

८४ लाख योनि विषय क्यों जानना आवश्यक है?
- सभी हिन्दुओं के लिए सनातन धर्म के सत्य, रहस्य और वैज्ञानिक तथ्य जानने आवश्यक हैं, जिससे सभी जानकारी सही रूप में उनकी संतान को मिले। इन्हीं जानकारियों के न होने के कारण तुच्छ प्रलोभनों के द्वारा धर्म परिवर्तन हो रहा है ! सनातनी-हिन्दू मलेच्छ बन रहे हैं ।
- सारे विश्व में जितने भी मलेच्छ हैं और विभिन्न मत और पंथ में जो व्यक्ति हैं वे सभी और उन सभी के पूर्वज भी सनातन धर्म अनुयायी ही थे। अगर उन्हें, सनातन धर्म की परंपरा, रीति रिवाज और सनातन धर्म के अनेकों योगदान जो ऋषि मुनियों, ने वेद पुराणों ने दिए, उसकी सही जानकारी होती तो वो किसी भी परिस्थिति में सनातन धर्म से दूर नहीं होते।
- सनातनी हिन्दुओं को तरह-तरह के धन आदि का प्रलोभन देकर, और डरा धमका कर, झूँठे कथा कहानी सुना कर भोले-भाले लोगों को अपने चंगुल में फंसा कर आज मलेच्छों की इतनी अधिक संख्या हो गयी की पूरे विश्व में विकट उत्पात हो रहे हैं। लगभग ५०० वर्ष के विदेशी शासन के कारण भी हमारी परम्पराएं संस्कृति सब भुला दी गयी आज विश्व भर में बसे अधिकतर हिन्दू परिवार अपनी संतान को सनातन धर्म सम्बन्धी सही जानकारी देने में असमर्थ हैं, जिसके फलस्वरूप मलेच्छों के संस्कार, उनका गलत खान-पान और व्याभिचार आदि कुकृत्यों से अमूल्य मनुष्य जीवन को व्यर्थ में गँवा रहे हैं।
- ८४ लाख योनि विषय सृष्टि की उत्पत्ति का विषय है और बहुत महत्वपूर्ण है। बल्कि अगर कहा जाये की मनुष्य योनि सर्वश्रेष्ठ योनि क्यों है यह जानने के लिए सभी योनियों और उनकी उत्पत्ति के बारे में सत्य जानकारी इसी विषय के द्वारा सिद्ध की जा सकती है
- हमारे शास्त्र जिस विस्तार से इन योनिओं का वर्गीकरण कर सभी प्रकार के जीवों की विशेषताएं बताते हैं वह आधुनिक विज्ञान के लिए चमत्कार से कम नहीं है
विदेशी शिक्षा प्रणाली के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति आदि के विषय में सभी सामग्री कल्पित है !
- विदेशी शिक्षा प्रणाली में बहुत से सनातन धर्म सिद्धांतों को अनदेखा किया गया है और उनके गलत सिद्धांत थोपे गए हैं, जिनमें ज्ञान विज्ञान और सिद्धांत आदि में प्रमुख हैं –
- सृष्टि की संरचना (Modern science version is Hypothetical Theories of evolution),, ८४ लाख योनियां (२० लाख के लगभग आधुनिक वैज्ञानिकों के अनुसार),
- योग विज्ञान,
- पुनर्जन्म,
- ज्योतिष विज्ञान ।
- आधुनिक विज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाण ही मानता है इसी कारण से ज्योतिष विद्या के अकाट्य सत्य भी उसकी दृष्टि में सत्य नहीं माने गए जब तक उन्हें उसका पक्का प्रमाण नहीं मिला । उदाहरण के लिए:
- सनातन धर्म शास्त्रों में ज्योतिष में पृथ्वी से सूर्य चन्द्रमा की दूरी, उनका माप गृह नक्षत्रों का वर्णन और उनके प्रभाव जो अरबों वर्षों से हैं वे यंत्रों के माध्यम से अब सत्य माने जा रहे हैं ।
- आधुनिक विश्व के सभी calendars भारतीय ज्योतिष विद्या की देन है Calendar शब्द भी ज्योतिष के कालांतर शब्द से बना है।
- सप्ताह में सात दिन ही क्यों एक वर्ष में १२ मास ही क्यों आदि अनेकों रहस्यों के समाधान ज्योतिष शास्त्र में ही मिलते हैं । यह जानकारी सभी सनातनी हिन्दुओं को पता होना आवश्यक है ।
- अगर ८४ लाख योनिओं के बारे में सत्य मानने के लिए हम आधुनिक विज्ञान की प्रतीक्षा करेंगे तो हजारों वर्ष लग जाएंगे क्योंकि आधुनिक विज्ञान अनुसार अभी लगभग २० लाख से भी कम जीव (योनिओं ) के बारे में पता पड़ पाया है ।
८४ लाख योनियों की उत्पत्ति, सृष्टि का क्रम, सनातन धर्म शास्त्रों में ही सत्य है !
उसका सबसे बड़ा प्रमाण !
८४ लाख योनियों की उत्पत्ति का क्रम और सृष्टि का क्रम केवल सनातन धर्म शास्त्रों में ही सत्य है । उसका सबसे बड़ा प्रमाण हैं ये प्रश्न जिनका उत्तर न कभी कोई दे पाया है न ही दे पायेगा :
- “पहले मुर्गी हुई की अंडा ” ?
- “पहले बीज हुआ की पेड़” ?
इन प्रश्नों का उत्तर सनातन धर्म शास्त्रों में विस्तार से समझाया गया है । हर बार महाप्रलय के बाद (ब्रह्मा जी के एक दिन / कल्प के समाप्त होने पर महाप्रलय होती है) सभी अनंत-अनंत जीवात्मायें, पंच-तत्व, माया सूक्ष्म रूप से भगवान् के उदर में विद्यमान हो जाते हैं।
सृष्टि की उत्पत्ति का एक निश्चित क्रम होता है । जो जीवात्माएं और पंचतत्व प्रलय काल में भगवान् के अंदर सूक्ष्म रूप से स्थित रहते हैं उनसे ही सृष्टि काल में भगवान् के ही संकल्प से क्रम से सृष्टि की पुनः संरचना होती है।
न पहले मुर्गी आयी न अंडा और न बीज या पेड़, भगवान् के संकल्प से पूरी सृष्टि की संरचना हर महाप्रलय के बाद उसके पहले (महाप्रलय के) की सृष्टि के समान ही होती है {सूर्याचंद्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत ।}। सभी जीव जिस स्थिति में भगवान् के उदर में प्रलय काल में गए थे उसी स्थिति में उनकी पुनः उत्पत्ति नए सर्ग (सृष्टि) में होती है जिसका क्रम हम आगे जानेंगे ।


