रामायण कितनी हैं ? (भाग-3)
आनंद रामायण – संस्कृत रामायणों में एक अनोखा , बहुमूल्य महाग्रंथ


इस लेख भाग 3 में किन रामायण ग्रंथों के बारे में चर्चा है
भाग १ में बहुत प्राचीन भुशुण्डि रामायण और अध्यात्म रामायण पर संक्षिप्त में बताया गया था, भाग २ में अद्भुत रामायण और कृतिवास रामायण, वर्तमान भाग ३ में हम आनंद रामायण के बारे में जानेंगे।
आनंद रामायण आसानी से online उपलब्ध है । हिंदी में पूरा ग्रन्थ का pdf भी online free में उपलब्ध हैं,आनंद रामायण में जो विशेष, रोचक, उपयोगी और ज्ञानवर्धक बातें हैं, अनसुनी कथाएं हैं, भाग 3 में उन्हीं की चर्चा है।
आनंद रामायण – संस्कृत रामायणों में एक अनोखा , बहुमूल्य महाग्रंथ

संस्कृत में लिखित रामायण: – वाल्मीकि रामायण, अध्यात्म रामायण, आनंद रामायण, भुशुण्डि रामायण और अद्भुत रामायण।
संस्कृत में लिखित रामायणों में आनंद रामायण कुछ अलग और विशिष्ट माना जाता है। रचयिता महर्षि वाल्मीकि ही माने जाते हैं लेकिन शंकाएं है उसमें क्योंकि कुछ कथाएं वाल्मीकि रामायण से बिलकुल अलग हैं और अनसुनी हैं।
अधिकांश रामायणों में 7 काण्ड हैं (बाल-काण्ड से उत्तर-काण्ड तक), परन्तु आनन्द रामायण में ९ काण्ड हैं।
1) सार काण्ड, २) यात्रा काण्ड, ३) याग काण्ड, ४) विलास कांड, ५) जन्मकाण्ड, ६) विवाह कांड, ७) राज्य कांड (पूर्वार्द्ध), राज्य कांड (उत्तरार्द्ध), ८) मनोहर काण्ड ९) पूर्ण काण्ड
आनंद रामायण की कुछ प्रमुख विशेषतायें
आनंद रामायण में प्रारम्भ में ही श्री वाल्मीकि मुनि कहते हैं: कि जिनके बायें भाग में सीताजी, सामने हनुमान, पीछे लक्ष्मण, दोनों बगल शत्रुघ्न और भरत, वायव्य ईशान अग्नि तथा नैर्ऋत्य-कोण में क्रमशः सुग्रीव, विभीषण, तारापुत्र युवराज अंगद और जाम्बवान् हैं, उनके बीच विराजमान श्याम कमल-सदृश मनोहर कान्ति वाले परम पुरुषोत्तम भगवान् श्री रामचन्द्रजी का मैं भजन करता हूँ
आनंद रामायण की कथा भगवान शिव और पार्वती जी के संवाद से शुरू होती है, जहाँ पार्वती राम और सीता के जीवन के सुखद पलों के बारे में जानने की जिज्ञासा व्यक्त करती हैं। शिव इसके उत्तर में आनंद रामायण की कथा सुनाते हैं।
अधिकतर रामायण भगवान् राम के जन्म से (बालकाण्ड) प्रारम्भ हो , स्वयंवर, वनवास, रावण वध और राम जी के राज्याभिषेक आदि क्रम से ही कथा चलती है। अर्थात बालकांड, आयोध्या काण्ड, अरण्य कांड, किष्किंधा कांड, सुंदरकांड, युद्ध कांड, उत्तर कांड आदि.. ये सभी काण्ड वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस में लगभग एक जैसे ही हैं।
लेकिन आनंद रामायण में इन सभी सात कांड की कथा पहले “सारकाण्ड” में ही पूरी कह देते हैं । आनंद रामायण में कुल १०९ सर्ग में १२३५२ श्लोक हैं ।सारी राम कथा जो अन्य रामायणों में ७ कांडों में है वह आनंद रामायण में सारकाण्ड के २५३० श्लोकों में ही पूरी कह दी गयी, तो आप कहेंगे की बाकी ९८२२ श्लोकों में फिर क्या है?
आनंद रामायण – ९ काण्ड के विषय
- सारकांड में ऋषिवाक्यसे दुष्ट रावणका हनन
- यात्राकांड में सीता के साथ रामकी तीर्थयात्रा
- यागकांड में अयोध्या में दस अश्वमेघ यज्ञ
- विलासकांड में पत्नी के साथ विलास
- जन्मकांड में लव-कुश की उत्पत्ति तथा सीता की पुनः स्वीकृति
- विवाह कांड में लव कुश के विवाह के लिए प्रस्थान
- राज्यकांडमें धर्म-पूर्वक पृथ्वी का रक्षण,
- मनोहरकांड में राम की पूजा आदि का वर्णन
- पूर्णकांड में सीता सहित भगवान रामचन्द्र के स्वधाम पधारने आदि का सुन्दर चरित्र वर्णित है
आनंद रामायण – नाम क्यों ?
