्रसंग हैं वो समझ में आने लगते हैं, उससे श्रद्धा-विश्वास पुष्ट होता हैं ।
- भाग १ में हमने यह भी जाना की ब्रह्मा जी के एक दिन में १४ मन्वंतर होते हैं ७१ बार चतुर्युगी बीतने पर एक मन्वंतर बीतता हैं और हर मन्वंतर परिवर्तन में इंद्र, मनु, सप्तऋषि आदि बदल जाते हैं। इसी प्रकार वर्तमान में श्वेत वाराह कल्प चल रहा हैं। असंख्य कल्प पहले बीत चुके हैं। अलग-अलग कल्प में और मन्वंतर में अक्सर कथाओं में कुछ अंतर होता हैं जिसको हम कल्प-भेद (मन्वंतर भेद) के नाम से सम्बोधित करते हैं।
- कल्प और मन्वंतर आदि इतने विशाल समय काल हैं की कथाओं में भेद होने स्वाभाविक भी है ।
- युग की विशेषताओं में प्रमुख विषय – तपस्या, वेद–ज्ञान, बल, प्रज्ञा–शक्ति, प्राण–शक्ति, और आयु
आधुनिक युग में विकास-वाद, सनातन सिद्धांत में ह्रास-वाद!
- प्रज्ञा-शक्ति , प्राण-शक्ति, आयु आदि सतयुग की तुलना में त्रेता युग में कम हो जाती है, त्रेता की उपेक्षा द्वापर में क्षय होता है और कलियुग में सबसे ज्यादा क्षय हो जाता है।
- सतयुग में उत्पन्न मनुष्यों को मानसी सिद्धि प्राप्त थी, वृक्षों के द्वारा उन्हें अपने उपयोग के लिए भोजन वस्त्रादि प्राप्त हो जाते थे। बल और युवावस्था बनाये रखने के लिए औषधियां आदि भी वृक्षों से ही प्राप्त हो जाती थीं, आवास आदि के लिए भी प्राकृतिक साधनो वृक्ष पर्वत कंदराओं आदि का आश्रय लेते थे। सतयुग के अंत में और त्रेता युग के आरंभ में इन सिद्धियों के नष्ट होने पर भवन निर्माण और कृषि आदि करने की प्रवृति मनुष्यों में शुरू हो जाती है।
- आधुनिक युग में विकास-वाद की दृष्टी से सुख की साधनों की वृद्धि और धन आदि का संचय को उन्नति माना जाता है। लेकिन पुराणों और वैदिक सिद्धांतों के अनुसार युगों के परिवर्तन से होने वाले विषय भोग वृद्धि को – ह्रास होना कहा जाता है, अर्थात तपस्या, वेद-ज्ञान, बल, प्रज्ञा-शक्ति, प्राण-शक्ति, और आयु आदि का सतयुग की अपेक्षा त्रेता में ह्रास होता है त्रेता की अपेक्षा द्वापर में और सबसे अधिक ह्रास कलियुग में ।
- भौतिक दृष्टिकोण से जो कलाओं का प्रचार प्रसार उन्नति मानी जाती है आध्यात्मिक दृष्टी में वह क्रमिक अवनति है । क्योंकि जितना परिग्रह (संचय) बढ़ता है, उतने ही छल-प्रपंच, राग-द्वेष आदि बढ़ता है अपराध आदि बढ़ते हैं। इसलिए पाश्चात्य संस्कृति का विकास-वाद, और सनातन धर्म का ह्रास-वाद एक ही है।
युग की विशेषताएं – सतयुग
- सर्वप्रथम सृष्टि के प्रारंभ में सतयुग (या कृत-युग) होता है, सतयुग के मनुष्य अत्यंत संवेदनशील होते हैं, उनमें किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होता न ही कोई द्वन्द, ऊंच नीच का भाव या स्वार्थ ।
