भोलेनाथ भगवान् शंकर की अद्भुत महिमा। भाग १

सकल मनोरथ सिद्धिदाता आशुतोष भोलेनाथ भगवान् शंकर की अद्भुत महिमा !

शान्तं पद्मासनस्थं शशधरमुकुटं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रं शूलं वज्रं च खड्गं परशुमभयदं दक्षभागे वहन्तम् |

नागं पाशं च घंटा प्रलयहुतवहं साङ्कुशं वामभागे नानालंकारयुक्तं स्फटिकमणिनिभं पार्वतीशं नमामि ||

जो शान्तस्वरूप हैं, कमल के आसनपर विराजमान हैं, मस्तकपर चन्द्रमा का मुकुट धारण करनेवाले हैं, जिनके पांच मुख हैं, तीन नेत्र हैं, जो अपने दाहिने भाग की भुजाओं में शूल, वज्र, खड्ग, परशु और अभयमुद्रा धारण करते हैं तथा वामभाग की भुजाओं में सर्प, पाश, घंटा, प्रलयाग्नि और अंकुश धारण किये रहते हैं, उन नाना अलंकारों से विभूषित एवं स्फटिकमणि के समान श्वेतवर्ण भगवान् पार्वतीपति को नमस्कार करता हूँ

भगवान् शंकर की अद्भुत महिमा !

  • भगवान् महादेव, शिव, शंकर, शम्भू, ज्ञान, योग, वैराग्य, भक्ति के ही भण्डार नहीं बल्कि आगम (तंत्र), मन्त्र, यंत्र, नृत्य, वाद्य, संगीत , व्याकरण एवं सभी कलाओं और विद्याओं के आचार्य भी हैं । उनका वास्तविक स्वरुप अत्यंत सौम्य एवं शांतिदायक है  (कर्पूरगौरं करुणावतारम) ।
  • शिव का अर्थ है कल्याण, उन्हें आशुतोष भी कहते हैं, आशु का अर्थ अतिशीघ्र तोष यानि प्रसन्न होना अर्थात भगवान् शिव बहुत सरल साधनों और उपासना से शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं ।
  • लिंग पुराण: शिव अविनाशी परब्रह्म निर्दोष, सर्वसृष्टि के स्वामी, नर्गुण, अलख, ईश्वरों के ईश्वर, सर्वश्रेष्ठ , विश्वंभर, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, महायोगी और संहारकर्ता हैं
  • सनातन धर्म ग्रंथों में जो त्रिदेव हैं – ब्रह्मा विष्णु महेश, उनमें विष्णु जी सत्व गुण प्रधान हैं, ब्रह्मा जी रजोगुण और शंकर जी तमोगुण प्रधान हैं । तमोगुण की अज्ञान-वश ठीक-ठीक समझ न होने से ख्याति कुछ कुचर्चित है, थोड़ा चिंतन करें तो रजोगुण और सत्व-गुण का आधार तमोगुण सिद्ध होता है । जैसे तमोगुणी निद्रा और विश्राम के बिना सत्वगुण और रजोगुण न ही स्थिर रह सकते हैं न ही उनके कोई कार्य सफल हो सकते हैं ।
  • उपासना की दृष्टि से शंकर जी तमोगुण के देव कहे गए इसका तात्पर्य उनका बहुत ही दयालु स्वभाव है । उनका एक नाम भोले नाथ भी इसीलिए प्रसिद्ध है । जिस दोष या अपवित्रता से घृणा की जाती भगवान् शंकर  उनको भी अनदेखा कर देते हैं, बड़े ही शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं । , भक्त की थोड़ी ही सेवा उपासना से प्रसन्न होकर सभी कुछ प्रदान कर देते हैं ।

भगवान् शिव सर्वज्ञ हैं! विद्यातीर्थ हैं !

  • पुराणों में भगवान् शंकर को विद्या का प्रधान देवता माना गया है, वे ही विश्व के समस्त समस्त ज्ञान का स्रोत हैं । सही मायनों में शिव ही जगत गुरु हैं और ज्ञान पाने के इक्षुक व्यक्तियों को भगवान् शंकर की ही आराधना करने का शास्त्रों में आदेश है।
  • संस्कृत व्याकरण रचियताओं के कुल गुरु महर्षि पाणिनि के व्याकरण सूत्रों की सिद्धि देवाधिदेव महादेव की ही कृपा कटाक्ष से हुई ।
  • शिव जी ही तंत्र शास्त्र (आगम) के प्रवर्तक एवं योग शास्त्र के प्रणेता बताये गए हैं । उन्हें ही सभी विद्याओं का आचार्य कहा गया है – ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः

ॐ ईशान सर्व विद्यानां ईश्वर सर्व भूतानां ब्रह्माधिपति र्ब्रह्मणोधिपतिर्ब्रह्मा शिवोमेऽ स्तु सदाशिवोम्

जो सम्पूर्ण विद्याओं के ईश्वर, समस्त भूतोंके अधीश्वर, ब्रह्म-वेदके अधिपति, ब्रह्म-बल-वीर्यके प्रतिपालक तथा साक्षात् ब्रह्मा एवं परमात्मा हैं, वे सच्चिदानन्दमय शिव मेरे लिये नित्य कल्याण-स्वरूप बने रहें

जगतगुरु भगवन शंकर!

