‘नमामि त्वां गणाधिप !‘
गणाधिप नमस्तुभ्यं सर्वविघ्नप्रशान्तिद । उमानन्दप्रद प्राज्ञ त्राहि मां भवसागरात् ॥
हरानन्दकर ध्यानज्ञानविज्ञानद प्रभो । विघ्नराज नमस्तुभ्यं सर्वदैत्यैकसूदन॥
सर्वप्रीतिप्रद श्रीद सर्वयज्ञैकरक्षक । सर्वाभीष्टप्रद प्रीत्या नमामि त्वां गणाधिप ॥
(पद्मपुराण, सृष्टि० ६१ । २६–२८)
श्रीगणेशजी ! आपको नमस्कार है। आप सम्पूर्ण विघ्नों की शान्ति करनेवाले, उमा के लिये आनन्ददायक तथा परम बुद्धिमान् हैं, आप भवसागरसे मेरा उद्धार कीजिये। विघ्नराज! आप भगवान् शंकरको आनन्दित करनेवाले,अपना ध्यान करनेवालोंको ज्ञान और विज्ञानके प्रदाता तथा सम्पूर्ण दैत्योंके एकमात्र संहारक हैं, आपको नमस्कार है। गणपते! आप सबको प्रसन्नता और लक्ष्मी देनेवाले सम्पूर्ण यज्ञोंके एकमात्र रक्षक तथा सब प्रकारके मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले हैं, मैं प्रेमपूर्वक आपको प्रणाम करता हूँ।
भगवान् गणेश की अग्रपूजा के और रहस्य
भाग १ में हमने जाना की विघ्नों को हरने का विभाग भगवान् गणेश का है। और इस कारन से वे प्रथम-पूज्य हैं । भाग दो में हम दो कारण और जानेंगे ।
अग्रपूजा के लिए शंकर जी के द्वारा पृथ्वी की परिक्रमा की प्रतियोगिता करवाना
हिन्दू-धर्मकी कुछ ऐसी विलक्षणता है कि जहाँ उसका ज्ञानकाण्ड ‘एकमेवाद्वितीयम्’ संसारमें एक ही सत्ता ब्रह्म-ईश्वरकी है, उसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है-
‘एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा (श्वेताश्वतरोपनिषद् ५। १०) –
एक ही देवता सभी जीवोंमें छिपा हुआ है। वह सर्वव्यापी तथा सभी जीवोंका अन्तरात्मा है।’ आदि अद्वैतवादी सिद्धान्तोंका उद्घोष करता है, वहीं उसका कर्मकाण्ड अनेक देवताओं के अस्तित्व, उनकी पूजा एवं अर्चना-की अवश्यकर्तव्यताके विश्वासपर आधारित है। यदि अनेक देवताओं की पूजन का विधान होगा तो प्रश्न उठेगा की प्रथम पूजन किनका हो । देवताओं में यह विवाद उठने पर सभी शंकर जी के पास गए, (यह कथा प्रसिद्द है इसीलिए बहुत ही संक्षेप में बतायी जा रही है) – शंकर जी ने प्रतियोगिता निश्चित की की जो सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके आएगा वही अग्रपूजा का अधिकारी समझा जायेगा।
सभी देवता अपने अपने वाहन पर सवार होकर परिक्रमा को गए पर गणेश जी ने बुद्धि का उपयोग किया । भगवान् गणेश ने सोचा चूहे के वाहन द्वारा अन्य देवताओं के साथ प्रतिस्पर्धा व्यर्थ है और असंभव भी है, जब सम्पूर्ण विश्व की परिक्रमा करने की प्रतियोगिता है तो भगवान् शंकर स्वयं विश्वात्मा हैं सारा संसार उन्ही का शरीर है “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” तो उनकी परिक्रमा से सारे विश्व की परिक्रमा हो जाएगी। यह विचार कर गणेश जी ने शंकर जी माता पार्वतीकी परिक्रमा कर ली और निश्चिन्त हो बैठे।
सब देवता जब परिक्रमा से लौटे तब तक भगवान् गणेश को विजय श्री प्राप्त हो चुकी थी। इस कथा से भगवान् गणेश की विलक्षण बुद्धिमता और विद्वता तो सिद्ध होती ही है साथ ही यह भी की वे माता पिता के भी बड़े भक्त हैं।
बुद्धि के अधिष्ठात्र देवता होने के कारण भी भगवान् गणेश प्रथम पूज्य हैं ।