- वे नदियों, समुद्र और पर्वतों के निकट, कंदराओं आदि में निवास करते थे भवन घर आदि का निर्माण नहीं करते थे।। सतयुग की प्रजाएं सत्वगुण प्रधान, अपने कर्तव्यों और अधिकारों का पालन करने वाली, एकांत में प्रसन्न रहने वाली हुआ करतीं हैं। कंदमूल फल, पुष्प आदि भोजन के लिए पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होते हैं।
- सतयुग के मनुष्यों में युग के प्रभाव से अद्भुत शक्तियां हुआ करतीं थीं जो सतयुग के मनुष्यों के लिए सामान्य थीं, पर आज के युग में हम उनके बारे में पढ़ते हैं या महात्मा लोग प्रवचन में बताते हैं तो वे सब हमको चमत्कारी लगतीं हैं। जीवन यापन के लिए सभी आवश्यक वस्तुएं उन्हें ध्यान मात्र से प्राप्त हो जाया करती थीं।
- सतयुग में मनुष्यों की आयु महाभारत ग्रन्थ में ४ हज़ार वर्ष की बतायी गयी है । कल्प-भेद से कुछ ग्रंथों विभिन्न संख्या भी मिलती है । कहीं-कहीं लाखों वर्ष की आयु भी बताई गयी है । मन्त्र दृष्टा ऋषि भी सतयुग में जन्म लेते हैं जिनकी आयु बहुत होती है।
- सतयुग में सभी सामान आयु के, रोगरहित, सत्यवादी, धर्मपरायण, अलोभी, काम-क्रोध आदि वासनाओं से रहित और सुखी होते हैं ।
युग की विशेषताएं – सतयुग की तुलना में त्रेता, द्वापर और कलियुग
- सतयुग में सनातन धर्म की पूर्ण स्थिति रहती है । सतयुग को कृत युग भी कहते हैं उसका कारण है की सतयुग के जन्मे सभी मनुष्य अपने सब कर्तव्य कर्म पूर्णतयः संपन्न कर ही लेते हैं। उनके लिए कुछ भी करना शेष नहीं रहता ।
- सतयुग में भगवान् के अवतार – मत्स्य, नरसिंह, वाराह और कूर्म
- धर्म के चार पैर कहे गए हैं – सत्य, दया, तप और दान, सतयुग में धर्म इन चारों चरणों से उपस्थित रहता है ।
- इसी तरह अधर्म के भी चार पैर कहे गए हैं- असत्य भाषण, हिंसा, असंतोष (तृष्णा), कलह (द्वेष)
- सतयुग में अधर्म एक ही पैर से उपस्थित होता है और धर्म चारों पैरों से
- त्रेता में धर्म तीन चरण से और अधर्म दो चरण से
- द्वापर में धर्म दो चरण से और अधर्म तीन चरण से
- कलियुग में धर्म सिर्फ एक ही चरण से और अधर्म चारों चरण से
- श्रीमद-भागवत अनुसार त्रेता युग में अधर्म के प्रभाव से धर्म के सत्य आदि चरणों का चतुर्थांश घाट जाता है, द्वापर में अधर्म के चरणों में (झूंठ, हिंसा, असंतोष, कलह) की वृद्धि से धर्म के चारों चरणों का आधा-आधा अंश क्षीण हो जाता है। कलियुग में अधर्म के चारों चरणों के बहुत अधिक बढ़ने से धर्म केवल एक चरण से और अधर्म अपने चारों चरण से स्थिर रहता है।
युग की विशेषताएं – त्रेता युग
सतयुग की आयु पूर्ण होने और त्रेता युग प्रारंभ के संधि काल में ही युग परिवर्तन के प्रभाव दिखने लगते हैं। सतयुग के मनुष्य पर्वत कंदराओं, वृक्षों की छाया में अपना आवास बना प्रसन्नचित्त रहते थे, उनके मन में राग, द्वेष, लोभ मोह आदि नहीं होता था । त्रेता आते आते ये सभी बीज पढ़ जाते हैं, सतयुग में वर्ण व्यवस्था नहीं होती न ही उसकी आवश्यकता थी, त्रेता में वर्णाश्रम व्यवस्था शुरू हो जाती है। सतयुग से त्रेता सांध्य काल में ही तप, वेदज्ञान, बल और आयु क्षीण होने लगती है। वर्षा होनी आरम्भ हो जाती है और अनेक तरह के वृक्ष उत्पन्न होते हैं जिससे त्रेता की प्रजा का जीविका निर्वाह चलता है।
