
इस लेख भाग -4 में किन रामायण ग्रंथों के बारे में चर्चा है
भाग १ में बहुत प्राचीन भुशुण्डि रामायण और अध्यात्म रामायण पर संक्षिप्त में बताया गया था, भाग २ में अद्भुत रामायण और कृतिवास रामायण, भाग ३ में आनंद रामायण, भाग 4 में हम विचित्र रामायण और कौशिक रामायण के बारे में जानेंगे।
विचित्र रामायण और कौशिक रामायण दोनों ही आसानी से online उपलब्ध है । हिंदी में पूरा ग्रन्थ का pdf भी online free में उपलब्ध हैं
विचित्र रामायण और कौशिक रामायण में जो विशेष, रोचक, उपयोगी और ज्ञानवर्धक बातें हैं, अनसुनी कथाएं हैं, भाग 4 में उन्हीं की चर्चा है ।
विचित्र रामायण – सही में विचित्र है !

- भगवान् जगन्नाथ जी की पवन भूमि में महान संतों द्वारा उड़िया भाषा में विविध रामायणों की रचना हुई। श्री विश्वनाथ खुंटिया, ऐसा माना जाता है अठाहरवीं शताब्दी में महाराज दिव्यसिंह देव के शासनकाल में विश्वनाथ जी पूरी में रहा करते थे और खुंटिया भगवान् जगन्नाथ जी के सेवकों में एक संप्रदाय का नाम है । वे जगन्नाथ जी के सेवक थे और रथ यात्रा में हमेशा उपस्थित रहते थे ।
- सामान्यतः उड़िया भाषा में अधिकतर ग्रन्थ एक ही छंद में रचे जाते थे, परन्तु विश्वनाथ खुंटिया ने ऐसा नहीं किया उन्होंने विभिन्न प्रकार के राग-रागिनी, ताल तथा छंद आदि प्रयोग कर के रामायण में वैचित्र्य का समायोजन किया है इसी कारण इस ग्रन्थ का नामकरण “विचित्र रामायण” किया गया।
- विचित्र रामायण एक महाकाव्य है और कथा का आधार वाल्मीकि रामायण ही है पर कई प्रसंग थोड़े अलग भी हैं।
- यह एक अलौकिक सी रचना ही लगती है रचनाकार विश्वनाथ जी ने ऐसा विचित्र काव्य लिखा है जिसमे सभी कथा प्रसंग को किस राग रागिनी में गाना है यह स्पष्ट लिखा है, (जिसे देखकर गोस्वामी तुलसीदास जी की विनय पत्रिका का स्मरण हो आया जिसमें तुलसीदास जी ने हर पद के प्रारम्भ में उसे कौन से राग में गाया जाय यह लिखा है)। सभी प्रसंग इतने मधुर भाषा में है की विचित्र रामायण के मंचन में (रामलीला ) दर्शकों के नेत्र अश्रुपूरित हो जाते हैं।
- इससे यह सिद्ध होता है की विश्वनाथ जी एक विलक्षण प्रतिभा-वाले विद्वान, राग रागिनियों के ज्ञाता और कवि ही नहीं बल्कि एक महान राम भक्त भी थे ।
उड़िया भाषा में गणेश जी की वन्दना विचित्र रामायण के मंगलाचरण से:
द्वितीय छान्द-गणेशांक बन्दना
राग-कळशा
बन्दइ श्री गणनाथ गउरीकुमर । गजमुख एकदन्त कपाळे सिन्दूर ।। १
देव अग्रगण्य तुम्भे अयोनि सम्भूत । लम्बोदर बिघ्नहर सदाशिव सुत ।। २
आहे गणनाथ मोर घेनिबार सेबा । सुप्रसन्न होई मोते पद कहिदेबा ।। ३
अनुग्रह कर बारे इन्दूर बाहन । श्रीरामचरित किछि करिबि बर्णन ।। ४
कृताञ्जलि पुटे करुअछि नमस्कार । भणे बिक्रम नरेन्द्र श्रीपदे कोयर ।। ५
“हे गजमुख एकदन्त वाले सिन्दूर- चर्चित मस्तकवाले गिरिजानन्दन श्री गणनायक की मै वंदना करता हूँ । हे अयोनिज , विघ्नों का हरण करने वाले, शंकर जी के पुत्र, लम्बोदर ! आप देवताओं में अग्रगण्य हैं । हे गणों के स्वामी। मेरी सेवा से प्रसन्न होकर आप मुझे पदों का निर्देश करें। हे मूषक वाहन ! एक मुझपर कृपा कर दें, जिससे मै श्रीराम-चरित्र का कतिपय वर्णन कर सकूँ।मैं हाथ जोड़कर आपको नमन करता हूँ। विक्रम नरेन्द्र कहता है कि वह आपके श्रीचरणों का दास है।”