सृष्टि का क्रम
7. वैकृत सर्ग –
वनस्पति, ओषधि, लता, त्वक्सार, वीरुध और द्रुम-ये छह प्रकारके स्थावर प्राणी हैं। जो बिना मौर (पुष्प) आये ही फलते हैं – वट, पीपल, पाकर (प्लक्ष), गूलर, अंजीर आदि, वे वनस्पति हैं । जो फलोंके पक जानेपर नष्ट (सूख) जाते हैं; वे धान, जौ, गेहूँ, चना आदि ओषधि हैं । जो वृक्षादि का आश्रय लेकर बढ़ते हैं, वे गिलोय आदि लता हैं । जिनकी छाल बहुत कठोर होती है, छाल के कारण ही जिन्हें दृढ़ (मजबूत) माना जाता है, वे बाँस, बेंत आदि त्वक्सार हैं । जो लता पृथ्वी पर ही फैलती है, कठोर होनेसे ऊपरकी ओर नहीं चढ़ती; वे खरबूज, तरबूज आदि वीरुध् हैं ।
अभिप्राय यह है कि वृक्षादि अन्य आश्रय के विना भी जो पृथ्वीपर फैलकर फल-फूल देने में समर्थ हैं, उन्हें वीरुधू कहते हैं । जिनमें पहले पुष्प आकर पुनः उन पुष्पोंके स्थानमें ही फल लगते हैं; वे आम, जामुन आदि द्रुम हैं । इनका संचार नीचे (जड़) से ऊपरकी ओर होता है । अत एव उन्हें उत्स्रोतस् कहते हैं । इनमें प्रायः ज्ञानशक्ति प्रकट नहीं रहती, ये भीतर ही भीतर केवल स्पर्शका अनुभव करते हैं । यह सप्तम वैकृतसर्ग है ।

8. तिर्यक् सर्ग–
अष्टम तिर्यक्-सर्ग है । गौ, बकरा, भैंसा, कृष्णमृग, सूअर, नीलगाय, रुरु नामक मृग, भेड़ और ऊँट-ये द्विशफ (दो खुरोंवाले) पशु कहलाते हैं । गधा, घोड़ा, खच्चर, गौरमृग, शरभ और चमरी- ये एकशफ (एक खुर वाले) हैं। कुत्ता, गीदड़, भेड़िया, बाघ, विलाव, खरगोश, साही, सिंह, बन्दर, हाथी, कछुआ, गोह और मगर आदि पाँच नखवाले पशु हैं । ये अट्ठाईस प्रकारके पशु एवम् कंक (बगुला ), गिद्ध, बटेर, बाज, भास, भल्लूक, मोर, हंस, सारस, चकवा, कौआ और उल्लू आदि पक्षी तिर्यक्सर्गके अन्तर्गत हैं । इनमें धर्म और मोक्षके उपयुक्त ज्ञानशक्तिका उत्कर्ष नहीं होता । तमोगुण की अधिकताके कारण ये आहार-निद्रा-भय-मैथुन में ही संलग्न रहते हैं । इन्हें सूँघने मात्र से वस्तुओंका ज्ञान हो जाता है इनके हृदय में विचारशक्ति या दूरदर्शिता नहीं होती । ‘अविदो भूरितमसो घ्राणज्ञा हृद्यवेदिनः ।’ (भागवत- ३.१०.२०)