सतयुग में जो स्त्रियों में जीवन के अन्त-समय में भी गर्भ धारण की शक्ति रहती थी त्रेता युग में वह नहीं रहती। और सतयुग में मासिक धर्म नहीं रहता वह त्रेता युग में प्रारंभ हो जाता है ।
त्रेता युग के शुरूआती समय में वृक्षों से मधु आदि प्रजा के पोषण के लिए उत्पन्न होता है, किन्तु लोभ बढ़ने के कारण मनुष्य बलपूर्वक वृक्षों का शोषण करने लगे, इस आचरण से वृक्ष आदि नष्ट होने से कई बदलाव होने लगे सतयुग में जहाँ तीव्र मौसमी प्रभाव सर्दी गर्मी आदि नहीं होते थे त्रेता युग में, इन मौसमी परिवर्तनों से प्रजा को काफी क्लेश होने लगा । इन्ही कारणों से लोग घर बना कर रहने लगे, भवन और दुर्ग आदि बनने लगे, नगर और पुर आदि बसने लगे । धीरे धीरे कृषि आदि व्यापार भी शुरू हुआ, राग -द्वेष , लोभ बढ़ने से शक्तिशाली मनुष्यों ने नदी, क्षेत्रों, पर्वतों, वृक्षों औषधियों आदि को बलपूर्वक अपने अधिकार में लेना शुरू कर दिया ।
त्रेता युग में अव्यवस्था और थोड़ी अराजकता बढ़ने पर ब्रह्मा जी ने वर्ण व्यवस्था कायम की। ब्राह्मणो को शिक्षा, क्षत्रिओं को रक्षा और शासन , वैश्यों को समाज का भरण पोषण, कृषि, व्यापार आदि कार्य और इन तीन कार्यों के अलावा सभी कार्य शूद्रों के लिए निर्धारित किये ब्रह्मा जी ने फिर आश्रम व्यवस्था भी बनाई अर्थात ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम। त्रेता युग में वर्णाश्रम धर्म या सनातन धर्म की नींव ब्रह्मा जी रखते हैं।
त्रेता युग में भगवान के अवतार – वामन, राम और परशुराम
युग की विशेषताएं – द्वापर युग
त्रेता के समाप्ति और द्वापर युग के प्रारंभ होने पर प्रजाओं में परस्पर वर्णों के कार्यों भेदभाव, विपरीतता शुरू हो जाती है । यज्ञ , दंड- विधान, मद, मोह, दम्भ, क्षमा, बल आदि में रजोगुण और तमोगुण की अधिकता हो जाती है। सतयुग में जो धर्म की चरमावस्था है वह, त्रेता में लागू की जाती है (प्रवर्तित की जाती है -enforcement ) , द्वापर में वही धर्म वर्णाश्रम व्यवस्था व्याकुल हो जाती है और कलियुग में नष्ट हो जाती है।
द्वापर युग में वर्णाश्रम धर्म पालन क्षीण होता है। श्रुति (वेद) स्मृति (शास्त्र) से भी निश्चय और समाधान नहीं प्राप्त होता क्योंकि विभिन्न मत प्रकट हो जाते हैं, जिनसे दुविधा उत्पन्न होती है, और व्यक्तिगत स्वार्थ से प्रेरित मतों में, समाधान न निकल कर क्लेश ही बढ़ता है ।
यह एक बहुत बड़ा परिवर्तन युग के प्रभाव से होता है वेद और शास्त्रों में मतभेद और उनके अनुसार आचरण न करने से ही द्वापर युग में ही अनेको क्लेश प्रारंभ होते हैं। वर्षा न होना, अकाल मृत्यु, व्याधि, उपद्रव, अराजकता, अपराध /पाप आदि क्लेश और प्रजा के दुःख बहुत बढ़ने लगते हैं । द्वापर में ही वेदों के विरोधी ग्रन्थ पैदा हो जाते हैं।