आनंद रामायण की कथा भगवान शिव और पार्वती जी के संवाद से शुरू होती है, एक समय रामचन्द्रजी की भक्ति में तत्पर देवी पार्वती ने कहा—हे शम्भो ! आपने बहुत से पुराणों की सुन्दर कथा मुझे सुनायी । हे देव ! अब आप कृपा करके मेरी प्रीति बढ़ानेवाले रघुबीर रामचन्द्र के आनन्द-दायक कर्म और उनके जन्म आदि की मनोहर कथा सुनाईये। शिव जी बोले, हे कांते तुमने रामचंद्र का कथा विषयक बड़ा अच्छा प्रश्न किया है। मै उस मंगल-कारिणी कथा को विस्तारपूर्वक कहता हूँ। …
आनंद रामायण में असल में बहुत ही मनोहर और मन को आनंदित करने वाली कथाएं हैं और माता पार्वती का अनुरोध भी यही था शिव जी से ; उदाहरण के लिए
- महाराज दशरथ का कौशल्या जी से विवाह का प्रकरण जिसमें रावण ने कौसल्या जी और दशरथ जी का विवाह रोकने हेतु दशरथ जी से युद्ध किया कौसल्या जी का हरण किया
- दशरथ जी की पूर्व जन्म की कथा जिसमें वे धर्मदत्त नाम के विष्णु भक्त ब्राह्मण थे। प्रेत योनि में एक कलहा नाम की स्त्री को उन्होंने अपना पुण्यों का दान कर, प्रेत योनि से मुक्ति दिलाई थी वही अगले जन्म में महारानी कैकई हुईं ।
- पिंगला नाम की वैश्या का राम जी के समक्ष पहुँचने पर सीता जी का कोप और वेश्या की पिटाई।
- राम-राज्य की अनोखी घटनाएं, लव कुश और लक्ष्मण भरत शत्रुघ्न के पुत्रों के विवाह का सम्पूर्ण विवरण ।
- वाल्मीकि ऋषि के पूर्व जन्मो का वर्णन ।
- राम जी के ही द्वारा रामावतार को ही सबसे श्रेष्ठ बताना और बाकी अवतारों के दोषों का वर्णन
- राम राज्य की विशेषताएं ।
- ब्रह्मर्षि वाल्मीकि जी से राम जी के प्रश्न पर की आपने मेरे अवतार होने के पहले ही रामायण की रचना कैसे की? भविष्य की बातें आपको कैसे ज्ञात हुईं ? वाल्मीकि जी ने अपने पूर्व जन्म का वृतांत और एक भयंकर अपराधी डकैत से ब्रह्मर्षि कैसे बने सब राम जी को विस्तार से बताया ।
- भगवान् राम के द्वारा सभी तीर्थों का भ्रमण और अनेकानेक अश्वमेध यज्ञ का वर्णन
- भगवान् की विभिन्न स्तुतियां, (राम सहस्त्रनाम) विविध अनुष्ठान
आनंद रामायण की कुछ अनोखी अनसुनी कथाएं
मुद्गल मुनि द्वारा दशरथ जी को बताना की राम साक्षात नारायण हैं, (वनवास और रावण वध आदि के बारे में भी पहले से ही बता दिया था )
यह कथा सारकाण्ड में विस्तार से है, और अन्य रामायणों में इस कथा का विवरण नहीं मिलता। सीता स्वयंवर के उपरांत जिन राजाओं को मान की हानि हुईं उन्होंने आक्रमण किया तो राम लक्ष्मण भरत शत्रुघ्न और महाराज दशरथ भी युद्ध में रत हुए, उसमें भरत जी के घायल होने से राम जी ने लक्ष्मण से कहा – यहाँ से कुछ दूरी पर तपोनिधि मुद्गल मुनि का आश्रम है वहां जाकर तुम कल्याण-कारिणीं संजीवनी आदि जड़ी बूटियों को ले आओ ।
लक्ष्मण जी गए तो मुनि के शिष्यों ने बिना मुनि की आज्ञा के बूटियां लेने से मना किया तब लक्ष्मण जी वापस राम जी से पूंछने गए तो राम जी ने कहा की विलम्भ हो रहा इसलिए बिना शस्त्र प्रयोग के तुम जल्दी बूटियां ले आओ । तो लक्ष्मण जी बूटियां ले आये पर समाधि से निवृत होने पर जब शिष्यों ने मुद्गल मुनि को सब बताया तो उन्हें क्रोध हुआ, लेकिन जब उन्हें पता पड़ा की राम जी की आज्ञा से यह हुआ तब वे शांत हो गए और तभी दशरथ जी इस पूरे प्रसंग से मुनि के रुष्ट होने का समाचार मिलने पर तुरंत स्वयं मुद्गल ऋषि के समक्ष पहुंचे ।