मंगलाचरण (आद्द्याकाण्ड )
विचित्र रामायण में कथा प्रसंग अधिकतर वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस से मिलता जुलता ही है थोड़ा बहुत अंतर है पर भाषा शैली मन को मोहित करने वाली है, और बहुत ही भावुक करने वाली है। जितना आनंद उड़िया भाषा बोलने वाले भक्तों को विचित्र रामायण में मिले शायद हिंदी अनुवाद में वो संभव न हो पाए पर इस संक्षिप्त लेख में कुछ ऐसे प्रसंग छांटे हैं जो बहुत रोचक हैं मन मोहक हैं।
प्रारम्भ में प्रथम काण्ड आद्द्याकाण्ड है जिसमें मंगलाचरण भी अद्भुत है, जिसमें भगवान् जगन्नाथ के १२ उत्सव (रथ यात्रा , देवोत्थान , चन्दनोत्सव आदि) और भगवान जगन्नाथ की जय जय-कार का और उनके श्रृंगार का स्मरण किया है। प्रारम्भ में ही उन्होंने राम चरित और राम नाम की महिमा का बहुत सूंदर व्याख्यान गाया है।
तदोपरांत भगवान गणेश फिर विष्णु जी, सभी देवी देवताओं, माता सरस्वती, और चंडी वंदना की है, उसके पश्चात भगवान राम की , सीता जी की, लक्ष्मण जी की और महामुनि वाल्मीकि जी की वंदना की है। लक्ष्मण जी की वंदना भी बहुत सुंदर और अनसुनी है उसका कुछ भाग इस प्रकार है :
लक्ष्मण जी की वंदना
“श्री राम के अनुज, सुमित्रा नंदन की जय हो, समग्र गुणों से परिपूर्ण होने के कारण ही आपका नाम लक्ष्मण पढ़ गया । तीनो लोकों में वीरता तुम्हारे सामान अन्य और कोई नहीं है । आपने सर्वस्व त्याग कर १४ वर्ष पर्यन्त वन में आहार, निद्रा मैथुनादि का परित्याग कर अपने अग्रज की सेवा की है । हे धनुर्धर वीर लक्ष्मण मै आपके चरणों की सेवा करूँगा तथा आपके दासानुदास की गिनती में स्थान प्राप्त करूँगा। हे सुमित्रानंदन ! आपने सप्तम अवतार में इंद्रजीत का विनाश करके कठिन भू-भाग का उद्धार किया है । के करुणा सागर ! मुझ पर दया कीजिये । आपके प्रसन्न होने पर ही मै श्री राम चरित्र का वर्णन करूंगा ।…”
विचित्र रामायण की कुछ अनोखी कथाएं
सीता जी का महाराज जनक जी की पुत्री के रूप में प्राकट्य कथा ।
मिथिला देश के राजा जनक के कील में कोई संतान न होने से वे बहुत दुखी थे। अपना राज्य भार मंत्रियों को सौंप कर वे कौशिकी नदी के तट पर तपस्या के लिए चले गए । बहित समय बीतने पर एक दिन मेनका नामक अप्सरा शापमुक्त होकर स्वर्गलोक जा रही थी वह अत्यंत शोभायमान दिख रहीं थीं। राजा जनक की दृष्टी मेनका पर पड़ी तो वे कह उठे हे सुंदरी ! तू धन्य है, तेरा रूप लावण्य भी धन्य है, और वह विधाता भी धन्य है जिसने तुम्हारी रचना की । तुम्हारे सामान ही मेरी पुत्री होती तो मै स्वर्ग से भी सौ गुना बढ़कर सुख सुविधाओं द्वारा उसका पालन पोषण करता । इस प्रकार मन में विचार कर राजा जनक दुखी हो गए। मेनका ने राजा का विचार जान कर कहा ये राज योगी सुनो मै आवश्य ही तुम्हारी पुत्री होती पर मै अभी शापमुक्त होकर स्वर्ग जा रही हूँ , यह सुनकर राजा जनक ने पूछा की तुम किस पाप के कारण मृत्यु लोक में अवतरित हुईं ?