9. मानव सर्ग – मनुष्य प्रजाति की सृष्टि
नवम सर्ग मनुष्यों का है। मानव सर्ग एक ही प्रकार का है। इसके आहार का प्रवाह ऊपर से नीचे की ओर होता है; अत एव इसे अर्वाक्-स्रोतस् कहते हैं। मनुष्य रजोगुण-प्रधान, कर्म-परायण और दुःख-रूप विषयों में ही सुख मानने वाले होते हैं।-
“अर्वाक् स्रोतस्तु नवमः क्षत्तरेकविधो नृणाम् । रजोधिकाः कर्मपरा दुःखे च सुखमानिनः ॥”
(श्रीमद्भागवत ३.१०.२५)

देव सर्ग
– (दशम देवसर्ग है ) यह देव, पितर, असुर, गन्धर्व – अप्सरा, यक्ष, राक्षस, सिद्ध-चारण-विद्याधर, भूत-प्रेत-पिशाच, किन्नर-किम्पुरुष और अश्व-मुख आदि भेद से आठ प्रकार का है। ।
कुमारसर्ग …
इनके अतिरिक्त श्रीब्रह्माजीके मानस पुत्र सनत्कुमारादि ऋषियोंका जो कुमारसर्ग है, वह प्राकृत- वैकृत दोनों प्रकार का है। प्राकृत एवं वैकृत दोनों इसीलिए कहा गया क्योंकि उनकी सृष्टि देव और मनुष्य रूप में होती है।
भाग २ में हम चतुर्विध सृष्टि के बारे में और देव-योनि के अद्भुत रहस्य जानेंगे
दशम सृष्टि देवताओं की कही गई है। इसमें आठ प्रकार शामिल हैं –
देव, पितर, असुर, गंधर्व और अप्सराएं, यक्ष और राक्षस, सिद्ध-चारण-विद्याधर, भूत-प्रेत-पिशाच, किन्नर-किम्पुरुष और अश्वमुख आदि।
द्विविध सृष्टि की व्याख्या
जीव-जंतुओं की सृष्टि दो तरह की होती है – स्थावर (जो चल नहीं सकते, जैसे पेड़) और जंगम (जो चल सकते हैं, जैसे पशु-पक्षी)। इनके अलावा ब्रह्माजी के मानसपुत्र सनत्कुमार आदि ऋषियों की जो मानसिक सृष्टि है, वह भी प्राकृत और वैकृत दोनों मानी जाती है। यानी समस्त संसार स्थावर और जंगम दो प्रकार से बना है।
चतुर्विध सृष्टि
चतुर्विध सृष्टि में उत्पत्ति के अनुसार जीवो का वर्गीकरण किया गया है जो की चार प्रकार के बताए गए हैं – उद्भिज्ज, स्वेदज, अंडज और जरायुज। – पौधे, लताएं, घास आदि **उद्भिज्ज** कहलाते हैं। – पसीने या नमी से पैदा होने वाले कीट-पतंगे **स्वेदज** कहलाते हैं। – जिन जीवों के अंडे होते हैं जैसे पक्षी या सरीसृप, वे **अंडज** कहलाते हैं। – मनुष्य और जानवर जो गर्भ में पैदा होते हैं, वे **जरायुज** कहलाते हैं। इस प्रकार आत्मा इन सभी प्रकार के जीवों में रहती है। उद्भिज्ज जीव पृथ्वी और जल के मेल से उत्पन्न होते हैं, स्वेदज जीव सर्दी-गर्मी या नमी के प्रभाव से पैदा होते हैं, और अंडज जीव बीज या अंडे के क्लेद (तरल भाग) से जन्म लेते हैं।
References
सार्वभौम सनातन सिद्धांत, रचियता – पूर्वाम्नाय गोवर्धनमठ- पुरी पीठाधीश्वर – श्रीमद जगतगुरु शंकराचार्य – पूज्यनीय स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी ।
- https://www.youtube.com/watch?v=iPF2XAzGx2M