मुद्गल ऋषि ने तब राजा और रानियों का यथोचित सत्कार किया, महाराज दशरथ ने अनेक क्षमा याचना की तो मुनि बड़े प्रसन्न हुए और कहने लगे की नहीं तुमने मेरे ऊपर बड़ा उपकार किया है, नहीं तो ध्यानयोग्य और माया से मनुष्य का रूप धारण किये, सीता सहित आपके पुत्र राम का दर्शन मुझे कैसे प्राप्त होता। तब मुनि की आज्ञा से दशरथ जी ने जिज्ञासा-वश प्रश्न किये। राजा ने कहा मुनिवर ! राम का भविष्य कैसा है ? मै उसका हित अहित जानना चाहता हूँ ।
मुद्गल मुनि कहने लगे “साक्षात नारायण, सर्वव्यापी जनार्दन विष्णु भगवान् पृथ्वी का भार उतारने , तथा पूर्व जन्म में आपको वरदान देने के कारण आपके प्रताप से स्वयं अवतरित हुए है । ये अधर्म का नाश करके धर्म की वृद्धि करेंगे। हे राजन, आपके देवलोक जाने के बाद ये दस हज़ार दस सौ वर्षों तक राज करेंगे , ये सप्तदीप के अधिपति और महँ राजा होंगे, इनके दो पुत्र और चार पुत्र वधुएं होंगी २४ पोते और १२ पोतियां होंगी। आपके पुत्र के असंख्य परपोते और पोतियां होंगे।, तदोपरांत मुद्गल मुनि ने उन्हें राम जी के अवतार के प्रयोजन, वनवास, सीता जी का अपहरण, रावण वध आदि सभी के बारे में बताया और कहा की यह गुप्त बात किसी को भी कभी न बताएं ।
महाराज दशरथ के ऐसे कौन से सुकृत्य थे की भगवान् स्वयं राम रूप में उनके पुत्र बने ? महाराज दशरथ के पिछले जन्म की कथा मुद्गल मुनि द्वारा
ये सब सुनकर महाराज दशरथ बहुत प्रसन्न हुए और फिर उन्होंने अपने स्वयं के पूर्व जन्मों के बारे में पूंछा की, किन सुकृतों (सत्कर्मों) के कारण साक्षात भगवान् मेरे पुत्र बने ? और साक्षात महालक्ष्मी सीता होकर मेरी पुत्र वधु बनीं ?
तब मुनि राजा से कहने लगे, राजन, कवीरपुर नामक नगर में एक विख्यात, धर्मज्ञ ब्राह्मण थे जिनका नाम धर्मदत्त था और वे भगवान् विष्णु के अनन्य भक्त थे, सभी विष्णु व्रतों और पूजन में रत रहते थे, एक बार वे कार्तिक में रात्रिजागरण करके चौथे पहर पूजन सामग्री सहित हरी मंदिर को जा रहे थे की तभी उन्हें घर घर शब्द करती हुईं, टेढ़े दांतों वाली, जीभ को हिलाती, लाल नेत्रों वाली जिसका शरीर का मांस सूख गया था, एक राक्षसी दिखी, उससे उन्हें बड़ा भय हुआ। धर्मदत्त ब्राह्मण भय के कारण नारायण नाम जाप के साथ उस राक्षसी पर तुलसी पत्र और जल छिड़कने लगे, बस इससे ही उस राक्षसी के सभी पाप धुल गए और उसको अपने पूर्व जन्म के कर्मो का स्मरण हो आया।
तब वह कलहा नाम की राक्षसी ब्राह्मण को प्रणाम कर कहने लगी – हे ब्राह्मण मै अपने पूर्व जन्म के दुष्कृत्यों के कारण इस दशा को प्राप्त हुईं। मैंने कभी पिछले जन्म में न वचन से न ही कर्मो से कभी भी अपने पति की भलाई नहीं की, खाना पहले स्वयं खा कर बचा हुआ उसको देती थी पति की कोई बात नहीं मानती थी ।
मेरे पति को उनके एक मित्र ने ये सलाह दी की अगर तुम्हारी पत्नी तुम्हारा कोई कहना न मान सब उल्टा करती है तो तुमको जो काम करवाना हो उसका उल्टा कहा करो ।