भगवान् वेदव्यास द्वापर युग में वेद के चार भाग करते हैं, और उनको कलियुग के मनुष्यों के लिए सुलभ करने हेतु पुराणों की रचना करते हैं ।
द्वापर युग के अंत में कृष्णावतार होता है (जो की कल्पावतार है अर्थात १ कल्प में किसी एक चतुर्युगी में ही होता है, और वर्तमान चतुर्युगी (२८वीं) में भगवान कृष्ण का अवतार हो चुका, हम सभी भाग्यशाली हैं की हमारा जन्म इस कल्प में हुआ जिसमें त्रेता में राम जी और द्वापर में कृष्ण जी का अवतार हुआ) ।
युग की विशेषताएं – कलियुग
कलियुग में धर्म के चार पदों में (धर्म तप, शौच (शुद्धि), सत्य, दया) सिर्फ एक ही पाद शेष रहता है। कलियुग में असंस्कृत, मंदबुद्धि, अल्प-शक्ति और अल्पायु मनुष्य उत्पन्न होने लगते हैं, उनकी प्राण शक्ति बहुत ही क्षीण हो जाती है।
द्वापर और कलियुग कलियुग की संध्या से ही धर्म की हानि शुरू हो जाती है, प्रजा में हिंसा, दोष-दृष्टी, अकाल मृत्यु, ईर्ष्या, क्रोध, दम्भ, पाखण्ड आदि सर्वत्र दिखने लगते हैं। रोग, महामारी, अनावृष्टि, अतिवृष्टि आदि बढ़ जाते हैं।
कलियुग में आयु १०० वर्ष की हो जाती है , यह आयु शुरूआती प्रथम चरण की आयु कही है, कलियुग के अंत में लगभग ४२०,००० वर्ष बीतने तक तो २०-२५ वर्ष की ही आयु रह जाती है।
सभी वर्ण आश्रम धर्म का लोप हो जाता है वर्णशंकरता, परस्त्री गमन, चरित्रहीनता ही सब जगह व्याप्त होती है।
हमने सभी ने कलियुग के दुर्गुणों के बारे में बहुत सुन रखा है, और सभी अपराधों और विकृतियों का हम कलियुग पर दोषारोपण करते हैं। लेकिन यह उचित नहीं है, चूँकि कलियुग के दुर्गुण सभी जगह आसानी से सुनने पढ़ने मिल जाते हैं इसलिए इस लेख में कलियुग के दुर्गुणों पर ज्यादा विस्तार नहीं किया जा रहा है।
भगवान् ने अन्य युगों की तरह कलियुग भी बनाया है और जिस तरह सतयुग त्रेता में सभी प्रजा अच्छी होती हैं, धर्माचरण करने वाली होती हैं तब भी दुष्ट, राक्षसी प्रकृति के अपराधी प्रवृति के मनुष्य उन कालों में भी हुए (हिरण्याक्ष,हिरण्यकशपु, रावण आदि), कलियुग में अगर अधर्मी ज्यादा हो जाते हैं तो आवश्यक नहीं की अच्छे साधू महात्मा संत सत्कर्मी लोग बिलकुल ही न बचें, बल्कि कलियुग में तो भगवान् ने बहुत छूट दी है और कल्याण के मार्ग बहुत आसान बनाये हैं।
युग की विशेषताएं

कलियुग – सबसे अच्छा युग …क्योंकि भगवान् की प्राप्ति सबसे सरल
गोस्वामी तुलसीदास रामचरितमानस में :
रामचरित मानस उत्तरकाण्ड में काक भुशुण्डि जी गरुड़ जी से कह रहे हैं:
सुनु ब्यालारि काल कलि मल अवगुन आगार। गुनौ बहुत कलिजुग कर बिनु प्रयास निस्तार ॥
कृतजुग त्रेता द्वापर पूजा मख अरु जोग। जो गति होइ सो कलि हरि नाम तें पावहिं लोग॥ ॥ १०२॥