मेनका ने हँसते हुए कहा हे राजर्षि ! सुनो -हम ८ आठ अप्सराएं इंद्र के सामने गीत गा रही थीं, ब्रह्मा, वरुण, दस दिग्पाल आदि सभी देवता सभा में विराजमान थे । मै उस समय इंद्र पुत्र चित्रसेन को देख कर विव्हल हो गयी यह देख इंद्र ने मुझे मलेक्ष का शरीर धारण करने का श्राप दे दिया की देव-रमणी होकर तुमने पापाचार किया है। फिर मेरे बहुत प्रार्थना करने पर इंद्र ने कहा की थोड़े समय बाद तुम्हें गिरिजा के दर्शन होंगे तब मलेक्ष शरीर त्याग स्वर्ग आओगी। मै श्राप भोग कर मुक्त होकर स्वर्ग लोक जा रही हूँ । मै आपसे सत्य बात कह रही हूँ की प्राचीन काल में नारद जी ने ब्रह्मा जी के समक्ष कहा था की तुम्हे (राजा जनक) को एक कन्या (पुत्री) आवश्य ही प्राप्त होगी जो मुझसे भी सौ गुना ज्यादा सुंदर होगी ।
यह सुनकर राजा जनक ने पूंछा की किस तरह मुझे यह पुत्री प्राप्त होगी ? तब मेनका ने कहा प्राचीन काल में एक कुशध्वज नाम के राजा थे जिनके वेदवती नाम की कन्या थीं वह अत्यंत सुंदरी थीं उसके मनोहर रूप को देख योगी जन भी विचलित हो जाते थे। उसके अनुरूप वर न मिलने के कारण वेदवती ने विष्णु जी को पति रूप में प्राप्त करने का निश्चय किया और निद्रा भजन आदि त्याग कर घोर तपस्या में लीन हो गयी।
रावण द्वारा वेदवती की तपस्या भंग करना और वेदवती का प्राण त्याग और रावण को श्राप ।
एक समय दिग्विजय के बाद लौटते रावण ने उस श्रेष्ठ तपस्विनी वेदवती को देखा और काम के वशीभूत हो यान रोककर वेदवती से वार्तालाप करने लगा और रतिदान का आग्रह किया, वेदवती के मना करने पर उस रावण ने उसे जबरदस्ती पकड़ लिया। वेदवती ने कुपित होकर छोड़ दे छोड़ दे बोला और छोड़ देने पर क्रोधित हो रावण से कहा “अरे असुर होकर तूने मेरी शुद्ध काया का स्पर्श कर मुझे अपवित्र कर दिया“ और ऐसा कहते-कहते क्रोधाग्नि से ही वेदवती के शरीर से अग्नि प्रज्वलित हुई और “मेरे कारण ही तेरा नाश होगा “ऐसा कहते-कहते उसने प्राण त्याग दिए।

भयभीत हो रावण वहां से चला गया, जब लंका पहुंचा तब नारद जी वहां आये और रावण से कहा तुमने आज जिस देवकन्या के साथ बलपूर्वक रमण किया, उसने अपमानित होकर अपने शरीर को क्रोध की अग्नि में जला डाला, दग्ध हुए बिना वह शरीर वैसा ही उस रूप में वहां पड़ा है। हे विश्रवानंदन उसी के कारण तुम्हारी मृत्यु होगी । नहीं तो उस शरीर को मंगा कर उसे शीघ्र ही नष्ट कर दो। इतना कहकर नारद जी आकाश में अदृश्य हो गए । ये सुनकर रावण ने वेदवती के शव को मंगा कर मंदोदरी को दे दिया और कहा हे प्राण संगिनी इसके षडरस व्यंजन बनाओ यह कहकर वह चला गया । देवर्षि नारद फिर मंदोदरी के समक्ष प्रगट हो बोले, हे राज रानी! कोई अन्य मांस मंगा कर व्यंजन तैयार करें , यह शव समुद्र में प्रवाहित कर दें। मंदोदरी ने वैसा ही किया ।