पांच तत्वों में भगवान् गणेश जल के अधिपति देवता होने के कारण भी प्रथम पूज्य हैं ।
आदित्यं गणनाथं च देवीं रुद्रं च केशवम् ।
पञ्चदैवतमित्यक्तं सर्वकर्मसु पूजयेत् ॥
सनातन धर्म में सभी पूजन अनुष्ठान आदि में पंच-देवों का पूजन अनिवार्य है। पांच देवों की उपासना का सम्बन्ध पंच तत्व (पंच भूत) – पृथ्वी, जल वायु अग्नि और आकाश से है। पांच तत्व जिनसे सारा जगत बना है उनमे प्रत्येक तत्व के अधिपति देवता (भगवान्) एक-एक पंचदेव हैं। यह विश्व-प्रपंच, प्रकृति, सभी जीव और इस सारे संसार में सभी कुछ पंचतत्वों (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) का ही रूपांतरण है ।
आकाशस्याधिपो विष्णुरग्नेश्चैव महेश्वरी । वायोः सूर्यः क्षितेरीशो जीवनस्य गणाधिपः ॥
अर्थात् आकाश-तत्त्वके अधिष्ठाता विष्णु अग्नि-तत्व की अधिष्ठात्री देवी दुर्गा, वायु तत्व के अधिष्ठाता सूर्य, पृथ्वी-तत्व के शिव, और जल-तत्व के अधिष्ठाता गणेश हैं।

पंचदेवोपासना वेद विहित है और पंचदेवोपासना में भगवान् गणेश का स्थान सर्वप्रथम है क्योंकि वे प्रथम उत्पन्न होने वाले जल तत्व के अधिपति हैं । इसलिए सर्वप्रथम तत्व के अधिपति को ही प्रथम पूज्य होना चाहिए ।
भगवान् गणपति के प्राकट्य की और गजमुख होने की विभिन्न कथाएं और लीलाएं !
शिवपुराण से श्वेतकल्प में प्राकट्य की कथा जो सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं और सर्व विदित हैं
श्वेतकल्प की इस कथा में भगवान् शंकर ने स्वयं गणेश जी का मस्तक काट दिया था। माता पर्वतो की दो सखियों ने (जया, विजया) एक बार कहा की शिव जी के सभी गण उनके ही अनन्य सेवक हैं और उनकी ही आज्ञा में तत्पर रहते हैं । असंख्य प्रमथगणों में हमारा कोई नहीं है वे शिव जी की अनन्यता के कारण ही हमारे द्वार पर खड़े रहते हैं इसलिए हमे भी एक गण चाहिए जो केवल हमारी ही आज्ञा का पालन करें।
माता पार्वती इस पर विचार कर रहीं थीं, तब एक दिन स्नान के समय द्वार पर नंदी के नियुक्त होते हुए भी शंकर जी नंदी के बताने पर भी की माता स्नान कर रही हैं शंकर जी नंदी की बात अनसुनी कर अंदर चले गए । माता पार्वती थोड़ी लज़्ज़ित हुईं और सोचने लगीं की जाया विजय ठीक कहती थीं, नंदी, भृंगी आदि गणों पर मेरा पूर्ण अधिकार नहीं। मेरा भी कोई एक ऐसा सेवक होना चाहिए जो मेरी आज्ञा के पालन में कभी विचलित न हो।
माता पार्वती ने तब अपने शरीर के ही मैल से एक चेतन पुरुष का निर्माण किया, ,वह शुभ लक्षणों से युक्त था उसके सभी अंग दोषरहित एवं सुंदर थे विशाल शरीर और महा बल पराक्रम से संपन्न वह बालक था। माता पार्वती ने उसे अनेक प्रकार के वस्त्र आभूषण और उत्तम आशीर्वाद देकर कहा – तुम मेरे पुत्र हो, तुम्हारे समान प्यारा मेरा यहाँ कोई दूसरा नहीं है ।
परम सुंदर पराक्रमी और बुद्धिमान बालक ने माता पार्वती के चरणों में अत्यंत श्रद्धा भक्ति के साथ प्रणाम करके अत्यंत विनय पूर्वक कहा माता ! आपका प्रत्येक आज्ञा शिरोधार्य है आप आज्ञा दें। तब माता पार्वती ने कहा तुम मेरे द्वारपाल हो जाओ और कोई भी मेरी आज्ञा के बिना अंतःपुर में प्रवेश न कर सके इसका ध्यान रखना। माता पारवती ने प्रसन्न होकर पुत्र को एक सुदॄढ छड़ी देकर द्वार पर जाने की आज्ञा दी और स्वयं सखियों के साथ स्नान करने चली गयीं।