हे व्यालों (सर्पों) के शत्रु गरुड़जी ! सुनिये । कलिकाल पाप और अवगुणों का घर है। लेकिन कलि-युग में गुण भी बहुत हैं कि बिना परिश्रम भव से छुटकारा हो जाता है। सत्ययुग, त्रेता और द्वापर में जो गति योग, यज्ञ और पूजन से प्राप्त होती है वही गति लोग कलि में केवल भगवन्नाम से पा जाते हैं ।
कृतजुग सब जोगी बिज्ञानी । करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी ॥ १ ॥
त्रेता बिबिध जग्य नर करहीं । प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं ॥ २ ॥
द्वापर करि रघुपति-पद पूजा । नर भव तरहिं उपाय न दूजा॥३॥
कलिजुग केवल हरिगुनगाहा । गावत नर पावहिं भव थाहा॥४॥
सत्य-युगमें सब योगी और विज्ञानी होते हैं। उसमें प्राणी भगवान का ध्यान करके संसार से तर जाते हैं ॥ १ ॥ त्रेता में मनुष्य अनेक प्रकार के यज्ञ करते हैं और (सब) कर्मों को प्रभु को समर्पण कर भव-पार होते हैं ॥२॥ द्वापर में मनुष्य धरि रघुनाथ जी के चरणों की पूजा कर के भव-पार होते हैं, दूसरा कोई उपाय नहीं है ॥३॥ कलियुग में केवल भगवान् की गुण-गाथा के गान करने से ही मनुष्य भवसागर की थाह पा जाते हैं ॥४॥
सृष्टि के वे खगौलिक रहस्य जो सनातन धर्म ग्रंथों में हमेशा से हैं। …और जिनका सम्बन्ध काल गणना से है। – भाग ३ में…
- यथा ब्रह्माण्डे तथा पिण्डे’ – यह शरीर ही ब्रह्माण्ड है …..
- सनातन धर्म की गृह-नक्षत्र और खगौलिक विज्ञान की ऐसी सटीक समझ जो आधुनिक विज्ञान तमाम यांत्रिक तकनीकों में अरबों डॉलर खर्च करके भी नहीं समझ पाया
- ऐसी विचित्र कथाएं जिनमें भगवान् ने …
- एक क्षण में ही कई कल्पों का अनुभव करा दिया (मार्कण्डेय ऋषि को)
- एक ब्राह्मण देवता को, जिनकी मनोकामना थी भगवान् की माया के दर्शन करने की, भगवान् ने उन्हें एक क्षण में ही एक डुबकी में दूसरे नगर पहुंचा कर उनका पूरा जीवन बिता दिया, नया विवाह हुआ बच्चे हुए, बच्चों का विवाह हो गया ब्राह्मण देवता वृद्ध हो गए और दूसरे ही क्षण फिर डुबकी लगायी तो अपने नगर पहुँच गए जहाँ उनकी पत्नी ने खिचड़ी चढ़ाई थी की ब्राह्मण देव स्नान संध्या करके आएंगे तब खाएंगे… अर्थात जितनी देर में खिचड़ी भी नहीं बन पायी थी उतनी देर में ब्राह्मण देवता एक पूरा दूसरा जीवन व्यतीत करके आ गए थे।
- नारद जी को भी उनकी ही विनती से भगवान् ने अपनी माया का अनुभव कराया, जिसमे नारद जी स्त्री रूप में एक रानी बनकर लम्बा समय व्यतीत कर और फिर युद्ध में अपने पुत्रो को वीरगति को प्राप्त हुए देख रोने लगे …
- जब भगवान् ने हनुमान जी को लीलापूर्वक एक दूसरे कल्प के हनुमान जी से मिलवाया।
- भीमसेन जी को हनुमान जी का दर्शन जिसमें हनुमान जी ने युग भेद के बारे में बताया ।
… इन रहस्यों के बारे में और युग परिवर्तन से आने वाली अनेक विशेषताओं के कारण विस्तार से भाग ३ में जानेंगे