हल कर्षण से भूमि से सीता जी का प्राकट्य
मेनका ने राजा जनक से कहा । दक्षिण सागर तट पर जाकर तुम हल द्वारा उस स्थान का कर्षण करो आवश्य ही आज तुम्हे कन्या की प्राप्ति होगी । यह कहकर मेनका स्वर्ग को गयीं । राजा जनक बहुत प्रसन्न हुए उन्होंने अपने मंत्रियों और सभासदों के साथ सफल मनोरथ हेतु सांकेतिक स्थान पर जाकर यज्ञ का विधि विधान अनुसार आयोजन किया जिसके समाप्ति पर जब सभी मुनिगण और देवता चले अपने स्थान गए, तब राजा ने राजगुरु शतानन्द जी को बुलाकर प्रसन्नचित्त से कहा की यज्ञ स्थान को जुटवाया जाये ।
शतानन्द जी की आज्ञा से फिर हल द्वारा यज्ञ स्थान का कर्षण किया गया । पूर्व नियोजित विधाता के विधान अनुसार, हल कर्षण करने मात्र से उसकी नोक लगने से ही भूमि से एक मञ्जूषा (संदूक) निकल आयी । शीघ्रता पूर्वक वे मंजूषा को खोलकर ध्यान से उसे देखने लगे ।
तप्त कांचन सदृश्य कांति तथा शरद ऋतु के चन्द्रमा के समान मुख ज्योति वाली बालिका देखकर राजा जनक प्रसन्न मन उसे ले अपने भवन में जाकर कन्या को महारानी को समर्पित कर दी । प्रसन्नता पूर्वक राजा जनक और महारानी ने उन बालिका का पालन पोषण किया । सुरसिद्ध समुदाय जिन महालक्ष्मी का चरण सेवा करता है अब लोकहितार्थ जनक की कन्या बन गयीं । विदेह राजा जनक को कहते हैं इस कारण वैदेही के नाम से विख्यात हुईं, जनक पुत्री होने के कारण उन्हें जानकी भी कहते हैं, मिथिला नरेश की दुलारी होने के कारण उन्हें मैथिली भी बुलाते हैं, हल की नोक से प्रादुर्भूत होने के कारण उनका नाम सीता रखा गया । – सीता जन्म कथा सुनने से सभी सांसारिक बाधाएं समाप्त हो जाती हैं।
शूर्पनखा प्रसंग और खर-दूषण वध और तत्पश्चात रावण का सीता जी के हरण के लिए उद्धत होना ।
राम जी सीता जी के साथ पंचवटी में बैठे थे लक्ष्मण जी भी अपनी कुटी में बैठे थे । दोनों भाई मुस्कराते हुए आयोध्या के चरित्र कह सुन रहे थे उसी समय एक राक्षसी की दॄष्टि राम लक्ष्मण पर पड़ी। मनोहर शरीर वाले श्री राम को देख वह मोहित हो गयी, उन्हें भक्षण करना भूल रोमांचित हो वह काम के वश हो गयी। पिंगल वर्ण के केशों वाली उस राक्षसी के नख सूप के समान थे, दांत कुल्हाड़ी के समान और शरीर जले हुए केन्दु-काष्ठ के समान था, राम जी पर मोहित हो उसने तुरंत ही दिव्य सुंदरी का रूप धारण कर लिया और रामजी के पास जा पहुंची ।