भगवान् शिव द्वारा गणराज का मस्तक काटना
गणराज द्वार पर खड़े हुए ही थे तभी भगवान् शंकर, वे शिवा के पुत्र से अपरिचित थे और अंदर प्रविष्ट होना ही चाहते थे तभी उन्हें रोकते हुए दंड धारी गणराज ने कहा – आप माता की आज्ञा के बिना भीतर नहीं जा सकते, माता स्नान कर राहु हैं आप इस समय यहाँ से जाईये । भवगवान शंकर से वाद विवाद हुआ लेकिन गणराज अडिग रहे इस पर शिव जी फिर से अंदर बढे तो गणराज ने उनका मार्ग अवरुद्ध कर दिया । लीला नायक परम विनोदी शिव ने गणों को आज्ञा दी की उसको मार्ग से हटाएँ और स्वयं कुछ दुरी पर खड़े हुए ।
भगवान् शिव के गणों से विवाद हुआ और गणों के समझाने पर भी गणराज अडिग ही रहे और सभी गणों को चेतावनी भी दी की मै तो माता की आज्ञा का पालन करूँगा ही , मेरे होते हुए कोई अंदर प्रवेश नहीं कर सकता । इस पर सभी गण शिव जी के पास जाकर बताने लगे की वह बालक पार्वती पुत्र है और युद्ध के लिए तैयार है । लीला विहारी कर्पूरगौर भगवान् शंकर ने रोष से कहा की वह एकाकी बालक है और तुम लोग कुछ नहीं कर सके, अगर तुम्हे युद्ध भी करना पड़े तो करो पर उस बालक को द्वार से हटाओ।
शिवगण तो तब अपने शास्त्रों से युक्त हो फिर बालक के समक्ष पहुंचे और पुनः विवाद के पश्चात घोर युद्ध छिड़ गया, और दंडपाणि गणराज पार्वती पुत्र ने सभी गणों को व्याकुल कर दिया , और सभी गणों ने गणराज के रूप में प्रलयंकर के दर्शन कुए और भागने लगे, सभी पराजित हुए । भगवान् विष्णु और ब्रह्मा जी भी उस समय शंकर जी के सम्मुख पहुँच उनकी स्तुति कर के पूंछने लगे – हमे आज्ञा दीजिये हम क्या करें ।

मन ही मन हँसते हुए शिव सही बोले मेरे द्वार पर एक अजेय दंड पाणि बालक बैठा है, मुझे ही घर में प्रवेश नहीं करने दे रहा है। हारे हुए घायल गण शिव जी से कह रहे थे की हमसे वह बालक नहीं जीता जाएगा। शिव जी ने तब इन्द्रादि देवताओं, भूत प्रेतों को आज्ञा दी की उस बालक को पराजित करो । वे सब भी अपने आयुधों सहित गणराज पर आक्रमण करे पर सभी विफल हो गए । पार्वती-कुमार अकेले ही शिव की अपार बलशाली विशाल सेना को रौंदने लगे । हारे हुए देवता तब शकर जी से विनती करने लगे की प्रभो यह कौन सा श्रेष्ठ गण है ? हमने अनेक युद्ध देखे हैं, पर ऐसा समर न कभी देखा न सुना, इस दुर्धर्ष उग्र बालक पर विजय प्राप्त करना बहुत कठिन प्रतीत होता है , आप कृपापूर्वक कुछ उपाय कीजिये ।
इस संवाद से भगवान् शंकर बहुत कुपित हुए और स्वयं ही गणराज से युद्ध के लिए उद्धत हुए , भगवान् विष्णु भी वहां उपस्थित थे और उन्होंने विचार किया की इसे छल से ही मारा जा सकता है और किसी रीति से नहीं। तत्पश्चात भीषण युद्ध छिड़ गया, माता पार्वती की शक्तियों ने पार्वतीपुत्र को अपना बल दिया।
इस भीषण युद्ध कौशल को देख श्री विष्णु ने कहा – ये धन्य हैं ! शौर्य वीर्य संपन्न महाबली और युद्ध-प्रीय हैं, हमने बहुत से यक्ष, राक्षस, दानव, देवता देखे हैं पर इन गणेश्वर की तो कोई भी समता नहीं कर सकता।
उसी समय पार्वती पुत्र ने विष्णु जी पर पारिध से प्रहार किया , भगवान् विष्णु के साथ गणराज का युद्ध होता देख शिव जी ने अपना तीक्ष्णतम त्रिशूल से प्रहार किया जिससे बालक का मस्तक कट कर दूर जा गिरा.