मेरे पति ने फिर अपने मित्र की बात पर अमल करते हुए मुझसे विपरीत बात कहकर सभी काम करवाने शुरू किये , पति ने मुझसे कहा मेरे मित्र को तुम कभी भोजन के लिए मत बुलाना वह बड़ा दुष्ट है। पति का यह वचन सुनकर मैंने कहा तुम्हारा मित्र ब्राह्मणों में श्रेष्ठ है बड़ा सज्जन है , उसको मै आज ही भोजन के लिए बुलाती हूँ । फिर मै उसके दोस्त को स्वयं ही बुला लायी । उसके बाद से मेरे पति विपरीत कथन से ही सब कार्य करवाने लगे । एक दिन मेरे पति उनके पिता की मरण तिथि आने पर कहने लगे आज मै अपने पिता का श्राद्ध नहीं करूँगा , इस पर मैंने अपने पति धिक्कारा, की तुम पुत्र धर्म को नहीं जानते पिता का श्राद्ध नहीं करना चाहते, पता नहीं तुम्हारी क्या गति होगी, और मैंने झटपट ब्राह्मणों को न्योता दे दिया । फिर पति ने कहा यदि करना ही है तो सिर्फ एक ही ब्राह्मण को बुलाना और ज्यादा खर्च नहीं करना । यह सुनकर मैंने १८ ब्राह्मणों को निमंत्रण देकर खूब पकवान बनाये। इस तरह से मेरे पति ने विपरीत वचनों के द्वारा विधिवत श्राद्ध करवाया।
देव वशात, भूल से उन्होंने कहा इन पिंडों को प्रेम से पवित्र तीर्थ के जल में फेंक आओ , मैंने उन पिंडो को जाकर पाखाने में डाल दिया, यह देख पति हाय हाय करने लगा और कहा पखाने से पिंडो को बाहर मत निकालना, तब शौचकूप में कूदकर मैंने उन पिंडों को बाहर निकाल लिया, तब उनने कहा देखो इन पिंडों को किसी तीर्थ के जल में मत डालना तो मैंने आदरपूर्वक उन पिंडों को तीर्थ जल में डाला ।
कलहा राक्षसी का पूर्व जन्म में आत्महत्या करना तथा यमलोक में दुष्कर्मों की फल प्राप्ति
मुझसे दुखित हो मेरे पति ने दूसरा विवाह करने का निश्चय किया , तब मैंने जहर खा कर अपने प्राण त्याग दिए। फिर यमदूत मुझे बाँधकर यमराजके पास ले गये । यमराज मुझे देखकर चित्रगुप्तसे कहने लगे –
चित्रगुप्त ! देखो, इसने अच्छा कर्म किया है, या बुरा, जिससे इसको वैसा ही फल दिया जाय । कलहा कहने लगी- यह सुनकर चित्रगुप्त मुझे धमकाते हुए कहने लगे कि इसने तो कोई अच्छा कर्म कभी किया नहीं। यह मिष्ठान बनाकर खाती थी, परन्तु अपने पति को नहीं देती थी। इसलिये यह बगुली की योनिमें जाकर अपनी ही विष्ठा खानेवाली पक्षिणी बने ।
प्रतिदिन झगड़ा तथा पति से द्वेष करने के कारण यह विष्ठा भक्षण करने वाली सूकर योनि में पैदा हो । हे यम। इधर-उधर छिपकर भोजन बनाने के पात्रमें अकेली ही खानेवाली यह बिल्ली बने। पति के उद्देश्य से इसने आत्मघात किया है । इस कारण यह अति निन्दित प्रेत-योनि मे अकेली रहे, हे यम ! इसको दूतो के द्वारा मरु प्रदेशमें भेज देना चाहिये। वहाँ जा तथा प्रेत बनकर यह बहुत काल पर्यन्त निवास करे यह पापिनी उपर्युक्त सभी योनियोंको भोगे । कलहा बोली- हे द्विज ! तब यमदूतों ने क्षण ही भरमें मुझे मरुदेशमें पहुँचा दिया, वहाँ प्रेतयोनिमें डालकर वे अपने स्थानको चले गये । मैं पन्द्रह वर्ष तक प्रेतयोनिमें रही, अपने किये हुये कर्म के अनुसार मैं सदा भूख-प्यास से अत्यन्त दुःखिनी रहने लगी । आज मैंने तुम्हारे द्वारा तुलसी जल डाले जाने से मेरे सारे पाप दूर हो गए हैं । इस कारण हे विप्रेन्द्र ! अब ऐसी कृपा करो की मेरी भावी तीन योनिओं से मुझे मुक्ति मिल जाये , हे मुनि श्रेष्ठ मै तुम्हारी शरण में आयी हूँ । तुम मेरा इस प्रेत योनि से उद्धार करो ।
धर्मदत्त ब्राह्मण द्वारा कलहा राक्षसी को अपने कार्तिक वृत का आधा फल का दान राक्षसी का उद्धार