उस सूर्पनखा नाम की राक्षसी ने राम जी कहा आपने ने तो राक्षसों के बीच में अपना घर बना लिया है, आप किसके पुत्र हैं ? रामजी ने सब वृतांत सुनाया तब सूर्पनखा ने कहा मै ऋषि विश्रवा की पुत्र हूँ दशानन मेरा भाई है । हे राम ! हम तुम एकांत में विहार करेंगे मै तुम्हें सम्पूर्ण दंडकारण्य में नदी पर्वतों की सैर कराऊंगी और तुम जो चाहोगे वह मैं तुम्हें दूंगी ।
राक्षसी को ताकते हुए हँसते हँसते राम जी ने कहा कि देखो मेरे साथ मेरी स्त्री है । उसने फिर कहा मै तुम्हारी कामिनी बन जाऊंगी तुम्हारी पत्नी सुंदरता में कितनी तुच्छ है । इसे मै इसी क्षण खा जाउंगी । और फिर हम और तुम रमण करेंगे । राम जी बोले आप तो ऋषि नंदिनी हैं । सौत बनने कि बात आपके मन में कैसे आयी? हमारा भाई लक्ष्मण है, उसके साथ उसकी पत्नी नहीं है । तुम उसके मन को हरने वाली जाओ। यह सुनकर राक्षसी संतुष्ट हो गयी और लक्षमण जी के पास जाकर बोली कि तुम मुझे अपनी पत्नी बना लो । लक्षमण जी बोले मै तो दास हूँ मेरे साथ विवाह कर के तुम दासी कहलाओगी, तुम्हें उनकी पत्नी कि सेवा करनी पड़ेगी , यह सुनकर सूर्पनखा फिर राम जी के पास जा पहुंची और कहने लगी मै तुम्हारी पत्नी का भक्षण करुँगी तुम इसी के कारण मुझे पत्नी नहीं बना रहे हो । इतना कहकर उसने मुख फैला दिया और सीता को निगलने ही वाली थी कि राम ने सीता को छुड़ा लिया और लक्षमण जी को आज्ञा दी कि वे सूर्पनखा के नाक और कान काट डालें । उसी क्षण लक्षमण जी ने सूर्पनखा के नाक कान काट दिए ।
सूर्पनखा तुरंत वहां से भाग कर अपने भाई खर के पास गयी । खर से उसने कहा देखो उन दोनों भाइयों ने बिना किसी अपराध के मुझे इतना दुःख दिया । आयोध्या नरेश दशरथ के पुत्र श्री राम तथा लक्ष्मण एक युवती को लेकर पंचवटी में रहते हैं । मै उनकी स्त्री को देखने गयी उनका छोटा भाई बहुत बलवान है उसने देखते ही मेरे नाक और कान काट दिए , इतना कहकर वह पृथ्वी पर लोट गयी । बेहेन को व्याकुल देख खर ने १४ राक्षसों को कहा कि सूर्पनखा जिसको बोले उसे मार डालो। वे सभी राक्षस शूल आदि हथियार लिए थे और उन्होंने राम जी पर आक्रमण किया पर राम जी ने उनके शूलों को काटकर एक ही बाण प्रहार से उन सभी के प्राण हर लिए । सूर्पनखा फिर से खर के पास रोते हुए पहुंची ।
खर-दूषण वध
