लेखक परिचय

अनुपम त्रिवेदी पिछले तीन दशकों से अधिक समय से सनातन शास्त्रों के अध्ययन में निरंतर संलग्न रहे हैं। उनका अध्ययन वेद, उपनिषद्, इतिहास, पुराण, स्मृति-ग्रंथ तथा पारंपरिक भाष्य परंपरा पर आधारित रहा है, जिसमें चिंतन, मनन और तुलनात्मक अध्ययन सम्मिलित है।

वे अत्यंत श्रद्धा के साथ स्वीकार करते हैं कि सनातन धर्म के विषय में जो भी स्पष्टता, अनुशासन और दृष्टि उन्हें प्राप्त हुई है, वह पूर्णतः उनके गुरु की अनुग्रह-कृपा का परिणाम है
पूर्वाम्नायगोवर्धनमठ – पुरी पीठाधीश्वर – श्रीमद जगतगुरु शंकराचार्य – पूज्यनीय स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी पुरी शंकराचार्य श्री को समकालीन युग में वैदिकवेदांतिक एवं शास्त्रीय ज्ञान के अग्रणी आचार्यों में गिना जाता है। वे गणितखगोलब्रह्माण्ड-विज्ञानकाल-तत्त्वदर्शनभाषा-विज्ञान तथा धर्मशास्त्र पर अपनी असाधारण पकड़ के लिए विख्यात हैं—ऐसा समन्वय किसी भी युग में विरल ही देखने को मिलता है। उनके विचारों और विश्लेषणों के लिए वैज्ञानिकोंविद्वानों और विभिन्न शोध संस्थाओं द्वारा समय-समय पर उनसे परामर्श लिया जाता रहा है।

अनेक साधकों और जिज्ञासुओं के लिए उनका जीवन और कार्य आदि शंकराचार्य की अखंड परंपरा का जीवंत प्रमाण है—जहाँ शंकर-तत्त्व केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि बौद्धिक प्रखरता, शास्त्रीय निष्ठा और वैदिक सत्य के प्रति अडिग प्रतिबद्धता के रूप में प्रकट होता है।

शास्त्रीय अध्ययन के साथ-साथ, अनुपम त्रिवेदी को कॉर्पोरेट क्षेत्र में 22 वर्षों से अधिक का व्यावसायिक अनुभव भी प्राप्त है। इस अवधि में उन्होंने भारत सहित विश्व-भर में फैले हिंदू समाज के भीतर यह गहराई से अनुभव किया कि आधुनिक जीवन-शैली के दबावों के बीच परिवारों के लिए धर्मसंस्कार और परंपराओं को बनाए रखना, तथा बच्चों को सनातन धर्म की मूलभूत समझ देना, दिन-प्रतिदिन कठिन होता जा रहा है।

वर्षों के अध्ययन के दौरान उन्होंने पुराणों का संपूर्ण संकलनमहाभारत एवं रामायण के अनेक संस्करणवैदिक साहित्यवेदाङ्ग तथा अन्य सहायक शास्त्रों से युक्त एक विस्तृत व्यक्तिगत ग्रंथालय भी निर्मित किया है, जो उनके लेखन और शोध का आधार है।

dharmsanatan.com के माध्यम से वे विनम्रताउत्तरदायित्व और शास्त्रीय निष्ठा के साथ यह प्रयास करते हैं कि हिंदू समाज सनातन धर्म को केवल कर्मकांड या पहचान के रूप में नहीं, बल्कि धर्मकाल (Time), ऋत और जीवन-व्यवस्था को संचालित करने वाले एक शाश्वत ज्ञान-तंत्र के रूप में सही ढंग से समझ सके—विशेषतः वे परिवार जो आधुनिक परिवेश में रहते हुए भी अपनी परंपराओं से जुड़े रहना चाहते हैं।

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