धर्मदत्त बोले—तीर्थ, दान तथा व्रतके द्वारा पाप क्षीण होते हैं, परन्तु प्रेतशरीरमें रहने से तुम्हारा उनपर अधिकार नहीं है। तुम्हारी इस दुर्दशाको देखकर मेरा मन बहुत दुखी हो रहा है । जबतक तुम्हारा इस दुःखसे उद्धार न होगा, तबतक मुझको शान्ति नहीं मिलेगी, यह नीच प्रेतत्व और तीन योनियोंको भोगानेवाला तुम्हारा महान् पाप साधारण पुण्योंसे क्षोण न होगा। इस कारण जन्मसे लेकरअबतक किये हुए अपने कार्तिकव्रतके पुण्यका आधा भाग मैं तुमको देता हूँ । उससे तुम सद्गतिको प्राप्त होओगी। कार्तिकव्रत के पुण्य के समान यज्ञ-दान- तीर्थ आदि कोई भी नहीं हो सकता । यह बात निश्चित है । मुनि मुद्गल कहने लगे-हे राजन् ! इतना कहकर धर्मदत्त ने ज्यों ही उसके ऊपर तुलसीदल तथा जल छिड़ककर द्वादश अक्षरोंका मंत्र सुनाया । त्यों ही प्रेतयोनि से मुक्त होकर वह जलती हुई अग्नि की लपटके समान दिव्य रूप धारण करके उर्वशीके समान सुन्दर स्त्री बन गयी, तब वह ब्राह्मणके चरणोंको दण्डवत् प्रणाम करके सहर्ष गद्गद वाणीसे कहने लगी । कलहा बोली – हे द्विजों में श्रेष्ठ ट्विज ! आपकी कृपासे मैं नरकमें जाने से बच गयी। पापसमुद्र में डुबती हुई मुझ पापिनी को बचाकर आपने नाव का काम किया है।
महारानी कैकई का भी पूर्व जन्म वृतांत और धर्मदत्त ब्राह्मण ही महाराज दशरथ बने
मुद्गल मुनि कहने लगे – ब्राह्मण ने देखा विष्णु रूपधारी देवताओं से युक्त एक सुंदर विमान उत्तर रहा है, उन दोनों गणों ने कहा हे द्विजश्रेष्ठ तुम धन्य हो , तुमने जो बचपन से ही कार्तिक मॉस वृत किया है और उसके पुण्य का आधा फल दान दिया है उससे तुम्हारा पुण्य दोगुना हो गया है। और कलहा के अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो गए हैं । तुम्हारे दिए हुए तुलसी जल और कार्तिक वृत के पुण्य से यह विष्णु भगवान् के सानिध्य को प्राप्त हुई है। तुम इस जन्म के अंत पर स्त्री सहित बैकुंठ में विष्णु सानिध्य तथा सरूपता को प्राप्त करोगे ।
हे धर्मदत्त वे धन्य हैं बड़े धर्मात्मा और सफल जन्म वाले हैं, जिन्होंने तुम्हारी तरह विष्णु आराधना की है। अपने भक्तों को वे क्या नहीं दे देते, उत्तानपाद के पुत्र को ध्रुव पद पर स्थापित किया, जिन भगवान् के नामस्मरण मात्र से मनुष्य सद्गति को प्राप्त हो जाता है। प्राचीन काल में मगर के द्वारा पकड़ा गया गजेंद्र भगवान विष्णु के स्मरण से मुक्त होकर विष्णु सानिध्य को प्राप्त हुआ और जय नाम का द्वारपाल हुआ। ग्राह (मगर) भी विष्णु जी के चिंतन से विजय नाम का द्वारपाल बना। तुमने भी जीवन पर्यन्त भवन का विष्णु भगवान् का पूजन किया है इसलिए तुम भी अपनी पत्नी सहित उनके सानिध्य को प्राप्त होगे।
तत्पश्चात पुण्य क्षीण होने पर तुम पृथ्वी पर जन्म लोगे, और सूर्यवंश में बड़े प्रख्यात राजा बनोगे तुम्हारा नाम दशरथ होगा और दोनों रानियों के अलावा यह तुम्हारे आधे पुण्य की भागिनी कलहा निःसंदेह तुम्हारी कैकेयी नाम की तीसरी -स्त्री (पत्नी) होगी। भगवान् स्वयं देवताओं का कार्य -साधन करने के लिए तुम्हारे पुत्र रूप में राम नाम धारण कर अवतार लेंगे, रावण कुम्भकरण आदि सभी असुरों का वध कर धर्म की स्थापना करेंगे ।,
महाराज दशरथ को धर्मदत्त की कथा सुनाने के बाद मुनि बोले – बहुत समय बैकुंठ धाम में रहकर अब तुम इतने बड़े राजा बने हो, तुम अपनी तीनो स्त्रियों के साथ यहाँ आये भगवान् विष्णु तुम्हारे पुत्र राम बने , शेष (शेषनाग) – लक्ष्मण, ब्रह्मा – भरत और सुदर्शन चक्र – शत्रुघ्न बने । फिर मुनि ने राजा दशरथ का यथोचित सत्कार कर विदा किया।
ब्रह्मर्षि वाल्मीकि जी ने रामावतार होने से पहले ही रामायण की रचना कर दी थी !
