महाभारत – क्यों इस महान ग्रंथ को “पंचम वेद” कहा जाता है
सनातन धर्म के असंख्य पवित्र ग्रंथों में महाभारत का स्थान अत्यंत विशिष्ट और अद्वितीय है। आज के समय में बहुत से लोग इसे केवल राजवंशों के बीच हुए युद्ध की कहानी समझ लेते हैं। यह धारणा अत्यंत सतही और भ्रामक है। वास्तविकता यह है कि महाभारत संसार का एक ऐसा महान ग्रंथ है जिसमें धर्म, नीति, आध्यात्मिकता, मानव मनोविज्ञान, समाज व्यवस्था और मोक्ष के मार्ग का अद्भुत समन्वय मिलता है।
इतना ही नहीं, प्राचीन परंपरा में महाभारत को “पंचम वेद” अर्थात पाँचवाँ वेद कहा गया है। इसका कारण यह है कि इस ग्रंथ में वेदों का सार अत्यंत सरल और जीवन के वास्तविक प्रसंगों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।
महाभारत केवल कथा नहीं है। यह जीवन का पूर्ण मार्गदर्शक है। इसमें धर्म क्या है, अधर्म क्या है, मनुष्य को कठिन परिस्थितियों में क्या करना चाहिए, कर्म और भाग्य का संबंध क्या है, और अंततः आत्मा की मुक्ति का मार्ग क्या है — इन सबका गहन विवेचन मिलता है।
लेकिन महाभारत की महानता को समझने से पहले यह आवश्यक है कि हम उससे जुड़े कुछ ऐसे महत्वपूर्ण तथ्यों को जानें जो आज बहुत कम लोगों को ज्ञात हैं।
महाभारत: वह ‘पंचम वेद’ जिसकी विशालता और रहस्य जानकर आप अचंभित हो जायेंगे !
जो महाभारत हम पढ़ते हैं, वह पूर्ण ग्रंथ का केवल एक छोटा सा हिस्सा है, भगवान वेदव्यास जी ने मूल महाभारत की रचना 60 लाख श्लोकों में की थी। इस 60 लाख में से 30 लाख श्लोक देवलोक में हैं, जिन्हें देवता पढ़ते हैं।, 15 लाख श्लोक पितृलोक में और 14 लाख श्लोक गंधर्व लोक में हैं। शेष १ लाख श्लोक पृथ्वी पर ।
हम मनुष्यों के पास जो 1 लाख श्लोक उपलब्ध हैं, वे उस अथाह ज्ञान की मात्र एक बूँद हैं। किंतु आश्चर्य यह है कि उस एक बूँद में भी वह सामर्थ्य है जो समस्त सृष्टि के रहस्यों को सुलझा सके।
भगवान वेदव्यास द्वारा रचित महा ग्रन्थ – महाभारत स्वयं भगवान गणेश के द्वारा लिखा गया
भगवान वेदव्यास कोई सामान्य ऋषि नहीं, बल्कि स्वयं भगवान विष्णु के कला अवतार हैं। उनका जन्म ‘पाराशर ऋषि’ और माता ‘सत्यवती’ के माध्यम से एक द्वीप पर हुआ, इसलिए उन्हें ‘कृष्ण द्वैपायन’ कहा गया।
हर द्वापर युग में भगवान व्यास के रूप में आते हैं क्योंकि द्वापर युग के पश्चात कलियुग में मनुष्यों की मानसिक और शारीरिक क्षमताएं कम होने लगती है इसलिए वे ‘वेद’ को चार भागों में विभाजित करते हैं, साथ ही अनेक पुराणों एवं महाभारत की रचना करते हैं जिससे कलियुग की जनता को वेदों के ज्ञान सुलभ हो सके …इसीलिए उन्हें ‘वेदव्यास’ (वेदों का विस्तार करने वाला) कहा गया।
भगवान वेदव्यास ने जब इस ग्रंथ की रचना का संकल्प लिया, तो उन्हें एक ऐसे बुद्धिमान लेखक की आवश्यकता थी जो उनके वैचारिक वेग को आत्मसात कर सके। ब्रह्मा जी के सुझाव पर उन्होंने भगवान श्रीगणेश का आह्वान किया।
गणेश जी ने लेखन हेतु एक अत्यंत कठिन शर्त रखी—”मेरी लेखनी क्षण भर के लिए भी रुकनी नहीं चाहिए। जिस क्षण आपकी वाणी रुकी, मैं लिखना छोड़ दूँगा।” अब चुनौती व्यास जी के समक्ष थी, क्योंकि उन्हें लाखों श्लोकों की रचना करनी थी। व्यास जी ने मुस्कुराते हुए एक प्रति-शर्त रखी—”हे गणाधिपति! मुझे स्वीकार है, परंतु आप भी कोई भी श्लोक बिना उसका अर्थ समझे नहीं लिखेंगे।”
यहीं से आरंभ हुआ वह अद्भुत बौद्धिक द्वंद्व। व्यास जी बीच-बीच में ऐसे ‘कूट श्लोक‘ रच देते थे, जिनका अर्थ अत्यंत गूढ़ होता था। जब तक गणेश जी उन श्लोकों का अर्थ समझते, तब तक व्यास जी अगले सैकड़ों नए श्लोकों की मानसिक रचना कर लेते थे। महाभारत में ऐसे लगभग 8,800 श्लोक हैं, जिनका रहस्य आज भी विद्वानों के लिए पहेली बना हुआ है।