माता पार्वती का कोप
माता पार्वती को जब विदित हुआ की उनके प्राणनाथ ने ही उनके पुत्र का मस्तक काट दिया है और देवता और शिवगण विजयोत्सव मना रहे हैं तब उनके क्रोध की सीमा नहीं रही । उन्होंने हज़ारों महाशक्तियों को उत्पन्न किया और आज्ञा दी की तुम सभी विश्व में प्रलयकाल उपस्थित कर दो । देवता दैत्य राक्षस, यक्ष, गन्धर्व, ऋषि आदि सबका भक्षण करो। तब वे सहस्त्रों भयंकर शक्तियां माता पार्वती की जय जयकार करती हुईं चल पड़ीं ।
सम्पूर्ण संसार में विकट उपद्रव होने लगे देवता, ऋषि, राक्षस, शिवगण, मनुष्य सभी में भय व्याप्त हो गया, प्रलय जैसी स्तिथि हो गयी । सभी त्रिदेवों से प्रार्थना करने लगे की किस तरह माता पार्वती को प्रसन्न किया जाए ।
ब्रह्मा विष्णु देवताओं सहित शंकर जी के समक्ष पहुँच कहने लगे – हे गिरिजानाथ सम्पूर्ण जगत प्रलयंकारी संकट से भयभीत है आप ही भगवती पार्वती को शांत करने का कोई उपाय करें। तब देवर्षि नारद जी के परामर्श से और उनकी ही अगवानी से सभी देवता माता पार्वती के पास पहुँच उनकी स्तुति करने लगे । जब देवताओं की स्तुति से भी वे शांत न हुईं तब नारद जी ने स्वयं स्तुति कर माता से प्रार्थना की कि संसार को भयमुक्त करें । तब माता ने कहा कि अगर मेरा पुत्र जीवित हो जाये और उसे सर्वाध्यक्ष का पद दिया जाये तो यह संकट दूर हो सकता है ।
भगवान शिव द्वारा गणेश जी को हाथी का मुख लगा कर जीवित करना और गणाध्यक्ष बनाना
सभी देवताओं ने शंकर जी से यह बताया तब थोड़ी देर विचार कर महादेव बोले – उत्तर दिशा कि ओर जाओ और जो प्राणी प्रथम दिखाई दे उसका मस्तक काट लाओ और पार्वती पुत्र के कबंध पर लगा दो उससे पहले कबंध को स्वच्छ कर उसका पूजन करो।
देवताओं ने वैसा ही किया और उत्तर दिशा में सर्वप्रथम एक हाथी मिला उसी का मस्तक काट कर लाये और पार्वती पुत्र के कबंध पर रख दिया और फिर शंकर जी से प्रार्थना कि प्राण प्रदान करें। शिव जी कि कृपा से तब वेदमंत्रों से अभिमंत्रित जल जब बालक पर अभिसिंचित किया , उस जल का स्पर्श पाते ही बालक में चेतना लौटने लगी और कुछ ही क्षणों में वह जीवित हो जैसे सोते से उठा हो वैसे ही नेत्र खोल दिए ।
सभी देवता त्रिदेव यक्ष शिव गण सभी तब बहुत प्रसन्न हुए। माता पार्वती समाचार पाकर अति प्रसन्न हुईं और पुत्र गणेश को गोद में लिया और बहुत प्यार किया और उनका सब दुःख दूर हो गया । तत्पश्चात माता पार्वती ने त्रिदेवों ने गणेश जी को अनेकों वर दिए और गणपति को प्रथम पूज्य होने का भी वर प्राप्त हुआ ।