बहन से सभी राक्षसों का वध का समाचार सुन खर बहुत क्रोधित हुआ और कहने लगा मै आज शत्रु के प्राण ले लूंगा , उसने १४ सहस्त्र असुरों कि सेना तैयार कि और पराक्रमी दूषण और त्रिशिरा आदि राक्षसों को साथ ले वन को घेर लिया । यह देखकर श्री राम ने कहा लक्ष्मण असुर सेना घिर आयी है । सीता को पर्वत कि गुफा में रखकर तुम द्वार कि रक्षा करना, हमारी चरणों कि शपथ है तुम बाहर मत आना, आज दंडकारण्य में सभी ऋषियों मुनियों को मै अभय वर प्रदान करूंगा । आज समस्त वीर मेरे पराक्रम को देखें । यह सुन लक्ष्मण जी सीता जी को ले गए और गुफा के द्वार पर रक्षा करने लगे । श्री राम अपने शरीर को वीर वेश में सजा कर प्रत्यञ्जा दाल बड़े वेग से कोदंड (धनुष) और तूणीर लेकर बाहर निकल पड़े।

श्री राम को धनुष में प्रत्यञ्जा चढ़ाते देख खर ने सेना के साथ दूषण को भेजा , उसने थोड़े समय यिद्ध किया और सेना सहित मारा गया । दैत्य त्रिशिरा ने राम को अपने पास देख बाणों कि वर्षा की लेकिन राम जी के बाण रूपी प्रचंड अग्नि के लिए ये सभी राक्षस तृण समूह के समान थे। राम जी ने तीन बानो से त्रिशिरा के शिर काट दिए। यह देख खर ने श्री राम के अंग पर शर संधान किया और राम जी के धनुष की प्रत्यञ्जा काट दी तब श्री राम ने अगस्त्य जी के दिए हुए धनुष पर प्रत्यञ्जा चढ़ा कर इ बाण छोड़ा उसी से खर धराशायी हो गया मृत्यु को प्राप्त हो गया। तब दंडकवन के सभी ऋषि एकत्रित हुए और उन्होंने राम जी को आशीर्वाद दिया । सीता जी को लेकर लक्ष्मण जी भी बाहर आ गए उन्होंने तड़प तड़प कर मरे हुए राक्षसों को देखा । देवताओं के साथ इंद्र ने राम जी पर पुष्प वर्षा की । सीता जी कहने लगीं ये जितने भी असुर हैं बड़े पराक्रमी होते हैं । आपने एकाकी होने पर भी किस प्रकार सबका वध कर दिया?
असुर कम्पन द्वारा रावण को खर दूषण वध का समाचार देना
कम्पन ने जाकर हाथ जोड़कर रावण से कहा खर सहित असुरदल मारा गया । दशरथनंदन राम और लक्ष्मण स्त्री को लेकर दंडकवन में उपस्थित हैं । उन्होंने शूर्पणखा के नाक कान काट दिए जिसे देखकर खर दूषण और त्रिशिरा आदि युद्ध करते हुए मृत्यु को प्राप्त हुए । संग्राम में राम की समता करने वाला कोई नहीं है , वे हम राक्षसों के लिए यमराज हैं । उनके साथ आपके युद्ध करने पर आपको विजय प्राप्त नहीं होगी, राम स्वयं कामदेव के समान हैं और कामदेव की रति भी राम की स्त्री के साथ कोई समता नहीं है, अगर उनकी स्त्री का हरण कर लिया जाय तो वह जीवित नहीं रहेंगे, दुःख से मर जाएंगे । यह सुनकर रावण सोचने लगा की उनकी स्त्री को किस प्रकार लाया जाय।
शूर्पणखा द्वारा राम जी के पराक्रम और सीता जी की सुंदरता का वर्णन !