वाल्मीकि जी ने राम जी के पूंछने पर अपने पूर्व जन्म का वृतांत सुनाया
राम जी ने ब्रह्मर्षि वाल्मीकि जी से पूछा की मेरे अवतार लेने के पहले ही आपने पूरी रामायण की रचना कैसे की आपको भविष्य ही बातें किसने बतायीं ? पूर्व जन्म में आप कौन थे और आपने कौन से पुण्य कार्य किये थे यह मुझे बताएं । वाल्मीकि जी ने कहा हे राम ! आपकी नाम की महिमा का वर्णन कौन कर सकता है, जिसके प्रभाव से मै आज ब्रह्मर्षि पद पर बैठा हूँ , अच्छा मै अपने पूर्व हम का वृत्तांत आपको बतलाता हूँ।
एक शंख नाम के महान, सिद्ध, यशस्वी ब्राह्मण किसी कारण एक निर्जन वन में पहुँच गए जहाँ जल भी मिलना कठिन था, वैशाख मॉस की गर्मी में वे दोपहर में बैठे थे तभी एक दुष्ट व्याध उनके पास आ पहुंचा, वह बहुत ही निर्दयी और भयानक था और अपनी तलवार से डरा कर उसने उन सूर्य के सामान तेजस्वी ब्राह्मण के कुण्डल, आभूषण, जूते, छतरी, वस्त्र, और कमंडल आदि छीन लिए, और उसके बाद जाओ कहकर छोड़ दिया । बेचारा ब्राह्मण तपती भूमि में चलने लगा उसके पैर जलने लगते तो तरुण आदि पर ठंडा कर आगे बढ़ता, जब बहुत ज्यादा जलने लगे तो वह एक कपडा बिछा कर बैठ गया, फिर थोड़ीदेर में हाहाकार करता हुआ फिर आगे बढ़ा । इस तरह से दुखी देख व्याध के मन में आया की क्यों न मै इस ब्राह्मण के जूते लौटा दूँ। मैंने उसकी सभी चीजें छीन कर अपना चोर धर्म का पालन तो कर ही लिया है। इनके जूते लौटाने से इनका क्लेश कम होगा और मुझे कुछ पुण्य ही मिलेगा, वैसे भी जूते छोटे हैं और मेरे किसी काम के हैं नहीं। ऐसा सोच वह दौड़ता हुआ गया और उसने शंख ब्राह्मण के जूते लौटाए।
ब्राह्मण को बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने कहा हे वनचर, तुम सुखी रहो , तुम्हारे पूर्व जन्म के पुण्य से ही तुम्हारी ऐसी बुद्धि हुई, जिससे तुमने वैशाख मॉस में जूते का दान किया। यह सुनकर व्याध ने पूछा, मैंने पूर्व जन्म में ऐसा कौन सा पुण्य किया था मुझे विस्तार से बताएं । तब ब्राह्मण ने कहा की किसी छाया वाले स्थान पर चलें जहाँ कुछ खाने और जल की व्यवस्था हो वहां मै तुम्हे तुम्हारे पूर्व जन्म के बारे में सब बताऊंगा। व्याध उन्हें ऐसे स्थान पर ले गया और स्नान पूजन उपरांत शंख ब्राह्मण ने कहा ।
शंख ब्राह्मण द्वारा व्याध को उसके पूर्व जन्म के दुष्कर्मों के बारे में बताना
तुम पिछले जन्म में शाकल नाम की नगरी में स्तम्भ नाम के ब्राह्मण थे, श्रीवत्स गोत्र में तुम्हारा हम हुआ था, किन्तु तुम बड़े भारी पापी थे । कुसंग से तुम एक वैश्या पर मुग्ध हो गए, और अपनी सभी नित्य क्रियाओँ का त्याग कर अचार विहीन हो गए और उस वैश्या के साथ ही अपने घर पर रहने लगे। तुम्हारी धर्मपत्नी बड़ी रूपवती थी और पतिव्रता थी और वह तुम दोनों की बहुत सेवा किया करती थी।
तुम्हें प्रसन्न रखने के लिए वह तुम दोनों के पैर भी धोती थी वैश्या के मना करने पर भी तुम दोनों की उसने बहुत सेवा की। फिर तुमने कुछ ऐसा खा लिया जिससे तुम्हें अति दारुण रोग हुआ, तुम्हारा शरीर गलने लगा , जब तक संपत्ति थी वैश्या रही फिर किसी और के पास चली गयी। ऐसी अवस्था में स्तम्भ अपनी पत्नी से रो रो कर गुहार लगाता था की मुझे क्षमा करो मुझ वैश्यागामी और निष्ठुर पुरुष की रक्षा करो, मैंने तुम्हारा बहुत बुरा किया। तुम्हारी पत्नी इतनी सती साध्वी और पतिवृता थी की उसने हमेशा तुमको ढाढस बंधाया और कहती थी की अपने पूर्वजन्म के पाप ही दुःख रूप से प्राप्त होते हैं। जो उन्हें सेह लेता है वह उत्तम है। इसलिए मुझे अपने ही पूर्व जन्म के कर्मो का फल भोगने पर कोई दुःख या विषाद नहीं है।
तुम्हारी पत्नी ने बहुत देवी देवताओं से मन्नतें मांगी प्रार्थना की की तुम स्वस्थ हो जाओ । तब एक दिन तुहारे घर एक बहुत विद्वान् महात्मा देवल ऋषि पधारे , तुम्हारी स्त्री ने तुम्हारी आज्ञा ली की एक बहुत बड़े वैद्य पधारे हैं क्या मैं उनकी सेवा सत्कार करूँ? मुझे लगता है वे जरूर आपका रोग मिटा देंगे। तब तुमने उसे आज्ञा दे दी फिर तुम्हारी पत्नी ने प्रसन्न मन से देवल ऋषि का पूजन सत्कार किया।