भगवान् शंकर बोले ! गिरिजासुवन, हे पुत्र मै तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ इसलिए तुम समस्त विश्व को ही प्रसन्न हुआ समझो। क्योंकि मेरी प्रसन्नता में विश्व कि प्रसन्नता और मेरे रोष में ही संसार का रोष निहित है ।अब कोई भी देवता, यक्ष, किन्नर, मनुष्य गन्धर्व आदि तुम्हारे विरोध का साहस नहीं कर सकता । तुम महाशक्ति के पुत्र हो इसलिए स्वयं भी अत्यंत तेजस्वी हो । तुमने युद्ध में महापराक्रम प्रदर्शित कर यह स्पष्ट कर दिया है कि तुम्हारा सामना कोई नहीं कर सकता, विघ्नों के नाश में तुम सर्वश्रेष्ठ होगे। सभी के पूज्य होने के कारण में तुम्हें अपने समस्त गणों का अध्यक्ष बनाता हूँ ।
फिर शिवगणों ने गणेश जी का पूजन वंदन किया सभी गणाध्यक्ष गजानन भगवान् कि जय बोलने लगे इससे समस्त त्रिलोकी गूंज उठी । अपने प्राणप्रिय पुत्र का सम्मान हुआ देख पार्वती जी बहुत प्रसन्न हुईं।
पद्म–पुराण में स्वयं माता पार्वती ने ही उबटन से गजमुख बालक गणेश को प्रकट किया
पद्म-पुराण के सृष्टिखण्ड में श्री गणेश भगवान् के प्राकट्य की अद्भुत कथा है। हिमगिरिनन्दिनी पारवती जी ने पाणिग्रहण उपरांत एक बार सुगन्धित तैल और चूर्ण द्वारा शरीर में उबटन लगवाया और उस भूमि पर गिरे हुए उबटन से उन्होंने एक पुरुष की आकृति बनायी , जिसका मुँह हाथी के समान था। क्रीड़ा करते हुए उन्होंने उस गजमुख पुरुषाकृति को पुण्यसलिला गंगा जी के जल में दाल दिया। त्रैलोक्यतारिणी गंगा जी पारवती जी को अपनी सखी मानती थीं । उनके पुण्यमय जल में पड़ते ही वह पुरुषाकृति विशालकाय हो गयी। माता पारवती ने उसे पुत्र कहकर पुकारा फिर गंगा जी ने भी उन्हें पुत्र कहा , देवताओं ने भी उन्हें गांगेय कहकर संभोदित किया । इस प्रकार गजवदन देवताओं के द्वारा पूजित हुए। कमलोद्भव ब्रह्मा जी ने उन्हें गणों का आधिपत्य प्रदान किया।
लिंग पुराण में भगवान्-शंकर पार्वती ने देवताओं की प्रार्थना पर गजमुख गणपति को प्रकट किया
एक बार की बात है देवताओं ने विचार किया की असुर ब्रह्मा जी और शंकर जी की तपस्या करके उन्हें प्रसन्न कर वरदान प्राप्त कर लेते हैं। और हमें युद्ध में पराजित कर देते हैं। दैत्यों के कारण हमे बड़े कष्ट प्राप्त होते हैं, इस कारण हम अपनी विजय एवं दैत्यों के कार्य में विघ्न उपस्थित करने तथा सर्व-सिद्धि प्राप्ति के लिए क्यों न आशुतोष भगवान् शिव से प्रार्थना करें।
सुर समुदाय ने भगवान् शंकर के समीप पहुंचकर उनकी स्तुति की, देवगुरु बृहस्पति ने निवेदन किया की दैत्यों की उपासन से प्रसन्न हो आप जो उन्हें वर प्रदान कर देते हैं उससे वे समर्थ हो हमे बहुत कष्ट पहुंचाते हैं । उन सुर द्रोही दानवों के कार्यों में विघ्न उत्पन्न हुआ करे यही हमारी कामना है ।