  • हर बार सृष्टि के आरंभ में भगवान् शंकर योगाचार्य के रूप में अवतीर्ण होकर शिष्यों को शिक्षा प्रदान करते हैं वे प्रथम शिष्य रुरु, दधीचि, अगस्त्य और उपमन्यु हैं। ये पशुपति के उपासक और पाशुपत संहिताओं के प्रवर्तक हुए। इनके वंश में हज़ारों गुरु उत्पन्न हुए शिवपुराण की वायवीय संहिता में इन योगाचार्यों का वर्णन हैं ।
  • प्रथम २८ योगाचार्य हुए ४ प्रथम शिष्यों के ७ शिष्य = ४ X ७= २८, इन २८ गुरुओं के ४चार चार शिष्य हुए जिनकी कुल संख्या २८ X ४ = ११२ हुई। इनमे सनत्कुमार, सनक, सनन्दन, सनातन, कुथुमी, मित्रक, आदि के भी नाम हैं  । और लिखा हैं संसार की मंगल कामना ही इनका वृत है।

भगवान् शिव की लिङ्गोपासना

वेदों में भगवान् शिव का पूजन सगुन साकार मूर्ति के रूप में और निर्गुण निराकार रूप में भी होती है । भक्त अपनी भावना अनुसार शिव जी का पूजन अनेक रूपों में करते है साम्ब-सदाशिव, उमा-महेश्वर, अर्धनारीश्वर, महामृत्युंजय, पंचवक्त्र, पशुपति, कृतिवास, दक्षिणामूर्ति, योगीश्वर आदि…  ।

इसके अतिरिक्त भगवान् शिव की पांच मूर्तियां हैं- ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव और सद्योजात,  पंचवक्त्र पूजन में इन्ही पांच नामों से पंचानन महादेव का पूजन होता है।

शिवलिंग पूजन की विशेष महिमा बताई गयी है । शिवलिंग पूजन के अनेक विधान हैं, और अनेक प्रकार के शिवलिंगों को बनाने के और प्रतिष्ठा करने के उपरांत पूजन आदि का विधान है, अलग अलग कामना हेतु विभिन्न वस्तुओं से शिवलिंग बनाये जाते हैं।  जैसे पार्थिव (मिट्टी), पुष्प, गंध (कस्तूरी,चन्दन कुमकुम), गेहूं या चावल के आटेसे ,  शक्कर, भस्म , पारद, चांदी, सोना, स्फटिक, मोती, रत्न आदि अनेक वस्तुओं से लिंग बना कर उनके पूजन की विधि भी शास्त्रों में बताई गयी है।

 

भगवान् शंकर को जो प्रिय है शिव भक्तों को वो पता होना चाहिए

  • शिव जी को सबसे अधिक प्रिय है राम नाम : भगवान् शंकर स्वयं ही सबसे बड़े वैष्णव हैं (हरि चरणामृतरूपा गंगा जी को जटाओं में धारण करते हैं (इसलिए उनका एक नाम गंगाधर है ) ।
  • बिल्वपत्र भगवान् शंकर को अत्यंत प्रिय हैं पर बिल्व पत्र तोड़ने और अर्पण करने के नियम जानकर ही शिव जी बिल्व पत्र चढ़ाने चाहिए।
  • अभिषेकप्रियः शिवः – शिव जी को अभिषेक बहुत प्रिय है जो घर के मंदिर में शिवलिंग पूजन करते हैं उन्हें जल से अभिषेक तो रोज़ करना ही चाहिए।
  • शिव मन्त्र जाप के लिए रुद्राक्ष माला ही उपयुक्त है । भक्त को चाहिए की भगवान् शंकर का पूजन-ध्यान करते समय उनकी प्रसन्नता के लिए विधिवत रुद्राक्ष माल धारण करे और त्रिपुण्ड तिलक मस्तक पर धारण करे ।
  • १ आक के फूल को शंकर जी पर चढाने से स्वर्ण दान का फल मिलता है, हज़ार आक के फूलों का फल १ कनेर का फूल से, हज़ार कनेर के फूलों की अपेक्षा १ बिल्वपत्र, हज़ार बिल्वपत्रों की अपेक्षा १ गूमापुष्प (द्रोण पुष्प), हज़ार गुमा से बढ़कर १ चिचिड़ा हज़ार चिचिड़ों (अपामार्ग) से बढ़कर १ कुश का फूल, हज़ार कुश पुष्पों से बढ़कर १ शमीपत्र, हज़ार शमीपत्रों से बढ़कर १ नीलकमल, हज़ार नीलकमलों से बढ़कर १ धतूरा और हज़ार धतूरों से बढ़कर १ शमी का फूल है ।

Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit. Ut elit tellus, luctus nec ullamcorper mattis, pulvinar dapibus leo.

3 thoughts on “भोलेनाथ भगवान् शंकर की अद्भुत महिमा। भाग १”

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Get in Touch

© 2025 Dharm Sanatan. All rights reserved.

Scroll to Top