कुछ समय बाद तुम्हारी मृत्यु हो गयी और मृत्यु के समय तुमने वैश्या का स्मरण किया था । तुम्हारी पत्नी तुम्हारे साथ ही चिता में सती हो गयी और वैकुण्ठ लोक चली गयी । तुमने अपने ब्राह्मणोचित कार्य त्यागे थे और अंत समय वैश्या का चिंतन किया इसलिए हिंसा में आसक्त घोर पापमय इस व्याध योनि में उत्पन्न हुए हो। चूँकि तुमने देवल ऋषि के पूजन के लिए आज्ञा दी थी इस पुण्य के प्रभाव से तुम्हारे धर्मबुद्धि हुई और तुमने मेरे जूते लौटाए । धवल ऋषि के चरण जल को तुम्हारी पत्नी ने तुम्हें पिलाया था उस पुण्य के प्रभाव से तुम्हारी मुझसे भेंट हुई और अपने पूर्व जन्म के बारे में जान पाए।
शंख मुनि ने व्याध को भावी जन्म के विषय में बताया की उसके एक छोटे से पुण्य से उसे सप्तऋषियों के दर्शन और कृपा प्राप्त हुई
शंख ब्राह्मण ने कुछ और बातें बतायीं और बोले, मैंने अपनी योग दृष्टी से तुम्हारे पूर्व जन्म के पाप पुण्य बताये हैं । अब मै तुम्हें भावी जीवन के बारे में बतलाता हूँ, सुनो। तुम्हारा अगला जन्म महान तेजस्वी क्रणु ऋषि के वीर्य से होगा किरात लोग तुम्हारी रक्षा करेंगे और तुम उन्ही के साथ रहोगे । जो तुम इस समय मेरा जूता वापस दे रहे हो उस पुण्य से तुम्हारी सप्तऋषियों से भेंट होगी, और उनकी दया से तुम वाल्मीकि नाम के ऋषि होओगे और रामायण की रचना करोगे।
इस प्रकार वाल्मीकि जी ने राम जी को अपने पूर्व जन्म की कथा सुनाई । व्याध जीवन के बाद कृणु ऋषि का पुत्र होकर जन्मा लेकिन किरातों ने ही मुझे पाला और मेरे कर्म चोरी डकैती आदि थे । एक बार मैंने एक विकराल जंगल में सप्तऋषियों को देखा , ज्वलंत अग्नि तथा सूर्य के सामान उनका प्रकाश था । उन्हें देखते ही उनको लूटने के लिए मैं दौड़ा, ठहरो ठहरो कहकर चिल्लाने लगा , ऋषियों के पूछने पर मैंने बोला आपसे कुछ लेने के लिए मेरे घर पर सब भूखे बैठे हैं उनका पालन पोषण के लिए मै वन वन घूम रहा हूँ ।
तब ऋषियों ने मुझसे कहा की अपने कुटुम्बियों से जाकर पूंछो की मै जो नित्य पाप की कमाई से तुम लोगो का भरण पोषण कर रहा हूँ , तुम सब भी उस पाप का फल भोगोगे या नहीं । यह विश्वास रखो की जब तक तुम लौट कर नहीं आते तब तक हम यही तुम्हारी प्रतीक्षा करेंगे ।
तब मै अपने निवास जाकर अपने सभी कुटुम्बिओं से पूंछा की वे मेरे पाप के भागी बनेगें या नहीं, तो सभी ने मन कर दिया, सभी ने उत्तर दिया की तुम जो पाप कर रहे हो उससे हमे कोई लेना देना नहीं है, हम तो केवल फल चाहते हैं । उनकी बात सुनकर मुझे बहुत दुःख हुआ , मै फिर लौट कर आया तो देखा सप्तऋषि मेरा रास्ता देख रहे थे । उन ऋषि मुनिओं के दर्शन से ही मेरा मन पवित्र हो गया और तुरंत मै अपने धनुष बाण आदि फेंक कर उनके चरणों में लोट गया , और कहने लगा – हे मुनिश्रेष्ठ ! मै नरक के महासमुद्र में गिर गया हूँ मेरी रक्षा कीजिये। तब ऋषियों ने मुझे उठाया और कहा आज हम लोगों का समागम तुम्हारे लिए बड़ा ही कल्याणकारी हुआ है, हम तुम्हें ऐसा उपदेश देंगे जिससे सब पापों से छूट जाओगे।
सप्तऋषियों द्वारा किरात को राम नाम का उल्टा “मरा” नाम का जाप करने का उपदेश
इसके बाद ऋषियों ने आपस में मंत्रणा की की नियम तो यह है की सदाचारी मनुष्य को ही उपदेश देना चाहिए, यह ब्राह्मणाधम एक असाधारण दुराचारी है । फिर भी हमारी शरण आया है इसलिए कोई उपदेश देकर इसकी रक्षा करनी चाहिए । इस प्रकार निश्चय करके हे राम ! उन्होंने आपके उलटे नाम (राम की जगह मरा) मरा का उपदेश दिया और कहा तुम एकाग्र मन से “मरा” का जप करो जबतक हम सब लौट कर नहीं आएं । ऐसा कहकर वे दिव्य ऋषिगण चले गए, जैसा उन्होंने बताया था ठीक उसी तरह से एकाग्र मन से मै जप करने लगा मेरा मन जप में इतना रम गया की मुझे शरीर की ही सुध नहीं रही । साक्षी के लिए मैंने एक दंड सामने गाड़ दिया था । मुझे इस तरह जप करते कई वर्ष बीत गए दीमकों (वाल्मीकों) ने मेरे शरीर में मिटटी का ढेर लगा दिया, मेरे तपोबल से सामने गड़ा दंड एक सूंदर वृक्ष बन गया था ।