तब भगवान् शंकर ने तथास्तु कह देवताओं को आश्वस्त किया, कुछ ही समय बाद शिव जी की महासती पत्नी पार्वती जी के सम्मुख एक हांथी के मुख वाले परम तेजस्वी बालक का प्राकट्य हुआ जिनके एक हाथ में पाश और एक हाथ में अंकुश था। सर्व विघ्नेश मोदक प्रिय के अवतरित होने पर देवताओं ने सुमन वृष्टि करते करते हुए गणपति हे चरणों में प्रणाम किया ।
भगवान् शंकर ने कहा : मेरे पुत्र गणेश! यह तुम्हारा अवतार दैत्योंका नाश करने तथा देवता, ब्राह्मण एवं ब्रह्मवादियोंका उपकार करने, के लिये हुआ है। देखो, यदि पृथ्वीपर कोई दक्षिणाहीन यज्ञ करे, तो तुम स्वर्ग के मार्ग में स्थित हो उसके अधर्मकार्य में विघ्न उत्पन्न करो; अर्थात् ऐसे यज्ञकर्ता को स्वर्ग मत जाने दो। जो इस जगत में अनुचित ढंग से अन्याय-पूर्वक अध्ययन, अध्यापन, व्याख्यान और दूसरा कार्य करता हो, उसके प्राणोंका तुम सदा ही हरण करते रहो। वर्णधर्मसे च्युत स्त्री-पुरुषों तथा स्वधर्मरहित व्यक्तियोंके भी प्राणोंका तुम अपहरण करो। विनायक ! जो स्त्री-पुरुष ठीक समयपर सदा तुम्हारी पूजा करते हों, उनको तुम अपनी समता प्रदान करो। हे बाल गणेश्वर! तुम पूजित होकर अपने युवा एवं बूढ़े भक्तों की भी सब प्रकार से इस लोक में तथा परलोक में भी रक्षा करना ।
तुम विघ्नगणोंके स्वामी होनेके कारण तीनों लोकोंमें तथा सर्वत्र ही पूज्य एवं वन्दनीय होओगे, इसमें संदेह नहीं। जो लोग मेरी, भगवान् विष्णुकी अथवा ब्रह्माजीकी भी यज्ञोंद्वारा अथवा ब्राह्मणोंके माध्यमसे पूजा करते हैं, उन सबके द्वारा तुम पहले पूजित होओगे । जो तुम्हारी पूजा किये बिना श्रौत, स्मार्त या लौकिक कल्याणकारक कर्मोंका अनुष्ठान करेगा, उसका मंगल भी अमङ्गलमें परिणत हो जायगा । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रोंद्वारा भी तुम सभी कार्योंकी सिद्धिके लिये भक्ष्य-भोज्य आदि शुभ पदार्थोंसे पूजित होओगे।
सर्वात्मा प्रभु शिवका आशीर्वाद प्राप्तकर भगवान् गणपति ने विघ्नगणोंको उत्पन्न किया और उन गणों के साथ उन्होंने भगवान् शंकर के मंगलमय चरणों में अत्यन्त श्रद्धा और प्रीतिपूर्वक प्रणाम किया। फिर वे त्रैलोक्य-पति पशुपतिके सम्मुख खड़े हो गये। तबसे लोकमें श्रीगणपति की अग्रपूजा होती है। इसके बाद श्रीगणेश जीने दैत्यों के कार्य में विघ्न पहुँचाना आरम्भ कर दिया।
भगवान गणेश कि विलक्षण महिमा भाग – २ में हमने गणेश जी कि अग्रपूजा के कुछ और रहस्य जाने और भगवान् गणेश के अलग-अलग काल में कल्पों में उनके गजमुख होने कि अलग-अलग कथाएं और लीलाएं जानी ।
भाग ३ में हम गणपति भगवान् के गजमुख होने कि कुछ और कथाएं और रहस्य जानेंगे और उनके स्वरुप और नामों के रहस्यों के बारे में भी ।
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