शूर्पणखा खर का और १४ हज़ार राक्षसों का वध कराकर अपनी नाक दिखाती हुई रोकर रावण से बोली हे भाई ! दशरथ के पुत्र उस स्थान पर रहते हैं । उनके पास द्वतीय लक्ष्मी के सामान स्त्री है । मै उसके पास देखने गयी कोई अपराध भी नहीं किया, बिना किसी दोष के उन्होंने मेरे नाक कान काट दिए । मैंने रोते हुए खर को बताया सुनते ही खर ने जाकर उनके साथ संग्राम किया । उस राम ने त्रिशिरा दूषण सहित १४००० राक्षसों को मार डाला । हे भाई! पृथ्वी पर जितने भी शूरवीर राक्षस हैं, वे सब अगर इकठ्ठे होकर उससे युद्ध करें तो भी उससे हार जायेंगे हे भैया ! जिस प्रकार समुद्र का जल मापा नहीं जा सकता उसी तरह राम के पराक्रम का आंकलन नहीं हो सकता । उनके बाणों की नोक वज्र के सामान है , उन्हें जितने वाला पृथ्वी पर कोई नहीं है। उनके साथ जो स्त्री है उसके सामान सुंदरी मनुष्यों, नागों और देवताओं में भी नहीं है । सारे ब्रह्माण्ड में खोजने पर भी उसके समान सुंदर स्त्री नहीं मिलेगी । तुम्हारे महल में जितनीं भी सुंदर स्त्रियां हैं वे सब उसकी दासियाँ लगेंगी । यदि तुम उसे लंका में ला सके, तो उसकी शोभा देखते ही तुम्हारा मन खो जायेगा । इतना कहकर शूर्पणखा रोते रोते पृथ्वी पर गिर पड़ी ।
रावण का मारीच से मिलना, मारीच द्वारा राम चरित्र सुनकर रावण का भयभीत होना
दशानन मारीच से सीता हरण के हेतु मिलने गया तब मारीच ने रावण की मंशा समझ राम जी के चरित्र का वर्णन किया । मारीच ने कहा हे दशानन सुनो ! उस बालक में तो काल के गुण हैं । उसने मेरी माता ताड़का को मार डाला और सुबाहु के प्राण भी हर लिए । हे लंकेश्वर । उसने मुझे हाबोड़ा नामक बाण से प्रहार किया । बैल समझ कर मुझे खदेड़ दिया, मुझे इतनी दूर फेंक दिया पर मै किसी तरह बच गया। (यह तब की बात है जब ऋषि विश्वामित्र अपने यज्ञ की रक्षा के लिए राम जी और लक्ष्मण जी को ले गए थे मारीच सुबाहु यज्ञ में विघ्न डालने आये तो सभी राक्षसों का राम लक्ष्मण जी ने वध कर दिया था पर मारीच को एक बाण के द्वारा दूर फेंक दिया था) । मारीच ने फिर और कहा हे रावण! राम के साथ शत्रुता करने से लंका का वैभव नष्ट हो जायेगा । वे एक भी राक्षस को नहीं छोड़ेंगे । सभी को यमपुरी भेज देंगे । हे दशानन! इस समय मेरा कहना मानकर उनकी स्त्री का हरण मत करो । उनके साथ बैर करने से मै भी नष्ट हो जाऊंगा और तुम भी मारे जाओगे। मारीच का उत्तर सुनकर दशानन का शरीर क्रोध से कांपने लगा ।
कौशिक रामायण

कौशिक रामायण कन्नड़ भाषा के महान कवि बत्तलेश्वर द्वारा लिखी गयी है । कर्णाटक राज्य के विभिन्न जिलों में यह ग्रन्थ बहुत लोकप्रिय है ।