एक हज़ार युग बीतने के बाद वे सप्त-ऋषि आये और मेरे बिमौटे (वाल्मीकों के द्वारा बनाया मिटटी का ढेर) के समीप आकर मुझसे कहा निकलो यह सुनकर मै तुरंत उठ खड़ा हुआ। तब ऋषियों ने कहा की वाल्मीक (बिमौटे) से तुम्हारा पुनर्जन्म हुआ है । इसलिए तुम मुनीश्वर वाल्मीकि हो गए हो । इतना कहकर वे सप्तऋषि आकाश मार्ग से चले गए, इस तरह हे राम, आपके नाम के प्रभाव से मै ऐसा ऋषि हो गया।
एक बार शिवजी ने ब्रह्मा को आपका चरित्र सुनाया था , ब्रह्मा जी ने वही चरित्र अपने पुत्र नारद जी को सुनाया और नारद जी ने आपका पूर्ण चरित्र मुझे सुनाया ।
कुछ समय बीतने पर एक व्याध के द्वारा मारे गए एक मादा पक्षी के दुख भरे विलाप से मै बहुत द्रवित हुआ और स्वतः ही मेरे मुख से एक श्लोक निकला: “मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः। यत्क्रौंचमिथुनादेकं वधीः काममोहितम्॥” (हे निषाद! तुझे कभी शांति नहीं मिलेगी, क्योंकि तूने प्रेम में लीन क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक को मार डाला है)। इसके अनन्तर ब्रह्मा जी ने आकर मुझे आपका सम्पूर्ण चरित्र सुनाया तब उन्ही के कहने से मैंने सौ करोड़ श्लोकों में आपका चरित्र रचा ।
इस तरह ब्रह्मर्षि वील्मीकी ने श्री राम को अपने पूर्व जन्म से लेकर ब्रह्मर्षि बनने तक की पूरी कथा सुनाई, यद्दपि राम जी सब जानते थे पर सांसारिक लोगों के भले के लिए एवं वाल्मीकि ऋषि के तप और नाम महिमा आदि का ज्ञान सभी को पता पड़े इसीलिए ऐसी लीला भगवान् ने की।
राम राज्य की विशेषताएं :
रामजी के राज्य में पृथ्वी पर्यन्त सभी सुख और आनंद पूर्वक और निर्भय रहते थे ! सभी प्रजा वर्णानुसार धर्म पालन करती थी। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी अपने वर्ण केअनुसार आचरण करते थे इसलिए सभी स्वस्थ, संपन्न और सुखी हुआ करते थे । मनुष्य ही नहीं पेड़ पौधे पशु आदि भी स्वस्थ और सुखी हुआ करते थे गौ धन की अधिकता थी, खूब देवालय थे।
राम-राज्य में अन्याय, अधर्म अपराध आदि का नामों-निशान नहीं था । सभी मनुष्यों में सात्विक गुण की अधिकता होती थी । प्रजा में कोई भिखारी नहीं था केवल गुरुकुल के ब्रह्मचारी विद्यार्थी ही भिक्षुक थे । राम जी के १० हज़ार वर्ष से भी अधिक राज्य में कभी अकाल नहीं पड़ा, स्त्रियां विधवा नहीं हुईं, पिता के रहते कभी पुत्र की मृत्यु नहीं हुई । सभी पुरुष एक पत्नीव्रत हुआ करते थे और सभी स्त्रियां पतिव्रता हुआ करतीं थीं। कोई संतान हीन नहीं था न ही कोई निर्धन था ।
राम राज्य में कोई अकाल मृत्यु का ग्रास नहीं हुआ, पुत्र के लिए माता-पिता की चरण सेवा ही देवपूजन, उपवास, वृत और तीर्थ हुआ करता था, नारी के लिए अपने पति के चरण पूजन और पति की बात मानना ही श्रेष्ठ धर्म माना जाता था, सदा छोटा भाई बड़े भाई का आदर करता था, सेवक प्रसन्न मन से अपने मालिक की सेवा किया करते थे।
सभी प्रजा गण, विद्वानों और ब्राह्मणो के मनोरथ पूर्ण करने को उद्धत रहते थे । विद्वान् से तपस्वी, तपस्वी से जितेन्द्रय, जितेन्द्रिय से भी ज्ञानी मनुष्य श्रेष्ठ माना जाता था और ज्ञानियों से भी ऊंचा पद सन्यासियों का हुआ करता था।
Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit. Ut elit tellus, luctus nec ullamcorper mattis, pulvinar dapibus leo.
Wow, it was never known to me that story of Ram i.e. Ramayan has been told in so many different ways. Rishi Valmiki himself has created so many different version. It not shows the strength of the characters to hold interest but the prowess of the poet also to narrate the same story in varied versions.
Ram Rajya ka itna vistar aur Sundar varnan Anand Ramayan mein hi dekhne Ko Mila Anand Ramayan ko jan jan Tak pahunchane ko aapka बहुत-बहुत sadhuvaad
अद्भुत ज्ञान, इतना विस्तार से सुन्दर लेखनी, जन जन के पास यह पहुंचाना चाइये 🌹
I was unaware of it, by knowing i m really surprised. Very nice Thanks for informations
Good 👌👏