कौशिक रामायण १६ वीं सदी में रचित कन्नड़ भाषा का एक महाकाव्य है, महाकवि बत्तलेश्वर के नाम में कुछ मतभेद है की ये उनका मुख्य नाम है या उपनाम ।
कौशिक रामायण में ४४ सर्ग (अध्याय ) हैं और जिस तरह वाल्मीकि रामायण और रामचरित मानस में ७ कांड हैं , कौशिक रामायण युद्ध काण्ड में समाप्त हो जाती है अर्थात ६ कांड ही हैं उत्तरकाण्ड का वर्णन नहीं है। सबसे विस्तृत वर्णन युद्ध काण्ड का मिलता है । शुरू के पांच काण्ड बाल, आयोध्या, अरण्य, किष्किंधा और सुंदरकांड ११ सर्गों में ही समेट दिए हैं और युद्ध काण्ड १२वें सर्ग से ४४ वें सर्ग तक अर्थात ३० सर्गों में विस्तृत है ।
कौशिक रामायण विशेषताएं
कौशिक रामायण में सीता जी के स्वयंवर का बहुत भव्य वर्णन है जिसमें रावण, यक्ष, गन्धर्व, चन्द्रमा इन्द्रादि देवता भी उपस्थित बताये गए हैं । स्वयंवर सभा में सीता जी की सखियों के भी रूप का वर्णन है । सीता जी की सखियाँ उन्हें सभा में सभी उपस्थित लोगों का परिचय भी बताती हैं । यह प्रसंग वाल्मीकि रामायण से भिन्न है , और परशुराम जी का आगमन का प्रसंग भी कौशिक रामायण में वर्णित नहीं लगता ।
शूर्पणखा प्रसंग भी कुछ अलग कथा है कौशिक रामायण में। (शूर्पणखा के पुत्र का वध लक्ष्मण जी से हुआ और इस कारण शूर्पणखा राम लक्ष्मण दोनों को अपने जाल में फंसा कर उनके साथ बाद में विश्वासघात करने के बारे में सोचती है।)
साथ ही कई रामायणों में (वाल्मीकि रामायण में भी) लक्ष्मण जी का धनुष से रेखा खींचने का प्रसंग बहुत प्रसिद्द तो है पर मिलता नहीं । कौशिक रामायण में सीता जी के उलाहना देने पर जब वे (लक्ष्मण जी) दुखी होकर राम को ढूंढने जाने लगे तब उन्होंने कुटिया के सामने रेखा खींची और सीता जी को उससे बहार न आने की चेतावनी दी ।
किष्किंधा काण्ड की शुरुआत में हनुमान जी का राम से मुलने का प्रसंग कौशिक रामायण में बहुत अलग तरह से वर्णित है, जिसमें रामजी के आग्रह पर हनुमान जी स्वयं अपने बारे में बहुत विस्तार से राम जी को बताते हैं, जिसमें बचपन में सूर्य को फल समझ उसे खाने जाना, माता गरिजा के वरदान से उनका शरीर वज्र का हो जाना (वज्रांग), सूर्य देव ही हनुमान जी गुरु हुए और शास्त्र ज्ञान उन्होंने दिया ।
हनुमान जी द्वारा यह प्रसंग बड़ा ही अद्भुत है और उन्होंने कई रहस्य बताये बाली और सुग्रीव की उत्पत्ति के बारे में जो अधिकतर रामायणों में नहीं मिलता और अगर होगा भी तो अधिकतर राम कथा वाचक इन प्रसंगों को नहीं बताते ।
References :
- कौशिक रामायण, अनुवादक प्रो. एस. रामचंद्र, प्रकाशक – “भुवन वाणी ट्रस्ट ” सीतापुर रोड लखनऊ.
- विचित्र रामायण, अनुवादक श्री योगेश्वर त्रिपाठी, प्रकाशक – “भुवन वाणी ट्रस्ट ” सीतापुर रोड लखनऊ.